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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादिना वेदविदः शूद्रादिभ्यो न
वदंतीति च न शक्यं वक्तुम्, तत्त्वमस्यादि वाक्यावगत ब्रह्मात्म-
भावानां वेदशिरसि वर्त्तमानतया दग्धाखिलाधिकारत्वेन निषेध-
शास्त्रकिंकरत्वाभावात् अतिक्रांतनिषेधैर्वा कैश्चिदुक्ताद्वाक्यात्
शूद्रादेः ज्ञानमुत्पद्यत एव ।
आप यह भी नहीं कह सकते कि-“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादि
वाक्यों से, वेदवेत्ता शूद्रों को उपदेश देने का विरोध करते हैं; क्यों कि-
जिन्हें “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों से ब्रह्मात्मभाव का परिज्ञान हो गया है,
वे तो वेदों से भी अतीत स्थिति को प्राप्त कर चुके, उनके तो सारे ही
कर्म बन्धन दग्ध हो चुके, वे तो शास्त्रीय निषेध के दास हो नहीं सकते
वे तो निषेध का अतिक्रमण करके शूद्र को तत्त्वोपदेश देंगे, शूद्र को तो
ज्ञान हो ही जायगा ।
न च वाक्यं शुक्तिकादौ रजतादिभ्रम निवृत्तित्त्वत् पौरुष

( ५३८ )
ज्ञातृज्ञेयविकल्परूपं कृत्स्नं जगच्चाध्यस्तमिति निश्चित्यैवम्भूत-
परिशुद्ध प्रत्यग्वस्तुन्यनवरतभावनया विपरीतवासनां निरस्य तदेव
प्रत्यग्वस्तु साक्षात्कृत्य शूद्रादयोऽपि विमोक्ष्यन्त इति मिथ्याभूत-
विचित्रैश्वर्य विचित्रसृष्ट्याद्यलौकिकानंतविशेषावलम्बिना वेदांत
वाक्येन न किंचित् प्रयोजनमिह दृश्यत इति शूद्रादीनामेव ब्रह्म-
विद्यायामधिकारः सुशोभनः। अनेनैव न्यायेन ब्राह्मणादीनामपि
ब्रह्मवेदनसिद्धेरुपनिषच्च तपस्विनी दत्तजलांजलिः स्यात्।
आप यह नहीं कह सकते कि—सीप आदि में, रजतभ्रमनिवृत्ति
की तरह, विद्वान् पुरुष के उपदेशात्मक वाक्य से शूद्र का जगद्भ्रम
निवृत्त नहीं हो सकता, ठीक है—तत्त्वमसि वाक्य श्रवण के बाद बहुत से
ब्राह्मणों की भी तो भ्रमनिवृत्ति नहीं होती। यदि कहें कि-निदिध्यासन
से द्वैतवासना के निरस्त हो जाने पर ही निवर्त्तक ज्ञान होता है; सो यह
नियम तो उपदेशात्मक वाक्य में शूद्रों के लिए भी लागू हो सकता है,
कोई ब्राह्मण के लिए ही तो निदिध्यासन का विशेष नियम नहीं। तत्त्व
के प्रतिपादन में समर्थ ब्रह्मात्मभाव बोधक वाक्य विषयक भावना
(चिन्तन के प्रवाह) को ही तो निदिध्यासन कहते हैं, यह भावना ही तो
तद्विषयक विपरीत वासना की निवृत्ति करती है, यही निदिध्यासन का
फल है। वेदानुशीलन को भी ज्ञानेच्छा उत्पादन का, उपयोगी कहा जाता
है। इसी प्रकार महापुरुष के उपदेश वाक्य से ज्ञानेच्छा होने पर निदि-
ध्यासनादि द्वारा विपरीत संस्कार के निवृत्त हो जाने पर शूद्र को भी
तत्त्वज्ञान हो जायगा और उसी से असत् बंधन की भी निवृत्ति हो
जायगी। अथवा आपके मतानुसार यह भी तो संभव है कि—जो निर्विशेष
और स्वप्रकाश चैतन्यमय परमात्मा से बहुविध विचित्रतापूर्ण ज्ञातृ ज्ञेय
कल्पनात्मक समस्त जगत समारोपित है, तर्क सम्मत प्रत्यक्ष और अनुमान
प्रमाण की सहायता से ज्ञानार्जन करके, शुद्ध चैतन्य परमात्मा की
निरन्तर भावना करके, जगत सत्यता के उस भ्रांत संस्कार का निराकरण
करके, सर्वव्यापी प्रत्यक्ष चैतन्य का साक्षात्कार करके, शूद्र आदि भी
मुक्तिलाभ कर सकते हैं। मिथ्याभूत विचित्र ऐश्वर्य और विचित्र सृष्टि

( ५३६ )
आदि अनंत अलौकिक विशेषावगाही वेदांत वाक्य का यहाँ कोई प्रयोजन
तो दीखता नहीं उक्त प्रकार से ही शूद्रादि का ब्रह्मविद्या में अधिकार
समधिक शोभित होता है। ब्राह्मणादि को भी उक्त नियम से ही, ब्रह्म-
ज्ञान सिद्धि संभावना के लिए तपस्विनी उपनिषद् देवी को जलांजलि
देनी होगी।
न च वाच्यं नैसर्गिक लोक व्यवहारे भ्राम्यतोऽस्य केनचिदयं
लौकिकव्यवहारोभ्रमः, परमार्थस्त्वेवमिति समर्पिते सत्येव
प्रत्यक्षानुमानवृत्त बुभुत्सा जायत इति तत्समर्पिका श्रुतिरप्यास्थेयेति,
यतो भवभयभीतानां सांख्यादय एव प्रत्यक्षानुमानाभ्यां वस्तुनि-
रूपणं कुर्वन्तः प्रत्यक्षानुवृत्तबुभुत्सां जनयंति बुभुत्सायां च जातायां
प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव विविक्तस्वभावाभ्यां नित्यशुद्धस्वप्रकाशा-
द्वितीयकूटस्थ चैतन्यमेव सत्, अन्यत्सर्वं तस्मिन्नध्यस्तमिति
सुविवेचनम्। एवंभूते स्वप्रकाशिनि वस्तुनि श्रुति समधिगम्यं
विशेषांतरं च नाभ्युपगम्यते—
आप यह भी नहीं कह सकते कि—लोक अनादि काल से स्वाभाविक
लौकिक व्यवहार में विभ्रान्त है, "यह समस्त लौकिक व्यवहार भ्रमात्मक
है, परमार्थ वस्तु अमुक है" किसी सुबुद्ध व्यक्ति के द्वारा ऐसा बतलाने
पर ही, इस लोक में प्रत्यक्ष और अनुमानावगत बुभुत्सा (बोधेच्छा)
उत्पन्न हो सकती है, इसलिए तदनुकूल श्रुति का आश्रय लेना आव-
श्यक है।
इस प्रकार तो निरीश्वरवादी सांख्य आदि भी, भव भयभीत
प्राणियों में, प्रत्यक्ष और अनुमान की सहायता से वस्तु का निरूपण करते
हुए, प्रत्यक्षानुमान विषयक व्यावहारिक बुभुत्सा जाग्रत करते हैं। उस
बुभुत्सा के जागरित होने पर तो, निर्दोष प्रत्यक्ष और अनुमान की सहा-
यता से, नित्यशुद्ध स्वप्रकाश अद्वितीय चैतन्य कूटस्थ ही सत् , और बाकी
सब उसी से अध्यस्त सिद्ध होते हैं। इस प्रकार स्वप्रकाश वस्तु में,
अन्यान्य श्रौत धर्म भी स्वीकृत नहीं होते क्यों कि—आपके मतानुसार
श्रुति तो एकमात्र, अध्यस्त मिथ्या रूप का ही निर्वर्तन करती है।
[email protected]

