श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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वत्तरः महताधर्मेण संयुक्तस्याप्यस्य जानश्रुतेरब्रह्मज्ञस्य को गुणः,
यद्गुणजनितं तेजो रैक्वतेज इव मां दहेदित्यर्थः ।
जो शोक करे उसे शूद्र कहते हैं, “शुचेर्दश्च” इस पाणिनीय सूत्र
से, र प्रत्यय होने पर शुच् धातु के उकार को दीर्घ और च के स्थान पर
द होने से शूद्र शब्द बनता है । उक्त प्रसंग में शूद्र शब्द से शोकान्वित
भाव ही सूचित होता है, जाति संबंध नहीं । पौत्रायण जानश्रुति, बहुद्रव्य
और बहुअन्न का प्रसिद्ध दानी था, धार्मिकाग्रगण्य उसकी धर्मचर्या से
परितुष्ट कोई दो महात्मा, उसकी ब्रह्मजिज्ञासा, को उद्बुद्ध करने के
लिए, हंस रूप धारण करके, रात्रि के समय, यात्रा में उसके साथ चलते
हुए इस प्रकार परस्पर वार्त्ता करने लगे--‘‘अरे भल्लाक्ष ! पौत्रायण
जानश्रुति का तेज आकाश में चारों ओर फैल रहा है, उसका स्पर्श मत
करना, कहीं वह तुम्हें भस्म न कर दे’’ ऐसी जानश्रुति की प्रशंसा सुनकर
दूसरा कहता है-‘’अरे तू इस राजा में कौन सी विशेषता देखकर ऐसी
प्रशंसा कर रहा है, क्या तू इसे गाड़ी वाले रैक्व के बराबर मानता है ?’’
अर्थात् ब्रह्मज्ञ वह रैक्व जगत में सर्वाधिक गुणवान है, यह जानश्रुति
महा धार्मिक होते हुए भी ब्रह्म ज्ञान रहित है, उसमें कौन सा गुण है
जिससे कि उसमें रैक्व के समान दाहिका शक्ति आ गई जिससे मुझे
दाह होगा ?
एवमुक्तेन परेण क्वोऽसौ रैक्व इति पृष्टः लोके यल्किञ्चित्
साध्वनुष्ठितं कर्म यच्च सर्वचेतनगतं विज्ञानम्, तदुभयं यदीयज्ञान-
कर्मान्तर्भूतम् स रैक्व” इत्याह। तदेतद् हंसवाक्यं ब्रह्मज्ञानविधुरतया
आत्मनिन्दागर्भं तद्वत्तया च रैक्व प्रशंसा रूपं जानश्रुतिरुपश्रुत्य
तत्क्षणादेवक्षत्तारं रैक्वान्वेषणाय प्रेष्य तस्मिन्विदित्वा आगते स्वय-
मपि रैक्वभुपसद्य गवां षट्शतं निष्कमश्वतरी रथं च रैक्वायोपहृत्य
रैक्व प्रार्थयामास “अनुम एतां भगवो देवतां शाधि यां देवता-
मुपास्से” इति त्वदुपास्यां परां देवतां ममानुशाधीत्यर्थः ।
इस प्रकार उस हंस के कहने पर, दूसरे ने पूछा ‘‘यह रैक्व कौन
है ?’’ इस पर उस हंस ने बतलाया कि--‘‘इस जगत में जो भी कुछ
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उत्कृष्ट कर्म होते हैं तथा समस्त चेतन में जो कुछ ज्ञान निहित है, ये
दोनों बातें जिसके ज्ञान और कर्म के अंतर्गत हैं वे रैक्व है।" ब्रह्मज्ञान
के अभाव से अपने निंदापूर्ण तथा ब्रह्मज्ञान के सद्भाव से रैक्व के स्तुति-
परक उस हंस के वाक्य को सुनकर जानश्रुति ने तत्काल सारथी को
रैक्व को खोजने को भेजा। सारथी, रैक्व को खोज कर आया तब,
जानश्रुति स्वयं रैक्व के पास गया, जाकर उसने छः सौ गाय, स्वर्णहार,
घोड़ेवाले रथ भेंट कर उनसे प्रार्थना की कि--"भगवन ! आप जिन
देवता की उपासना करते हैं उनका मुझे उपदेश दें" अर्थात् अपने उपास्य
परादेवता का मुझे भी उपदेश दो।
स च रैक्वः स्वयोगमहिम विदित लोकत्रयो जानुश्रुतेर्ब्रह्मज्ञान
विधुरतानिमित्तानादरगर्भहंसवाक्य श्रवणेन शोकाविष्टतां तदनंतर-
मेव ब्रह्मजिज्ञासोद्योगं च विदित्वाऽस्य ब्रह्मविद्यायोग्यतामभिज्ञाय
चिरकाल सेवां बिना द्रव्यप्रदानेन शुश्रूषमाणस्यास्य यावच्छक्ति
प्रदानेन ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीति मत्वा तमनुगृह्णन् तस्य
