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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1513, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1513

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सोलहवाँ अध्याय 16/132-138 ]
महाप्रभु-सङ्गके लोभसे सेवा-परित्याग और सेवाकी
प्रतिज्ञाके उल्लङ्घनमें भी पण्डित अविचलित :—
प्रभु कहे,—“इँहा कर गोपीनाथ-सेवन।”
पण्डित कहे,—“कोटि-सेवा त्वत्पाद-दर्शन॥” 132॥
अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यहाँ नीलाचलमें रहकर
श्रीगोपीनाथकी सेवा करो।” श्रीगदाधर पण्डितने
कहा,—“आपके चरणोंके दर्शनमात्रसे ही श्रीगोपीनाथकी
करोड़ गुणा अधिक सेवा हो जाती है॥” 132॥
अपने भावी-कलङ्ककी आशङ्काको दिखलाकर
महाप्रभुका पुरीसे ही पण्डितको उनके
पीछे अनुसरण करने हेतु निषेध :—
प्रभु कहे,—“सेवा छाड़िबे, आमाय लागे दोष।
इँहा रहिं सेवा कर,—आमार सन्तोष॥” 133॥
अनुवाद— महाप्रभुने कहा,—“यदि तुम सेवा छोड़ोगे,
तो दोष मुझे लगेगा। इसलिये यहींपर रहकर सेवा करो,
इसीमें मुझे सन्तुष्टि होगी॥” 133॥
श्रीगदाधरका अभिमान :—
पण्डित कहे,—“सब दोष आमार उपर।
तोमा-सङ्गे ना याइब, याइब एकेश्वर॥ 134॥
‘आइ’के देखिते याइब, ना याइब तोमा लागि’।
‘प्रतिज्ञा’-‘सेवा’-त्याग-दोष, तार आमि भागी॥” 135॥
अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—“सारा दोष
मुझपर लगेगा। मैं आपके साथ नहीं जाऊँगा, किन्तु मैं
अकेला ही जाऊँगा। मैं ‘आइ’ (शचीमाताके) दर्शनोंके
लिये जाऊँगा, आपसे मिलनेके लिये नहीं जाऊँगा।
इसलिये ‘क्षेत्र-संन्यासकी प्रतिज्ञा’ तथा ‘श्रीगोपीनाथकी
सेवा’को त्यागनेके दोषका मैं ही उत्तरदायी
होऊँगा॥” 134-135॥
अमृतप्रवाह भाष्य— श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने
श्रीगोपीनाथकी सेवा प्राप्त करके उस सेवामें ही जीवन
व्यतीत करनेकी प्रतिज्ञा की थी। महाप्रभुके साथ
गौड़देशमें जानेपर उस ‘प्रतिज्ञा-भङ्ग-दोष’ और
‘सेवा-त्याग-दोष’—ये दो दोष होते हैं। अनुराग-मार्गमें
इन सब दोषोंको महात्मागण स्वीकार करते हैं॥ 135॥
अनुभाष्य— ‘एकेश्वर’—आज भी चट्टग्राम-क्षेत्रमें
‘अकेले’के अर्थमें ‘एकेश्वर’ शब्दका अपभ्रंश ‘अश्वर’
प्रचलित है।
जीवनमें सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करनेवाले श्रीगोपीनाथके
विग्रहकी सेवारूपी प्रतिज्ञाको विफल करके श्रीगदाधर
पण्डित श्रीगौराङ्गका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये भगवद्-
सेवाको भी बिना प्रयासके ही आसानीसे छोड़ देनेके
लिये तैयार हुए। श्रीगदाधरकी श्रीगौराङ्गप्रीतिको उनके
ही समान मर्मी, अन्तरङ्ग बान्धवके अतिरिक्त और कोई
नहीं समझ सकता॥ 134॥
पुरीसे कटक आकर महाप्रभुके द्वारा
पण्डितको निकट बुलाना :—
एत बलि’ पण्डित-गोसाञि पृथक् चलिला।
कटक आसि’ प्रभु ताँरे सङ्गे आनाइला॥ 136॥
अनुवाद— यह कहकर श्रीगदाधर-पण्डित गोसाईं
महाप्रभुसे अलग चलने लगे। कटकमें पहुँचकर महाप्रभुने
उन्हें अपने पास आनेके लिये बुलवा भेजा॥ 136॥
श्रीगदाधरकी केवला-श्रीगौरप्रीति ऐश्वर्यसे मुग्ध
व्यक्तियोंकी समझसे परे :—
पण्डितेर गौराङ्गप्रेम बुझन ना याय।
‘प्रतिज्ञा’, ‘श्रीकृष्णसेवा’ छाड़िल तृणप्राय॥ 137॥
अनुवाद— श्रीगदाधर पण्डितके श्रीगौराङ्गप्रेमको समझा
नहीं जा सकता, उन्होंने अपनी क्षेत्र-संन्यासकी ‘प्रतिज्ञा’
और ‘श्रीगोपीनाथसेवा’को तृणकी भाँति त्याग कर दिया
था॥ 137॥
महाप्रभुके भीतर सन्तोष होनेपर भी
बाहरसे कृत्रिम-कोप-उक्ति :—
ताँहार चरित्रे प्रभु अन्तरे सन्तोष।
ताँहार हाते धरि’ कहे करि’ प्रणय-रोष॥ 138॥
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