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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ६०१ )
“धन से अमृतत्व प्राप्ति की आशा नहीं है” इस उपक्रमवाक्य से तो
ज्ञात होता है कि अमृतत्व प्राप्ति के उपाय का उपदेश ही इस वाक्य में
दिया गया है, इसे पुरुष प्रतिपादक कैसे कहा जा सकता है ? उत्तर देते
हैं कि-इसमें पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। सांख्य शास्त्र में
अचित् धर्म (सुखदुःखादि) के बंधन से मुक्त पुरुष स्वरूप के यथार्थ ज्ञान
को ही अमृतत्त्व प्राप्ति का कारण कहा गया है “आत्मा वा अरे
द्रष्टव्यः” इत्यादि में, जीवात्मा के, प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप का ही,
अमृतत्व प्राप्ति के लिए उपदेश दिया गया है।
सर्वेषामात्मनां प्रकृतिवियुक्तस्वात्मयाथात्म्यविज्ञानेन सर्व
एवात्मानो विदिता भवन्तीत्यात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुपपन्नम्।
देवादिस्यावरान्तेषुसर्वेषुभूतेष्वात्मस्वरूपस्य ज्ञानैकप्रकारत्वात्
“इदं सर्वं यदयमात्मा” इत्यैकात्म्योपदेशः देवाद्याकाराणामनात्मा-
कारत्वात् “सर्वं तं परादात्” इत्यादिनान्यत्वनिषेधश्च “यत्र हि
द्वैतमिव भवति” इति च नानात्वनिषेधेनैकस्वरूपे हि आत्मनि
देवादिप्रकृति परिणामभेदेन नानात्वं मिथ्येत्युच्यते। “तस्य वा
एतस्यमहतोभूतस्य निश्वसितमेतद् यदृग्वेदः” इत्याद्यपि प्रकृते-
रधिष्ठातृत्वेन पुरुषनिमित्तत्वाज्जगदुत्पत्तेरुपपद्यते। एवमस्मिन्वाक्ये
पुरुषपरे निश्चिते सति तदैकार्थ्यात् वेदांताः तंत्रसिद्धं पुरुषमेवाद-
धतीति तदधिष्ठिता प्रकृतिरेव जगदुपादानम्, नेश्वरः, इति।
सभी आत्माओं का प्रकृति बंधन से मुक्त स्वरूप एक सा है, इस-
लिए प्रकृति बंधन से अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान हो जाने पर, सभी
आत्माओं का परिज्ञान हो जाना स्वाभाविक है, इसलिए अपने ज्ञान से
सबका ज्ञान हो जाता है, यह सिद्धान्त भी समीचीन है। देवादिस्यावर
पर्यन्त सभी भूतों में आत्मज्ञान स्वरूप धर्म समान है इसलिए “यह सब
आत्मस्वरूप है” ऐसा एकात्मोपदेश दिया गया, देवादि का आकार तो
ज्ञानस्वरूप है नहीं। “सारे पदार्थ ही उसे प्रतारित करते हैं” इससे भेद
बुद्धि का प्रतिषेध किया गया है तथा “जिससे द्वैतबृद्धि होती है” इत्यादि
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