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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ५४३ )

परब्रह्म के लिए ही सर्वत्र परंज्योति स्वरूप का प्रयोग किया गया है,
जैसे कि—“परं ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता
है” देवगण, उन्हें ज्योतियों की ज्योति, अमृत और वायु रूप से उपासना
करते हैं “ये जो द्युलोक से ऊपर ज्योति प्रकाशित हो रही है ।” इत्यादि,
इससे सिद्ध होता है कि-अंगुष्ठ प्रमित परमात्मा ही है ।
१० अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाधिकरण :-
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ।१।३।४२॥
छांदोग्ये श्रूयते-“आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते
यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा” इति । तत्र संशयः किमया-
माकाश शब्द निर्दिष्टो मुक्तात्मा, उत परमात्मा—इति किं युक्तम् ?
मुक्तात्मेति, कुतः ? “अश्व इव रोमाणि विधूय पापं, चंद्र इव
राहोर्मुखात् प्रमुच्य, धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभि-
संभवामि” इति मुक्तस्यानंतर प्रकृतत्वात् “ते यदंतरा” इति च
नामरूपविनिर्मुक्तस्य तस्याभिधानात् “नामरूपयोर्निर्वहिता” इति
च स एव पूर्वावस्थयोपलिलक्षयिषतः स एव हि देवादि रूपाणि
नामानि च पूर्वमबिभः, तस्यैव नामरूपविनिर्मुक्ता सांप्रतिक्यवस्था
“तद्ब्रह्म तदमृतम्” इत्युच्यते आकाशशब्दश्च तस्मिन्नप्यसंकुचित
प्रकाशयोगादुपपद्यते । ननु दहर वाक्यशेषत्वादस्य स एव दहरा-
काशोऽयमिति प्रतीयते, तस्य च परमात्मत्वं निर्णीतम् ।मैवं, प्रजा-
पति वाक्य व्यवधानात् । प्रजापति वाक्ये च प्रत्यगात्मनो
मुक्त्यवस्थान्तं रूपमभिहितम्, अनन्तरं च “विधूय पापम्” इति स
एव मुक्तावस्था प्रस्तुतः । अतोऽत्राकाशो मुक्तात्मा ।
छांदोग्योपनिषद का वाक्य है—“आकाश ही नाम और रूप का
निर्वाहक है, ये नामरूप जिसके अन्तर्यामी हैं, वही ब्रह्म, वही अमृत

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वही आत्मा है" इत्यादि । इस पर संशय होता है कि - आकाश शब्द
निर्दिष्ट मुक्तात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि मुक्तात्मा, क्यों कि
"जैसे कि घोड़ा रोंए झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों
को धोकर, राहुके मुख से निकले चन्द्रमा के समान शरीर त्याग कर
कृतकृत्य हो, नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ" ऐसा मुक्तात्मा का वर्णन
मिलता है। "वह नाम और गुण उसके अन्तर्गत हैं" इस वाक्य में नाम
रूप से मुक्त उसका वर्णन प्रतीत होता है "वह नाम रूप का निर्वाहक
है" इस वाक्य में भी, इसी की, सृष्टि की पूर्व स्थिति का वर्णन किया
गया है । उसने ही पहिले देवादि रूपों में बहुत से नाम धारण किये, वही
ब्रह्म, वही अमृत है" इस वाक्य में भी उसी की नाम रूप रहित अवस्था
का वर्णन है । अव्याहत प्रकाश से संबद्ध होने से, उसे ही आकाश कहा
गया है ।
यह प्रकरण दहर वाक्य का शेषांश है इसलिए यह वर्णन दहरा-
काश का ही प्रतीत होता है, दहराकाश परमात्मा ही है, यह निर्णय कर
ही चुके हैं, इसलिए यह परमात्मा का वर्णन है, इत्यादि शंका नहीं की
जा सकती, क्यों कि दहर प्रकरण और इस प्रकरण के मध्य में प्रजापति
वाक्य का व्यवधान है। प्रजापति वाक्य में जीवात्मा की मुक्तावस्था का
ही वर्णन है, उसके बाद ही "पापों को धोकर" वाक्य भी मुक्तात्मा का
ही बोधक है। इससे सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा ही आकाश है ।
सिद्धान्तः - इति प्राप्त उच्यते-आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्
इति आकाशः परब्रह्म, कुतः ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । अर्थान्तर
व्यपदेशस्तावत्- "आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इति नाम-
रूपयोः निर्वोढृत्वं बद्धमुक्तोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वमा-
काशस्योपपादयति । बद्धावस्थः स्वयं कर्मवशान्नामरूपे भजमानो न
नामरूपे निर्वोढु शक्नुयात्, मुक्तावस्थस्य जगद्व्यापारासंभवात् न
नितरां नामरूपनिर्वोढृत्वम् । ईश्वरस्य तु सकल जगन्निर्माण
धुरंधरस्य नामरूपयोः निर्वोढृत्वम् श्रुत्यैव प्रतिपन्नम्- "अनेन
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जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि"-यः सर्वज्ञः सर्व-
विद्यस्य ज्ञानमयंतपः, तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते-
“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”
इत्यादिषु । अतो निर्वाह्यनामरूपात्प्रत्यगात्मनो नामरूपयोर्निर्वो-
ढाऽयमाकाशोऽर्थान्तरभूतः परमेव ब्रह्म। तदेवोपपादयति “ते यदंतरा”
इति । यस्मादयमाकाशो नामरूपे अन्तरा-ताभ्यां अस्पृष्टोऽर्थान्तर-
भूतः, तस्मात्तयोर्निर्वोढा अपहतपाप्मत्वात् सत्यसंकल्पत्वाच्च निर्व-
हितेत्यर्थः । आदिशब्देन ब्रह्मत्वात्मत्वामृतत्वानि गृह्यंते। निरुपाधिक-
वृहत्वादयो हि परमात्मन एव संभवंति, तेनात्राकाशः परमेव ब्रह्म।
उक्त संशय पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “आकाशोऽर्थान्तर” सूत्र
प्रस्तुत करते हैं। उनके मत से आकाश, परब्रह्म है, क्यों कि उपनिषदों में
इसी अर्थ में आकाश शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे कि-“आकाश
नाम रूप का निर्वाहक है" इत्यादि जिसे निर्वाहिका शक्ति की चर्चा की