( ५४० )
न च सत आत्मन आनन्दरूपताज्ञानायोपनिषदास्थेया चिद्रूप-
ताया एव सकलेतरा तद्रूपव्यावृत्ताया आनन्दरूपत्वात् । यस्य तु
मोक्षसाधनतया वेदान्तवाक्यैर्विहितं ज्ञानमुपासन रूपं, तच्च परब्रह्म-
भूत परमपुरुष प्रीणनम्, तच्चशास्त्रैक समधिगम्यम् । उपासन
शास्त्रं चोपनयनादि संस्कृताधीत स्वाध्यायजनितं ज्ञानं विवेक-
विमोकादिसाधनानुगृहीतमेव स्वोपायतया स्वीकरोति, एवं रूपो-
पासनप्रीत. पुरुषोत्तम, उपासक स्वाभाविकात्मयाथात्म्यज्ञानदानेन
कर्मजनिताज्ञानं नाशयम् बन्धान् मोचयतीति पक्षः तस्ययथोक्तया
नीत्या शूद्रादेरनधिकार उपपद्यते ।
सत् स्वरूप आत्मा के आनंदरूप ज्ञान के लिए, उपनिषदों का
आश्रय लिया ही जावे, यह भी कोई आवश्यक नही है । क्यों कि-मिथ्या-
भूत अन्यान्य समस्त पदार्थों से पृथक् जो चैतन्य है, वस्तुतः आनंदरूप
ही तो उसका स्वाभाविक रूप है । जो लोग, वेदांतविहित उपासना रूप
ज्ञान को मोक्ष का साधन मानते हैं तथा परब्रह्म परंपुरुष भगवान की
साक्षात् कृपा की कामना से ही उपासना में संलग्न रहते हैं जो कि-
एकमात्र शास्त्र सम्मत ही होती है । उपासना प्रतिपादक शास्त्र उपनयन
आदि संस्कारों से संस्कृत, वेदाधीत, विवेक विमोक आदि साधनों से
परिपोषित व्यक्ति के ज्ञान को ही, मोक्षोपाय रूप से स्वीकारता है । ऐसी
उपासना से परितुष्ट पुरुषोत्तम ही (गुरुरूप से) उपासक को, स्वाभाविक
स्वकीय यथार्थ ज्ञान का दान देकर, कर्मजनित अज्ञान का संहार कर
बंधन से मुक्त करते हैं । ऐसे मत में ही, यथार्थ रूप से शूद्र का अनधिकार
माना जा सकता है ।
प्रमिताधिकरण शेष :-
तदेवं प्रसक्तानुप्रसक्ताधिकारकथां परिसमाप्य प्रकृतस्य अंगुष्ठ
प्रमितस्य भूतभव्येशितृत्ववगत परब्रह्म भावोत्तंभनं हेत्वन्तरमाह-
इस प्रकार प्रासंगिक अधिकार विचार को समाप्त कर अब पुनः
प्रस्तावित अंगुष्ठ परिमित के भूतभविष्य के स्वामित्व को बतलाने वाले
ब्रह्मभाव के समर्थक अन्य कारणों का उल्लेख करते हैं-

( ५४१ )
कम्पनात् ॥१।३।४०॥
“अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति” अंगुष्ठमात्रः
पुरुषोऽन्तरात्मा “इत्यनयोर्वाक्ययोर्मध्ये” यदिदं किच् जगत्सर्वं प्राण
एजति निस्सृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवंति।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपतिसूर्यः, भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्यु-
र्धावति पंचमः।” इति कृत्स्नस्य जगतोऽग्निसूर्यादीनां चास्मिन्नं-
गुष्ठ मात्रे पुरुषे प्राणशब्दे निर्दिष्टे स्थितानां सर्वेषां ततो
निस्सृतानां तस्मात्सञ्जातमहाभयनिमित्तं एजनकम्पनं श्रूयते।
तच्छासनातिवृत्तौ किं भविष्यतीति, महतो भयाद् वज्राद् इवोद्यतात्
कृत्स्नं जगत् कंपत् इत्यर्थः। “भयादस्याग्निस्तपति” इत्यनेनैकार्थ्यात्
“महद्भयं वज्रमुद्यतम्” इतिपंचम्यर्थे प्रथमा। अयं च परस्यब्रह्मण-
स्स्वभावः “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ
तिष्ठतः” भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः, भीषाऽस्मादग्नि-
श्चेन्द्रश्च, मृत्युर्धावति पंचमः” इति परस्य ब्रह्मणः पुरुषोत्तमस्यैवं
विधैश्वर्यावगतेः ।
“अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष शरीर के मध्य के हृदयाकाश
में स्थित है “अंगुष्ट मात्र पुरुष अंतरात्मा है” इन दोनों वाक्यों के मध्य
में ही— “परब्रह्म परमेश्वर से उत्पन्न यह सारा जगत, उस प्राण स्वरूप
घरमेश्वर में ही चेष्टा करता है, इस उठे हुए वज्र के समान महान् भय
स्वरूप परमेश्वर को जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं, उसी भय से
अग्नितपता है, सूर्यंतपता है, इसी के भय से इन्द्र, वायु और पांचवे देवता
मृत्यु अपने-अपने कार्यों में संलग्न हैं ।” इत्यादि वर्णन भी मिलता है
जिसका तात्पर्य है कि-समस्त जगत अग्नि सूर्यादि सहित, प्राण शब्द
निर्दिष्ट इस अंगुष्ठ परिमाण पुरुष में ही स्थित हैं और उसी से प्रकट
होकर उसके ही संयमन में, भयभीत होकर संसार कर्म को नियमित रूप
से कर रहे हैं। इसमें जो भय से कंपित होने वाली बात लिखी है, उसका
[email protected]