शोकाविष्टतामुपदेशयोग्यताख्यापिकां शूद्र शब्देनामंत्रणेन ज्ञापयन्नि-
दमाह-“अहहारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्तु” इति । सह गोभि-
रयं रथस्तवैवास्तु नैतावता मह्यं दत्तेन ब्रह्मजिज्ञासया शोकाविष्टस्य
तव ब्रह्मविद्या प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः ।
अपनी योगशक्ति के प्रभाव से त्रिलोक तत्त्वज्ञ उस रैक्व ने समझ
लिया कि--ब्रह्मज्ञानाभाव और हंसोक्त अनादर वचन श्रवण से जानश्रुति
शोकाविष्ट है, इसीलिए यह असूयावश ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए उद्यत
है। उसकी ऐसी ब्रह्मजिज्ञासा योग्यता को समझकर कि दीर्घकालीन
ब्रह्मचर्य की साधना के बजाय केवल भेंट द्वारा ही ब्रह्मविद्या ग्राहिका
शक्ति आ जावेगी, ऐसा विचार कर अनुग्रह पूर्वक रैक्व ने जानश्रुति से
कहा--"अरे शूद्र ! गौओं सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे"
अर्थात्-गो रथ आदि तू ही रख, इनको देने मात्र से ही, शोकाविष्ट
ब्रह्म जिज्ञासु तुझमें ब्रह्म विद्या स्थिर नहीं हो सकती।
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स च जानश्रुतिर्भूयोऽपि स्वशक्त्यनुगुणमेव गवादिकंधनं कन्यां
च प्रदायोपससाद, स रैकवः पुनरपि तस्य योग्यतामेव ख्यापयन् शूद्र
शब्देनामंत्र्याह—"आजहारेमा शूद्रानेनैव मुखेनाला पयिष्यथाः"
इति इमानि धनानि शक्त्यनुगुणान्याजहर्थ, अनेनैव द्वारेण चिरसे-
वया बिनाऽपि मां त्वदभिलाषितं ब्रह्मोपदेश रूपवाक्यमालापयिष्य-
तीत्युक्त्वा तस्मा उपदिदेश अतः शूद्रशब्देन विद्योपदेशयोग्यताख्या-
पनार्थं शोक एवास्य सूचितः न चतुर्थवर्णत्वम्।
उस जानश्रुति ने और अधिक गौ कन्या आदि लाकर देते हुए
ब्रह्मजिज्ञासा की-रैक्व ने उसकी योग्यता को जानने के लिए उसे पुनः
शूद्र कहते हुए कहा—"अरे शूद्र । अपनी शक्ति के अनुसार जो गौवें
और कन्यायें लाया है इनके द्वारा ही तू मुझसे, बिना चिरन्तन कालीन
सेवा के, ब्रह्मोपदेश चाहता है" इतना कह उसे उपदेश दिया । इस प्रसंग
के विवेचन से ज्ञात होता है कि—जानश्रुति की विद्योपदेश योग्यता की
परीक्षा और असूयायुक्त शोक को सूचित करने के लिए ही उसे शूद्र कहा
गया । अंतिमवर्ण का सूचक शूद्र शब्द नही है ।
क्षत्रियत्ववगतेश्च ।१।३।३४॥
"बहुदायी" इति दानपतित्वेन "बहुपाक्यः" इत्यादिना"
सर्वत एवं एतदन्नमत्स्यति "इत्यन्तेन बहुतरपक्वान्नप्रदायित्व
प्रतीते ।" सहसज्जहान एव क्षत्तारमुवाच" इति क्षत्रियत्व प्रती-
तेश्च न चतुर्थवर्णत्वम् ।
"बहुत दान करने वाला" पद से दानशीलता तथा "बहुत अन्न
पकाया गया" आदि से लेकर "सब लोग यही अन्न खावें" इस पद तक
अनेक पक्वान्नों के दान की चर्चा से और "उसने शय्या त्याग करते ही
सारथी से कहा" इत्यादि वर्णनों से क्षत्रियत्त्व की प्रतीति होती है, चतुर्थ-
वर्ण शूद्रता की प्रतीति नहीं होती ।
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तदेवमुपक्रमगताख्यायिकायां क्षत्रियत्व प्रतीतिरुक्ता, उपसंहार-
गताख्यायिकायामपि क्षत्रियत्वमस्य प्रतीयत इत्याह—
उपाख्यान के उपक्रम से तो जानश्रुति का क्षत्रियत्व प्रतीत होता
ही है, उपाख्यान के उपसंहार से भी क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है-यही
बतलाते हैं ।
उत्तरत्र चैत्ररथेन लिंगात् ।१।३।३५॥
अस्य जानश्रुतेरुपदिश्यमानायामस्यामेव संवर्गविद्यायामुत्तरत्र
कीर्त्यमानेनाभिप्रतारिणाम्ना चैत्ररथेन क्षत्रियेणास्य क्षत्रियत्वं
