श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1533, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण दिया गया है:
रात्रिकाले मने आमि विचार करिल।
सनातन मोरे किवा ‘प्रहेली’ कहिल ॥ 268 ॥
भालमत’ कहिल, — मोर एत लोक सङ्गे।
लोक देखि’ कहिबे मोरे — ‘एइ एक ढङ्गे’ ॥ 269 ॥
अनुवाद—उस समय मैंने उस बातको केवल सुन
लिया, किन्तु उसपर कोई अधिक ध्यान नहीं दिया।
और प्रातःकाल मैं ‘कानाइ नाटशाला’-ग्राममें चला
आया। वहाँ रातके समय मैंने मनमें विचार किया कि
सनातनने मुझसे क्या ‘पहेली’ कही थी। तब मैंने
समझा कि सनातनने ठीक ही तो कहा है। मेरे साथ
तो इतने लोगोंकी भीड़ है, दूसरे लोग इतनी भीड़को
देखकर मुझे कहेंगे, —‘यह एक ढोंगी है ॥’267-269 ॥
निगूढ़ भजनस्थल वृन्दावनमें अति अन्तरङ्ग मर्मों भक्तके
अतिरिक्त बहिरङ्ग लोगोंका अनधिकार :—
‘दुर्लभ’ ‘दुर्गम’ सेइ ‘निर्जन’ वृन्दावन।
एकाकी याइब, किवा सङ्गे एकजन ॥ 270 ॥
पूर्व महाजन श्रीमाधवपुरीका अकेले ही वृन्दावन जाना :—
माधवेन्द्रपुरी तथा गेला एकेश्वरे।
दुग्धदान-छले कृष्ण-साक्षात् हइल ताँरे ॥ 271 ॥
अनुवाद—‘दुर्लभ’, ‘दुर्गम’ उस ‘निर्जन’ वृन्दावनमें
मैं अकेला ही जाऊँगा या फिर केवल किसी एक
व्यक्तिके साथ। श्रीमाधवेन्द्रपुरी वहाँ अकेले ही गये थे,
दूध देनेके छलसे श्रीकृष्णने उन्हें अपने दर्शन दिये
थे॥ 270-271 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 4/20-33, 172 और 179
संख्या देखें ॥ 271 ॥
महाप्रभुके द्वारा बहुत लोगोंकी भीड़का अनादर :—
वादियार वाजि पाति’ चलिलाङ तथारे।
बहु-सङ्गे वृन्दावन गमन ना करे ॥ 272 ॥
एका याइब, किवा सङ्गे भृत्य एकजने।
तबे से शोभय वृन्दावनेर गमन ॥ 273 ॥
वृन्दावन याब काँहा ‘एकाकी’ हञा!
सैन्य सङ्गे चलियाछि ढाक बाजाञा ! ॥ 274 ॥
अनुवाद—तब मैं समझा कि मैं तो बाजीगरकी
भाँति ढोल पीटते हुए वृन्दावनके लिये जा रहा हूँ।
बहुतसे लोगोंके साथ वहाँ नहीं जाना चाहिये। मैं
अकेला ही जाऊँगा या फिर किसी एक सेवकको
अपने साथ लूँगा। तभी वृन्दावन-यात्रा शोभनीय होगी।
कहाँ तो मुझे अकेले ही वृन्दावन जाना चाहिये! और
कहाँ मैं ढोल बजाते हुए सेनाके साथमें चल पड़ा
हूँ॥ 272-274 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘वादिया’ अर्थात् बाजीगर खेल
दिखानेके लिये जब किसी स्थानपर बैठते हैं, तब जिस
प्रकार लोगोंकी भीड़ होती है, उसी प्रकार लोगोंकी
भीड़को लेकर मैं वृन्दावन जा रहा हूँ, यह अच्छा नहीं
है ॥ 272 ॥
वृन्दावन जाना छोड़कर महाप्रभुका
पुनः गङ्गाके तटपर आगमन :—
धिक्, धिक् आपनाके बलि’ हइलाङ अस्थिर।
निवृत्त हञा पुनः आइलाङ गङ्गातीर ॥ 275 ॥
कम भक्तोंके साथ पुरीमें आगमन :—
भक्तगणे राखिया आइनु स्थाने-स्थाने।
आमा-सङ्गे आइला सबे पाँच-छय जने ॥ 276 ॥
सभीसे निर्विघ्न वृन्दावन-जानेका परामर्श माँगना :—
निर्विघ्ने एबे कैछे याइब वृन्दावने।
सबे मेलि’ युक्ति देह’ हञा परसन्ने ॥ 277 ॥
छोड़कर जानेसे दुःखी श्रीगदाधरको
प्रेमके द्वारा सन्तुष्ट करना :—
गदाधरे छाड़ि’ गेनु, इँहो दुःख पाइल।
सेइहेतु वृन्दावन याइते नारिल ॥”278 ॥
अनुवाद—मैं स्वयंको धिक्कार देते हुए क्षुब्ध हो
गया। इस प्रकार वृन्दावन जानेकी अभिलाषाको छोड़कर
मैं पुनः गङ्गातटपर आ गया। मैं भक्तोंको उनके-उनके