( ५४२ )
तात्पर्य है कि-उसका शासन का अतिक्रमण करने पर अनिष्ट होगा,
इस महान् भय से उठे हुए वज्र के समान उससे सारा जगत कांपता है ।
“भयादग्निस्तपति” का जो अर्थ है वही “महद्भयं” इत्यादि का
भी है, द्वितीय वाक्य मे पंचमी अर्थ की द्योतिका प्रथमा विभक्ति है । उक्त
परब्रह्म के स्वभाव को-“हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य और
चंद्र स्थित हैं, इसके भय से वायु डोलता है, सूर्य उदय होता है, इसी के
भय से अग्नि-चंद्र और पांचवा मृत्यु कार्य में संलग्न है” इत्यादि परब्रह्म
पुरुषोत्तम के ऐश्वर्य बोधक वाक्यों से भी जाना जा सकता है ।
इतश्चांगुष्ठ प्रमितः पुरुषोत्तमः—
ज्योतिर्दर्शनात् । १।३।४१॥
तयोरेवांगुष्ठ प्रमितविषययोर्वाक्ययोर्मध्ये परब्रह्मसाधारणं
सर्वं तेजसां छादकं सर्वतेजसां कारणभूतमनुग्राहकं चांगुष्ठ प्रमितस्य
ज्योतिरीक्ष्यते-“न तत्र सूर्यो भाति न चंद्रतारकं नेमाविद्युतो भ्रांति
कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्तमनु भातिसर्वं तस्यभासा सर्वमिदं विभाति”
इति । अयमेवश्लोक अथर्वणे परंब्रह्माधिकृत्यश्रूयते । पर ज्योतिष्ट्वं
च सर्वत्रपरस्य ब्रह्मणः श्रूयते । यथा-“परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन
रूपेणाभिनिष्पद्यते”-तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्-
“अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते” इत्यादिषु । अतो अंगुष्ठ
प्रमितः परं ब्रह्म ।
उन दोनों अंगुष्ठ प्रमित विषयक दोनों वाक्यों के बीच में परब्रह्म
के असाधारण धर्म सर्वतेजोभिभावक एवं समस्त तेजों के कारण अनु-
ग्राहक ज्योतिष रूप का जो वर्णन मिलता है, अंगुष्ठ प्रमित के लिए भी
वैसी ही ज्योति का वर्णन मिलता है—“वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है,
न चंद्रमा न तारों का समुदाय ही न ये बिजलियाँ ही प्रकाशित होती हैं,
इस अग्नि की तो गणना ही क्या है; उसके प्रकाशित होने पर ही सूर्य
आदि प्रकाशित होते हैं, उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण जगत प्रकाशित
होता है” यही श्लोक अथर्वण उपनिषद् में परब्रह्म के लिए कहा गया है,

( ५४३ )

परब्रह्म के लिए ही सर्वत्र परंज्योति स्वरूप का प्रयोग किया गया है,
जैसे कि—“परं ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता
है” देवगण, उन्हें ज्योतियों की ज्योति, अमृत और वायु रूप से उपासना
करते हैं “ये जो द्युलोक से ऊपर ज्योति प्रकाशित हो रही है ।” इत्यादि,
इससे सिद्ध होता है कि-अंगुष्ठ प्रमित परमात्मा ही है ।
१० अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाधिकरण :-
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ।१।३।४२॥
छांदोग्ये श्रूयते-“आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते
यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा” इति । तत्र संशयः किमया-
माकाश शब्द निर्दिष्टो मुक्तात्मा, उत परमात्मा—इति किं युक्तम् ?
मुक्तात्मेति, कुतः ? “अश्व इव रोमाणि विधूय पापं, चंद्र इव
राहोर्मुखात् प्रमुच्य, धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभि-
संभवामि” इति मुक्तस्यानंतर प्रकृतत्वात् “ते यदंतरा” इति च
नामरूपविनिर्मुक्तस्य तस्याभिधानात् “नामरूपयोर्निर्वहिता” इति
च स एव पूर्वावस्थयोपलिलक्षयिषतः स एव हि देवादि रूपाणि
नामानि च पूर्वमबिभः, तस्यैव नामरूपविनिर्मुक्ता सांप्रतिक्यवस्था
“तद्ब्रह्म तदमृतम्” इत्युच्यते आकाशशब्दश्च तस्मिन्नप्यसंकुचित
प्रकाशयोगादुपपद्यते । ननु दहर वाक्यशेषत्वादस्य स एव दहरा-
काशोऽयमिति प्रतीयते, तस्य च परमात्मत्वं निर्णीतम् ।मैवं, प्रजा-
पति वाक्य व्यवधानात् । प्रजापति वाक्ये च प्रत्यगात्मनो
मुक्त्यवस्थान्तं रूपमभिहितम्, अनन्तरं च “विधूय पापम्” इति स
एव मुक्तावस्था प्रस्तुतः । अतोऽत्राकाशो मुक्तात्मा ।
छांदोग्योपनिषद का वाक्य है—“आकाश ही नाम और रूप का
निर्वाहक है, ये नामरूप जिसके अन्तर्यामी हैं, वही ब्रह्म, वही अमृत

( ५४४ )
वही आत्मा है" इत्यादि । इस पर संशय होता है कि - आकाश शब्द
निर्दिष्ट मुक्तात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि मुक्तात्मा, क्यों कि
"जैसे कि घोड़ा रोंए झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों
को धोकर, राहुके मुख से निकले चन्द्रमा के समान शरीर त्याग कर
कृतकृत्य हो, नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ" ऐसा मुक्तात्मा का वर्णन
मिलता है। "वह नाम और गुण उसके अन्तर्गत हैं" इस वाक्य में नाम
रूप से मुक्त उसका वर्णन प्रतीत होता है "वह नाम रूप का निर्वाहक
है" इस वाक्य में भी, इसी की, सृष्टि की पूर्व स्थिति का वर्णन किया
गया है । उसने ही पहिले देवादि रूपों में बहुत से नाम धारण किये, वही
ब्रह्म, वही अमृत है" इस वाक्य में भी उसी की नाम रूप रहित अवस्था
का वर्णन है । अव्याहत प्रकाश से संबद्ध होने से, उसे ही आकाश कहा
गया है ।
यह प्रकरण दहर वाक्य का शेषांश है इसलिए यह वर्णन दहरा-
काश का ही प्रतीत होता है, दहराकाश परमात्मा ही है, यह निर्णय कर
ही चुके हैं, इसलिए यह परमात्मा का वर्णन है, इत्यादि शंका नहीं की
जा सकती, क्यों कि दहर प्रकरण और इस प्रकरण के मध्य में प्रजापति
वाक्य का व्यवधान है। प्रजापति वाक्य में जीवात्मा की मुक्तावस्था का
ही वर्णन है, उसके बाद ही "पापों को धोकर" वाक्य भी मुक्तात्मा का
ही बोधक है। इससे सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा ही आकाश है ।
सिद्धान्तः - इति प्राप्त उच्यते-आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्
इति आकाशः परब्रह्म, कुतः ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । अर्थान्तर
व्यपदेशस्तावत्- "आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इति नाम-
रूपयोः निर्वोढृत्वं बद्धमुक्तोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वमा-
काशस्योपपादयति । बद्धावस्थः स्वयं कर्मवशान्नामरूपे भजमानो न
नामरूपे निर्वोढु शक्नुयात्, मुक्तावस्थस्य जगद्व्यापारासंभवात् न
नितरां नामरूपनिर्वोढृत्वम् । ईश्वरस्य तु सकल जगन्निर्माण
धुरंधरस्य नामरूपयोः निर्वोढृत्वम् श्रुत्यैव प्रतिपन्नम्- "अनेन
[email protected]

