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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1027

[ 6/102-108 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीकरभाजन-मुनि कलिकालके अवतार और उनके
भजनकी प्रणालीका वर्णन कर रहे हैं—
हे उर्वीश (पृथ्वीपते निमे), द्वापरे [भक्ताः] जगदीश्वरं
(वासुदेवादि-चतुष्टयं) स्तुवन्ति (पञ्चरात्रादि-कथितेन अर्चन-विधिना
पूजां कुर्वन्ति)। तथा कलौ अपि नानातान्त्रविधानेन (येन येन
पञ्चरात्रादि-सात्वत-तन्त्राद्युक्त-विधिना) स्तुवन्ति, तत् [मत्तः]
शृणु।
श्लोक-भावानुवाद—हे राजन् निमि! द्वापरयुगमें
लोग वासुदेवादि चतुर्व्यूहकी पञ्चरात्रादिमें वर्णित
अर्चन-विधिके अनुसार पूजा करते हैं। तथा कलियुगमें
भी लोग जिन-जिन पञ्चरात्रादि सात्वत-तन्त्रोंमें कही
गयी विधियोंके द्वारा स्तुति करते हैं, वे अब श्रवण
करो॥102॥
कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 103 ॥
अनुवाद—जिनके मुखमें सदैव कृष्ण-वर्ण अर्थात्
श्रीकृष्णनाम और जिनकी कान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर
है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित
महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा
पूजा करते हैं॥103॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥103॥
महाभारत दानधर्म (149),
विष्णुसहस्रनाम-स्तोत्र (92, 75) :—
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥ 104 ॥
अनुवाद—सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग,
सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित। संन्यासाश्रमी,
हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्तन-रूप
महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान्, केवलाद्वैतवादी
अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण। [प्रथम
चार लक्षण महाप्रभुकी गृहस्थलीलामें और शेष चार
लक्षण संन्यासलीलामें लक्षित होते हैं।] ॥ 104 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/49 संख्या देखें॥104॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा श्रीभट्टाचार्यकी उपेक्षा और उपहास :—
तोमार आगे एत कथार नाहि प्रयोजन।
ऊषर-भूमिते येन बीजेर रोपण ॥ 105 ॥
भगवद्-कृपासे ही भगवान्‌की महिमाका ज्ञान :—
तोमार उपरे ताँर कृपा यबे हबे।
एसब सिद्धान्त तबे तुमिह कहिबे ॥ 106 ॥
अप्राकृत वस्तुके विषयमें कुतर्क-मायाजनित :—
तोमार ये शिष्य कहे कुतर्क, नानावाद।
इहार कि दोष—एइ मायार प्रसाद ॥ 107 ॥
अनुवाद—आपके सामने इन सब प्रमाणोंको कहनेका
कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि बंजर भूमिमें बीज बोनेसे
कोई लाभ नहीं होता। जब आपपर भगवान्‌की कृपा
होगी, तब आप स्वयं इन सब सिद्धान्तोंको अपने
मुखसे कहेंगे। आपके शिष्य जो अनेक प्रकारके
कुतर्क करके अनेक वाद स्थापित कर रहे हैं, इसमें
इनका कोई दोष नहीं—यह तो मायादेवीकी कृपा
है॥ 105-107 ॥
श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्ति ही अक्षज
विचारकोंमें मोह उत्पन्न करनेवाली :—
श्रीमद्भागवत (6/4/31)—
यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै,
विवाद-संवाद-भुवो-भवन्ति।
कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं,
तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने ॥ 108 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥108॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रजापति दक्षने कहा,―"वादियोंके
सम्बन्धमें जिनकी सब शक्तियाँ विवाद और संवाद
उत्पन्न करती हैं एवं उनके आत्ममोहको बार-बार
उत्पन्न कर देती हैं, उन अनन्त-गुणस्वरूप भूमा-पुरुषको
मैं नमस्कार करता हूँ॥108॥
अनुभाष्य—भगवान् श्रीहरिके प्रति प्रजापति दक्षका
हंसगुह्यस्तव—
178 ।