गई है, वही बद्धमुक्त उभय अवस्था वाले जीवात्मा से पार्थक्य बतलाती
है। बद्ध अवस्था वाला जीव, कर्मों के वश होकर स्वयं ही नाम और रूप
का अनुसरण करता है इसलिए वह तो निर्वाहक हो नहीं सकता। मुक्त
अवस्था वाले जीव में जागतिक व्यवहार होता नहीं, इसलिए वह भी,
नाम रूप का निर्वाहक नहीं हो सकता। सारे विश्व के निर्माण में पटु
ईश्वर की नामरूप निर्वाहकता शास्त्र प्रसिद्ध है-जैसे कि-“इस जीव में
प्रवेश कर नामरूप का व्यवहार करूँगा”-सर्वज्ञ, सर्वविद्, ज्ञानमय तप
वाले उस परमेश्वर से ही यह विराट जगत और नाम रूप तथा अन्न की
उत्पत्ति हुई-“धीर परमेश्वर, समस्त रूप का विस्तार कर उनका
नामकरण करके, उन्हीं नामों को व्यवहृत करते हुए स्थित हैं" इत्यादि
से सिद्ध होता है कि-नाम रूप का निर्वाहक आकाश, अपने कार्यभूत
नामरूप संपन्न जीवात्मा से भिन्न, परब्रह्म ही है। उसी का प्रतिपादन
“ते यदन्तरा” इत्यादि वाक्य में किया गया है, उसमें बतलाया गया है
कि-यह आकाश, नामरूप से अस्पृष्ट पृथक् पदार्थ है, इसीलिए वह
नामरूप का निर्वाहक है, अर्थात् वह निष्पापता और सत्यसंकल्पता को
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चरितार्थ करने के लिए, नामरूप का निर्वाह करता है । सूत्र में प्रयुक्त
आदि शब्द का तात्पर्य है-ब्रह्मत्व आत्मत्व और अमृतत्त्व । अहैतुक
महानतां आदि गुण परमात्मा में ही संभव हैं इसलिए इस प्रकरण का
उपदिष्ट आकाश तत्त्व, परब्रह्म का ही रूप है ।
यत् पुनरुक्तं "धूत्वा शरीरम्" इति मुक्तोऽनंतर प्रकृत. इति
तन्न, 'ब्रह्मलोकमभिसंभवामि" इति परस्यैव ब्रह्मणोऽनन्तर
प्रकृतत्वात् । यद्यप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्याभिसंभाव्यतया परं ब्रह्मनि-
र्दिष्टम्, तथाप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्य नामरूपनिर्वोढृत्वाद्यसंभावाद-
भिसंभाव्यं परमेव ब्रह्म तत्र प्रत्येतव्यम् ।
“धूत्वाशरीरम्" यह परवर्त्ती वाक्य, मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा
के लिए कहा गया है, यह कथन भी असगत है, “ब्रह्मलोक को प्राप्त
होऊँगा" यह वाक्य, उपर्युक्त वाक्य के ठीक बाद का जो कि परमात्मा
के लिए कहा गया है । यद्यपि, ब्रह्मभाव लब्ध मुक्तपुरुष का प्राप्य रूप
परब्रह्म ही कहा गया है, तथापि, उस ब्रह्मभाव लब्ध मुक्त पुरुष मे जब,
नाम रूप निर्वाक्त्व है नहीं, तो अभिसद्भाव्य परमात्मा को ही निर्वाहक
मानना पड़ेगा ।
कि च आकाश शब्देन प्रकृतस्य दहराकाशस्यात्र प्रत्यभिज्ञानात्
प्रजापतिवाक्यस्याप्युपासक स्वरूप कथनार्थत्वादुपास्य एव दहरा-
काशः प्राप्यतयोपसंह्रियत इति युक्तम् । आकाश शब्दश्च प्रत्यगा-
त्मनि न कश्चिद् दृष्टचरः । अतोऽत्राकाशः परंब्रह्म ।
उक्त प्रकरण में, आकाश शब्द से प्रस्तावित दहराकाश ही निर्दिष्ट
है, मध्यवर्त्ती प्रजापति वाक्य का तात्पर्य, उपासक के स्वरूप का कथन
मात्र है, इस जगह उपास्य रूप से दहराकाश को ही प्राप्य बतलाकर
उपसंहार किया गया है, यही मानना युक्ति संगत है । आकाश शब्द
का, जीवात्मा के लिए कहीं भी प्रयोग दिखलाई नही देता । इसलिए
निश्चित होता है कि उक्त प्रकरण में आकाश शब्द, परब्रह्म का ही
वाचक है ।
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अथस्यात्-प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतमात्मान्तरमेव, नास्ति,
ऐक्योपदेशात् द्वैत प्रतिषेधाच्च। शुद्धावस्थ एव हि प्रत्यगात्मा,
परमात्मा परंब्रह्म परमेश्वर इति च व्यपदिश्यते, अतः प्रकृतान्मुक्ता-
त्मनोऽभिसंभवितुनार्थान्तरमभिसन्भाव्यो ब्रह्मलोकः अतोनामरूपयो-
र्निर्वहिता आकाशोऽपि स एव भवितुमर्हति-इति। अत उत्तरं
पठति-
श्रुति वाक्यों के अद्वैत वर्णन और द्वैत के प्रतिषेध से ज्ञात होता
है कि-जीवात्मा से पृथक् किसी अन्य का अस्तित्व नहीं है, शुद्ध अवस्था
वाला जीवात्मा ही, परमात्मा, परब्रह्म, परमेश्वर आदि नामों से उल्लेख्य
है अभिसद्‌भविता ( ब्रह्मभाव प्राप्त ) मुक्तात्मा से अभिसद्भाव्य (प्राप्य)
ब्रह्मलोक कोई भिन्न वस्तु नहीं है, इसलिए नाम रूप का निर्वाहक
आकाश भी जीवात्मा ही है। इस भ्रांति का उत्तर सूत्रकार देते हैं--
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥१।३।४३॥
व्यपदेशादिति वर्तते, सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वेन
परमात्मनो व्यपदेशात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्माऽस्त्येव ।
तथाहि-वाजसनेयके-"कतम आत्मायोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु" इति
प्रकृतस्य प्रत्यगात्मनः सुषुप्त्यवस्थायामकिंचिद्ज्ञस्य सर्वज्ञेन पर-
मात्मना परिष्वंग आम्नायते-"प्राज्ञेनात्मनासंपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद
नान्तरम्" इति। तथोत्क्रांतावपि- "प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन-
न्द्याति" इति । न च स्वपत उत्क्रामतो वा किंचिद् ज्ञस्य तदानीमेव
स्वेनैव सर्वज्ञेन सतापरिष्वंगान्वारो हौ संभवतः न च क्षेत्रज्ञान्तरेण
तस्यापि सर्वज्ञत्वासंभवात् ।
जीवात्मा के लिए सुषुप्ति और उत्क्रांति इन दो अवस्थाओं का
वर्णन मिलता है, जिससे, जीवात्मा-परमात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता
है, इसलिए जीव से भिन्न परमात्मा नामक कोई तत्त्व है यह मानना