गम्यते । कथम् ? “अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च
काक्षसेनि परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे” इत्यादिना “ब्रह्मचा-
रिन्नेदमुपास्महे” इत्यंतेन कापेयाभिप्रतारिणोर्भिक्षमाणस्य ब्रह्मचा-
रिणश्च संवर्गविद्या संबंधित्वं प्रतीयते । तेषुचाभिप्रतारी क्षत्रियः
इतरौ ब्राह्मणौ अतोऽस्यां विद्यायां ब्राह्मणस्य तदितरेषु च क्षत्रि-
यस्यैवान्वयो दृश्यते, न शूद्रस्य । अतोऽस्यां विद्यायांमन्विताद् रैक्वाद्
ब्राह्मणात् अन्यस्य जानश्रुतेरपि क्षत्रियत्वमेव युक्तम् ; न चतुर्थ-
वर्णत्वम् ।
जानश्रुति के उपदेश प्राप्त हो जाने के बाद, इसी संवर्ग विद्या के
अंतिम प्रकरण में चित्ररथवंशज अभिप्रतारि को क्षत्रिय बतलाया गया है,
जिससे कि क्षत्रियत्व की प्रतीति होती है । “कापेय शौनक और कक्षसेन
के पुत्र अभिप्रतारी को भोजन परोसते समय ब्रह्मचारी ने भिक्षा मांगी”
इत्यादि से लेकर “ब्रह्मचारी ! हम उसी की उपासना करते हैं” इस
अंतिम वाक्य तक कापेय, अभिप्रतारी और ब्रह्मचारी का, संवर्ग विद्या से
संबंध प्रतीत होता है । इन तीनों में अभिप्रतारी क्षत्रिय और दो ब्राह्मण
थे, इस विद्या में ब्राह्मण और क्षत्रियों का ही संबंध दिखलाया गया है शूद्र
का नहीं । इसलिए इस विद्या से सबद्ध रैक्व ब्राह्मण से भिन्न जानश्रुति
को भी क्षत्रिय मानना ही युक्तियुक्त है, शूद्रा मानना ठीक नही है ।
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नन्वस्मिन् प्रकरणेऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च न
श्रुतम् तत्कथमस्याभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वम् ? कथं वा क्षत्रियत्वं ?
तत्राह-लिङ्गात् इति । "अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च
काक्षसेनिम्" इत्यभिप्रतारिणः कापेयसाहचर्याल्लिङ्गादस्याभि
प्रतारिणः कापेय संबंधः प्रतीयते । अन्यत्र च "एतेन वैचैत्ररथं
कापेया अयाजयन्" इति कापेयसंबंधिनश्चैत्ररथत्वं श्रूयते, तथा
चैत्ररथस्य क्षत्रियत्वं-"तस्माच्चैत्रथोनामैकः क्षत्रपतिरजायत" इति ।
अतोऽभिप्रतारिणश्चैत्ररथत्वं क्षत्रियत्वं च गम्यते ।
प्रश्न होता है कि-इस प्रकरण में अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और
क्षत्रियत्व, स्पष्ट रूप से तो कहा नहीं गया, फिर यह कैसे जाना कि
वह चित्ररथवंशज क्षत्रिय था ? कहते हैं कि-चिन्ह से ही ज्ञात होता है ।
"एक बार कापेय शौनक और काक्षसेनि अभिप्रतारी" इत्यादि वाक्य में
कापेय के साथ अभिप्रतारी का वर्णन किया गया है जिससे ज्ञात होता है
कि अभिप्रतारी भी किसी गोत्र से संबद्ध था । अन्यत्र "कापेय इसके द्वारा
ही चैत्ररथ को यज्ञ कराते हैं" इत्यादि में भी कापेय और चैत्ररथ का
संबंध दिखलाया गया है, तथा-"चैत्ररथ नाम का एक क्षत्रपति था"
इत्यादि से चैत्ररथ का क्षत्रियत्व स्पष्ट प्रतीत होता है । इन सभी वर्णनों
से अभिप्रतारी का चैत्ररथत्व और क्षत्रियत्व ज्ञात होता है ।
तदेवं न्यायविरोधिनि शूद्रस्याधिकारे लिंगं नोपलभ्यत
इत्युक्तम्, इदानीं न्याय सिद्धः शूद्रस्यानधिकारः श्रुतिस्मृतिभिर-
नुगृह्यत, इत्याह--
युक्ति विरुद्ध शूद्राधिकार विषयक कोई प्रमाण नहीं है यह दिख-
लाया गया । शूद्र का अनधिकार युक्तिसम्मत तथा श्रुति स्मृति अनुमोदित
है, यही बतलाते हैं-
संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच्च ।१।३।३६॥
