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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १६३ )
जातीयाश्चपुरुषास्तेनैव विदिता इति तदविदितपुरुषविशेषज्ञापन-
परोऽयं कर्मशब्दो न पुण्यापुण्यमात्रवाची, अपितु कृत्स्नस्यजगतः
कार्यत्ववाची । एवमेवखल्वविदितोऽर्थउपदिष्टो भवति । पुरुषस्य
कर्मसंबंधोपलक्षितस्वाभाविकस्वरूपस्याज्ञातस्य वेदितव्योपदेशे च
लक्षणा, कर्मसंबंधमात्रस्यैव वेदितव्यस्वरूपलक्षणत्वात् यस्य कर्म स
वेदितव्य, इत्येतावत्तैव तत्सिद्धेः “यस्य वैतत्कर्म” इत्येतच्छब्द
वैयर्थ्यं च ।
“एतत्” शब्द का अर्थ, प्रकरण आदि से बहुत ही स्पष्ट और
सामान्य ढंग से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से गृहीत, चेतन अचेतन युक्त
समस्त जगत का वाची प्रतीत होता है । इस प्रसंग में प्रयुक्त कर्म शब्द,
पुण्यपाप रूप ही कर्म नहीं है । “तुम्हें ब्रह्म तत्त्व बतलाता हूँ’ इत्यादि
से बालाकि को आदित्यमण्डल से अधिष्ठित जिस पूर्ण पुरुष ब्रह्म का
निर्देश किया गया, उसी को “मुझे झूठी बातों से मत ठगो” ऐसी अब्रह्म-
वादी बालाकि द्वारा निन्दा करने पर, उसके अज्ञान निवारण के लिए
अजातशत्रु ने “यो वै बालाके” इत्यादि वाक्य से अविज्ञात ब्रह्म तत्त्व
का निरूपण किया । पुण्यपाप संबद्ध आदित्य आदि के आश्रयभूत एवं
उसके समानजातीय पुरुष को तो बालाकि स्वयं ही जानता था, उसको
वैसा ही उपदेश देने का कोई मतलब ही नहीं था, इससे निश्चित होता
है कि-“कर्म” शब्द एकमात्र पुण्यापुण्य का ही वाचक नहीं है, अपितु
संपूर्ण जगत की कार्यता का भी बोधक है । ऐसा मानने से ही, सही अर्थों
में अविज्ञात तत्त्व का उपदेश घटित होता है । जो स्वतः सिद्ध स्वरूप
है, समय विशेष में ही कर्म से संबद्ध होता है, उस अविज्ञात पुरुष की यदि
ज्ञातव्योपदेश रूप से कल्पना की जाय तो, वह लक्षणा द्वारा ही संभव
है, क्योंकि-कर्म के साथ जो संबंध है, एकमात्र उससे ही जिसके स्वरूप
का ज्ञान होता है, वहां ज्ञातव्य तत्त्व है । “यह जगत जिसका कर्म है,
उसे जानो” इतना कहने मात्र से ही उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है । यदि
जगत् रूप कर्म का संबंध ज्ञेय से तोड़ दिया जाय तो वाक्यगत “एतत्”
शब्द की उपयोगिता ही समाप्त हो जायगी ।
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“य एतेषां कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म” इति पृथङ्निर्देशस्य चायम-
भिप्रायः, ये त्वया ब्रह्मत्वेन निर्दिष्टाः तेषां यः कर्त्ता,ते यत्कार्यभूताः,
किं विशिष्याभिधीयते, कृत्स्नस्यजगत्यस्यकार्यम्, उत्कृष्टा अपकृ-
ष्टाः चेतनाम्चेतनाश्च सर्वेपदार्था यत्कार्यत्वे तुल्याः, स परमका-
रणभूतः पुरुषोत्तमो वेदितव्यः, इति। जगदुत्पत्तेर्जीवकर्मनिबंधनत्वेऽपि
न जीवः स्वभोग्यभोगोपकरणादेः स्वयमुत्पादक., अपितु स्वकर्मानुगु-
ण्येनेश्वरसृष्टं सर्वं भुंक्ते, अतो न तस्य पुरुषान् प्रति कर्तृत्वमुपप-
द्यते। अतः सर्वं वेदांतेषु परमकारणतया प्रसिद्धं परंब्रह्मैवात्र वेदि-
तव्यतयोपदिश्यते।
“जो इसका कर्त्ता है, एवं यह जिसका कर्म है” इत्यादि में किये
गए कर्त्ता कर्म के पृथक् निर्देश का अभिप्राय है कि—तुम्हारे द्वारा जो
ब्रह्मत्वरूप से निर्दिष्ट पुरुष हैं तथा जो कर्त्ता है, जिसके वे सब कार्यरूप
हैं, अधिक क्या, सारा जगत ही जिसका कार्य है, भला बुरा, जड चेतन
सभी पदार्थ उसके कार्य के समान हैं, वह परमकारण रूप पुरुषोत्तम ही
ज्ञातव्य हैं। जीव का पापपुण्यमय कर्म ही यदि जगत की उत्पत्ति का
कारण है तो प्रश्न उठता है कि—जीव अपने भोग्य और भोगोपकरणों
का उत्पादक कैसे होगा ? वह तो अपने कर्मों के अनुसार, ईश्वर सृष्ट
पदार्थों का भोग मात्र कर सकता है, जीव का जीवों के प्रति कर्तृत्व कभी
संभव नहीं है। सभी वेदांत वाक्यो मे परम कारण रूप से प्रसिद्ध
परब्रह्म ही उक्त प्रकरण के ज्ञातव्य विषय हैं।
जीवमुख्यप्राणलिंगान्नेति चेत्तद् व्याख्यातम् ।१।४।१७।।
अथ यदुक्तम्-जीवल्गिान्मुख्यप्राणसकीर्त्तनाच्च लिंगाद्
भोक्तैवाऽस्मिन्प्रकरणे प्रतिपाद्यते, न परमात्मा इति, तद्व्याख्या-
तम्। तस्य निर्वाहः प्रतर्दनविद्यायामभिहितः। एदतुक्तं भवति-यत्रो-
पक्रमोपसंहारपर्यालोचनया ब्रह्मपरं वाक्यमिति निश्चितम्, तत्रा-
न्यलिंगानि तदनुरोधेन वर्णनीयानीति तत्र प्रतिपादितम्। अत्राप्युक्रमे
“ब्रह्म ते ब्रवाणि” इति ब्रह्मोपक्षिसम्, मध्ये च “यस्य वै
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तत्कर्म" इति निर्दिष्टं न पुरुषमात्रम् अपितु निखिलजगदेककारणम्
ब्रह्मैवेत्युक्तम् ।
जो यह कहते हो कि—इस प्रसंग में जीव शब्द और मुख्य प्राण
बोधक शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है कि—भोक्ता पुरुष का ही इस
प्रकरण में प्रतिपादन किया गया है, परमात्मा का नहीं । इस विषय की
व्याख्या हम कर चुके हैं, इसका समाधान भी प्रतर्दन विद्या के प्रसंग में
कर चुके हैं। अब तो कथन यह है कि—जब प्रकरण के उपक्रम और
उपसंहार की पर्यालोचना से यह निश्चित हो चुका कि सारा प्रसंग
परब्रह्म परक ही है, इसलिये प्रयुक्त जितने भी शब्द हैं, उनका तदनुसार
ही अर्थ करना चाहिए यही बात वहाँ प्रतिपादित भी है। इस प्रसंग के
उपक्रम में भी जैसे—"तुझे ब्रह्मोपदेश देता हूँ" ब्रह्म का उल्लेख किया
गया है। प्रसंग के मध्य के—"यह जिसका कर्म है" इस निर्देश में केवल
पुरुष मात्र ही नहीं अपितु संपूर्ण जगत के कारण रूप से ब्रह्म का ही
निर्देश किया गया है ।
उपसंहारे च— "सर्वान्पाप्मनोऽपहृत्य सर्वेषां च भूतानां श्रैष्ठ्-
यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद" इति ब्रह्मोपासनैकान्तं
सर्वपापापहतिपूर्वकं स्वाराज्यं च फलं श्रुतम्, अतोऽस्यवाक्यस्य
परब्रह्मपरत्वनिश्चयेन जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्यपि तत्परतया वर्णनी-
यानि—इति ।
प्रातर्दने हि उपासात्रैविध्येन जीवमुख्यप्राणलिंगानां
ब्रह्मपरत्वमुक्तम्, अत्रापि–"अथास्मिन् प्राण एवैकधा भवति" इति
सामानाधिकरण्य संभवे वैयधिकरण्यसमाश्रयणाऽऽयोगात् ब्रह्मण्येव
प्राणशब्द प्रयोग निश्चयेन च प्राणशरीर कब्रह्मोपासनार्थं प्राणसंकी-
र्त्तनं लिंगं युज्यते ।
उपसंहार में भी—"जो इस प्रकार जानता है वह समस्त पापों
को भस्म करके, संपूर्ण भूतों के श्रेष्ठतम रूप स्वर्ग राज्य का आधिपत्य
[email protected]