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होगा । जैसा कि-वाजसनेय उपनिषद् में—"आत्मा कौन है ? जो कि—
प्राणों के मध्य में विज्ञानमय नामवाला है" इत्यादि उपक्रम के बाद,
सामान्य अज्ञ जीवात्मा का सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ परमात्मा से मिलन
बतलाया गया है जैसे कि—"प्राज्ञ परमात्मा से मिलकर बाह्याभ्यंतर
ज्ञान से शून्य हो जाता है।" तथा उत्क्रान्ति में भी जैसे—"प्राज्ञ परमात्मा
से अधिष्ठित होकर ( जीव ) शरीर त्याग कर जाता है।" इन दोनों
वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि—जीवात्मा और परमात्मा भिन्न हैं, एक
नहीं है, एक ही वस्तु में अज्ञता और प्राज्ञता, एकीभाव और प्रतिष्ठान
आदि विलक्षणतायें संभव नहीं हैं और न क्षेत्रज्ञ जीवात्मा का साहचर्य
ही संभव हैं क्योंकि—उसमें सर्वज्ञता का अभाव है।
इतश्च प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्मेत्याह—
इसलिए भी जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न बतलाया जाता
है कि—
पत्यादिशब्देभ्यः : १।३।४४॥
अयं परिष्वंजकः परमात्मा उत्तरत्र पत्यादिशब्दैः व्यपदिश्यते 'सर्व-
स्याधिपतिः सर्वस्यवशी सर्वस्येशानः स न साधुनाकर्मणा भूयान्नो एव
असाधुना कनीयान्, एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपालन एष
सेतुः विधरण एषां लोकानामसंभेदाय, तमेतंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा
विविदिषंति एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, एतमेव प्रत्राजिनो लोक-
मिच्छन्तः प्रव्रजंति"—"स वा एष महानज आत्माऽन्नादोवसुदानः"—
अजरोऽमृतोऽभयोब्रह्म" इति एते च पतित्व जगद्विधरणत्व सर्वेश्वर-
त्वादयः प्रत्यगात्मनि मुक्तावस्थेऽपि न कथंचिद् संभवंति । अतो
मुक्तात्मनोऽर्थान्तरभूतो नामरूपयोनिर्वहिता आकाश. । ऐक्योप-
देशस्तु सर्वस्य चिदाचिदात्मकस्य ब्रह्मकार्यत्वेन तदात्मकत्वायत्त
इति "सर्वंखल्विदं ब्रह्म तज्जलान" इत्यादिभिर्वाक्यैः प्रतिपाद्यत
इति पूर्वमेव समर्थितम् । द्वैत प्रतिषेधश्च तत एषेत्यनवद्यम् ।

( ५४६ )
उक्त प्रकरण के उत्तर भाग में, जीवात्मा से परिष्वक्त होने वाले
परमात्मा को पति आदि शब्दों से बतलाया गया है—"वह सभी के अधि-
पति, वश करने वाले, सभी के ईश्वर हैं, वह उत्तम कर्मों से महान् या
मंद कर्मों से हीन नहीं होते, वे सबके ईश्वर भूतपाल, भूताधिपति हैं, वे
ही समस्त जगत के विभाग संरक्षण करने वाले सेतु हैं, ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण
उन्हें वेदार्थ परिशीलन से जानने की इच्छा रखते हैं उन्हें जानकर मौन
हो जाते हैं। संन्यासी भी इन्हीं को जानने की इच्छा से संन्यास लेते
हैं।" यह महान अज आत्मा ही अन्नभोक्ता और धनदाता हैं।" ब्रह्म
अजर-अमर और अभय स्वरूप है।" इत्यादि वाक्यों में जो पतित्व,
जगद्विधरणत्व और सर्वेश्वरत्व आदि गुण बतलाए गए हैं, वे मुक्त
अवस्था वाले जीवात्मा में कदापि संभव नहीं हैं। इससे ज्ञात होता है
कि—मुक्तात्मा से भिन्न नामरूप निर्वाहक आकाश है। "यह सब कुछ
ब्रह्म है" इत्यादि वाक्य में जो अद्वैत का प्रतिपादन है, उसका तात्पर्य
है कि—जड़ चेतन सारा जगत ब्रह्म का ही कार्य है, तदात्मक और उनके
अधीन है; इसका विवेचन पहिले भी कर चुके हैं। ब्रह्मात्मक भाव से
ही द्वैत का प्रतिषेध भी किया गया है। ऐसा मानना ही निर्दोष सुसंगत
मत है।
प्रथम अध्याय तृतीय पाद समाप्त

[ प्रथम अध्याय ]
चतुर्थ पाद
१. आनुमानिकाधिकरणः-
आनुमानिकमप्येकेषामितिचेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च
।१।४।१।।
उक्तं परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया जिज्ञास्यं जगज्जन्मादि
कारणं ब्रह्मचिद्वस्तुनः प्रधानादेश्चेतनाच्च बद्धमुक्तोभयावस्थाद्
विलक्षणं निरस्त समस्तहेयगंध सर्वज्ञं सर्वशक्ति सत्यसंकल्पं समस्त
कल्याण गुणात्मकं सर्वान्तरात्मभूतम् निरंकुशैश्वर्यम् इति । इदानीं
कपिलतंत्रसिद्धा ब्रह्मात्मक प्रधान पुरुषादि प्रतिपादन मुखेन प्रधान
कारणत्व प्रतिपादनच्छायानुसारोष्यपि कानिचिद्वाक्यानि कासु-
चिच्छाखासु संतीत्याशंक्य ब्रह्मैककारणत्वस्थेम्ने तन्निराक्रियते ।
तृतीय पाद तक, मोक्षसिद्धि के उपाय रूप से जिज्ञास्य, जगत् की
सृष्टि आदि के कारण, प्रधान आदि अचेतन तथा बद्धमुक्त-अवस्था वाले
चेतन जीवात्मा से विलक्षण, समस्त हीनता से रहित, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति,
सत्यसंकल्प, समस्त कल्याण गुणात्मक, सर्वान्तर्यामी, सर्वतंत्र स्वतंत्र
परम पुरुषार्थ स्वरूप पर ब्रह्म, का विवेचन किया गया हैं। अब अनीश्वर-
वादी कपिल के सांख्यशास्त्र के प्रतिपाद्य प्रधान पुरुष में जो, प्रधान तत्त्व
है उसका श्रुतियों में कुछ अंशों में, छायारूप से प्रतिपादन प्रतीत होता
है, अतः वही जगत का कारण है, ऐसी आशंका करते हुए, ब्रह्मकारणवाद
का दृढ़ता से संपादन करते हुए, उक्त आशंका का निराकरण करेंगे ।
कठवल्लीष्वाम्नायते- “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परंमनः,
मनसस्तु पराबुद्धिः बुद्धेरात्मामहान् परः, महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्
पुरुषः परः पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परागतिः ।” इति,
[email protected]

( ५५१ )
तत्र संदेहः किं कापिल तंत्र सिद्धिमब्रह्मात्मकं प्रधानमिहाव्यक्त
शब्देनोच्यते, उत न इति । किं युक्तम् ? प्रधानमिति, कुतः ?
“महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः” इति तंत्रसिद्धतंत्र प्रक्रिया-
प्रत्यभिज्ञानेन तस्यैव प्रतीतेः “पुरुषाान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा
परागतिः” इति पंचविंशकपुरुषातिरिक्त तत्व निषेधाच्च । अतोऽ-
व्यक्तम् कारणमिति प्राप्तम् । तदिदमुक्तम्-आनुमानिकमप्येकेषामिति
चेत्-इति । एकेषां शाखिनां शाखास्वानुमानिकं प्रधानमपि कारण-
माम्नात इति चेत्-
कठवल्ली में प्रसंग आता है कि-“इन्द्रियों से शब्दादि विषय
बलवान हैं, विषयों से मन बलवान है, मन से बुद्धि बलवती है बुद्धि से
श्रेष्ठ महत् तत्त्व है, महत् तत्त्व से बलवती अव्यक्त माया है, उस अव्यक्त
से श्रेष्ठ पुरुष है, उस पुरुष से श्रेष्ठ कोई नहीं है वही सब की परम
अवधि और परमगति है !”
इसको पढ़कर संदेह होता है कि-कपिल के सांख्य शास्त्र से सम्मत
प्रधान को ही अव्यक्त नाम से बतलाया गया है अथवा नहीं, कह सकते
हैं कि, प्रधान का ही वर्णन है, क्योंकि-अव्यक्त से पुरुष की जो बात कही
गई है, वह सांख्यतंत्र की ही प्रणाली है । तथा ‘पुरुष से श्रेष्ठ कुछ भी
नहीं है, वही परमगति और परम अवधि है” इत्यादि में जिस पुरुष का
वर्णन किया गया है वह भी सांख्यतंत्र सिद्ध पंचविंशक पुरुष का ही
वर्णन प्रतीत होता है । इसलिए जगत का कारण वह अव्यक्त प्रधान ही
है ऐसा निश्चित होता है । इसी आशय से “आनुमानिक मप्ये केषाम्”
अर्थात् किसी एक शाखा में आनुमानिक प्रधान को कारण माना गया
है । इत्यादि-
सिद्धान्त-अत्रोत्तरं नेति । नाव्यक्तशब्देनाब्रह्मात्मकं प्रधान-
मिहाभिधीयते । कुतः ? शरीररूपक विन्यस्त गृहीतेः, शरीराख्य
रूपक विन्यस्तस्य अव्यक्त शब्देनं गृहीतेः । आत्मशरीरबुद्धिमन्
इन्द्रियविषयेषु रथिरथादिभावेन रूपितेषु रथरूपेण विन्यस्तस्य
[email protected]

( ५५२ )
शरीरस्यात्राव्यक्त शब्देन ग्रहणादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति-पूर्वत्र हि-
“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च, बुद्धीं तु सारथिं विद्धि मनः
प्रग्रहमेव च, इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्” इत्यादिना;
“सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमंपदम्” इत्यनेन संसाराध्वनः
पारं वैष्णवं पदं प्रेप्संतमुपासकं रथित्वेन तच्छरीरा दीनि च रथरथां-
गरूपयित्वा यद्येते रथादयो वशे तिष्ठंति, स एवाध्वनः पारं वैष्णवं
पदमाप्नोतीत्युक्तवा, तेषु रथादिरूपित शरीरादिषु यानि येभ्यो
वशीकार्यतायां प्रधानानि तान्युच्यन्ते “इन्द्रियेभ्यः पराः” इत्यादिना ।
तत्र हयत्वेन रूपितेभ्य इन्द्रियेभ्यो गोचरत्वेन रूपिता विषयाः वशी-
कार्यत्वे पराः वश्येन्द्रियस्यापि विषयसन्निधाविन्द्रियाणां दुर्निग्रह-
त्वात् । तेभ्योऽपि परं प्रग्रहरूपितं मनः, मनसि विषय प्रवणे विषया-
सन्निधानस्याप्यकिंचित्करत्वात् । तस्मादपि सारथित्वरूपिता बुद्धिः
परा, अध्यवसायाभावे मनसोऽप्यकिंचित्करत्वात् । तस्या अपि रथित्व
रूपित आत्मा कर्तृत्वेन प्राधान्यात्परः, सर्वस्यचास्यात्मेच्छायत-
त्वादात्मैव महानिति च विशेष्यते । तस्मादपि रथरूपितं शरीरं
परम्, तदायत्तत्वाज्जीवात्मनः सकल पुरुषार्थसाधन प्रवृत्तीनाम् ।
तस्मादपि परः सर्वान्तरात्मभूतोऽन्तर्याम्यध्वनः पारभूतः परं पुरुषः,
यथोक्तस्यात्मपर्यन्तस्य समस्तस्य तत्संकल्पायत्त प्रवृत्तित्वात् । स
खल्वन्तर्यामितयोपासनस्यापि निर्वर्त्तकः । “परात्तुतच्छ्रुतेः” इति
हि जीवात्मनः कर्तृत्वं परमपुरुषायत्तमिति वक्ष्यते । वशीकार्यो-
पासन निवृत्त्युपायकाष्ठाभूतः परमप्राप्यश्च स एव । तदिदमुच्यते
“पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः” इति ।
सिद्धान्त—उक्त शंका का उत्तर नकारात्मक है । उक्त प्रसंग में
अव्यक्त शब्द से प्रधान का उल्लेख नहीं है, क्योंकि—अव्यक्त के लिए
शरीर के रूपक का वर्णन मिलता है जिसमें, आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन,
[email protected]

( ५५३ )
इन्द्रिय, इन्द्रिय के विषय, रथी और रथ आदि के रूप में कल्पना की
गई है रथ रूप से उल्लेख्य शरीर को ही अव्यक्त शब्द से प्रस्तुत किया
गया है । यह रूपक उक्त प्रकरण के पूर्व का ही है । रूपक इस प्रकार
है—"आत्मा को ही रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, और मन को
लगाम समझो, इन्द्रियों को घोड़ा, विषयों को उनकी विचरण भूमि"
इत्यादि से लेकर "वही संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त करते
हैं" इस अंतिम वाक्य तक, संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त
करने की इच्छावाले उपासक को रथी रूप से एवं उसके शरीर आदि
को रथ और रथांग अश्व आदि रूप से कल्पना करके; यह दिखलाया
गया है कि जो इन रथ आदि को वश में रखता है, वही संसार मार्ग से
पार जाकर वैष्णव पद प्राप्त करता है । रथादि रूप से कल्पित शरीर
आदि के मध्य में जिन्हें वशीभूत करने की बात कही गई है, उनमें भी
