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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 602, कुल 696 में से

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पृष्ठ 602

( ५४० )
न च सत आत्मन आनन्दरूपताज्ञानायोपनिषदास्थेया चिद्रूप-
ताया एव सकलेतरा तद्रूपव्यावृत्ताया आनन्दरूपत्वात् । यस्य तु
मोक्षसाधनतया वेदान्तवाक्यैर्विहितं ज्ञानमुपासन रूपं, तच्च परब्रह्म-
भूत परमपुरुष प्रीणनम्, तच्चशास्त्रैक समधिगम्यम् । उपासन
शास्त्रं चोपनयनादि संस्कृताधीत स्वाध्यायजनितं ज्ञानं विवेक-
विमोकादिसाधनानुगृहीतमेव स्वोपायतया स्वीकरोति, एवं रूपो-
पासनप्रीत. पुरुषोत्तम, उपासक स्वाभाविकात्मयाथात्म्यज्ञानदानेन
कर्मजनिताज्ञानं नाशयम् बन्धान् मोचयतीति पक्षः तस्ययथोक्तया
नीत्या शूद्रादेरनधिकार उपपद्यते ।
सत् स्वरूप आत्मा के आनंदरूप ज्ञान के लिए, उपनिषदों का
आश्रय लिया ही जावे, यह भी कोई आवश्यक नही है । क्यों कि-मिथ्या-
भूत अन्यान्य समस्त पदार्थों से पृथक् जो चैतन्य है, वस्तुतः आनंदरूप
ही तो उसका स्वाभाविक रूप है । जो लोग, वेदांतविहित उपासना रूप
ज्ञान को मोक्ष का साधन मानते हैं तथा परब्रह्म परंपुरुष भगवान की
साक्षात् कृपा की कामना से ही उपासना में संलग्न रहते हैं जो कि-
एकमात्र शास्त्र सम्मत ही होती है । उपासना प्रतिपादक शास्त्र उपनयन
आदि संस्कारों से संस्कृत, वेदाधीत, विवेक विमोक आदि साधनों से
परिपोषित व्यक्ति के ज्ञान को ही, मोक्षोपाय रूप से स्वीकारता है । ऐसी
उपासना से परितुष्ट पुरुषोत्तम ही (गुरुरूप से) उपासक को, स्वाभाविक
स्वकीय यथार्थ ज्ञान का दान देकर, कर्मजनित अज्ञान का संहार कर
बंधन से मुक्त करते हैं । ऐसे मत में ही, यथार्थ रूप से शूद्र का अनधिकार
माना जा सकता है ।
प्रमिताधिकरण शेष :-
तदेवं प्रसक्तानुप्रसक्ताधिकारकथां परिसमाप्य प्रकृतस्य अंगुष्ठ
प्रमितस्य भूतभव्येशितृत्ववगत परब्रह्म भावोत्तंभनं हेत्वन्तरमाह-
इस प्रकार प्रासंगिक अधिकार विचार को समाप्त कर अब पुनः
प्रस्तावित अंगुष्ठ परिमित के भूतभविष्य के स्वामित्व को बतलाने वाले
ब्रह्मभाव के समर्थक अन्य कारणों का उल्लेख करते हैं-