श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६१२ )
वह स्वाभाविक है या औपाधिक ? वह भी पारमार्थिक है या आपार-
मार्थिक ? यदि वह स्वाभाविक है तो जीवात्मा में कभी ब्रह्मभाव संभव
नहीं हैं, क्योंकि-जब भेद स्वतः सिद्ध है तो, वस्तुस्थिति में उस भेद का
अवगम हो नहीं सकता। यदि कहो कि भेद समाप्ति के साथ उसका
स्वरूप भी नष्ट हो जाता है, ऐसा मानने पर तो, विनष्ट होने वाले
उसका ब्रह्मभाव होना और भी कठिन है, साथ ही मुक्ति के संबंध में,
अपुरुषार्थत्व दोष, उपस्थित हो जाता है। यदि यह पारमार्थिक
और औपाधिक है तो यह समझना चाहिए कि उत्क्रांति के पूर्व जीव
ब्रह्म ही है, तब “उत्क्रमण कर वह ब्रह्मभाव को प्राप्त करता है” इत्यादि
कहना निरर्थक है। इस स्थिति में ( पारमार्थिक औपाधिकावस्था में )
एक बात और है, उपाधि ब्रह्म इन दो के अतिरिक्त कुछ और तो रहता
नही तथा उपाधिद्वारा, निरवयव ब्रह्म में विभाग तो संभव है नहीं, इससे
यह सिद्ध होता है कि-वह केवल औपाधिक ही हो सकता है, पारमार्थिक
नही, इसलिए जीव, उत्क्रमण के पूर्व भी ब्रह्मस्वरूप ही था। यदि वह
औपाधिक भेद अपारमार्थिक है, तो फिर उत्क्रांति के बाद ब्रह्मभाव
किसका होता है ? यदि कहो कि अविद्या रूप उपाधि से विरहित ब्रह्म
ही, ब्रह्मभाव है, तो तुम्हारा यह कथन भी असंगत है, क्योंकि-नित्यमुक्त
और नित्य प्रकाश ज्ञान स्वभाव परब्रह्म में, अविद्याजन्य आवरण निमि-
त्तक तिरोधान असंभव है। वस्तुस्वरूप के रहते हुए उसके प्रकाश की
निवृत्ति हो जाना ही तो तिरोधान कहलाता है, प्रकाश स्वरूप परब्रह्म
का तिरोधान मानना तो प्रकाश निवृत्ति होने से उसके स्वरूप का नाश
मानना ही है। यदि नहीं मानते तो जीव का नित्यब्रह्मभाव निश्चित
होता है, उत्क्रांति से उसमें कोई विशेषता तो होगी नहीं, ‘उत्क्रमिष्यत्त···
यह विशेषण व्यर्थ ही है। “इस शरीर से उठकर” इत्यादि में मृत्युपूर्वी
अब्रह्मभाव वाले जीव की, तत्काल ब्रह्मप्राप्ति कही गई हो ऐसा भी नही
है, अपितु पूर्वसिद्ध उसके अपने वास्तविक स्वरूप का पुनः आविर्भाव
मात्र बतलाया गया है। यही बात सूत्रकार “संपद्याविर्भावः स्वेन शब्दात्”
इत्यादि में कहते हैं।
अतः “अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य”— य आत्मनि तिष्ठन्ना-
त्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्त रोयम-
[email protected]