सर्व प्रधान, जिनको वशीभूत करना सर्वाधिक कष्ट साध्य है "इन्द्रियेभ्यः
परा" इत्यादि में उन्हीं वृत्तियों को "परा" शब्द से उल्लेख किया गया
है इस वशीकरण कार्य में, अश्वरूप से कल्पित इन्द्रियों की अपेक्षा, गोचर
रूप से कल्पित विषयों का समूह प्रधान है । क्योंकि—जिन लोगों ने एक
मात्र इन्द्रियों को संयमित कर भी लिया, विषयों से विरक्ति नहीं हुई
तो प्रायः उनकी इन्द्रियां असंयत हो जाती हैं । प्रग्रह ( लगाम ) रूप से
कल्पित मन, उन विषयों से भी प्रधान है, क्योंकि—मन के विरत होने
पर ही विषयों की न्यूनता होती है । सारथी रूप से कल्पित बुद्धि, मन
की अपेक्षा और भी प्रधान है, क्योंकि—बुद्धि के द्वारा अध्यवसाय न करने
पर मन भी कुछ नहीं कर सकता । रथी रूप से कल्पित आत्मा, सर्वकर्त्ता
होने के कारण, उस बुद्धि की अपेक्षा प्रधान है, क्योंकि उक्त सभी आत्मा-
धीन हैं, इसलिए आत्मा को ही "महान्" ऐसा विशेष नाम वाला कहा
गया है । रथ रूप से कल्पित शरीर, उस आत्मा की अपेक्षा प्रधान है,
क्योंकि— शरीर ही, जीवात्मा के हर प्रकार के पुरुषार्थ साधन में, प्रवृत्ति
प्रयोजक है । संसार मार्ग से पार सबके अन्तर्यामी, परम पुरुष परमात्मा
उसकी अपेक्षा प्रधान हैं, क्योंकि पूर्वोक्त आत्मा पर्यन्त सभी पदार्थ समस्त
प्रवृत्तियां, उन्हीं की इच्छाशक्ति के अधीन हैं, वे ही अंतर्यामी रूप से
उपासना का भी निर्वाह करते हैं। "परात्त तच्छुतेः" इस सूत्र में
जीवात्मा का कर्तृत्व, परं पुरुष के अधीन है, ऐसा बतलाते हैं। वे

( ५५४ )
परमात्मा ही आत्मवशीकरण और उपासना सिद्धि के उपायों में चरम
उपाय एवं परं प्राप्य लक्ष्य हैं या परं पुरुषार्थ रूप हैं, यही बात "पुरुष
से श्रेष्ठ कुछ नहीं है, वही परम अवधि और परम गति है" इस श्रुति में
कहा गया है।
तथा चान्तर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादिभिः सर्वं
साक्षात् कुर्वन्तः सर्वं नियमयतोत्युक्तवा “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा”
इति नियंत्रंतरं निषिध्यते । भगवद्गीतासु च-“अधिष्ठानंतथा कर्त्ता
करणं च पृथग् विधं, विविधाश्च पृथग् चेष्टा दैव चैवात्र पंचमम्।”
दैवमत्र पुरुषोत्तम एव “सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति-
र्ज्ञानमपोहनं च” इति वचनात् । तस्य च वशीकरणं तच्छरणागति-
रेव । यथाह-‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्
सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति । तदेवम्
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिना रथ्यादिरूपक विन्यस्ता इन्द्रिया-
दयः “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इत्यत्र स्वशब्दैरेव प्रत्यभिज्ञायन्ते, न
रथरूपितं शरीरमिति परिशेषात्तदव्यक्त शब्देनोच्यत इति निश्ची-
यते । अतः कापिलतंत्रसिद्धस्य प्रधानस्य प्रसंग एव नास्ति ।
इसी प्रकार अन्तर्यामी ब्राह्मण में “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादि
वाक्य में उस परमात्मा को सबका दृष्टा और नियामक बतलाकर
“नान्योऽतो” इत्यादि में इसके अतिरिक्त किसी अन्य नियामक का निषेध
किया गया है। भगवद्गीता में भी-“अधिष्ठान (शरीर) एवं कर्त्ता,
अनेक प्रकार के करण (इन्द्रियाँ) पृथक्-पृथक् विविध चेष्टायें तथा
पांचवां दैव, ये ही क्रिया प्रवृत्ति के कारण हैं।” इसमें दैव का तात्पर्य
पुरुषोत्तम ही है ऐसा-“मैं ही सबके हृदय में संन्निविष्ट हूँ, मुझसे ही
स्मरण, ज्ञान और अपोहन होते हैं”—इस वचन से ज्ञात होता है। उस
परमात्मा को वशीकरण करने का उपाय उसकी शरणागति प्राप्त करना
ही है। जैसा कि—इस गीता वाक्य से ज्ञात होता है-‘ईश्वर अपनी माया
से, सबके हृदय में विराज कर, सारे जगत् को यंत्रमयी कठपुतली की

तरह नचाते रहते हैं, तुम उन्हीं की शरण में जाओ।” इसी प्रकार
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादि से, रथी इत्यादि रूपक में चित्रित
इन्द्रियाँ आदि “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में अपने-अपने नाम
से ही बतलाए गए हैं, केवल रथ रूप से कल्पित शरीर को ही प्रकरण
के अंत में, ‘अव्यक्त’ शब्द से बतलाया गया है, ऐसा निश्चित होता है।
कपिलतंत्र सिद्ध प्रधान का तो प्रसंग ही नहीं है।
न चात्रतत्तंत्रसिद्ध प्रक्रिया प्रत्यभिज्ञा “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः”
इतीन्द्रियेभ्योऽर्थानां शब्दादीनां परत्व कीर्त्तनात् । नहि शब्दादय इन्द्रि-
याणां कारणभूताः तद्दर्शने “अर्थेभ्यश्च परंमनः”इत्यादि न तत्तत्रसंग-
तम्, बुद्धिशब्देन महत्तत्त्वस्याभिधानाभ्युपगमात् । नहि महतो
महान् परः संभवति । महत आत्मशब्देन विशेषणं च न संगच्छते
अतोरूपक निन्यस्तानामेव ग्रहणम् ।
उम प्रसंग में सांख्यतंत्र के विवेचन की प्रणाली भी ज्ञात नहीं
होती, “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में, इन्द्रियों से उनके अर्थ
अर्थात् शब्द आदि विषयों को, श्रेष्ठ बतलाया गया है, सांख्य तंत्र में कहीं
