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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1514

[ 16/138-145 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
यहाँ तक पण्डितके उद्देश्यकी सिद्धि, इसके
बाद पण्डितको पुरीमें जाकर श्रीगोपीनाथकी
सेवा करनेके लिये शपथ दिलाना :-
“'प्रतिज्ञा' 'सेवा' छाड़िबे,—ए तोमार 'उद्देश'।
से सिद्ध हइल—छाड़ि' आइला दूर देश॥ 139॥
भक्तका श्रीकृष्णको सुख-दान और
श्रीकृष्णका भक्तको सुख-दान :-
आमार सङ्गे रहिते चाह,—वाञ्छ निज-सुख।
तोमार दुइ धर्म याय,—आमार हय 'दुःख'॥ 140॥
मोर सुख चाह यदि, नीलाचले चल।
आमार शपथ, यदि आर किछु बल॥” 141॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके आचरणसे यद्यपि
महाप्रभु हृदयमें बहुत सन्तुष्ट थे, किन्तु बाहरसे उनके
हाथोंको पकड़कर उन्होंने प्रणय-रोष प्रकाशित करते
हुए कहा,—“तुम्हारा उद्देश्य क्षेत्र-संन्यासकी 'प्रतिज्ञा'
और श्रीगोपीनाथकी 'सेवा'का त्याग था, अब तुम्हारा
वह उद्देश्य तो पूर्ण हो गया है, क्योंकि तुम नीलाचलसे
इतना दूर आ गये हो। तुम मेरे साथ रहना चाहते
हो—यह तो तुम्हारे अपने सुखकी कामना है। इसके
द्वारा तुम दोनों धर्मोंको नष्ट कर रहे हो, जिसे देखकर
मुझे 'दुःख' हो रहा है। यदि तुम मेरी प्रसन्नता चाहते
हो तो नीलाचल लौट जाओ। तुम्हें मेरी शपथ है, यदि
इसके बाद भी तुमने कुछ बोला॥” 138-141॥
महाप्रभुका नौकापर चढ़ना, पण्डितकी मूर्च्छा :-
एत बलि' महाप्रभु नौकाते चड़िला।
मूर्च्छित हञा तथा पण्डित पड़िला॥ 142॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु नौकामें चढ़ गये
और श्रीगदाधर पण्डित मूर्च्छित होकर वहींपर गिर
पड़े॥ 142॥
श्रीगदाधर-पण्डितको ले जानेके लिये महाप्रभुका
श्रीसार्वभौमको आदेश :-
पण्डिते लञा याइते सार्वभौमे आज्ञा दिला।
भट्टाचार्य कहे,—“उठ, ऐछे प्रभुर लीला॥ 143॥
श्रीगदाधर-पण्डितको श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना देना :-
तुमि जान, कृष्ण निज-प्रतिज्ञा छाड़िला।
भक्त कृपा-वशे भीष्मेर प्रतिज्ञा राखिला॥ 144॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौमको श्रीगदाधर पण्डितको
जगन्नाथपुरी ले जानेकी आज्ञा दी। श्रीसार्वभौमने श्रीगदाधर
पण्डितसे कहा,—“उठो! महाप्रभुकी ऐसी ही अद्भुत
लीलाएँ हैं। तुम तो जानते हो कि श्रीकृष्णने अपनी
प्रतिज्ञाको भङ्ग करके भक्त भीष्मके प्रति कृपाके कारण
उनकी प्रतिज्ञाकी रक्षा की थी॥ 143-144॥
भक्तकी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेके लिये भगवान्‌के द्वारा
अपनी प्रतिज्ञाको भङ्ग करना :-
श्रीमद्भागवत (1/9/37) में—
स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृत-
मधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्-
गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ 145॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कुरुक्षेत्र युद्धमें मैं अस्त्रधारण
नहीं करूँगा'—श्रीकृष्णचन्द्र अपनी इस प्रतिज्ञाको त्याग
करके मेरी प्रतिज्ञाको ही अधिक सत्य करनेके
अभिप्रायसे रथसे नीचे उतरे और जब चक्रको धारण
कर मेरा वध करनेके लिये आ रहे थे, तब उनका
उत्तरीय भी गिर पड़ा॥ 145॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके साथ आये युधिष्ठिर आदि
पाण्डवोंको भागवतधर्म और अन्यान्य साधारण धर्मोंका
वर्णन करनेके बाद स्वेच्छा मृत्युवाले महाभागवत
भीष्मदेव उत्तरायण-कालको उपस्थित हुआ देखकर,
अपनी मृत्युको निकट जानकर सामने उपस्थित श्रीकृष्णका
स्तव कर रहे हैं—
स्वनिगमम् (अस्त्रधारणं विनेव पाण्डवान् रक्षिष्यामीति
निजप्रतिज्ञाम्) अपहाय (परित्यज्य) मत्प्रतिज्ञां (श्रीकृष्णं शस्त्रं
ग्राहयिष्यामीति सङ्कल्पम्) ऋतं (सत्यम्) अधि (अधिकं) कर्तुं
रथस्थः [श्रीकृष्णः] अवप्लुतः (सहसा अवतीर्णः सन् एव)
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