( ५४५ )
जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि"-यः सर्वज्ञः सर्व-
विद्यस्य ज्ञानमयंतपः, तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते-
“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”
इत्यादिषु । अतो निर्वाह्यनामरूपात्प्रत्यगात्मनो नामरूपयोर्निर्वो-
ढाऽयमाकाशोऽर्थान्तरभूतः परमेव ब्रह्म। तदेवोपपादयति “ते यदंतरा”
इति । यस्मादयमाकाशो नामरूपे अन्तरा-ताभ्यां अस्पृष्टोऽर्थान्तर-
भूतः, तस्मात्तयोर्निर्वोढा अपहतपाप्मत्वात् सत्यसंकल्पत्वाच्च निर्व-
हितेत्यर्थः । आदिशब्देन ब्रह्मत्वात्मत्वामृतत्वानि गृह्यंते। निरुपाधिक-
वृहत्वादयो हि परमात्मन एव संभवंति, तेनात्राकाशः परमेव ब्रह्म।
उक्त संशय पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “आकाशोऽर्थान्तर” सूत्र
प्रस्तुत करते हैं। उनके मत से आकाश, परब्रह्म है, क्यों कि उपनिषदों में
इसी अर्थ में आकाश शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे कि-“आकाश
नाम रूप का निर्वाहक है" इत्यादि जिसे निर्वाहिका शक्ति की चर्चा की
गई है, वही बद्धमुक्त उभय अवस्था वाले जीवात्मा से पार्थक्य बतलाती
है। बद्ध अवस्था वाला जीव, कर्मों के वश होकर स्वयं ही नाम और रूप
का अनुसरण करता है इसलिए वह तो निर्वाहक हो नहीं सकता। मुक्त
अवस्था वाले जीव में जागतिक व्यवहार होता नहीं, इसलिए वह भी,
नाम रूप का निर्वाहक नहीं हो सकता। सारे विश्व के निर्माण में पटु
ईश्वर की नामरूप निर्वाहकता शास्त्र प्रसिद्ध है-जैसे कि-“इस जीव में
प्रवेश कर नामरूप का व्यवहार करूँगा”-सर्वज्ञ, सर्वविद्, ज्ञानमय तप
वाले उस परमेश्वर से ही यह विराट जगत और नाम रूप तथा अन्न की
उत्पत्ति हुई-“धीर परमेश्वर, समस्त रूप का विस्तार कर उनका
नामकरण करके, उन्हीं नामों को व्यवहृत करते हुए स्थित हैं" इत्यादि
से सिद्ध होता है कि-नाम रूप का निर्वाहक आकाश, अपने कार्यभूत
नामरूप संपन्न जीवात्मा से भिन्न, परब्रह्म ही है। उसी का प्रतिपादन
“ते यदन्तरा” इत्यादि वाक्य में किया गया है, उसमें बतलाया गया है
कि-यह आकाश, नामरूप से अस्पृष्ट पृथक् पदार्थ है, इसीलिए वह
नामरूप का निर्वाहक है, अर्थात् वह निष्पापता और सत्यसंकल्पता को
[email protected]

( ५४६ )
चरितार्थ करने के लिए, नामरूप का निर्वाह करता है । सूत्र में प्रयुक्त
आदि शब्द का तात्पर्य है-ब्रह्मत्व आत्मत्व और अमृतत्त्व । अहैतुक
महानतां आदि गुण परमात्मा में ही संभव हैं इसलिए इस प्रकरण का
उपदिष्ट आकाश तत्त्व, परब्रह्म का ही रूप है ।
यत् पुनरुक्तं "धूत्वा शरीरम्" इति मुक्तोऽनंतर प्रकृत. इति
तन्न, 'ब्रह्मलोकमभिसंभवामि" इति परस्यैव ब्रह्मणोऽनन्तर
प्रकृतत्वात् । यद्यप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्याभिसंभाव्यतया परं ब्रह्मनि-
र्दिष्टम्, तथाप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्य नामरूपनिर्वोढृत्वाद्यसंभावाद-
भिसंभाव्यं परमेव ब्रह्म तत्र प्रत्येतव्यम् ।
“धूत्वाशरीरम्" यह परवर्त्ती वाक्य, मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा
के लिए कहा गया है, यह कथन भी असगत है, “ब्रह्मलोक को प्राप्त
होऊँगा" यह वाक्य, उपर्युक्त वाक्य के ठीक बाद का जो कि परमात्मा
के लिए कहा गया है । यद्यपि, ब्रह्मभाव लब्ध मुक्तपुरुष का प्राप्य रूप
परब्रह्म ही कहा गया है, तथापि, उस ब्रह्मभाव लब्ध मुक्त पुरुष मे जब,
नाम रूप निर्वाक्त्व है नहीं, तो अभिसद्भाव्य परमात्मा को ही निर्वाहक
मानना पड़ेगा ।
कि च आकाश शब्देन प्रकृतस्य दहराकाशस्यात्र प्रत्यभिज्ञानात्
प्रजापतिवाक्यस्याप्युपासक स्वरूप कथनार्थत्वादुपास्य एव दहरा-
काशः प्राप्यतयोपसंह्रियत इति युक्तम् । आकाश शब्दश्च प्रत्यगा-
त्मनि न कश्चिद् दृष्टचरः । अतोऽत्राकाशः परंब्रह्म ।
उक्त प्रकरण में, आकाश शब्द से प्रस्तावित दहराकाश ही निर्दिष्ट
है, मध्यवर्त्ती प्रजापति वाक्य का तात्पर्य, उपासक के स्वरूप का कथन
मात्र है, इस जगह उपास्य रूप से दहराकाश को ही प्राप्य बतलाकर
उपसंहार किया गया है, यही मानना युक्ति संगत है । आकाश शब्द
का, जीवात्मा के लिए कहीं भी प्रयोग दिखलाई नही देता । इसलिए
निश्चित होता है कि उक्त प्रकरण में आकाश शब्द, परब्रह्म का ही
वाचक है ।
[email protected]