भी, शब्द आदि को इन्द्रियों का कारण नहीं बतलाया गया है। इसी
प्रकार “अर्थेभ्यश्च परंमनः” वाक्य भी सांख्य तंत्र सम्मत नहीं है, इस
तंत्र में विषयों का कारण मन नहीं है। “बुद्धेरात्मा महान् परः” वाक्य
भी उक्त तंत्र के मत से विपरीत है क्योंकि-सांख्य में बुद्धि शब्द “महत्”
शब्द वाची है, महत् कभी महान् से श्रेष्ठ हो ही नहीं सकता “महत्”
शब्द आत्म शब्द का विशेषण भी नहीं हो सकता, इसलिए उक्त कल्पित
रूपक से आत्मा आदि अर्थ मानना ही युक्ति-युक्त है।
दर्शयति च तदेव-“एषु सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते,
दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः
तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि, ज्ञानंन्नात्मनि महतियच्छेद् तद्यच्छेच्छान्त-
न्नात्मनि” इति । अजित बाह्याभ्यंतरकरणैरस्य परमपुरुषस्य दुर्दर्श-

( ५५६ )
त्वमभिधाय हयादिरूपितानामिन्द्रियादीनां वशीकार प्रकारोऽय
मुच्यते । 'यच्छेद् वाङ्मनसी” वाचं मनसि नियच्छेत्-वाक्पूर्वकाणि
कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि च मनसि नियच्छेद् इत्यर्थः । वाक्शब्दे
द्वितीयायाः "सुपां सुलुकू" इतिलुक् । “मनसी" इति सप्तम्या-
श्छान्दसो दीर्घः । “तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि" तन्मनौ बुद्धौ नियच्छेद् ।
ज्ञान शब्देनात्र पूर्वोक्ता बुद्धिरभिधीयते । ज्ञाने आत्मनि" इति
व्यधिकरणे सप्तम्यौ । आत्मनि वर्त्तमाने ज्ञाने नियच्छेदित्यर्थः ।
“ज्ञान आत्मनि महति यच्छेत्" बुद्धिं कर्त्तरि महत्यात्मनि निय-
च्छेत् !” तद्यच्छेच्छांत आत्मनि" तं कत्र्तरि परस्मिन् ब्रह्मणि
सर्वान्तर्यामिणि नियच्छेत् । व्यत्ययेन तदिति नपुंसकलिंगता ।
एवम्भूतेन रथिना वैष्णवं पदं गन्तव्यमित्यर्थः ।
उक्त रहस्य को श्रुति में इस प्रकार दिखलाया गया है कि- “यह
सबका आत्मरूप परं पुरुष, समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी, माया के
परदे में छिपा रहने से प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्म तत्त्वों को समझने
वाले पुरुषों से ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।" बुद्धिमान
साधक को चाहिए कि वाणी आदि को मन में निरुद्ध करके, उस मन
को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में विलीन करे तथा ज्ञान स्वरूप बुद्धि आत्मा
में विलीन करे तथा उस महान् आत्मा को शांत स्वरूप परमात्मा में
विलीन करे ।"
उक्त प्रसंग में, जो लोग बाह्य और आभ्यंतर को जय नहीं कर
पाते, उनके लिए परमात्म दर्शन बहुत दूर है, ऐसा बतलाते हुए, अश्व
आदि रूप से कल्पित इन्द्रियो को वशीभूत करने के विशेष उपाय का
निर्देश किया गया है। "यच्छेद् वाङ्मनसी" का तात्पर्य है, वागेन्द्रिय को
मन में लीन करो अर्थात् वागेन्द्रिय सहित कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को
लीन करो इस वाक्य में "सुपांसुलुक्" इस व्याकरणीय नियम से वाक्
शब्द की द्वितीया विभक्ति का लोप हो गया है तथा "मनसी" पद में
वैदिक व्याकरण के अनुसार सप्तमी विभक्ति में दीर्घ ईकार हो गया
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( ५३७ )
है। “तद् यच्छेद् ज्ञान आत्मनि” का अर्थ है, उस मन को बुद्धि में लीन
करो इसमें ज्ञान शब्द से पूर्वोक्त बुद्धि ही लक्षित है। “ज्ञाने आत्मनि” में
दो सप्तमी विभक्ति का प्रयोग है, जिसका तात्पर्यार्थ है आत्मा में वर्त्तमान
ज्ञान में लीन करो। ‘ज्ञानं आत्मनि महति यच्छेद्’ का तात्पर्य है बुद्धि
को महान कर्त्ता आत्मा में लीन करो। “तद् यच्छेद् शांत आत्मनि” का
तात्पर्य है—उस कर्त्ता को परब्रह्म सर्वान्तर्यामी परमात्मा में लीन करो।
इस वाक्य में तत् शब्द का नपुंसक लिंगात्मक प्रयोग, लिंग विपर्यय से
हुआ है। ऐसा रथी ही वैष्णव पद प्राप्त कर सकता है, यही प्रकरण का
तात्पर्य है।
अव्यक्त शब्देन कथं व्यक्तस्य शरीरस्याभिधानम् ? इत्याह-
अव्यक्त शब्द से, व्यक्त शरीर कैसे माना गया ? इसका निराकरण
करते हैं -
सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ।१।४।२।।
भूतसूक्ष्ममव्याकृतं ह्यवस्था विशेष मापन्नं शरीरंभवः तदव्या-
कृतमिह शरीरावस्थमव्यक्त शब्देनोच्यते । तदर्हत्वात्-तस्य अव्या-
कृतस्य अचिद् वस्तुन एव विकारापन्नस्य रथवत् पुरुषार्थ साधन
प्रवृत्त्यर्हत्वात् ।
अव्याकृत सूक्ष्म भूत ही, अवस्था विशेष योग से शरीर होते हैं।
शरीर रूप विशिष्ट अवस्था को प्राप्त इन अव्याकृतों को ही यहाँ अव्या-
कृत नाम से कहा गया है (अर्थात् अव्यक्त शब्द सूक्ष्मशरीर का वाची है)
विकृतावस्था को प्राप्त अचित् वस्तु ही, रथ की तरह पुरुषार्थ साधन
करने वाली है, यही उक्त कथन का तात्पर्य है।
यदि भूतसूक्ष्ममव्याकृतमभ्युपगम्यते, कापिल तंत्रसिद्धोपादानेकः
प्रद्वेष ? तत्रापि हि भूतकारणमेवाव्यक्तमित्युच्यते । तत्राह-
अव्याकृत भूतसूक्ष्म को ही यदि अव्यक्त मानते हैं तो सांख्योक्त