निश्चित होता है कि-जीव का वर्णन, जीव से भिन्न परमात्मा के प्रति-
पादन के लिए ही किया गया है ।
यदुक्तं प्रश्नव्याख्याने जीवपरे सुषुप्तिस्थानं च नाड्यएव,
करणग्रामश्च प्राणशब्दनिर्दिष्टे जीवएवैकधा भवति इति,
तदयुक्तम् नाडीनां स्वप्रस्थानत्वात् उक्तरीत्याब्रह्मण एव सुषुप्तिस्थान
त्वात् । प्राणशब्द निर्दिष्टे ब्रह्मण्येव जीवस्य तदुपकरणभूतवागादि-
करणग्रामस्य चैकताऽऽपत्ति विभागवचनाच्च ।
अपिचैवमेके-वाजसनेयिनोऽस्मिन्नेव बालाक्यजातशत्रु संवादे
सुषुप्ताद्विज्ञानमयात् भेदेन तदाश्रयभूतं परमात्मानमामनन्ति-“य
एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष, तदाऽभूत्कुत एतदागात्” यत्रैष एतत्
सुप्तो अभूत् य एष विज्ञानमयः पुरुषः तदैतेषां प्राणानां विज्ञानेन
विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः तस्मिन् शेते” इति आकाश
शब्दश्च परमात्मनि प्रसिद्धः । “दहरोऽस्मिन्नंतर आकाशः” इति ।
अतोऽत्र जीव संकीर्तनं तस्मादर्थान्तरभूतस्यप्राज्ञस्यपरस्यब्रह्मणः
प्रतिबोधनार्थमित्यवगम्यते । तस्मादस्मिन्वाक्ये पुरुषादर्थान्तरभूतस्य
निखिलजगत्कारणस्यपरस्यैवब्रह्मणो वेदितव्यतयाऽभिधानान्तन्त्र-
सिद्धस्य पुरुषस्यतदधिष्ठितस्य वा प्रधानस्य कारणत्वं क्वचिदपि
वेदान्ते प्रतीयत इति स्थितम् ।
प्रश्न और उत्तर दोनों ही जीव परक हैं, परमात्मा परक नहीं,
नाड़ियां ही जीव का शयन स्थल है परमात्मा नही तथा इन्द्रियाँ ही प्राण
बोधक हैं जो कि जीव मे एकत्र हो जाती है, इत्यादि कथन भी असंगत
है । नाड़ियो को शयन स्थल मानकर तुम उक्त मत स्थिर करते हो, उसी
तरह हम, परमात्मा को शयन स्थल मानकर यह निर्णय करते है कि-
प्राण शब्द निर्दिष्ट, जीव की साधन रूप वागादि इन्द्रियाँ, ब्रह्म में ही
एकत्र होती और भिन्न होती है। ऐसा ही इसी वाजसनेयी की एक
शाखा मे बालाकि अजातशत्रु के संवाद में, सुप्त पुरुष से भिन्न, उसके

( ५६६ )
आश्रयभूत परमात्मा का ऐसा वर्णन मिलता है कि-“यह जो विज्ञानमय
पुरुष है, वह उस समय ( सुप्तावस्था में ) कहाँ था ? और बाद में
( जागरितावस्था में ) कहाँ से आ गया ? यह जब सुप्त था तब यह
विज्ञानमय पुरुष, प्राण समूह विज्ञान के साथ, स्वीय विज्ञान को ग्रहण
करके, इस हृदयस्थ आकाश में शयन कर रहा था” "दहरोऽस्मिन्नंतर
आकाश"इत्यादि में आकाश शब्द परमात्मा के लिए प्रसिद्ध है। इस विवेचन
से निश्चित होता है कि-उक्त प्रसंग में जो जीव का उल्लेख किया गया है,
वह ब्रह्म परक ही है तथा पुरुष से भिन्न संपूर्ण जगत का कारण
परब्रह्म ही ज्ञातव्य है। सांख्यतंत्रसिद्ध पुरुष और उससे अविष्ठित
प्रधान का कारणरूप से वेदांत वाक्यों में कहीं भी उल्लेख नहीं है।
६ वाक्यान्वयाधिकरण :-
वाक्यान्वयात् ।१।४।१९॥
अत्रापि कापिलतंत्रसिद्धपुरुषतत्त्वावेदनपरंवाक्यं क्वचित्
दृश्यत इति, तदतिरिक्त ईश्वरो नाम न कश्चित् संभवतीत्याशंक्य
निराकरोति ।
इस प्रकरण में भी कापिलतंत्र सिद्ध पुरुष तत्त्व को बतलाने वाले
वाक्य कहीं-कहीं दिखलाई देते हैं, इसलिए उसके अतिरिक्त ईश्वर नामक
कोई दूसरा नहीं हो सकता, ऐसी शंका करके उसका निराकरण करते हैं।
बृहदारण्यके मैत्रेयी ब्राह्मणे श्रूयते-“न वा अरे पत्युः कामाय
पतिः प्रियो भवति" इत्यारभ्य “न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं
प्रियं भवति, आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः
मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम् इति ।
बृहदारण्यकोपनिषद् के मैत्रेयी ब्राह्मण में कहा गया है कि-
“अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता" इत्यादि से लेकर “अरे
सब की कामना से सब प्रिय नहीं होते, आत्मा को ही देखो, सुनो, मनन
करो और अभ्यास करो, अरी मैत्रेयी ! इस आत्मा में ही देखने, सुनने,
मनन करने और जानने से यह सारा जागतिक प्रसार ज्ञात हो जाता
है।" यहाँ तक ।
[email protected]