( ५४७ )
अथस्यात्-प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतमात्मान्तरमेव, नास्ति,
ऐक्योपदेशात् द्वैत प्रतिषेधाच्च। शुद्धावस्थ एव हि प्रत्यगात्मा,
परमात्मा परंब्रह्म परमेश्वर इति च व्यपदिश्यते, अतः प्रकृतान्मुक्ता-
त्मनोऽभिसंभवितुनार्थान्तरमभिसन्भाव्यो ब्रह्मलोकः अतोनामरूपयो-
र्निर्वहिता आकाशोऽपि स एव भवितुमर्हति-इति। अत उत्तरं
पठति-
श्रुति वाक्यों के अद्वैत वर्णन और द्वैत के प्रतिषेध से ज्ञात होता
है कि-जीवात्मा से पृथक् किसी अन्य का अस्तित्व नहीं है, शुद्ध अवस्था
वाला जीवात्मा ही, परमात्मा, परब्रह्म, परमेश्वर आदि नामों से उल्लेख्य
है अभिसद्‌भविता ( ब्रह्मभाव प्राप्त ) मुक्तात्मा से अभिसद्भाव्य (प्राप्य)
ब्रह्मलोक कोई भिन्न वस्तु नहीं है, इसलिए नाम रूप का निर्वाहक
आकाश भी जीवात्मा ही है। इस भ्रांति का उत्तर सूत्रकार देते हैं--
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥१।३।४३॥
व्यपदेशादिति वर्तते, सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वेन
परमात्मनो व्यपदेशात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्माऽस्त्येव ।
तथाहि-वाजसनेयके-"कतम आत्मायोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु" इति
प्रकृतस्य प्रत्यगात्मनः सुषुप्त्यवस्थायामकिंचिद्ज्ञस्य सर्वज्ञेन पर-
मात्मना परिष्वंग आम्नायते-"प्राज्ञेनात्मनासंपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद
नान्तरम्" इति। तथोत्क्रांतावपि- "प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन-
न्द्याति" इति । न च स्वपत उत्क्रामतो वा किंचिद् ज्ञस्य तदानीमेव
स्वेनैव सर्वज्ञेन सतापरिष्वंगान्वारो हौ संभवतः न च क्षेत्रज्ञान्तरेण
तस्यापि सर्वज्ञत्वासंभवात् ।
जीवात्मा के लिए सुषुप्ति और उत्क्रांति इन दो अवस्थाओं का
वर्णन मिलता है, जिससे, जीवात्मा-परमात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता
है, इसलिए जीव से भिन्न परमात्मा नामक कोई तत्त्व है यह मानना

( ५४८ )
होगा । जैसा कि-वाजसनेय उपनिषद् में—"आत्मा कौन है ? जो कि—
प्राणों के मध्य में विज्ञानमय नामवाला है" इत्यादि उपक्रम के बाद,
सामान्य अज्ञ जीवात्मा का सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ परमात्मा से मिलन
बतलाया गया है जैसे कि—"प्राज्ञ परमात्मा से मिलकर बाह्याभ्यंतर
ज्ञान से शून्य हो जाता है।" तथा उत्क्रान्ति में भी जैसे—"प्राज्ञ परमात्मा
से अधिष्ठित होकर ( जीव ) शरीर त्याग कर जाता है।" इन दोनों
वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि—जीवात्मा और परमात्मा भिन्न हैं, एक
नहीं है, एक ही वस्तु में अज्ञता और प्राज्ञता, एकीभाव और प्रतिष्ठान
आदि विलक्षणतायें संभव नहीं हैं और न क्षेत्रज्ञ जीवात्मा का साहचर्य
ही संभव हैं क्योंकि—उसमें सर्वज्ञता का अभाव है।
इतश्च प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्मेत्याह—
इसलिए भी जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न बतलाया जाता
है कि—
पत्यादिशब्देभ्यः : १।३।४४॥
अयं परिष्वंजकः परमात्मा उत्तरत्र पत्यादिशब्दैः व्यपदिश्यते 'सर्व-
स्याधिपतिः सर्वस्यवशी सर्वस्येशानः स न साधुनाकर्मणा भूयान्नो एव
असाधुना कनीयान्, एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपालन एष
सेतुः विधरण एषां लोकानामसंभेदाय, तमेतंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा
विविदिषंति एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, एतमेव प्रत्राजिनो लोक-
मिच्छन्तः प्रव्रजंति"—"स वा एष महानज आत्माऽन्नादोवसुदानः"—
अजरोऽमृतोऽभयोब्रह्म" इति एते च पतित्व जगद्विधरणत्व सर्वेश्वर-
त्वादयः प्रत्यगात्मनि मुक्तावस्थेऽपि न कथंचिद् संभवंति । अतो
मुक्तात्मनोऽर्थान्तरभूतो नामरूपयोनिर्वहिता आकाश. । ऐक्योप-
देशस्तु सर्वस्य चिदाचिदात्मकस्य ब्रह्मकार्यत्वेन तदात्मकत्वायत्त
इति "सर्वंखल्विदं ब्रह्म तज्जलान" इत्यादिभिर्वाक्यैः प्रतिपाद्यत
इति पूर्वमेव समर्थितम् । द्वैत प्रतिषेधश्च तत एषेत्यनवद्यम् ।

( ५४६ )
उक्त प्रकरण के उत्तर भाग में, जीवात्मा से परिष्वक्त होने वाले
परमात्मा को पति आदि शब्दों से बतलाया गया है—"वह सभी के अधि-
पति, वश करने वाले, सभी के ईश्वर हैं, वह उत्तम कर्मों से महान् या
मंद कर्मों से हीन नहीं होते, वे सबके ईश्वर भूतपाल, भूताधिपति हैं, वे
ही समस्त जगत के विभाग संरक्षण करने वाले सेतु हैं, ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण
उन्हें वेदार्थ परिशीलन से जानने की इच्छा रखते हैं उन्हें जानकर मौन
हो जाते हैं। संन्यासी भी इन्हीं को जानने की इच्छा से संन्यास लेते
हैं।" यह महान अज आत्मा ही अन्नभोक्ता और धनदाता हैं।" ब्रह्म
अजर-अमर और अभय स्वरूप है।" इत्यादि वाक्यों में जो पतित्व,
जगद्विधरणत्व और सर्वेश्वरत्व आदि गुण बतलाए गए हैं, वे मुक्त
अवस्था वाले जीवात्मा में कदापि संभव नहीं हैं। इससे ज्ञात होता है
कि—मुक्तात्मा से भिन्न नामरूप निर्वाहक आकाश है। "यह सब कुछ
ब्रह्म है" इत्यादि वाक्य में जो अद्वैत का प्रतिपादन है, उसका तात्पर्य
है कि—जड़ चेतन सारा जगत ब्रह्म का ही कार्य है, तदात्मक और उनके
अधीन है; इसका विवेचन पहिले भी कर चुके हैं। ब्रह्मात्मक भाव से
ही द्वैत का प्रतिषेध भी किया गया है। ऐसा मानना ही निर्दोष सुसंगत
मत है।
प्रथम अध्याय तृतीय पाद समाप्त