ब्रह्मविद्योपदेशेषूपनयनसंस्कारः परामृश्यते-"उप त्वानेष्ये"
"तं होपनिन्ये" इत्यादिषु । शूद्रस्य चोपनयनादिसंस्काराभावोऽ-
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भिलप्यते–“न शूद्रे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति”—चतुर्थोवर्णं
एकजातिर्न च संस्कारमर्हति” इत्यादिषु ।
जहाँ ब्रह्मविद्योपदेश प्रकरणों में उपनयन संस्कार के विषय में
“तुझे उपनीत करता हूँ” उसे उपनीत किया “ऐसा विचार किया गया हैं
वही शूद्र के लिए उपनयन का अनधिकार भी बतलाया गया है—’ शूद्र
को किसी प्रकार का पाप नही लगता और न वह किसी संस्कार के योग्य
ही है “चौथा वर्ण ही एक ऐसी जाति है जिसे सस्कार की आवश्यकता
नही है” इत्यादि ।
तदभाव निर्धारणे च प्रवृत्तेः ।१।३।३७॥
“नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याहर” इति शुश्रूषो
र्जावालस्य शूद्रत्वाभाव निर्धारणे सत्येव विद्योपदेशप्रवृत्तेश्च न
शूद्रस्याधिकारः ।
“ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर नही कर सकता इसलिए
सौम्य ! तू समिधा ले आ” ऐसे शुश्रूषु जाबालि के शूद्रत्व के अभाव को
भली भाँति जानकर ही गौतम विद्योपदेश में प्रवृत्त हुए । इस वर्णन से
ज्ञात होता है कि-शूद्र का ब्रह्मविद्या में अधिकार नहीं है ।
श्रवणाध्ययनार्थ प्रतिषेधात् ।१।३।३८॥
शूद्रस्य वेद श्रवणतदध्ययनतदर्थानुष्ठानानि प्रतिषिध्यंते–
“पद्युहवा एतच्छमशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्रसमीपे नाध्येतव्यम्”–
तस्माच्छूद्रो बहुपशुरयज्ञीय” इति । बहुपशुः पशुसदृश इत्यर्थः ।
श्रनुपशृण्वतो अध्ययनतदर्थज्ञानतदर्थानुष्ठानानि न संभवंति,
अतस्तान्यपि प्रतिषिद्धान्येव ।
शूद्र को, वेद श्रवण, अध्ययन और वैदिक अनुष्ठानों का प्रतिषेध
किया गया है–जैसे कि–“शूद्र चलता फिरता श्मशान है इसलिए उसके
समीप वेदाध्ययन नहीं करना चाहिए” शूद्र पशुतुल्य ही है यज्ञ के योग्य
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नहीं हैं” इत्यादि । जिसके लिए वेद श्रवण तक विहित नहीं है, उसके
लिए वेदाध्ययन, वेदार्थज्ञान और वेदानुष्ठान आदि तो कभी संभव ही
नहीं हैं । इसलिए वे सब भी उसके लिए प्रतिषिद्ध ही हैं ।
स्मृतेश्च ।१।३।३६॥
स्मर्यते च श्रवणादि निषेधः “अथ हास्यवेदमपशृण्वतस्त्रपुज-
तुभ्यां श्रोत्रप्रतिपूरणमुदाहरणे जिह्वाच्छेदो धारणे शरीरभेदः”
इति । “न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्” इति च ।
अतः शूद्रस्यानधिकार इति सिद्धम्।
श्रवण आदि का निषेध स्मृति में भी जैसे-“वेद सुनने वाले शूद्र के
कानों को गर्म लोह और शीशे से पूर्ण करो, वेदपाठ करने पर जीभ काट
लो, याद कर लेने पर शरीर काट दो” इत्यादि । “इसे धर्म का उपदेश
मत दो, न व्रतानुष्ठान का ही उपदेश दो”। इत्यादि से शूद्र का अनधि-
कार सिद्ध होता है ।
ये तु निर्विशेषचिन्मात्र ब्रह्मैव परमार्थः, अन्यत् सर्वंमिथ्याभूतम्
बंधश्चापारमार्थिकः, स च वाक्यजन्यवस्तुयाथात्म्यज्ञानमात्रनिवर्त्यः,
तन्निवृत्तिरेवमोक्षः इति वदंति, तै ब्रह्मज्ञाने शूद्रादेरनधिकारो वक्तुं
न शक्यते । अनुपनीतस्य अनधीतवेदस्याश्रुतवेदांतवाक्यस्यापि
यस्मात्कस्मादपि निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैव परमार्थोऽन्यत्सर्वम्
तस्मिन् परिकल्पितं मिथ्याभूतमिति वाक्याद्वस्तुयाथात्म्यज्ञानो-