( ६०० )
तत्र संशयः, किमस्मिन्वाक्ये द्रष्टव्यतयोपदिश्यमानः तंत्रसिद्धः
पुरुष एव, अथवा सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः सर्वेश्वरः ? इति किं युक्तम् ?
पुरुष इति, कुतः ? आदिमध्यावसानेषु पुरुषस्यैव प्रतीतेः, उपक्रमे
तावत् पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियत्वयोगाज्जीवात्मैव प्रतीयते ।
मध्येऽपि “विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति
न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति" इत्युत्पत्तिविनाशयोगात्स एवावगम्यते । तथाऽन्ते
च “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति स एव ज्ञाता क्षेत्रज्ञ इति
प्रतीयते, नेश्वरः । अतस्तंत्रसिद्धपुरुष प्रतिपादनपरमिदं वाक्यमिति
निश्चीयते ।
उक्त वाक्य के विषय में संशय होता है कि-इसमें द्रष्टव्य रूप से
उपदिष्ट, तंत्रसिद्ध पुरुष ही है, अथवा सर्वज्ञ सत्यसंकल्प सर्वेश्वर हैं ?
कह सकते हैं कि पुरुष ही है; वाक्य के आदि मध्य और अन्त से पुरुष
की ही प्रतीति होती है । उपक्रम में पति स्त्री पुत्र वित्त पशु आदि की
प्रियता का संपर्क दिखलाया गया है जिससे जीवात्मा की ही प्रतीति
होती है । मध्य में भी जैसे-“विज्ञानघन ही इन पंच भूतों का अनुगत
होकर व्यक्त होता है तथा उनके विनष्ट होने पर विनष्ट हो जाता है,
मृत्यु के बाद कोई चिन्ह अवशिष्ट नहीं रह जाता"-उत्पत्ति और विनाश
के साथ जो संयोग दिखलाया गया है, उससे भी उसी (जीव) का बोध
होता है । इसी प्रकार अन्त में भी-“अरे ! विज्ञाता को और कैसे
जानेगी ?” वह क्षेत्रज्ञ ही ज्ञाता होता है, ईश्वर नहीं । इससे निश्चित
होता है कि-यह वाक्य सांख्य तंत्रोक्त पुरुष परक ही है ।
ननु “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” इत्युपक्रमामृतत्व-
प्राप्त्युपायोपदेशपरमिदं वाक्यमिदमवगम्यते । तत्कथं पुरुषप्रतिपादन
परत्वमस्यवाक्यस्य तदुच्यते, अतएव ह्यत्र पुरुषप्रतिपादनम् ।
तंत्रे हि अचिद्धर्माध्यासविमुक्तपुरुषस्वरूपरूपायाथात्म्यविज्ञानमेवा-
मृतत्वहेतुत्वेनोच्यते, अतो जीवात्मनः प्रकृतिवियुक्तं स्वरूपमिहामृत-
त्वाय “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादिनापदिश्यते ।
[email protected]

( ६०१ )
“धन से अमृतत्व प्राप्ति की आशा नहीं है” इस उपक्रमवाक्य से तो
ज्ञात होता है कि अमृतत्व प्राप्ति के उपाय का उपदेश ही इस वाक्य में
दिया गया है, इसे पुरुष प्रतिपादक कैसे कहा जा सकता है ? उत्तर देते
हैं कि-इसमें पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। सांख्य शास्त्र में
अचित् धर्म (सुखदुःखादि) के बंधन से मुक्त पुरुष स्वरूप के यथार्थ ज्ञान
को ही अमृतत्त्व प्राप्ति का कारण कहा गया है “आत्मा वा अरे
द्रष्टव्यः” इत्यादि में, जीवात्मा के, प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप का ही,
अमृतत्व प्राप्ति के लिए उपदेश दिया गया है।
सर्वेषामात्मनां प्रकृतिवियुक्तस्वात्मयाथात्म्यविज्ञानेन सर्व
एवात्मानो विदिता भवन्तीत्यात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुपपन्नम्।
देवादिस्यावरान्तेषुसर्वेषुभूतेष्वात्मस्वरूपस्य ज्ञानैकप्रकारत्वात्
“इदं सर्वं यदयमात्मा” इत्यैकात्म्योपदेशः देवाद्याकाराणामनात्मा-
कारत्वात् “सर्वं तं परादात्” इत्यादिनान्यत्वनिषेधश्च “यत्र हि
द्वैतमिव भवति” इति च नानात्वनिषेधेनैकस्वरूपे हि आत्मनि
देवादिप्रकृति परिणामभेदेन नानात्वं मिथ्येत्युच्यते। “तस्य वा
एतस्यमहतोभूतस्य निश्वसितमेतद् यदृग्वेदः” इत्याद्यपि प्रकृते-
रधिष्ठातृत्वेन पुरुषनिमित्तत्वाज्जगदुत्पत्तेरुपपद्यते। एवमस्मिन्वाक्ये
पुरुषपरे निश्चिते सति तदैकार्थ्यात् वेदांताः तंत्रसिद्धं पुरुषमेवाद-
धतीति तदधिष्ठिता प्रकृतिरेव जगदुपादानम्, नेश्वरः, इति।
सभी आत्माओं का प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप एक सा है, इस-
लिए प्रकृति बंधन से अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर, सभी
आत्माओं का परिज्ञान हो जाना स्वाभाविक है, इसलिए अपने ज्ञान से
सबका ज्ञान हो जाता है, यह सिद्धान्त भी समीचीन है। देवादिस्यावर
पर्यन्त सभी भूतों में आत्मज्ञान स्वरूप धर्म समान है इसलिए “यह सब
आत्मस्वरूप है” ऐसा एकात्मोपदेश दिया गया, देवादि का आकार तो
ज्ञानस्वरूप है नहीं। “सारे पदार्थ ही उसे प्रतारित करते हैं” इससे भेद
बुद्धि का प्रतिषेध किया गया है तथा “जिससे द्वैतबृद्धि होती है” इत्यादि
[email protected]