प्रकृति को ही मानने में क्या आपत्ति है ? वहाँ भी तो भूतकारण को ही
अव्यक्त कहते हैं। इसका निराकरण करते हैं—
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( ५५८ )
तदधीनत्वादर्थवत् ॥१।४।३॥
परमकारणभूत परमपुरुषाधीनत्वात् प्रयोजनवत् भूत सूक्ष्मम्।
एतदुक्तं भवति-न वयमव्यक्तं तत्परिणाम विशेषांश्च स्वरूपेण
नाभ्युपगच्छामः। अपितु परमपुरुष शरीरतया तदात्मकत्वविरहेण।
तदात्मकत्वेनैव हि प्रकृत्यादयः स्वप्रयोजनं साधयंति, अन्यथा स्वरूप-
स्थिति प्रवृत्ति भेदास्तेषां न स्युः, तथाऽनभ्युपगमादेव तंत्रसिद्ध
प्रक्रियानिरसनम् इति।
परम कारण परं पुरुष परमात्मा के अधीनस्थ अव्याकृत भूत सूक्ष्मों
का एक विशेष प्रयोजन है। कथन यह है कि-हम लोग अव्यक्त और
उसके विशेष-विशेष परिणामों को स्वतंत्र रूप से एकाएक ही स्वीकार
नही कर लेते, अपितु परमपुरुष के शरीर तदात्मक होने से ही, उनकी
कृति को मानते हैं, तदात्मक होकर ही प्रकृति आदि सभी, अपने प्रयोजनों
को पूरा कर पाते है। यदि ऐसा न होता तो, उनके स्वरूप, स्थिति और
प्रवृत्ति में भेद न होता उक्त प्रकार की प्रक्रिया सांख्यतंत्र में नहीं है,
इसलिए सांख्यतंत्र प्रक्रिया का विरोध किया गया है।
श्रुतिस्मृत्योर्हि जगदुत्पत्ति प्रलयवादेषु परमपुरुषमहिमवादेषु
च प्रकृति विकृतिपुरुषास्तदात्मकाः संकीर्त्यन्ते, यथा-“पृथिव्यप्सु-
लीयते” इत्यारम्भ-“तन्मात्राणि भूतादौलीयन्ते, भूतादिर्महति लीयते,
महानव्यक्ते लीयते, अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे
देवएकीभवति” तथा-“शस्य पृथिवी शरीरं यस्यापः शरीरं, यस्य तेजः
शरीरं यस्यवायुः शरीरं यस्याकाशः शरीरं यस्याहंकारः शरीरं यस्य
बुद्धिः शरीरं यस्य अव्यक्तं शरीरं यस्याक्षरं शरीरं यस्य मृत्युः शरीरं
एष सर्व भूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः” तथा-
“भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनोबुद्धिरेव च, अहंकार इतीयं में
प्रकृतिरष्टधा, अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम्, जीवभूतां
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महाबाहो ययेदंधार्यते जगत्। एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय,
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा। मत्तः परतरं नान्यत्
किंचिदस्ति धनंजय, मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव” इति।
‘व्यक्तं विष्णुस्तथा अव्यक्तं पुरुषः कालएव च” इति। “प्रकृतिर्या ‘
‘मयाऽख्याता व्यक्ताव्यक्त स्वरूपिणी, पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते
परमात्मनि परमात्मा च सर्वेषां आधारः परमेश्वरः” इति च।
श्रुति स्मृतियों में, जगत की उत्पत्ति स्थिति और लय के बोधक,
परम पुरुष की महिमा के प्रतिपादक, प्रकृति विकृति और पुरुष तदात्मक
वाक्य मिलते हैं जैसे कि— “पृथ्वी जल में लीन हो जाती है” इत्यादि से
प्रारंभ कर--“तन्मात्रा, भूतादि अहंकार में लीन हो जाती हैं, अहंकार,
महान् अव्यक्त में लीन हो जाता है, अव्यक्त अक्षर में लीन होता है,
अक्षर तम में लीन हो जाता है--तम, परमात्मा में लीन हो जाता है।”
तथा— “पृथ्वी जिसका शरीर है, जल जिसका शरीर है, तेज
जिसका शरीर है, वायु जिसका शरीर है, आकाश जिसका शरीर
है, अहंकार अक्षर जिसका शरीर है, जिसका शरीर है, बुद्धि जिसका
शरीर है, अव्यक्त जिसका शरीर है, मृत्यु जिसका शरीर है,
वह सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण ही है।” तथा—
“भूमि-जल-अग्नि-वायु-आकाश-मन-बुद्धि और अहंकार ये मेरी
आठ प्रकार की भिन्ना प्रकृति है, मेरी जीव रूपा एक अपरा
प्रकृति भी है जो कि इससे भिन्न है, उसी से यह जगत स्थिर है, ये समस्त
भूत समुदाय मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं, मैं ही समस्त जगत का उत्पत्ति
और विलय स्थान हूँ, मेरे अतिरिक्त कुछ और नहीं है, सूत्र में पिरोई
मणियों के समान मुझमें ही सारा जगत ग्रथित है। व्यक्त (जड) अव्यक्त
चैतन्य, विष्णु और पुरुष और काल ये सभी उसी के रूप हैं। जिस व्यक्त
और अव्यक्त प्रकृति और पुरुष को मैं बतला रहा हूँ वे दोनों ही पर-
मात्मा में लीन हो जाते हैं। परमात्मा ही सर्वाधार पुरुषोत्तम है, उसे ही
वेद और वेदांत में, विष्णु कहा गया है।” इत्यादि—
ज्ञेयत्वावचनाच्च ।१।४।४॥
यदि तंत्र सिद्धमिहाव्यक्तमविवक्षिष्यत्, ज्ञेयत्वमवक्ष्यत्, व्यक्ता-
[email protected]

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व्यक्तज्ञविज्ञानात् मोक्षं वदद्भिस्तांत्रिकै स्तेषां सर्वेषां ज्ञेयत्वाभ्युपग-
तात्, न चास्य ज्ञेयत्वमुच्यते, अतो न तंत्रसिद्धस्येह ग्रहणम् ।
यदि उपनिषदों में सांख्योक्त प्रधान को जगत का कारण माना
गया होता तो, उसी को ज्ञेय भी कहा गया होता । व्यक्त-अव्यक्त और
पुरुष, इन तीनों के विशेष ज्ञान से मोक्ष मानने वाले सांख्यवादी, इन
तीनों को ज्ञेय मानते हैं, उपनिषदों में अव्यक्त को ज्ञेय नहीं मानते