त्पत्तेः, तावतैव बंधनिवृत्तेश्च ।
( शांकरमत निरसन ) जो लोग निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म को ही
सत्य और सबको मिथ्या तथा देहादिबंधन को असत्य और तत्त्वमसि
आदि वाक्य जन्य ज्ञान से बंधन की निवृति तथा उस निवृत्ति को ही
मोक्ष मानते हैं वे तो शूद्रों के वेदों के अनधिकार की बात कह ही नहीं
सकते । उनके उक्त मत के अनुसार तो, अनुपनीत—वेदाध्ययन रहित—
वेदांतवाक्यों से अपरिचित जिस किसी भी व्यक्ति को “निर्विशेष चिन्मात्र
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ब्रह्म ही सत्य है, बाकी सब कुछ मिथ्या है" इस वाक्य से ही वस्तु का
यथार्थ ज्ञान हो जाना चाहिए और उतने ज्ञान मात्र से ही बंधमुक्ति भी
हो जानी चाहिए।
न च तत्त्वमस्यादि वाक्येनैव ज्ञानोत्पत्तिः कार्या, न वाक्यांत-
रेणेति नियंतुंशक्यम्, ज्ञानस्यापुरुषतंत्रत्वात् सत्यां सामग्रयामनिच्छ-
तोऽपि ज्ञानोत्पत्तेः । न च वेदवाक्यादेव वस्तुयाथात्म्यज्ञाने सति
बंधनिवृत्तिर्भवतीति शक्यंवक्तुम्, येन केनापि वस्तुयाथात्म्यज्ञाने
सति भ्रांतिनिवृत्तेः पौरुषेयादपि निर्विशेष चिन्मात्रं ब्रह्म परमा-
र्थोऽन्यत् सर्वं मिथ्याभूतम् इति वाक्यात् ज्ञानोत्पत्तेस्तावंतैव भ्रम
निवृत्तिश्च । यथा पौरुषेयाद्याप्तवाक्याच्छुक्तिकारजतादि भ्रांति
ब्राह्मणस्य शूद्रादेरपि त्रिवर्त्तते, तद्वदेवशूद्रस्यापि वेदवित् संप्रदा-
यागतवाक्यात् वस्तुयाथात्म्यज्ञाने जगद् भ्रम निवृत्तिरपि भविष्यति।
ये भी नहीं कह सकते कि केवल "तत्त्वमसि" वाक्य से ही ज्ञानो-
त्पत्ति होती है, अन्य वाक्यों से नहीं हो सकती। सो भाई, ज्ञान कभी
ज्ञाता पुरुष के अधीन तो नहीं रहता; प्रायः ज्ञानोत्पत्ति की सामग्री की
उपस्थिति में भी ज्ञान नहीं होता, और ज्ञानेच्छा न रहते हुए भी ज्ञानो-
त्पत्ति हो जाती है।
और ये भी नहीं कह सकते कि-वेदवाक्य से ही यथार्थज्ञान हो
जाने पर बंधन मुक्ति होती है; प्रायः देखा जाता है कि जिस किसी
प्रकार से यथार्थ ज्ञान हो जाने से भी भ्रांति निवृत्त हो जाती है। किसी
महान पुरुष के द्वारा "निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म ही सत्यं है अन्य सब कुछ
मिथ्या है" इस वाक्य के उपदेश से ही ज्ञानोत्पत्ति और भ्रम निवृत्ति हों
सकती है। जैसे कि-किसी प्रामाणिक आप्त पुरुष के द्वारा, निवृत्त की
गई, सीप में हुई चांदी की भ्रांति, ब्राह्मण और शूद्र दोनों के लिए समान
है, वैसे ही वैदिक संप्रदाय के ज्ञाता विद्वान् पंडित के उपदेशात्मक वाक्य
से, शूद्र को भी, वस्तु का यथार्थ ज्ञान और जगत् की भ्रमात्मक निवृत्ति
भी हो सकती है।
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“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादिना वेदविदः शूद्रादिभ्यो न
वदंतीति च न शक्यं वक्तुम्, तत्त्वमस्यादि वाक्यावगत ब्रह्मात्म-
भावानां वेदशिरसि वर्त्तमानतया दग्धाखिलाधिकारत्वेन निषेध-
शास्त्रकिंकरत्वाभावात् अतिक्रांतनिषेधैर्वा कैश्चिदुक्ताद्वाक्यात्
शूद्रादेः ज्ञानमुत्पद्यत एव ।
आप यह भी नहीं कह सकते कि-“न चास्योपदिशेद्धर्मम्” इत्यादि
वाक्यों से, वेदवेत्ता शूद्रों को उपदेश देने का विरोध करते हैं; क्यों कि-
जिन्हें “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों से ब्रह्मात्मभाव का परिज्ञान हो गया है,
वे तो वेदों से भी अतीत स्थिति को प्राप्त कर चुके, उनके तो सारे ही