( ६०२ )
से भेद निषेध करते हुए दिखलाया गया है कि-एक स्वरूप आत्मा में,
प्रकृति के परिणाम स्वरूप देव, मनुष्य, पशु आदि मिथ्या भेद प्रतीत होता
है। "उस नित्य सिद्ध महत् का निश्वास यह ऋग्वेद है" इत्यादि से भी
प्रकृति का अधिष्ठाता पुरुष ही जगत का निमित्त है ऐसा सिद्ध होता है।
इस प्रकार इस वाक्य के पुरुष परक निश्चित हो जाने पर, समस्त वेदांत
वाक्यों का एकमात्र अर्थ यही होता है कि-सांख्योक्त पुरुष और उससे
अधिष्ठिता प्रकृति ही जगत के उपादान कारण हैं, ईश्वर नहीं।
सिद्धान्त--एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे, वाक्यान्वयात्-इति । सर्वेश्वर
एवास्मिन्वाक्ये प्रतीयते, कुतः ? एवमेवहि वाक्यावयवानामन्योन्या-
न्वयः समंजसो भवति । "अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन" इति
याज्ञवल्क्येनाभिहिते 'येनाहं नामृता स्यां किम‌हं तेन कुर्यां' यदेव भग-
वान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्यमृतत्वानुपायतया वित्ताद्यनादरेणामृत-
त्वप्राप्त्युपायमेव प्रार्थयमानायै मैत्रेय्यै तदुपायतया द्रष्टव्यत्वेनोपदि-
ष्टोऽयमात्मा परमात्मैव "तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति" "तमेवं विद्वान-
मृत इह भवति नान्यः पन्थाः" इत्यादिभिरमृतत्वस्य परमपुरुषवेद-
नैकोपायतया प्रतिपादनात् । परमपुरुषविभूतिभूतस्य प्राप्तुरात्मनः
स्वरूपयाथात्म्यमपवर्गसाधनपरमपुरुषवेदनोपयोगितयाऽवगन्तव्यम् , न
स्वत एवोपायतवेन । अतोऽत्र परमात्मैवामृतत्व उपायतया
"द्रष्टव्यः" इत्यादिनापदिश्यते ।
उक्त संशय पर सिद्धान्तरूप से "वाक्यान्वयात्" सूत्र प्रस्तुत है।
उक्त वाक्य में सर्वेश्वर को ही प्राप्तव्य कहा गया है। ऐसा मानने से ही
वाक्यों के अर्थ की परस्पर सामंजस्यपूर्ण संगति हो सकती है। "धन से
अमरता प्राप्ति की आशा नहीं है" ऐसा याज्ञवल्क्य के कहने पर "जिससे
मैं अमर नहीं हो सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् ! जो आप
अमरता की साधना जानते हों उसे मुझे बतलावें" इत्यादि में मुक्तिलाभ
के अनुपयोगी धन संपत्ति का अनादर करते हुए, मुक्ति के उपाय की
जिज्ञासु मैत्रेयी को, द्रष्टव्य रूप से जिस आत्मा का उपदेश प्राप्त हुआ,
[email protected]

( ६०३ )
वह परमात्मा ही है। “उसे जानकर ही मृत्यु को अतिक्रमण करता है”
“उसको भली भाँति जानकर इस लोक में ही अमर हो जाता है, इसके
अतिरिक्त मुक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है” इत्यादि में परम पुरुष
परमात्मा को ही एक मात्र ज्ञेय और उपायरूप प्रतिपादन किया गया है।
परम पुरुष परमात्मा के विभूतिरूप, मोक्ष प्राप्त करने वाले जीवात्मा
का जो स्वरूपगत यथार्थ ज्ञान है, उसे भी मुक्ति प्राप्ति के उपायभूत
परमात्मज्ञान का उपयोगी बतलाया गया है। स्वतः उसकी उपायरूप
से कोई सत्ता नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि-इस प्रसंग में 'द्रष्टव्य”
इत्यादि वाक्य में मोक्षोपायरूप से परमात्मा का ही उपदेश दिया
गया है।
तथा-“तस्य ह वा एतस्य महतोभूतस्य निश्वसितमेतद्यद्
ऋग्वेदः” इत्यादिना कृत्स्नस्यजगतः कारणत्वमुच्यमानं परमपुरुषाद
न्यस्य कर्मपरवशस्यमुक्तस्यनिर्व्यापारस्य च पुरुषमात्रस्य न संभवति ।
तथा “आत्मनो वा अरे दर्शनेन” इत्यादिना एकविज्ञानमभिधीय-

( ६०४ )
यह कहना भी युक्ति युक्त नहीं है, क्योंकि—अचेतन प्रपंचमय जगत के
ज्ञान के बिना समस्त ज्ञान हो नहीं सकता। उक्त प्रतिज्ञा (एक के ज्ञान
से सबका ज्ञान हो जाना है) के प्रतिपादन के लिए "यही ब्राह्मण यही
क्षत्रिय" इत्यादि से लेकर "यह सब कुछ आत्मास्वरूप है" यहाँ तक
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध चिदचिद् मिश्रित सारे प्रपंचमय जगत को
"इदं" शब्द से बतलाकार "यह जो सब आत्म स्वरूप है" इत्यादि में
उसकी आत्मा के साथ एकता दिखलाई गई है, ऐसी एकता परमात्मा में
ही संभव हो सकती है।
नहीदंशब्दवाच्यं चिदचिन्मिश्रं जगत् पुरुषेणाचित्संसृष्टेन
तद्वियुक्तेनस्वरूपेणवावस्थितेन चैक्यमुपगच्छति। अतएव
"सर्वं तं परादात् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद" इति व्यतिरिक्तत्वेन
सर्व वेदन निन्दा च तथा प्रथमे च मैत्रेयीब्राह्मणे "महद्भूतमनंत-
मपारम्" इति श्रुता महत्त्वाद्यो गुणाः परमात्मन एव संभवंति।
अतः स एवात्र प्रतिपाद्यते।
पुरुष चैतन्य हो अथवा जडमिश्रित हो, किसी भी रूप से वह इदं
पद वाच्य जड़चेतनात्मक जगत के साथ अद्वैत भाव से रह नहीं सकता।
इसीलिए "जो लोग आत्मा के अतिरिक्त सब पदार्थों को जानते हैं
(अर्थात् सारे जगत को आत्मा से भिन्न मानते हैं) सारे पदार्थ उन्हें ही
प्रतारित करते हैं" इत्यादि में जगत् को परमात्मा से भिन्न मानने की
निन्दा की गई है। तथा प्रथम मैत्रेयीब्राह्मण के—"अनंत अपार स्वतः
सिद्ध महान्" इत्यादि में उक्त महत्त्वादि गुण भी उस परमात्मा में ही
संभव हो सकते हैं। इससे निश्चित होता है कि वह परमात्मा ही उक्त
प्रकरण के प्रतिपाद्य हैं।
यत्तूक्तं—पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियान्वयिनोजीवात्मन उप-
क्रमेत्वन्वेष्टव्यतया प्रतिपादनात्तद्विषयमेवेदंवाक्यमिति, तद-
युक्तम्, "आत्मनस्तु कामाय" इत्यात्मशब्देन जीवात्मसंशब्दने,
तस्य "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" इत्यनेनान्वयप्रसंगात्। "आत्मा

