सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1532, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1532

[ 16/253-267 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीकाशीमिश्र, श्रीरामानन्द राय, श्रीप्रद्युम्न, श्रीसार्वभौम सेवक हैं। दोनों ही विद्या-भक्ति-बुद्धिबलमें बहुत
भट्टाचार्य, श्रीवाणीनाथ, श्रीशिखि माहिति आदि जितने अनुभवी हैं, तथापि वे दोनों स्वयंको तृणसे भी अधिक
भक्त थे, वे सब आकर महाप्रभुसे मिले। श्रीगदाधर हीन मानते हैं। उन दोनोंकी दीनताको देखकर, सुनकर
पण्डित भी तब आकर महाप्रभुसे मिले। महाप्रभु सभीके तो पत्थर भी पिघल जाँय। मैंने उनके व्यवहारसे
सामने कहने लगे, - "मैंने बङ्गालसे होकर वृन्दावन सन्तुष्ट होकर उन दोनोंसे कहा, - 'तुम दोनों उत्तम
जानेका निर्णय इसलिये किया था कि वहाँ अपनी माता होनेपर भी अपनेको हीन मानते हो, इसलिये श्रीकृष्ण
और गङ्गादेवीके चरणोंके दर्शन करते हुए जाऊँगा। इस अतिशीघ्र ही तुम दोनोंका उद्धार करेंगे ॥ '260-264 ॥
विचारसे मैं बङ्गाल गया था। परन्तु वहाँ हजारों भक्त अनुभाष्य-तुम लोग इस संसारमें 'परम उत्तम'
मेरे साथ चलने लगे। लाखों-लाखों लोग कौतूहलपूर्वक होकर भी स्वयंको 'सबसे अधिक अधम' मान रहे हो।
मुझे देखनेके लिये आते। लोगोंकी भीड़के कारण मैं इसलिये श्रीकृष्ण तुम्हें इस 'संसार-बन्धन' (?)से मुक्त
रास्तेमें चल नहीं पाता था। मैं जहाँ भी रहता, वहाँ करके अपने नित्यदास्यमें नियुक्त करेंगे। यद्यपि तुम
इतनी अधिक भीड़ होती कि वहाँपर घर-दीवार आदि साक्षात् नित्यसिद्ध ब्रजपरिकर हो, तथापि ऐसी लीला
भी टूट जाते। मैं जहाँ भी देखता, मुझे लोगोंकी भीड़ कर रहे हो कि लोगोंको उनकी बाहरी दृष्टिसे अथवा
ही दिखलायी देती ॥ 253-259 ॥ जड़ेन्द्रियोंके द्वारा बद्धजीव ही दिखायी देते हो ॥ 264 ॥
रामकेलि ग्राममें श्रीरूप-सनातनके साथ विदायीके समय श्रीसनातनके द्वारा
मिलन और उनके परिचयका वर्णन :- महाप्रभुको सतर्क करना :-
कष्टे-सृष्ट्ये करि' गेलाङ रामकेलि-ग्राम। एत कहि' आमि यबे विदाय ताँरे दिल।
आमार ठाञि आइला 'रूप' 'सनातन' नाम॥ 260॥ गमनकाले सनातन 'प्रहेली' कहिल॥ 265॥
दुइ भाइ-भक्तराज, कृष्णकृपा-पात्र। बहुतसे विभिन्न उद्देश्यवाले लोगोंके
व्यवहारे-राजमन्त्री हय राजपात्र॥ 261॥ साथ वृन्दावन-दर्शन अनुचित :-
विद्या-भक्ति-बुद्धि-बले परम प्रवीण। 'याँर सङ्गे हय एइ लोक लक्ष-कोटि।
तबु आपनाके माने तृण हैते हीन॥ 262॥ वृन्दावन याइवार एइ नहे परिपाटी ॥ '266॥
ताँर दैन्य देखि' शुनि' पाषाण विदरे। अनुवाद-इतना कहकर मैंने जब उन्हें विदायी दी,
आमि तुष्ट हञा तबे कहिलुँ दोँहारे॥ 263॥ तब जाते समय सनातनने एक गूढ़ बात कही, - 'जिनके
श्रीरूप-सनातनके प्रति महाप्रभुका उपदेश :- साथ लाखों-करोड़ों लोग हो, (उन्हें यह समझना चाहिये
'उत्तम हञा हीन करि' मानह आपनारे। कि) वृन्दावन जानेकी यह परिपाटी नहीं है ॥ '265-266॥
अचिरे करिबे कृष्ण तोमार उद्धारे॥ '264॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'प्रहेली' - प्रहेलिका, पहेली ॥ 265 ॥
अनुवाद-बड़े कष्टसे मैं रामकेलि ग्राममें गया। ऐसा होनेपर भी महाप्रभुकी लोगोंकी भीड़के
वहाँ मेरे पास रूप और सनातन-दो भाई आये। दोनों साथ यात्रा, बादमें श्रीसनातनके वचनपर
भाई बहुत उन्नत भक्त और श्रीकृष्णके कृपापात्र हैं। विचार करके लोगोंके सङ्गका त्याग :-
व्यवहारिक दृष्टिसे दोनों राजमन्त्री होनेके कारण राजाके तबु आमि शुनिलुँ मात्र, ना कैलुँ अवधान।
प्राते चलि' आइलाङ 'कानाइर नाटशाला'- ग्राम॥ 267॥
86 |