कर्म बन्धन दग्ध हो चुके, वे तो शास्त्रीय निषेध के दास हो नहीं सकते
वे तो निषेध का अतिक्रमण करके शूद्र को तत्त्वोपदेश देंगे, शूद्र को तो
ज्ञान हो ही जायगा ।
न च वाक्यं शुक्तिकादौ रजतादिभ्रम निवृत्तित्त्वत् पौरुष
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ज्ञातृज्ञेयविकल्परूपं कृत्स्नं जगच्चाध्यस्तमिति निश्चित्यैवम्भूत-
परिशुद्ध प्रत्यग्वस्तुन्यनवरतभावनया विपरीतवासनां निरस्य तदेव
प्रत्यग्वस्तु साक्षात्कृत्य शूद्रादयोऽपि विमोक्ष्यन्त इति मिथ्याभूत-
विचित्रैश्वर्य विचित्रसृष्ट्याद्यलौकिकानंतविशेषावलम्बिना वेदांत
वाक्येन न किंचित् प्रयोजनमिह दृश्यत इति शूद्रादीनामेव ब्रह्म-
विद्यायामधिकारः सुशोभनः। अनेनैव न्यायेन ब्राह्मणादीनामपि
ब्रह्मवेदनसिद्धेरुपनिषच्च तपस्विनी दत्तजलांजलिः स्यात्।
आप यह नहीं कह सकते कि—सीप आदि में, रजतभ्रमनिवृत्ति
की तरह, विद्वान् पुरुष के उपदेशात्मक वाक्य से शूद्र का जगद्भ्रम
निवृत्त नहीं हो सकता, ठीक है—तत्त्वमसि वाक्य श्रवण के बाद बहुत से
ब्राह्मणों की भी तो भ्रमनिवृत्ति नहीं होती। यदि कहें कि-निदिध्यासन
से द्वैतवासना के निरस्त हो जाने पर ही निवर्त्तक ज्ञान होता है; सो यह
नियम तो उपदेशात्मक वाक्य में शूद्रों के लिए भी लागू हो सकता है,
कोई ब्राह्मण के लिए ही तो निदिध्यासन का विशेष नियम नहीं। तत्त्व
के प्रतिपादन में समर्थ ब्रह्मात्मभाव बोधक वाक्य विषयक भावना
(चिन्तन के प्रवाह) को ही तो निदिध्यासन कहते हैं, यह भावना ही तो
तद्विषयक विपरीत वासना की निवृत्ति करती है, यही निदिध्यासन का
फल है। वेदानुशीलन को भी ज्ञानेच्छा उत्पादन का, उपयोगी कहा जाता
है। इसी प्रकार महापुरुष के उपदेश वाक्य से ज्ञानेच्छा होने पर निदि-
ध्यासनादि द्वारा विपरीत संस्कार के निवृत्त हो जाने पर शूद्र को भी
तत्त्वज्ञान हो जायगा और उसी से असत् बंधन की भी निवृत्ति हो
जायगी। अथवा आपके मतानुसार यह भी तो संभव है कि—जो निर्विशेष
और स्वप्रकाश चैतन्यमय परमात्मा से बहुविध विचित्रतापूर्ण ज्ञातृ ज्ञेय
कल्पनात्मक समस्त जगत समारोपित है, तर्क सम्मत प्रत्यक्ष और अनुमान
प्रमाण की सहायता से ज्ञानार्जन करके, शुद्ध चैतन्य परमात्मा की
निरन्तर भावना करके, जगत सत्यता के उस भ्रांत संस्कार का निराकरण
करके, सर्वव्यापी प्रत्यक्ष चैतन्य का साक्षात्कार करके, शूद्र आदि भी
मुक्तिलाभ कर सकते हैं। मिथ्याभूत विचित्र ऐश्वर्य और विचित्र सृष्टि
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आदि अनंत अलौकिक विशेषावगाही वेदांत वाक्य का यहाँ कोई प्रयोजन
तो दीखता नहीं उक्त प्रकार से ही शूद्रादि का ब्रह्मविद्या में अधिकार
समधिक शोभित होता है। ब्राह्मणादि को भी उक्त नियम से ही, ब्रह्म-
ज्ञान सिद्धि संभावना के लिए तपस्विनी उपनिषद् देवी को जलांजलि
देनी होगी।
न च वाच्यं नैसर्गिक लोक व्यवहारे भ्राम्यतोऽस्य केनचिदयं
लौकिकव्यवहारोभ्रमः, परमार्थस्त्वेवमिति समर्पिते सत्येव
प्रत्यक्षानुमानवृत्त बुभुत्सा जायत इति तत्समर्पिका श्रुतिरप्यास्थेयेति,
यतो भवभयभीतानां सांख्यादय एव प्रत्यक्षानुमानाभ्यां वस्तुनि-
रूपणं कुर्वन्तः प्रत्यक्षानुवृत्तबुभुत्सां जनयंति बुभुत्सायां च जातायां
प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव विविक्तस्वभावाभ्यां नित्यशुद्धस्वप्रकाशा-