( ६०५ )
वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यात्मनो द्रष्टव्यत्वोपयोगितया “आत्मनस्तु
कामाय” इत्युपदिष्टमिति प्रतीयते । आत्मनस्तुकामाय–आत्मनः
कामसंपत्तये, काम्यन्त इति कामाः, आत्मन इष्टसंपत्तय इति
यावत् । न च जीवात्मन इष्टसंपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति,
इत्युक्ते सति तस्यजीवस्य स्वरूपमन्वेष्टव्यं भवति । प्रियमेवहि अन्वे-
ष्टव्यम्, न तु प्रियंप्रति शेषिणः प्रियवियुक्तं स्वरूपम् । यस्मादात्मन
इष्ट संपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति, तस्मात् पत्यादिप्रियं परि-
त्यज्य तद्वियुक्तमात्मस्वरूपमन्वेष्टव्यमित्यसंगतं भवति ।
जो यह कहा कि—वाक्य के प्रारंभ में पति-पत्नी-पुत्र-धन-पशु
आदि प्रिय वस्तुओं से संपर्कित होने से “द्रष्टव्य” इत्यादि में जीवात्मा
को ही द्रष्टव्य आदि कहा गया है, सो यह कथन भी असंगत है । “आत्म-
नस्तु कामाय” में आत्मनः पद से जीवात्मा का निर्देश मानने से “आत्मा
वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादि वाक्य के साथ उसकी संगति बैठ ही नहीं
सकती, क्योंकि—“आत्मा ही द्रष्टव्य है” इत्यादि में आत्मदर्शन को उप-
योगी बतलाकर “आत्मा की कामना से” इत्यादि उपदेश दिया गया है,
जिसका तात्पर्य होता है “आत्मा की कामपूर्ति के लिए” “काम” शब्द
का तात्पर्य होता है, कामना का विषयीभूत अर्थात् अभीष्ठ विषयराशि ।
इस अर्थ के अनुसार आत्मनस्तु कामाय” इत्यादि का तात्पर्य होगा कि—
“आत्मा की इष्ट संपत्ति के लिए ही पति पुत्रादि प्रिय होते हैं” ऐसा अर्थ
होने पर जीवात्मा का स्वरूप अन्वेष्टव्य नहीं हो सकता । प्रिय वस्तु
ही अन्वेषणीय होती है; प्रियवस्तु का अंगीभूत प्रियवियुक्त आत्मा का
स्वरूप कभी अन्वेषणीय नहीं हो सकता । पति आदि प्रिय पदार्थों की
पुंजीभूत राशि, आत्मा के प्रिय संपादन के लिए साधन हो सकती है,
उन पत्यादि प्रिय वस्तुओं के अन्वेषण को छोड़कर, प्रियतारहित आत्मा
के स्वरूप को अन्वेष्टव्य कहना असंगत है ।
प्रत्युत न पत्यादिशेषतया पत्यादीनां प्रियत्वम्, अपितु आत्मनः
शेषतया पत्यादीनां प्रियत्वमित्युक्ते स्वशेषतया त एवोपादेयाः स्युः ।

( १०६ )
“आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” इत्यस्य परेणानन्वये
वाक्यभेदः प्रसज्येत, अभ्युपगम्यमानेऽपि वाक्यभेदे पूर्ववाक्यस्य न
किंचित् प्रयोजनं दृश्यते । अतः पत्यादि सर्वप्रियं परित्यज्यात्मन
एवान्वेष्टव्यत्वं यथा प्रतीयते, तथा वाक्यार्थो वर्णनीयः ।
ऐसी कल्पना करना अधिक युक्ति संगत होगा कि—पति आदि
इसलिए प्रिय नहीं हैं कि वह पति आदि के अश हैं अपितु परमात्मा के
अंश होने से उन पत्यादि की प्रियता है, ऐमा मानने से वे स्व के मान्य
अंश होंगे और उपादेय होगे । “आत्मा की कामना से सब प्रिय होते हैं”,
इस वाक्य का, परवर्त्ती वाक्यों के साथ यदि संबंध नहीं रहेगा तो वाक्य
भेद हो जायगा, यदि वाक्य भेद को मानेंगे तो पूर्ववर्त्ती वाक्यों का कोई
प्रयोजन नहीं रहेगा । इसलिए पत्यादि समस्त प्रियवस्तुओं को छोड़कर,
परमात्मा के अन्वेषण की ही जिसमें प्रतीति हो, वैसा वाक्यार्थ करना
अधिक समीचीन होगा ।
सोऽयमुच्यते—“अमृतत्त्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन”
इति वित्तादीनां नित्यनिर्दोषनिरतिशयानंदरूपामृतत्वप्राप्त्यनुपाय
तामुक्तवा वित्तपुत्रपतिजायादीनां सातिशयदुःखमिश्रकाचित्कप्रिय-
त्वमनुभूयमानं न पत्यादिस्वरूपप्रयुक्तम्, अपितु निरतिशयानंदस्व-
भावपरमात्मप्रयुक्तम् । अतो य एव स्वयं निरतिशयानंदः सन्
अन्येषामपि प्रियत्वलेशास्पदत्वमापादयति स परमात्मैव दृष्टव्यः,
इत्युपदिष्ट्यते । तदयमर्थ. “न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो
भवति” न हि पतिजायापुत्रवित्तादयो मत्प्रयोजनायाहमस्य प्रियः
स्यामिति स्वसंकल्पात् प्रिया भवन्ति, अपि तु आत्मनः कामाय
परमात्मन. स्वाराधक प्रियप्रतिलम्भनरूपेष्टनिर्वृत्तय इत्यर्थः ।
प्रसग मे कहा गया कि—“धन से अमरता की आशा नहीं है”
अर्थात् ये धन आदि क्षणभंगुर पदार्थ, नित्यनिर्दोष सर्वातिशय परमानंद-
मय मुक्ति लाभ के उपाय नहीं है। पति स्त्री पुत्रादि में जो कुछ दुःख
[email protected]

( ६०७ )

मिश्रित प्रियता की उपलब्धि होती है वह, पत्यादि के स्वरूप से नहीं
होती, अपितु वे सब अत्यानंदमय परमात्मा के अंश हैं, इसलिए होती है ।
जो स्वयं अत्यानंदमय होकर दूसरों को भी उस आनंद के लेश से आप्ला-
वित करता है, ऐसा परमात्मा ही दृष्टव्य है, ऐसा उपदेश किया गया
है । इसका तात्पर्य हुआ कि--“'अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं
होता” इत्यादि का यह अर्थ नहीं है कि--“पति, स्त्री, धन आदि सब
मेरे ही प्रयोजन के साधन हैं, मैं ही इनका प्रिय हूँ”; अपितु आत्मा की
प्रीति के लिए अर्थात् परमात्मा की आराधना के लिए, ये सब अभीष्ट
प्रियता प्रदान करते हैं; ऐसा मानना चाहिए ।
परमात्मा हि कर्मभिराराधितस्तत्तत्कर्मानुगुणं प्रतिनियतदेश-
कालस्वरूपपरिमाणमाराधकानां तत्तद्वस्तुगतं प्रियत्वमापादयति
“एष ह्येवानंदयति” इति श्रुतेः । नतु तत्तद्वस्तुस्वरूपेण प्रियम-
प्रियंवा । यथोक्तं-- “तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते ,तदेव
कोपाय यतः प्रसादाय च जायते । तस्मात् दुःखात्मकं नास्ति न
च किंचित्सुखात्मकम्” इति । “आत्मनस्तु कामाय” इत्यस्य
जीवात्मपरत्वेऽपि “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” इति तु परमात्मा
विषयमेव ।
“एष ह्येवानंदयति” इत्यादि श्रुति बतलाती है कि—परमात्मा,
आराधना के अनुसार उन आराधकों को, देश-काल-स्वरूप-परिमाण-
आकृतिगत प्रियता प्रदान करते हैं--जैसा कि-कहा गया--“एक ही
वस्तु जो एक बार प्रीतिकारक होती है, वही पुनः दुखदायी हो जाती
है, जो वस्तु क्रोधकारक होती है वही प्रीतिकारक हो जाती है, इससे
ज्ञात होता है कि कोई भी वस्तु सुखात्मक या दुःखात्मक नहीं है ।”
कोई भी वस्तु तत्त्वतः स्वरूप से प्रिय वा अप्रिय नहीं होती । “आत्मनस्तु
कामाय” इस वाक्य के जीवात्मा परक होते हुए भी, “आत्मा वा अरे
दृष्टव्यः” वाक्य तो परमात्म विषयक ही है ।
तत्रायमर्थः, यस्मात् पत्यादीनां इष्ट संपत्तये तत्परवशेन पत्या-
दयः प्रियत्वेन नोपादीयते, अपितु आत्मेष्ट संपत्तये स्वतंत्रेण स्वीप्र-