[ प्रथम अध्याय ]
चतुर्थ पाद
१. आनुमानिकाधिकरणः-
आनुमानिकमप्येकेषामितिचेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च
।१।४।१।।
उक्तं परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया जिज्ञास्यं जगज्जन्मादि
कारणं ब्रह्मचिद्वस्तुनः प्रधानादेश्चेतनाच्च बद्धमुक्तोभयावस्थाद्
विलक्षणं निरस्त समस्तहेयगंध सर्वज्ञं सर्वशक्ति सत्यसंकल्पं समस्त
कल्याण गुणात्मकं सर्वान्तरात्मभूतम् निरंकुशैश्वर्यम् इति । इदानीं
कपिलतंत्रसिद्धा ब्रह्मात्मक प्रधान पुरुषादि प्रतिपादन मुखेन प्रधान
कारणत्व प्रतिपादनच्छायानुसारोष्यपि कानिचिद्वाक्यानि कासु-
चिच्छाखासु संतीत्याशंक्य ब्रह्मैककारणत्वस्थेम्ने तन्निराक्रियते ।
तृतीय पाद तक, मोक्षसिद्धि के उपाय रूप से जिज्ञास्य, जगत् की
सृष्टि आदि के कारण, प्रधान आदि अचेतन तथा बद्धमुक्त-अवस्था वाले
चेतन जीवात्मा से विलक्षण, समस्त हीनता से रहित, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति,
सत्यसंकल्प, समस्त कल्याण गुणात्मक, सर्वान्तर्यामी, सर्वतंत्र स्वतंत्र
परम पुरुषार्थ स्वरूप पर ब्रह्म, का विवेचन किया गया हैं। अब अनीश्वर-
वादी कपिल के सांख्यशास्त्र के प्रतिपाद्य प्रधान पुरुष में जो, प्रधान तत्त्व
है उसका श्रुतियों में कुछ अंशों में, छायारूप से प्रतिपादन प्रतीत होता
है, अतः वही जगत का कारण है, ऐसी आशंका करते हुए, ब्रह्मकारणवाद
का दृढ़ता से संपादन करते हुए, उक्त आशंका का निराकरण करेंगे ।
कठवल्लीष्वाम्नायते- “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्था अर्थेभ्यश्च परंमनः,
मनसस्तु पराबुद्धिः बुद्धेरात्मामहान् परः, महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्
पुरुषः परः पुरुषान्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परागतिः ।” इति,
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( ५५१ )
तत्र संदेहः किं कापिल तंत्र सिद्धिमब्रह्मात्मकं प्रधानमिहाव्यक्त
शब्देनोच्यते, उत न इति । किं युक्तम् ? प्रधानमिति, कुतः ?
“महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः” इति तंत्रसिद्धतंत्र प्रक्रिया-
प्रत्यभिज्ञानेन तस्यैव प्रतीतेः “पुरुषाान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा
परागतिः” इति पंचविंशकपुरुषातिरिक्त तत्व निषेधाच्च । अतोऽ-
व्यक्तम् कारणमिति प्राप्तम् । तदिदमुक्तम्-आनुमानिकमप्येकेषामिति
चेत्-इति । एकेषां शाखिनां शाखास्वानुमानिकं प्रधानमपि कारण-
माम्नात इति चेत्-
कठवल्ली में प्रसंग आता है कि-“इन्द्रियों से शब्दादि विषय
बलवान हैं, विषयों से मन बलवान है, मन से बुद्धि बलवती है बुद्धि से
श्रेष्ठ महत् तत्त्व है, महत् तत्त्व से बलवती अव्यक्त माया है, उस अव्यक्त
से श्रेष्ठ पुरुष है, उस पुरुष से श्रेष्ठ कोई नहीं है वही सब की परम
अवधि और परमगति है !”
इसको पढ़कर संदेह होता है कि-कपिल के सांख्य शास्त्र से सम्मत
प्रधान को ही अव्यक्त नाम से बतलाया गया है अथवा नहीं, कह सकते
हैं कि, प्रधान का ही वर्णन है, क्योंकि-अव्यक्त से पुरुष की जो बात कही
गई है, वह सांख्यतंत्र की ही प्रणाली है । तथा ‘पुरुष से श्रेष्ठ कुछ भी
नहीं है, वही परमगति और परम अवधि है” इत्यादि में जिस पुरुष का
वर्णन किया गया है वह भी सांख्यतंत्र सिद्ध पंचविंशक पुरुष का ही
वर्णन प्रतीत होता है । इसलिए जगत का कारण वह अव्यक्त प्रधान ही
है ऐसा निश्चित होता है । इसी आशय से “आनुमानिक मप्ये केषाम्”
अर्थात् किसी एक शाखा में आनुमानिक प्रधान को कारण माना गया
है । इत्यादि-
सिद्धान्त-अत्रोत्तरं नेति । नाव्यक्तशब्देनाब्रह्मात्मकं प्रधान-
मिहाभिधीयते । कुतः ? शरीररूपक विन्यस्त गृहीतेः, शरीराख्य
रूपक विन्यस्तस्य अव्यक्त शब्देनं गृहीतेः । आत्मशरीरबुद्धिमन्
इन्द्रियविषयेषु रथिरथादिभावेन रूपितेषु रथरूपेण विन्यस्तस्य
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( ५५२ )
शरीरस्यात्राव्यक्त शब्देन ग्रहणादित्यर्थः । एतदुक्तं भवति-पूर्वत्र हि-
“आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च, बुद्धीं तु सारथिं विद्धि मनः
प्रग्रहमेव च, इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्” इत्यादिना;
“सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमंपदम्” इत्यनेन संसाराध्वनः
पारं वैष्णवं पदं प्रेप्संतमुपासकं रथित्वेन तच्छरीरा दीनि च रथरथां-
गरूपयित्वा यद्येते रथादयो वशे तिष्ठंति, स एवाध्वनः पारं वैष्णवं
पदमाप्नोतीत्युक्तवा, तेषु रथादिरूपित शरीरादिषु यानि येभ्यो
वशीकार्यतायां प्रधानानि तान्युच्यन्ते “इन्द्रियेभ्यः पराः” इत्यादिना ।
तत्र हयत्वेन रूपितेभ्य इन्द्रियेभ्यो गोचरत्वेन रूपिता विषयाः वशी-
कार्यत्वे पराः वश्येन्द्रियस्यापि विषयसन्निधाविन्द्रियाणां दुर्निग्रह-
त्वात् । तेभ्योऽपि परं प्रग्रहरूपितं मनः, मनसि विषय प्रवणे विषया-
सन्निधानस्याप्यकिंचित्करत्वात् । तस्मादपि सारथित्वरूपिता बुद्धिः
परा, अध्यवसायाभावे मनसोऽप्यकिंचित्करत्वात् । तस्या अपि रथित्व
रूपित आत्मा कर्तृत्वेन प्राधान्यात्परः, सर्वस्यचास्यात्मेच्छायत-
त्वादात्मैव महानिति च विशेष्यते । तस्मादपि रथरूपितं शरीरं
परम्, तदायत्तत्वाज्जीवात्मनः सकल पुरुषार्थसाधन प्रवृत्तीनाम् ।
तस्मादपि परः सर्वान्तरात्मभूतोऽन्तर्याम्यध्वनः पारभूतः परं पुरुषः,
यथोक्तस्यात्मपर्यन्तस्य समस्तस्य तत्संकल्पायत्त प्रवृत्तित्वात् । स
खल्वन्तर्यामितयोपासनस्यापि निर्वर्त्तकः । “परात्तुतच्छ्रुतेः” इति
हि जीवात्मनः कर्तृत्वं परमपुरुषायत्तमिति वक्ष्यते । वशीकार्यो-
पासन निवृत्त्युपायकाष्ठाभूतः परमप्राप्यश्च स एव । तदिदमुच्यते
“पुरुषात्न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः” इति ।
सिद्धान्त—उक्त शंका का उत्तर नकारात्मक है । उक्त प्रसंग में
अव्यक्त शब्द से प्रधान का उल्लेख नहीं है, क्योंकि—अव्यक्त के लिए
शरीर के रूपक का वर्णन मिलता है जिसमें, आत्मा, शरीर, बुद्धि, मन,
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( ५५३ )
इन्द्रिय, इन्द्रिय के विषय, रथी और रथ आदि के रूप में कल्पना की
गई है रथ रूप से उल्लेख्य शरीर को ही अव्यक्त शब्द से प्रस्तुत किया
गया है । यह रूपक उक्त प्रकरण के पूर्व का ही है । रूपक इस प्रकार
है—"आत्मा को ही रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, और मन को
लगाम समझो, इन्द्रियों को घोड़ा, विषयों को उनकी विचरण भूमि"
इत्यादि से लेकर "वही संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त करते
हैं" इस अंतिम वाक्य तक, संसार मार्ग से पार वैष्णव पद को प्राप्त
करने की इच्छावाले उपासक को रथी रूप से एवं उसके शरीर आदि
को रथ और रथांग अश्व आदि रूप से कल्पना करके; यह दिखलाया
गया है कि जो इन रथ आदि को वश में रखता है, वही संसार मार्ग से
पार जाकर वैष्णव पद प्राप्त करता है । रथादि रूप से कल्पित शरीर
आदि के मध्य में जिन्हें वशीभूत करने की बात कही गई है, उनमें भी
सर्व प्रधान, जिनको वशीभूत करना सर्वाधिक कष्ट साध्य है "इन्द्रियेभ्यः
परा" इत्यादि में उन्हीं वृत्तियों को "परा" शब्द से उल्लेख किया गया
है इस वशीकरण कार्य में, अश्वरूप से कल्पित इन्द्रियों की अपेक्षा, गोचर
रूप से कल्पित विषयों का समूह प्रधान है । क्योंकि—जिन लोगों ने एक
मात्र इन्द्रियों को संयमित कर भी लिया, विषयों से विरक्ति नहीं हुई
तो प्रायः उनकी इन्द्रियां असंयत हो जाती हैं । प्रग्रह ( लगाम ) रूप से
कल्पित मन, उन विषयों से भी प्रधान है, क्योंकि—मन के विरत होने
पर ही विषयों की न्यूनता होती है । सारथी रूप से कल्पित बुद्धि, मन
की अपेक्षा और भी प्रधान है, क्योंकि—बुद्धि के द्वारा अध्यवसाय न करने
पर मन भी कुछ नहीं कर सकता । रथी रूप से कल्पित आत्मा, सर्वकर्त्ता
होने के कारण, उस बुद्धि की अपेक्षा प्रधान है, क्योंकि उक्त सभी आत्मा-
धीन हैं, इसलिए आत्मा को ही "महान्" ऐसा विशेष नाम वाला कहा
गया है । रथ रूप से कल्पित शरीर, उस आत्मा की अपेक्षा प्रधान है,
क्योंकि— शरीर ही, जीवात्मा के हर प्रकार के पुरुषार्थ साधन में, प्रवृत्ति
प्रयोजक है । संसार मार्ग से पार सबके अन्तर्यामी, परम पुरुष परमात्मा
उसकी अपेक्षा प्रधान हैं, क्योंकि पूर्वोक्त आत्मा पर्यन्त सभी पदार्थ समस्त
प्रवृत्तियां, उन्हीं की इच्छाशक्ति के अधीन हैं, वे ही अंतर्यामी रूप से
उपासना का भी निर्वाह करते हैं। "परात्त तच्छुतेः" इस सूत्र में
जीवात्मा का कर्तृत्व, परं पुरुष के अधीन है, ऐसा बतलाते हैं। वे