द्वितीयकूटस्थ चैतन्यमेव सत्, अन्यत्सर्वं तस्मिन्नध्यस्तमिति
सुविवेचनम्। एवंभूते स्वप्रकाशिनि वस्तुनि श्रुति समधिगम्यं
विशेषांतरं च नाभ्युपगम्यते—
आप यह भी नहीं कह सकते कि—लोक अनादि काल से स्वाभाविक
लौकिक व्यवहार में विभ्रान्त है, "यह समस्त लौकिक व्यवहार भ्रमात्मक
है, परमार्थ वस्तु अमुक है" किसी सुबुद्ध व्यक्ति के द्वारा ऐसा बतलाने
पर ही, इस लोक में प्रत्यक्ष और अनुमानावगत बुभुत्सा (बोधेच्छा)
उत्पन्न हो सकती है, इसलिए तदनुकूल श्रुति का आश्रय लेना आव-
श्यक है।
इस प्रकार तो निरीश्वरवादी सांख्य आदि भी, भव भयभीत
प्राणियों में, प्रत्यक्ष और अनुमान की सहायता से वस्तु का निरूपण करते
हुए, प्रत्यक्षानुमान विषयक व्यावहारिक बुभुत्सा जाग्रत करते हैं। उस
बुभुत्सा के जागरित होने पर तो, निर्दोष प्रत्यक्ष और अनुमान की सहा-
यता से, नित्यशुद्ध स्वप्रकाश अद्वितीय चैतन्य कूटस्थ ही सत् , और बाकी
सब उसी से अध्यस्त सिद्ध होते हैं। इस प्रकार स्वप्रकाश वस्तु में,
अन्यान्य श्रौत धर्म भी स्वीकृत नहीं होते क्यों कि—आपके मतानुसार
श्रुति तो एकमात्र, अध्यस्त मिथ्या रूप का ही निर्वर्तन करती है।
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न च सत आत्मन आनन्दरूपताज्ञानायोपनिषदास्थेया चिद्रूप-
ताया एव सकलेतरा तद्रूपव्यावृत्ताया आनन्दरूपत्वात् । यस्य तु
मोक्षसाधनतया वेदान्तवाक्यैर्विहितं ज्ञानमुपासन रूपं, तच्च परब्रह्म-
भूत परमपुरुष प्रीणनम्, तच्चशास्त्रैक समधिगम्यम् । उपासन
शास्त्रं चोपनयनादि संस्कृताधीत स्वाध्यायजनितं ज्ञानं विवेक-
विमोकादिसाधनानुगृहीतमेव स्वोपायतया स्वीकरोति, एवं रूपो-
पासनप्रीत. पुरुषोत्तम, उपासक स्वाभाविकात्मयाथात्म्यज्ञानदानेन
कर्मजनिताज्ञानं नाशयम् बन्धान् मोचयतीति पक्षः तस्ययथोक्तया
नीत्या शूद्रादेरनधिकार उपपद्यते ।
सत् स्वरूप आत्मा के आनंदरूप ज्ञान के लिए, उपनिषदों का
आश्रय लिया ही जावे, यह भी कोई आवश्यक नही है । क्यों कि-मिथ्या-
भूत अन्यान्य समस्त पदार्थों से पृथक् जो चैतन्य है, वस्तुतः आनंदरूप
ही तो उसका स्वाभाविक रूप है । जो लोग, वेदांतविहित उपासना रूप
ज्ञान को मोक्ष का साधन मानते हैं तथा परब्रह्म परंपुरुष भगवान की
साक्षात् कृपा की कामना से ही उपासना में संलग्न रहते हैं जो कि-
एकमात्र शास्त्र सम्मत ही होती है । उपासना प्रतिपादक शास्त्र उपनयन
आदि संस्कारों से संस्कृत, वेदाधीत, विवेक विमोक आदि साधनों से
परिपोषित व्यक्ति के ज्ञान को ही, मोक्षोपाय रूप से स्वीकारता है । ऐसी
उपासना से परितुष्ट पुरुषोत्तम ही (गुरुरूप से) उपासक को, स्वाभाविक
स्वकीय यथार्थ ज्ञान का दान देकर, कर्मजनित अज्ञान का संहार कर
बंधन से मुक्त करते हैं । ऐसे मत में ही, यथार्थ रूप से शूद्र का अनधिकार
माना जा सकता है ।
प्रमिताधिकरण शेष :-
तदेवं प्रसक्तानुप्रसक्ताधिकारकथां परिसमाप्य प्रकृतस्य अंगुष्ठ
प्रमितस्य भूतभव्येशितृत्ववगत परब्रह्म भावोत्तंभनं हेत्वन्तरमाह-
इस प्रकार प्रासंगिक अधिकार विचार को समाप्त कर अब पुनः
प्रस्तावित अंगुष्ठ परिमित के भूतभविष्य के स्वामित्व को बतलाने वाले
ब्रह्मभाव के समर्थक अन्य कारणों का उल्लेख करते हैं-
( ५४१ )
कम्पनात् ॥१।३।४०॥
“अंगुष्ठ मात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति” अंगुष्ठमात्रः
पुरुषोऽन्तरात्मा “इत्यनयोर्वाक्ययोर्मध्ये” यदिदं किच् जगत्सर्वं प्राण