( ६० म )
यत्वेन उपादीयन्ते, तस्माद् य एवात्मनो निरुपाधिकनिर्दोषनिरव-
धिकः प्रियः परमात्मा, स एव हि दृष्टव्यः, नदुःखमिश्राल्पसुखदुःखो-
दर्काः परायत तत्तत्स्वभावाः पतिजायापुत्रवित्तादयोविषयाः, इति ।
अस्मिंस्तु प्रकरणे, जीवात्मवाचिशब्देनापि परमात्मन एवाभि-
धानात् “आत्मनस्तु कामाय” आत्मा वा अरे दृष्टव्यः “इति पूर्वोक्त .
प्रक्रिययोभयत्रात्मशब्दावेकविषयौ ।
उक्त कथन का सारांश यह है कि—पति आदि की प्रीति के लिए,
पति आदि प्रिय पदार्थों को, प्रियरूप मैं ग्रहण नहीं किया जाता अपितु
अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए, उन सबको प्रिय रूप से ग्रहण किया जाता
है, यदि तुम स्वाभाविक निर्दोष अपार प्रिय स्वरूप परमात्मा को, पति,
स्त्री, पुत्रादि सभी में देखोगे तो तुम्हारी वास्तविक अभीष्ट सिद्धि होगी,
क्योंकि—ये सांसारिक जीव दुःखमिश्रित अल्प सुखदायी, परिणाम में
दुखप्रद एवं स्वरूप और स्वभाव से परतंत्र हैं इनको देखने से शांति
मिलने के बजाय दुःख ही पल्ले पड़ेगा। इसलिए परमात्मा ही दृष्टव्य
हैं, पति पुत्र आदि नहीं। इस प्रकरण में तो, जीवात्मवाची शब्द

( ६०६ )
"यथा सुदीप्तात्पावकाद् विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवंते सरूपाः,
तथाऽक्षरात् विविधाः सोम्य भावाः प्रजायंते तत्र चैवापियंति ।"
इत्यादिभिर्ब्रह्मणो जीवानामुत्पत्ति श्रवणात् तस्मिन्नेव लय श्रवणा-
च्च जीवानां ब्रह्मकार्यत्वेन ब्रह्मणैक्यमवगम्यते । अतो जीव शब्देन
परमात्माभिधानमिति ।
एक के ज्ञान से संपूर्ण का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा की सिद्धि
के लिए ही उक्त प्रसंग में केवल आत्मा शब्द का प्रयोग किया गया है
जिससे कि जीवात्मवाची शब्दों से परमात्मा का अर्थबोध होता है; ऐसा
आश्मरथ्य आचार्य की मान्यता है । यदि यह जीवात्मा, परमात्मा का
कार्य होने से, परमात्मा ही न होता, उससे एकदम भिन्न होता तो,
परमात्मा को जान लेने पर, इसका ज्ञान नहीं हो सकता था । "सृष्टि के
पूर्व यह जगत, एकमात्र आत्मस्वरूप ही था" ऐसे सृष्टिपूर्व के अद्वैत
प्रतिपादक वाक्य से उक्त बात की ही पुष्टि होती है । "जैसे प्रज्वलित
अग्नि ज्वाला से हजारों चिनगारियां बाहर छिटकती हैं, हे सौम्य ! उसी
प्रकार विविध प्रजा भी उस परब्रह्म से उत्पन्न होती है और उसी में
विलीन हो जाती है।" इत्यादि वाक्य में कही गई, ब्रह्म से जीव की
उत्पत्ति और प्रलय से जीवों की ब्रह्म कार्यता, और ब्रह्मात्मकता ज्ञात
होती है। इसलिए जीव शब्द से परमात्मा का ही वर्णन किया गया है,
यह निश्चित मत है ।
उत्क्रमिष्यत एवम्भावादित्यौडुलोमिः ।१।४।२१॥
यदुक्तं जीवस्य ब्रह्मकार्यतया ब्रह्मणैक्येनैकविज्ञानेन सर्वं वि-
ज्ञानप्रतिज्ञोपादनाथं ब्रह्मणो जीवशब्देन प्रतिपादनमिति, तदयुक्तम्
“न जायते म्रियते वा विपश्चिद्” इत्यादिनाऽजत्वश्रुतेः जीवात्मनां
प्राचीनकर्मफल भोगाय जगत्सृष्ट्यभ्युपगमाच्च, अन्यथाविषमसृष्ट्-
यनुपपत्तेश्च ब्रह्मकार्यस्यजीवस्य ब्रह्मतापत्तिलक्षणो मोक्ष
आकाशादिवदवर्जनीय इति, तदुपायविधानानुष्ठानानर्थक्याच्च,
घटादिवत् कारणप्राप्तेर्विनाशरूपत्वेन मोक्षस्यापुरुषार्थत्वाच्च ।
[email protected]