( ५५४ )
परमात्मा ही आत्मवशीकरण और उपासना सिद्धि के उपायों में चरम
उपाय एवं परं प्राप्य लक्ष्य हैं या परं पुरुषार्थ रूप हैं, यही बात "पुरुष
से श्रेष्ठ कुछ नहीं है, वही परम अवधि और परम गति है" इस श्रुति में
कहा गया है।
तथा चान्तर्यामिब्राह्मणे “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादिभिः सर्वं
साक्षात् कुर्वन्तः सर्वं नियमयतोत्युक्तवा “नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा”
इति नियंत्रंतरं निषिध्यते । भगवद्गीतासु च-“अधिष्ठानंतथा कर्त्ता
करणं च पृथग् विधं, विविधाश्च पृथग् चेष्टा दैव चैवात्र पंचमम्।”
दैवमत्र पुरुषोत्तम एव “सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति-
र्ज्ञानमपोहनं च” इति वचनात् । तस्य च वशीकरणं तच्छरणागति-
रेव । यथाह-‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्
सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति । तदेवम्
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादिना रथ्यादिरूपक विन्यस्ता इन्द्रिया-
दयः “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इत्यत्र स्वशब्दैरेव प्रत्यभिज्ञायन्ते, न
रथरूपितं शरीरमिति परिशेषात्तदव्यक्त शब्देनोच्यत इति निश्ची-
यते । अतः कापिलतंत्रसिद्धस्य प्रधानस्य प्रसंग एव नास्ति ।
इसी प्रकार अन्तर्यामी ब्राह्मण में “य आत्मनितिष्ठन्” इत्यादि
वाक्य में उस परमात्मा को सबका दृष्टा और नियामक बतलाकर
“नान्योऽतो” इत्यादि में इसके अतिरिक्त किसी अन्य नियामक का निषेध
किया गया है। भगवद्गीता में भी-“अधिष्ठान (शरीर) एवं कर्त्ता,
अनेक प्रकार के करण (इन्द्रियाँ) पृथक्-पृथक् विविध चेष्टायें तथा
पांचवां दैव, ये ही क्रिया प्रवृत्ति के कारण हैं।” इसमें दैव का तात्पर्य
पुरुषोत्तम ही है ऐसा-“मैं ही सबके हृदय में संन्निविष्ट हूँ, मुझसे ही
स्मरण, ज्ञान और अपोहन होते हैं”—इस वचन से ज्ञात होता है। उस
परमात्मा को वशीकरण करने का उपाय उसकी शरणागति प्राप्त करना
ही है। जैसा कि—इस गीता वाक्य से ज्ञात होता है-‘ईश्वर अपनी माया
से, सबके हृदय में विराज कर, सारे जगत् को यंत्रमयी कठपुतली की

