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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1512, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1512

[ 16/122-131 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
नदीको पारकर चतुर्द्वारमें आकर प्रतिदिन पड़िछाओंके द्वारा
भेजे गये जगन्नाथके प्रसादका सेवन :-
नौकाते चढ़िया प्रभु हैल नदी पार।
ज्योत्स्नावती रात्र्ये चलि' आइला चतुर्द्वार ॥ 122 ॥
रात्र्ये तथा रहि' प्राते स्नानकृत्य कैल।
हेनकाले जगन्नाथेर महाप्रसाद आइल ॥ 123 ॥
राजार आज्ञाय पड़िछा पाठाय दिने-दिने।
बहुत प्रसाद पाठाय दिया बहु-जने ॥ 124 ॥
स्वगण सहिते प्रभु प्रसाद अङ्गीकरि' ।
उठिया चलिला प्रभु बलि' 'हरि' 'हरि' ॥ 125 ॥
अनुवाद—तब नौकापर चढ़कर महाप्रभुने नदी पार
की। चाँदनी रात्रिमें वे चलते हुए चतुर्द्वार नामक गाँवमें
आ पहुँचे। रात्रिमें चतुर्द्वारमें रहकर महाप्रभुने प्रातःकाल
स्नानकृत्य किया, उसी समय श्रीजगन्नाथका महाप्रसाद
आ गया। राजाकी आज्ञासे पड़िछा प्रतिदिन श्रीजगन्नाथजीका
इतना अधिक प्रसाद भेजता था कि उस प्रसादको
बहुतसे लोग उठाकर लाते थे। अपने भक्तोंके साथ
महाप्रभुने प्रसादको ग्रहण किया और 'हरि' 'हरि' बोलते
हुए वे उठकर चल दिये ॥ 122-125 ॥
साथमें तीन राजकर्मचारियोंमें श्रीराय प्रमुख :-
रामानन्द, मङ्गराज (?), श्रीहरिचन्दन।
सङ्गे सेवा करि' चले एइ तिन जन ॥ 126 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द राय, श्रीमङ्गराज तथा
श्रीहरिचन्दन—ये तीनों महाप्रभुकी सेवा करते हुए सदा
उनके साथ चल रहे थे ॥ 126 ॥
महाप्रभुकी वृन्दावन-यात्राके प्रधान सङ्गी :-
प्रभुसङ्गे पुरी-गोसाञि, स्वरूप-दामोदर।
जगदानन्द, मुकुन्द, गोविन्द, काशीश्वर ॥ 127 ॥
हरिदास ठाकुर आर पण्डित-वक्रेश्वर।
गोपीनाथाचार्य, आर पण्डित-दामोदर ॥ 128 ॥
रामाइ, नन्दाइ आर बहु भक्तगण।
प्रधान कहिलुँ, सबार के करे गणन ॥ 129 ॥
अनुवाद—महाप्रभुके साथ श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं,
श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीमुकुन्द,
श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर
पण्डित, श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीरामाइ,
श्रीनन्दाइ तथा अन्य और भी अनेक भक्त थे। मैंने
प्रधान भक्तोंके नामोंका उल्लेख किया है। सभी भक्तोंकी
कौन गणना कर सकता है? ॥ 127-129 ॥
आधे क्षणके लिये भी महाप्रभुके विच्छेदमें कातर
श्रीगदाधरका अतुलनीय श्रीगौरप्रेम :-
गदाधर-पण्डित तब सङ्गेते चलिला।
'क्षेत्र-संन्यास ना छाड़िह'—प्रभु निषेधिला ॥ 130 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित भी तब महाप्रभुके साथ
चलने लगे, परन्तु 'क्षेत्र-संन्यासको मत छोड़ना'—ऐसा
कहकर महाप्रभुने उन्हें साथ चलनेके लिये मना
किया ॥ 130 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'क्षेत्र-संन्यास'—जो अपने पूर्व
गृहका त्याग करके किसी विशेष (विष्णु) तीर्थमें अर्थात्
पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें या नवद्वीप-धाममें या मथुरादि-मण्डलमें
अकेले अथवा सपरिवार परमार्थ-बुद्धिके सहित वास
करते हैं, उनके आश्रमको 'क्षेत्र-संन्यास' कहते हैं।
यही आश्रम ही कलिकालका उपयुक्त 'वानप्रस्थ-धर्म'
है। सार्वभौम-भट्टाचार्यका भी ऐसा ही 'क्षेत्र-संन्यास'
कहा गया है ॥ 130 ॥
महाप्रभुके सङ्गके लोभसे धामवासरूपी क्षेत्रसंन्यासके
त्यागमें भी पण्डित अविचलित :-
पण्डित कहे,—"याँहा तुमि, सेइ नीलाचल।
क्षेत्र-संन्यास मोर याउक रसातल ॥" 131 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितने कहा,—"आप जहाँपर
हैं, वही नीलाचल है। मेरा ऐसा क्षेत्र-संन्यास रसातलमें
चला जाय ॥" 131 ॥
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