( ६१० )
जीवात्मन उत्पत्तिप्रलयवादोपपत्तिरुत्तरत्र प्रपंचयिष्यते । श्रुतः
“एषसंप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परंज्योतिरूपसंपद्य स्वेनरूपेणा-
भिनिष्पद्यते” यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे
विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति-
दिव्यम्” इत्युत्क्रमिष्यतः परमात्मभावात् जीवशब्देन परमात्म-
नोऽभिधानम् इति औडुलोमिराचार्यों मन्यतेऽस्म ।
जीव ब्रह्म का कार्य है, इससे जीव और ब्रह्म एक हैं, एक के ज्ञान
से संपूर्ण का ज्ञान होता है, इस प्रतिज्ञा के प्रतिपादन के लिए ही, ब्रह्म
का जीव शब्द से वर्णन किया गया है, यह कथन असंग । है। “ज्ञानी न
उत्पन्न होता है न मरता है” इत्यादि में जीव को अजन्मा बतलाया गया
है। जीवों के प्राक्तन कर्मों के अनुसार ही जगत् की सृष्टि का भी वर्णन
मिलता है, यदि ऐसा न होना तो, सृष्टि में विषमता न होती । ब्रह्म के
कार्य आकाश आदि की तरह ब्रह्म के कार्य जीवात्मा का भी यदि ब्रह्म-
तापत्तिलक्षण वाला मोक्ष अनायास ही हो जाय तो, मोक्ष प्राप्ति के
उपाय अनुष्ठान आदि सब व्यर्थ हो जावेंगे [अर्थात् जैसे आकाश स्वतः
प्रकट होकर प्रलय में स्वतः लीन हो जाता है वैसे ही यदि जीवों की भी
उत्पत्ति और प्रलय होवे तो अनुष्ठानों की क्या आवश्यकता है] घट
आदि की तरह स्वतः ही विनष्ट होने पर अपने कारणत्व को यदि जीव
भी पा जावे तो, मोक्षनामक पुरुषार्थ को मानने की आवश्यकता ही क्या
है ? जीवात्मा के संबंध में जो उत्पत्ति और प्रलय की प्रसिद्धि है उसका
विवेचन आगे करेंगे ।
“यह जीव इस शरीर से बाहर निकल कर परमात्मा की परंज्योति
को प्राप्त कर अपने वास्तविक रूप को प्राप्त कर लेता है, ‘जैसे कि
बहती हुई नदियाँ अपने नामरूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती
हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष नाम रूप से मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुष को
प्राप्त हो जाता है ।” ऐसे, उत्क्रमणकारी जीव के परमात्मभाव के निरू-
पण से ज्ञात होता है कि उक्त प्रसंग में जीव शब्द से परमात्मा का ही
वर्णन किया गया है । ऐसा औडुलोमि आचार्य का मत है ।
[email protected]

अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ।१।४।२२॥
यदुक्तमुत्क्रमिष्यतो जीवस्य ब्रह्मभावाद् ब्रह्मणस्तच्छब्देनाभि-
धानमिति, तदप्ययुक्तम्, विकल्पासहत्वात् । अस्य जीवात्मन उत्क्रा-
न्तेः पूर्वमनेवंभावः किं स्वाभाविकः उतौपाधिकः अपारमार्थिकः
वेति । स्वाभाविकत्वे ब्रह्मभावो नोपपद्यते, भेदस्य स्वरूप-
प्रयुक्तत्वेन स्वरूपे विद्यमाने तदनपायात् । अथ भेदेनसह स्वरूपमप्य-
पैतीति, तथासति विनष्टत्वादेव तस्य न ब्रह्मभावः अपुरुषार्थत्वा-
-दिदोषप्रसंगश्च । पारमार्थिकौपाधिकत्वे प्रागपि ब्रह्मैवेति “उत्क्र-
मिष्यत एवंभावात्” इति विशेषो न युज्यते वक्तुम् । अस्मिन् पक्षे
हि उपाधिब्रह्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तराभावान्निरवयवस्य ब्रह्मण उपा-
धिनाच्छेदाद्यसंभवाच्चोपाधिगत एव भेद इत्युत्क्रान्तेः प्रागपि
ब्रह्मैव । औपाधिकस्य भेदस्यापारमार्थिकत्वे कस्यायमुत्क्रान्तौ ब्रह्म-
भाव इति वक्तव्यम् । ब्रह्मण एवाविद्योपाधितिरोहितस्वरूपस्येति चेन्न,
नित्यमुक्तस्वप्रकाशज्ञानस्वरूपस्याविद्योपाधितिरोधानासंभवात् । ति-
रोधानं नाम वस्तुस्वरूपेविद्यमाने तत्प्रकाशनिवृत्तिः । प्रकाश एव
वस्तु स्वरूपमित्यंगीकारे तिरोधानाभावः स्वरूपनाशो वा स्यात् ।
अतो नित्याविर्भूतस्वस्वरूपत्वात्तस्योत्क्रान्तौ ब्रह्मभावे न कश्चिद्
विशेषः , इति “उत्क्रमिष्यतः” इति विशेषणं व्यर्थमेव । “अस्माच्छ-
रीरात् समुत्थाय” इति पूर्वमनेवंरूपस्य न तदानीं ब्रह्मतापत्तिमाह,
अपितु पूर्वसिद्धस्वरूपस्याविर्भावम् । तथाहि वक्ष्यते “संपद्याविर्भावः
स्वेनशब्दात्” इत्यादिभिः ।
उत्क्रमण करने वाले जीव को ब्रह्मभाव प्राप्त होता है, इसीलिए
जीव शब्द से ब्रह्म का वर्णन किया गया है, इत्यादि कथन भी असंगत
है । ऐसा तो विकल्प से भी नहीं हो सकता ( एक विषय के लिए दो तीन
या इससे अधिक पक्षों की कल्पना करना ही विकल्प है ) उक्तमत वालों
से मैं पूछता हूँ कि-जीवात्मा में उत्क्रांति के पूर्व जो ब्रह्मभाव का अभाव है,

( ६१२ )
वह स्वाभाविक है या औपाधिक ? वह भी पारमार्थिक है या आपार-
मार्थिक ? यदि वह स्वाभाविक है तो जीवात्मा में कभी ब्रह्मभाव संभव
नहीं हैं, क्योंकि-जब भेद स्वतः सिद्ध है तो, वस्तुस्थिति में उस भेद का
अवगम हो नहीं सकता। यदि कहो कि भेद समाप्ति के साथ उसका
स्वरूप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा मानने पर तो, विनष्ट होने वाले
उसका ब्रह्मभाव होना और भी कठिन है, साथ ही मुक्ति के संबंध में,
अपुरुषार्थत्व दोष, उपस्थित हो जाता है। यदि यह पारमार्थिक
और औपाधिक है तो यह समझना चाहिए कि उत्क्रांति के पूर्व जीव
ब्रह्म ही है, तब “उत्क्रमण कर वह ब्रह्मभाव को प्राप्त करता है” इत्यादि
कहना निरर्थक है। इस स्थिति में ( पारमार्थिक औपाधिकावस्था में )
एक बात और है, उपाधि ब्रह्म इन दो के अतिरिक्त कुछ और तो रहता
नही तथा उपाधिद्वारा, निरवयव ब्रह्म में विभाग तो संभव है नहीं, इससे
यह सिद्ध होता है कि-वह केवल औपाधिक ही हो सकता है, पारमार्थिक
नही, इसलिए जीव, उत्क्रमण के पूर्व भी ब्रह्मस्वरूप ही था। यदि वह
औपाधिक भेद अपारमार्थिक है, तो फिर उत्क्रांति के बाद ब्रह्मभाव
किसका होता है ? यदि कहो कि अविद्या रूप उपाधि से विरहित ब्रह्म
ही, ब्रह्मभाव है, तो तुम्हारा यह कथन भी असंगत है, क्योंकि-नित्यमुक्त
और नित्य प्रकाश ज्ञान स्वभाव परब्रह्म में, अविद्याजन्य आवरण निमि-
त्तक तिरोधान असंभव है। वस्तुस्वरूप के रहते हुए उसके प्रकाश की
निवृत्ति हो जाना ही तो तिरोधान कहलाता है, प्रकाश स्वरूप परब्रह्म
का तिरोधान मानना तो प्रकाश निवृत्ति होने से उसके स्वरूप का नाश
मानना ही है। यदि नहीं मानते तो जीव का नित्यब्रह्मभाव निश्चित
होता है, उत्क्रांति से उसमें कोई विशेषता तो होगी नहीं, ‘उत्क्रमिष्यत्त···
यह विशेषण व्यर्थ ही है। “इस शरीर से उठकर” इत्यादि में मृत्युपूर्वी
अब्रह्मभाव वाले जीव की, तत्काल ब्रह्मप्राप्ति कही गई हो ऐसा भी नही
है, अपितु पूर्वसिद्ध उसके अपने वास्तविक स्वरूप का पुनः आविर्भाव
मात्र बतलाया गया है। यही बात सूत्रकार “संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात्”
इत्यादि में कहते हैं।
अतः “अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य”— य आत्मनि तिष्ठन्ना-
त्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्त रोयम-
[email protected]

