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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1570, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1570

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[ 17/208–212 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीकृष्ण और राधाके स्वपक्षीय शुक तथा
सारीके गानका श्रवण :—
वृक्षडाले शुक–शारी दिल दरशन।
ताहा देखि' प्रभुर किछु शुनिते हैल मन॥208॥
शुक–शारिका प्रभुर हाते उड़ि' पड़े।
प्रभुके शुनाञा कृष्णेर गुण–श्लोक पड़े॥209॥
**अनुवाद—**जब वृक्षकी डालके ऊपर शुक और सारी (तोता और मैना) आकर बैठे, उन्हें देखकर महाप्रभुकी उनसे कुछ सुननेकी इच्छा हुई। शुक और सारी उड़कर महाप्रभुके हाथपर आकर बैठ गये तथा शुक श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुको श्लोक सुनाने लगा॥208–209॥
शुकके द्वारा श्रीकृष्णके गुणोंका गान :—
गोविन्दलीलामृत (13/29)—
सौन्दर्यं ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भिनी
वीर्यं कन्दुकिताद्रिवर्यममलाः पारे–परार्द्धं गुणाः।
शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत्प्रभुर्विश्वं
विश्वजनीनकीर्त्तिरवतात् कृष्णो जगन्मोहनः॥210॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीशुकने कहा,—जिनका सौन्दर्य रमणियोंके धैर्यका हरण करता है, जिनकी लीला लक्ष्मीदेवीको स्तम्भित करती है, जिनका बल गोवर्धन पर्वतको गेंदकी भाँति खेलनेकी सामग्री बना देता है, जिनके सब अमल गुण परार्द्धातीत (अनन्त) हैं, जिनका शील–धर्म सभीको आनन्दित करता है, जगतवासियोंके हितकारीरूपमें जिनकी कीर्ति है, वे जगन्मोहन श्रीकृष्ण विश्वका पालन करें॥210॥
अनुभाष्य—
यस्य (कृष्णस्य) सौन्दर्यं (मनोहररूपं) ललनालि–धैर्य–दलनं (ललनालीनां ब्रजाङ्गनासमुहानां धैर्यं दलयितुं शीलं यस्य तत्), यस्य लीला (चिद्विलासमयी क्रीड़ा) रमा–स्तम्भिनी (रमां स्तम्भयितुं क्षोभयितुं शीलं यस्याः सा), यस्य वीर्यं (पराक्रमः),
कन्दुकिताद्रिवर्यं (कन्दुकितः कन्दु Bulk... कन्दुकिताद्रिवर्य्य... कन्दुकीकृतः अद्रिवर्यः गिरिराजः गोवर्धनः येन तत्), यस्य पारे–परार्द्धं (परार्द्धस्य पारं गताः अपरिमेयाः इत्यर्थः) अमलाः (दोषरहिताः) गुणाः, अहो यस्य शीलं (चरितं) सर्वजनानुरञ्जनं (सर्वेषां जनानां भक्तानाम् अनुरञ्जनम् आनन्द–विधायकं) सः अयम् अस्मत्प्रभुः (मादृशदासानाम् एकगतिः) विश्वजनीनकीर्त्तिः (सर्वजनानां हिताय कीर्त्तिः यशः यस्य सः) जगन्मोहनः (भुवन–सुन्दरः) कृष्णः विश्वम् अवतात् (रक्षतु)।
**श्लोक–भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥210॥
शुक–मुखे शुनि' तबे कृष्णेर वर्णन।
शारिका पड़ये तबे राधिका–वर्णन॥211॥
**अनुवाद—**शुकके मुखसे श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर सारिका (मैना) श्रीमती राधिकाके गुणोंका वर्णन करने लगी॥211॥
सारीके द्वारा श्रीराधिकाका गुण–गान :—
गोविन्दलीलामृत (13/30)—
श्रीराधिकायाः प्रियता स्वरूपता
सुशीलता नर्त्तनगानचातुरी।
गुणालिसम्पत् कविता च राजते
जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी॥212॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥212॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**सारीने कहा,—श्रीमती राधिकाकी प्रियता, स्वरूपता [अर्थात् महाभावस्वरूपिणी], सुशीलता, नृत्य–गान–चातुरी, कवित्व आदि गुणराशि भुवनमोहन श्रीकृष्णकी चित्त–विमोहिनी बनकर शोभा पा रही है॥212॥
अनुभाष्य—
श्रीराधिकायाः प्रियता (प्रेम), स्वरूपता (असाधारणसौन्दर्यं, स्वम् आत्मानं रूप्यते निरूप्यते येन तत्, महाभावस्वरूपं वा), सुशीलता (शोभनं शीलं सुचरितं) नर्त्तन–गानचातुरी (नर्त्तनं गानञ्च तयोः चातुरी नैपुण्यं वैदग्ध्यं वा) गुणालि–सम्पत् (गुणानां आली श्रेणी, सैव सम्पत्तिः), कविता (कवित्वं)—सर्वा च जगन्मनोमोहन–चित्तमोहिनी (जगन्मनोमोहनस्य भुवनमोहनस्य कृष्णस्य मनोमोहिनी आनन्दिनी एव) राजते (विराजते)।
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