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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1531

सोलहवाँ अध्याय 16/236-259 ]
अन्त्यलीला, 6/13-15 संख्या देखें॥ 236-244 ॥
श्रीनिताइ श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे महाप्रभुके द्वारा पुरी
होकर वृन्दावन-जानेके अनुमोदनकी याचना :-
इँहा प्रभु एक एक करि' सब भक्तगण।
अद्वैत-नित्यानन्दादि यत भक्तजन ॥ 245 ॥
सबा आलिङ्गन करि' कहेन गोसाञि।
“सबे आज्ञा देह'—आमि नीलाचले याइ ॥ 246 ॥
उस वर्ष पुरीमें जानेके लिये सभीको निषेध-आज्ञा :-
सबार सहित इँहा आमार हइल मिलन।
ए वर्ष 'नीलाद्रि' केह ना करिह गमन ॥ 247 ॥
इहाँ हैते अवश्य आमि 'वृन्दावन' याब।
सबे आज्ञा देह', तबे निर्विघ्ने आसिब ॥"248 ॥
अनुवाद—इधर शान्तिपुरमें महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द आदि अपने सभी भक्तोंको एक-एक करके उन सबका आलिङ्गन करनेके बाद कहा, —“आप सब अब मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं नीलाचल जाऊँ। आप सबके साथ मेरा यहाँपर मिलन हो ही गया है, इसलिये इस वर्ष किसीको भी जगन्नाथ पुरीमें आनेकी आवश्यकता नहीं है। श्रीजगन्नाथपुरीसे मैं अवश्य ही वृन्दावन जाऊँगा। यदि आप सब मुझे आज्ञा देंगे, तो मैं निर्विघ्न वहाँसे लौटकर आऊँगा ॥ 245-248 ॥
शचीमातासे दीनतापूर्वक अनुमति ग्रहण :-
मातार चरणे धरि' बहु विनय कैल।
वृन्दावन याइते ताँर आज्ञा लइल ॥ 249 ॥
माताको शान्तिपुरसे नवद्वीप भेजना, पुरी-यात्रा :-
तबे नवद्वीपे ताँरे दिल पाठाञा।
नीलाद्रि चलिला, सङ्गे भक्तगण लञा ॥ 250 ॥
पुरीमें आगमन :-
सेइ सब लोक पथे करेन सेवन।
सुखे नीलाचले आइला शचीर नन्दन ॥ 251 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने शचीमाताके चरणोंको पकड़कर उनकी आज्ञाके लिये प्रार्थना की। माताने तब उनको वृन्दावन जानेके लिये आज्ञा प्रदान की। तब महाप्रभुने शचीमाताको नवद्वीप भेज दिया और स्वयं अपने भक्तोंको साथ लेकर वे जगन्नाथ पुरीकी ओर चल दिये। मार्गमें उन सब लोगोंने महाप्रभुकी सेवा की। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन सुखपूर्वक नीलाचल आ पहुँचे ॥ 249-251 ॥
श्रीजगन्नाथ-दर्शन, सर्वत्र आगमनके संवादका प्रचार :-
प्रभु आसि' जगन्नाथ दरशन कैल।
'महाप्रभु आइला'—ग्रामे कोलाहल हैल ॥ 252 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने आकर श्रीजगन्नाथके दर्शन किये। 'महाप्रभु लौट आये हैं'—यह बात पूरे जगन्नाथपुरीमें फैल गयी ॥ 252 ॥
भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका साक्षात्कार :-
आनन्दित भक्तगण आसिया मिलिला।
प्रेम-आलिङ्गन प्रभु सबारे करिला ॥ 253 ॥
काशीमिश्र, रामानन्द, प्रद्युम्न, सार्वभौम।
वाणीनाथ, शिखि-आदि यत भक्तगण ॥ 254 ॥
सभीको पहले वृन्दावन-यात्रामें विघ्नका वर्णन :-
गदाधर-पण्डित आसि' प्रभुरे मिलिला।
सबार अग्रेते प्रभु कहिते लागिला ॥ 255 ॥
“वृन्दावन याब आमि गौड़देश दिया।
निज-मातार, गङ्गार चरण देखिया ॥ 256 ॥
एत मते करि' कैलुँ गौड़ेरे गमन।
सहस्रेक सङ्गे हैल निज-भक्तगण ॥ 257 ॥
लक्ष लक्ष लोक आइसे कौतुक देखिते।
लोकेर संघट्टे पथ ना पारि चलिते ॥ 258 ॥
यथा रहि, तथा घर-प्राचीर हय चूर्ण।
यथा नेत्र पड़े तथा लोक देखि पूर्ण ॥ 259 ॥
अनुवाद—सभी भक्त आकर बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे मिले। महाप्रभुने सभीको प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया।
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