( ६१३ )
यति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः”— योऽक्षरमंतरे संचरन् यस्याक्षरं
शरीरं यमक्षरं न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव
एको नारायणः”— श्रन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा” इति
स्वशरीरभूते जीवात्मन्यात्मतयाऽवस्थिते जीव शब्देन ब्रह्म प्रतिपाद-
नमितिकाशकृत्स्न आचार्यो मन्यतेस्म ।
अतः “जीवात्मा के स्वरूप में प्रवेश करके” जो आत्मा में स्थित
रहते हुए भी आत्मा से पृथक् है आत्मा जिसको नहीं जानता, आत्मा ही
जिसका शरीर है जो कि आत्मा को नियमित करता है, वही तुम्हारा
अन्तर्यामी अमृत स्वरूप आत्मा है “जो अक्षर ( जीव ) में संचरण करता
है, अक्षर ही जिसका शरीर है अक्षर जिसे नहीं जानता ऐसा सर्वान्तर्यामी
निष्पाप दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है” सबका आत्मस्वरूप
परमेश्वर अन्तर्यामी शासक है” इत्यादि श्रुतियों में, अपने ही शरीररूप
जीवात्मा में आत्मा रूप से उनकी स्थिति बतलाई है, इसीलिए जीवात्म-
वाची शब्दों से परमात्मा का वर्णन किया गया है। ऐसा काशकृत्स्न
आचार्य का अभिमत है।
जीवशब्दश्च जीवस्य परमात्मपर्यन्तस्यैव वाचको न , जीवमा-
त्रस्येति पूर्वमेवोक्तम् “नामरूपे व्याकरवाणि” इत्यत्र । एवमात्म-
शरीरभावेन तादात्म्योपपादने परस्य ब्रह्मणोऽपहतपाप्मत्वसर्वज्ञ-
त्वादिगोचरा जीवस्याविदुषः शोचतो ब्रह्मोपासनान् मोक्षवादिन्यो
जगत्सृष्टिप्रलयाभिधायिन्यो जगतो ब्रह्मतादात्म्योपदेशपराश्च
सर्वाः श्रुतयः सम्यगुपपादितां भवेतीति काशकृत्स्नीयंमतं सूत्रकारः
स्वीकृतवान् ।
जीव शब्द, जीव के परमात्मभाव तक का वाचक है केवल,
जीवभाव मात्र का ही वाचक नहीं है, ऐसा “नामरूपे व्याकरवाणि” के
प्रसंग में भी बतला चुके हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार, परमात्मा के
शरीर रूप जीवात्मा के साथ, तादात्म्य भाव स्थिर होता है। परब्रह्म के
[email protected]

[Page ६१४]

निर्दोष और सर्वज्ञ आदि गुणों के प्रतिपादक, तत्त्वज्ञान के अभाव में
शोक संतप्त जीव के ब्रह्मोपासना के फलस्वरूप होने वाले मोक्ष के प्रति-
पादक, जगत की सृष्टि स्थिति और प्रलय के प्रतिपादक, तथा ब्रह्म के
साथ ब्रह्म के साथ जगत के तादात्म्य के प्रतिपादक श्रुतिवाक्यों का भी
उक्त प्रकार से ही समाधान हो सकता है। इस काशकृत्स्न आचार्य के
मत को ही सूत्रकार ने स्वीकार किया है।
अयमत्रवाक्यार्थः, अमृतत्वोपाये मैत्रेय्या पृष्टे याज्ञवल्क्यः
“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” इत्यादिना परमात्मोपासनममृतत्वोपाय-
मुक्त्वा ”आत्मनि खल्वरे दृष्टे” इत्यादिनोपास्यलक्षणम्, दुंदुभ्या-
दिदृष्टान्तैश्चोपासनोपकरणभूत मनः प्रभृतिकरणनियमनं च सामा-
न्येभिधाय “सऽयथाऽर्द्रैन्धाग्ने” इत्यादिना “स यथा सर्वासामपां
समुद्र एकायनम्” इत्यादिना चोपास्यभूतस्य परस्यब्रह्मणो निखि-
लजगदेककारणत्वम्, सकलविषयप्रवृत्तिमूलकरणग्रामनियमनं च
विस्तीर्णमुपदिश्य “स यथा सैन्धवघनः” इत्यादिना अमृतत्वोपाय
प्रवृत्तिप्रोत्साहनाय जीवात्मस्वरूपेणावस्थितस्य परमात्मनोऽपरि-
च्छिन्नज्ञानैकाकारतामुपपाद्य तस्यैवारिच्छिन्नज्ञानैकाकारस्य संसार
दशायां भूतपरिणामानुवृत्ति “विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यःसमुत्थाय
तान्येवानुविनश्यति” इत्यभिधाय “न प्रेत्य संज्ञास्ति” इति मोक्षद-
शायां स्वाभाविकापरिच्छिन्नज्ञानसंकोचाभावेन भूतसंघातैनेकीकृत्या-
ऽत्मनि देवादिरूपज्ञानाभावमुक्तवा पुनरपि “यत्र हि द्वैतमिव भवति”
इत्यादिना अब्रह्मात्मकत्वेन नानाभूतवस्तुदर्शनमज्ञानकृतमिति निर-
स्तनिखिलाज्ञानस्य ब्रह्मात्मकं कृत्स्नं जगदनुभवतो ब्रह्मव्यतिरिक्तव-
स्त्वन्तराभावेन भेददर्शनं निरस्य “येनेदं सर्वं विजानाति तं केन वि-
जानीयात्” इति च जीवात्मा स्वात्मतयाऽवस्थितेन येन परमात्मना
ग्राहितज्ञानः सन्निदं सर्वं विजानाति, अयंतं केन विजानीयात् , न
केनापीति परमात्मनो दुरवगमत्वमुपपाद्य “स एष नेति नेति”