तरह नचाते रहते हैं, तुम उन्हीं की शरण में जाओ।” इसी प्रकार
“आत्मानं रथिनं विद्धि” इत्यादि से, रथी इत्यादि रूपक में चित्रित
इन्द्रियाँ आदि “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में अपने-अपने नाम
से ही बतलाए गए हैं, केवल रथ रूप से कल्पित शरीर को ही प्रकरण
के अंत में, ‘अव्यक्त’ शब्द से बतलाया गया है, ऐसा निश्चित होता है।
कपिलतंत्र सिद्ध प्रधान का तो प्रसंग ही नहीं है।
न चात्रतत्तंत्रसिद्ध प्रक्रिया प्रत्यभिज्ञा “इंद्रियेभ्यः पराह्यर्थाः”
इतीन्द्रियेभ्योऽर्थानां शब्दादीनां परत्व कीर्त्तनात् । नहि शब्दादय इन्द्रि-
याणां कारणभूताः तद्दर्शने “अर्थेभ्यश्च परंमनः”इत्यादि न तत्तत्रसंग-
तम्, बुद्धिशब्देन महत्तत्त्वस्याभिधानाभ्युपगमात् । नहि महतो
महान् परः संभवति । महत आत्मशब्देन विशेषणं च न संगच्छते
अतोरूपक निन्यस्तानामेव ग्रहणम् ।
उम प्रसंग में सांख्यतंत्र के विवेचन की प्रणाली भी ज्ञात नहीं
होती, “इन्द्रियेभ्यः पराह्यर्थाः” इस वाक्य में, इन्द्रियों से उनके अर्थ
अर्थात् शब्द आदि विषयों को, श्रेष्ठ बतलाया गया है, सांख्य तंत्र में कहीं
भी, शब्द आदि को इन्द्रियों का कारण नहीं बतलाया गया है। इसी
प्रकार “अर्थेभ्यश्च परंमनः” वाक्य भी सांख्य तंत्र सम्मत नहीं है, इस
तंत्र में विषयों का कारण मन नहीं है। “बुद्धेरात्मा महान् परः” वाक्य
भी उक्त तंत्र के मत से विपरीत है क्योंकि-सांख्य में बुद्धि शब्द “महत्”
शब्द वाची है, महत् कभी महान् से श्रेष्ठ हो ही नहीं सकता “महत्”
शब्द आत्म शब्द का विशेषण भी नहीं हो सकता, इसलिए उक्त कल्पित
रूपक से आत्मा आदि अर्थ मानना ही युक्ति-युक्त है।
दर्शयति च तदेव-“एषु सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते,
दृश्यते त्वग्रया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः” यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः
तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि, ज्ञानंन्नात्मनि महतियच्छेद् तद्यच्छेच्छान्त-
न्नात्मनि” इति । अजित बाह्याभ्यंतरकरणैरस्य परमपुरुषस्य दुर्दर्श-

( ५५६ )
त्वमभिधाय हयादिरूपितानामिन्द्रियादीनां वशीकार प्रकारोऽय
मुच्यते । 'यच्छेद् वाङ्मनसी” वाचं मनसि नियच्छेत्-वाक्पूर्वकाणि
कर्मेन्द्रियाणि ज्ञानेन्द्रियाणि च मनसि नियच्छेद् इत्यर्थः । वाक्शब्दे
द्वितीयायाः "सुपां सुलुकू" इतिलुक् । “मनसी" इति सप्तम्या-
श्छान्दसो दीर्घः । “तद्यच्छेद् ज्ञान आत्मनि" तन्मनौ बुद्धौ नियच्छेद् ।
ज्ञान शब्देनात्र पूर्वोक्ता बुद्धिरभिधीयते । ज्ञाने आत्मनि" इति
व्यधिकरणे सप्तम्यौ । आत्मनि वर्त्तमाने ज्ञाने नियच्छेदित्यर्थः ।
“ज्ञान आत्मनि महति यच्छेत्" बुद्धिं कर्त्तरि महत्यात्मनि निय-
च्छेत् !” तद्यच्छेच्छांत आत्मनि" तं कत्र्तरि परस्मिन् ब्रह्मणि
सर्वान्तर्यामिणि नियच्छेत् । व्यत्ययेन तदिति नपुंसकलिंगता ।
एवम्भूतेन रथिना वैष्णवं पदं गन्तव्यमित्यर्थः ।
उक्त रहस्य को श्रुति में इस प्रकार दिखलाया गया है कि- “यह
सबका आत्मरूप परं पुरुष, समस्त प्राणियों में रहता हुआ भी, माया के
परदे में छिपा रहने से प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्म तत्त्वों को समझने
वाले पुरुषों से ही अति सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।" बुद्धिमान
साधक को चाहिए कि वाणी आदि को मन में निरुद्ध करके, उस मन
को ज्ञान स्वरूप बुद्धि में विलीन करे तथा ज्ञान स्वरूप बुद्धि आत्मा
में विलीन करे तथा उस महान् आत्मा को शांत स्वरूप परमात्मा में
विलीन करे ।"
उक्त प्रसंग में, जो लोग बाह्य और आभ्यंतर को जय नहीं कर
पाते, उनके लिए परमात्म दर्शन बहुत दूर है, ऐसा बतलाते हुए, अश्व
आदि रूप से कल्पित इन्द्रियो को वशीभूत करने के विशेष उपाय का
निर्देश किया गया है। "यच्छेद् वाङ्मनसी" का तात्पर्य है, वागेन्द्रिय को
मन में लीन करो अर्थात् वागेन्द्रिय सहित कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को
लीन करो इस वाक्य में "सुपांसुलुक्" इस व्याकरणीय नियम से वाक्
शब्द की द्वितीया विभक्ति का लोप हो गया है तथा "मनसी" पद में
वैदिक व्याकरण के अनुसार सप्तमी विभक्ति में दीर्घ ईकार हो गया
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