इसलिए श्रुतियों का प्रतिपाद्य, सांख्योक्त प्रधान नहीं है ।
वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् । १ । ४ । ५ ॥
“अशब्द मस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्चयत्, अनाद्य-
मनंतं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्यु मुखात्प्रमुच्यते” इत्य-
व्यक्तस्य ज्ञेयत्वमनंतरमेव वदतीयं श्रुतिरेति चेत्-तन्न, प्राज्ञः परम-
पुरुष एवेत्यत्र श्लोके निचाय्यत्वेन प्रतिपाद्यते । “विज्ञानसारः
यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं
पदम्” एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते, दृश्यते त्वग्र्यया
बुद्ध्यासूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” इति प्राज्ञस्यैव प्रकृतत्वात् । अतएव-
“पुरुषान्न परंकिंचिद् “इति न पंचविंशक पुरुषातिरिक्त तत्त्व निषेधः,
तस्य च परं पुरुषस्याशब्दत्वादयो धर्माः “यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम्”
इत्यादि श्रुति प्रसिद्धाः । “महतः परम्” इत्यपि “बुद्धेरात्मा महान्
परः” इति पूर्वप्रकृताज्जीवात्मनः परत्वमेवोच्यते ।
“शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध रहित, अनादि अनंत, महत् तत्त्व से भी
परवर्ती, उस स्थिर वस्तु की उपासना करने से, मृत्यु से छुटकारा प्राप्त
होता है” यह परवर्ती श्रुति तो अव्यक्त को ज्ञेय बतला रही है, ऐसी
शंका करना भी ठीक नहीं है, प्राज्ञ परं पुरुष परमात्मा को ही इसमें
उपास्य कहा गया है । “विज्ञान जिसका सारथी और मन जिसकी लगाम
है, वही साधक, संसार मार्ग को पार कर विष्णु के परं पद को प्राप्त

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करता है”—“यह सबका आत्म रूप परम पुरुष समस्त प्राणियों में रहता
हुआ भी माया के परदे में छिपे रहने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल
सूक्ष्म तत्त्वों को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से
देखा जाता है।” इत्यादि में प्राज्ञ परमात्मा को ही उपास्य रूप से
बतलाया गया है। “पुरुषान्न परं किंचित्” इस वाक्य में भी पंचविंशक
पुरुष से अतिरिक्त तत्त्व का निषेध प्रतीत नहीं होता। उस परम पुरुष की
अशब्दत्व आदि जो विशेषतायें हैं, वे “अदृश्यमग्राह्यम्” इत्यादि
वाक्यों में प्रसिद्ध हैं। “महतः परम्” वाक्य भी, “बुद्धेरात्मा महान्
परः” इस पूर्वकथित वाक्य के जीवात्मा से पर तत्त्व, परमात्मा की
ओर ही इङ्गन कर रहा है।
त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥१।४।६॥
अस्मिन् प्रकरणे हि उपायोपेयोपेतॄणां त्रयाणामेव चैवमुप-
न्यासः ज्ञेयत्वेनोपन्यासः तद्विषयश्च प्रश्नो दृश्यते, नान्यस्या

( ५६२ )
इस प्रकरण में उपाय (साधना) उपेय (साध्य) और उपेतृ (साधक)
इन तीनों का ही उपन्यास अर्थात् तीनों को ही ज्ञेय रूप से बतलाया
गया है, और उन्हीं के विषय में प्रश्न प्रस्तुत किया गया है, अव्यक्त
आदि का प्रश्न ही नहीं है। ऐसा वर्णन मिलता है कि-मुमुक्षु नचिकेता
ने मृत्यु प्रदत्त तीन वरों में सर्व प्रथम पुरुषार्थयोग्यतापादिनी पिता की
प्रसन्नता प्राप्त की, दूसरे वर में मोक्ष साधन भूत नाचिकेताग्नि विद्या
मांगी “हे मृत्यु ! आप स्वर्ग साधन भूत अग्नि विद्या को जानते है, मुझ
श्रद्धालु को उसका उपदेश करिये, स्वर्ग लोकगामी अमृतत्व भोग करते है,
द्वितीय वर के रूप में मैं उसी की याचना करता हूँ।” यहाँ स्वर्ग शब्द
परम पुरुषार्थ मोक्ष का द्योतक है। अमृतत्वं भजन्ते पद स्वर्गीय लोगों के
जन्म मरण के अभाव और क्षयशील कर्म की निंदा का द्योतक है। “जो
तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करता है, वह माता पिता और आचार्य
इन तीनो से संबंधित तीनो कर्मों से कृतकार्य हो चुका, वह जन्म मरण
को भी अतिक्रमण कर चुका” इस उत्तर से भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि
होती है। “तीसरे वर में मनुष्य के मरणोत्तर अस्तित्व को कोई मानता है,
कोई नही मानता, आपके उपदेश से इस संशयात्मक रहस्य को जानना
चाहता हूँ” इत्यादि में मोक्ष के स्वरूप विषयक प्रश्न द्वारा प्राप्तव्य,
प्रापक और उसके उपायरूप कर्म-संपादित उपासना के स्वरूप की
जिज्ञासा की गई है।
एवं मोक्षे पृष्टे तदुपदेशयोग्यतां परीक्ष्योपदिदेश-“तं दुर्दर्शं
गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन
देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति। तदेवं सामान्येनोपदिष्टे
नचिकेताः प्रीतस्सन् “देवं मत्वा” इत्युपास्यतया निर्दिष्टस्य प्राप्य-
भूतस्य देवस्य “अध्यात्मयोगाधिगमेन” इति वेदितव्यतया निर्दिष्ट-
प्राप्तुः प्रत्यगात्मनश्च “मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति निर्दिष्टस्य
ब्रह्मोपासनस्य च स्वरूप विशोधनाय पुनः पप्रच्छ-“अन्यत्र धर्मादन्य-
त्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताद्भव्याच्च यत्तत्पश्यसि
तद् वद” इति। एवं सकलेतरातीतानागतवर्त्तमान साध्यसाधनसाधक-