श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 17/219-229 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आस्ते-व्यस्ते महाप्रभुर लञा बहिर्वास।
जलसेक करे अङ्गे, वस्त्रेर वातास ॥ 220 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको मूर्च्छित देखकर वे ब्राह्मण
बलभद्र भट्टाचार्यके साथ महाप्रभुकी सेवा करनेमें लग
गये। उन्होंने शीघ्रतासे महाप्रभुके शरीरपर जल छिड़का
और उनके बहिर्वास वस्त्रको लेकर उससे हवा करने
लगे ॥ 219-220 ॥
अनुभाष्य—'सन्तर्पण'—यत्नपूर्वक सेवा ॥ 219 ॥
सतरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुके कानमें श्रीकृष्णनामका उच्चारण,
महाप्रभुमें चेतनता और उनका लोट-पोट खाना :-
प्रभु-कर्णे कृष्णनाम कहे उच्च करि'।
चेतन पाञा प्रभु या'न गड़ागड़ि ॥ 221 ॥
अनुवाद—वे महाप्रभुके कानमें उच्च स्वरसे
श्रीकृष्णनाम सुनाने लगे। श्रीकृष्णनाम सुनकर महाप्रभुकी
चेतनता तो लौट आयी, किन्तु अभी भी प्रेमावेशमें वे
भूमिपर लोट-पोट खाने लगे ॥ 221 ॥
भट्टके प्रयत्नसे महाप्रभुका आवेश शान्त होना :-
कण्टक-दुर्गम वने अङ्ग क्षत हैल।
भट्टाचार्य कोले करि' प्रभुरे सुस्थ कैल ॥ 222 ॥
अनुवाद—काँटोंसे भरे दुर्गम वनमें भूमिपर लोटनेसे
महाप्रभुके अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। बलभद्र भट्टाचार्यने
महाप्रभुको गोदमें लेकर उनके आवेशको कुछ शान्त
किया ॥ 222 ॥
प्रेमावेशमें महाप्रभुके द्वारा हरिध्वनि :-
कृष्णावेशे प्रभुर प्रेमे गरगर मन।
'बोल्' 'बोल्' करि' उठि' करेन नर्त्तन ॥ 223 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णके आवेशमें महाप्रभुका मन प्रेममें
विचलित हो रहा था। वे उसी समय उठ खड़े हुए और
[क्योंकि वे श्रीकृष्णनाम सुनना चाहते थे, इसलिये]
'बोलो', 'बोलो' कहकर नृत्य करने लगे ॥ 223 ॥
श्रीकृष्णनामकीर्तन, महाप्रभुकी यात्रा :-
भट्टाचार्य, सेइ विप्र 'कृष्णनाम' गाय।
नाचिते नाचिते पथे प्रभु चलि' याय ॥ 224 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञानुसार बलभद्र भट्टाचार्य
और वे ब्राह्मण—दोनों श्रीकृष्णनामका कीर्तन करने
लगे। तब महाप्रभु नाचते-नाचते मार्गमें चल पड़े॥ 224 ॥
ब्राह्मणको विस्मय और महाप्रभुके लिये चिन्ता :-
प्रभुर प्रेमावेश देखि' ब्राह्मण—विस्मित।
प्रभुर रक्षा लागि' विप्र हइला चिन्तित ॥ 225 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके प्रेमावेशको देखकर ब्राह्मण
विस्मित हो गये। तब वे महाप्रभुकी रक्षाके लिये चिन्ता
करने लगे ॥ 225 ॥
पुरीकी अपेक्षा वृन्दावन-यात्राके पथमें अधिक प्रेमावेश :-
नीलाचले छिला यैछे प्रेमावेश मन।
वृन्दावन याइते पथे हैल शतगुण ॥ 226 ॥
अनुवाद—महाप्रभुका मन नीलाचलमें जैसे प्रेमके
आवेशमें रहता था, वृन्दावन जानेके पथमें वह सौ-गुणा
अधिक प्रेमके आवेशमें डूब गया था ॥ 226 ॥
यात्रा-पथकी अपेक्षा मथुराके दर्शनसे, और उसकी अपेक्षा
वृन्दावनके भ्रमणमें अधिक प्रेम :-
सहस्रगुण प्रेम बाड़े मथुरा-दरशने।
लक्षगुण प्रेम बाड़े, भ्रमेण यबे वने ॥ 227 ॥
साक्षात् वृन्दावनमें आकर प्रतिक्षण
गाढ़-श्रीकृष्णप्रेममें निमग्न :-
अन्य-देशे प्रेम उछले 'वृन्दावन'-नामे।
साक्षात् भ्रमये एबे सेइ वृन्दावने ॥ 228 ॥
अभ्यासवश दैनिक कृत्यादिका सम्पन्न होना :-
प्रेमे गरगर मन रात्रि-दिवसे।
स्नान-भिक्षादि-निर्वाह करेन अभ्यासे ॥ 229 ॥
अनुवाद—मथुराके दर्शनसे उनका प्रेम हजार गुणा
बढ़ गया था। परन्तु जब महाप्रभु वृन्दावनके वनोंमें
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