एजति निस्सृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवंति।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपतिसूर्यः, भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्यु-
र्धावति पंचमः।” इति कृत्स्नस्य जगतोऽग्निसूर्यादीनां चास्मिन्नं-
गुष्ठ मात्रे पुरुषे प्राणशब्दे निर्दिष्टे स्थितानां सर्वेषां ततो
निस्सृतानां तस्मात्सञ्जातमहाभयनिमित्तं एजनकम्पनं श्रूयते।
तच्छासनातिवृत्तौ किं भविष्यतीति, महतो भयाद् वज्राद् इवोद्यतात्
कृत्स्नं जगत् कंपत् इत्यर्थः। “भयादस्याग्निस्तपति” इत्यनेनैकार्थ्यात्
“महद्भयं वज्रमुद्यतम्” इतिपंचम्यर्थे प्रथमा। अयं च परस्यब्रह्मण-
स्स्वभावः “एतस्य वाऽक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचंद्रमसौ विधृतौ
तिष्ठतः” भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः, भीषाऽस्मादग्नि-
श्चेन्द्रश्च, मृत्युर्धावति पंचमः” इति परस्य ब्रह्मणः पुरुषोत्तमस्यैवं
विधैश्वर्यावगतेः ।
“अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला पुरुष शरीर के मध्य के हृदयाकाश
में स्थित है “अंगुष्ट मात्र पुरुष अंतरात्मा है” इन दोनों वाक्यों के मध्य
में ही— “परब्रह्म परमेश्वर से उत्पन्न यह सारा जगत, उस प्राण स्वरूप
घरमेश्वर में ही चेष्टा करता है, इस उठे हुए वज्र के समान महान् भय
स्वरूप परमेश्वर को जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं, उसी भय से
अग्नितपता है, सूर्यंतपता है, इसी के भय से इन्द्र, वायु और पांचवे देवता
मृत्यु अपने-अपने कार्यों में संलग्न हैं ।” इत्यादि वर्णन भी मिलता है
जिसका तात्पर्य है कि-समस्त जगत अग्नि सूर्यादि सहित, प्राण शब्द
निर्दिष्ट इस अंगुष्ठ परिमाण पुरुष में ही स्थित हैं और उसी से प्रकट
होकर उसके ही संयमन में, भयभीत होकर संसार कर्म को नियमित रूप
से कर रहे हैं। इसमें जो भय से कंपित होने वाली बात लिखी है, उसका
[email protected]
( ५४२ )
तात्पर्य है कि-उसका शासन का अतिक्रमण करने पर अनिष्ट होगा,
इस महान् भय से उठे हुए वज्र के समान उससे सारा जगत कांपता है ।
“भयादग्निस्तपति” का जो अर्थ है वही “महद्भयं” इत्यादि का
भी है, द्वितीय वाक्य मे पंचमी अर्थ की द्योतिका प्रथमा विभक्ति है । उक्त
परब्रह्म के स्वभाव को-“हे गार्गि ! इस अक्षर के प्रशासन में सूर्य और
चंद्र स्थित हैं, इसके भय से वायु डोलता है, सूर्य उदय होता है, इसी के
भय से अग्नि-चंद्र और पांचवा मृत्यु कार्य में संलग्न है” इत्यादि परब्रह्म
पुरुषोत्तम के ऐश्वर्य बोधक वाक्यों से भी जाना जा सकता है ।
इतश्चांगुष्ठ प्रमितः पुरुषोत्तमः—
ज्योतिर्दर्शनात् । १।३।४१॥
तयोरेवांगुष्ठ प्रमितविषययोर्वाक्ययोर्मध्ये परब्रह्मसाधारणं
सर्वं तेजसां छादकं सर्वतेजसां कारणभूतमनुग्राहकं चांगुष्ठ प्रमितस्य
ज्योतिरीक्ष्यते-“न तत्र सूर्यो भाति न चंद्रतारकं नेमाविद्युतो भ्रांति
कुतोऽयमग्निः, तमेव भान्तमनु भातिसर्वं तस्यभासा सर्वमिदं विभाति”
इति । अयमेवश्लोक अथर्वणे परंब्रह्माधिकृत्यश्रूयते । पर ज्योतिष्ट्वं
च सर्वत्रपरस्य ब्रह्मणः श्रूयते । यथा-“परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन
रूपेणाभिनिष्पद्यते”-तं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्-
“अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते” इत्यादिषु । अतो अंगुष्ठ
प्रमितः परं ब्रह्म ।
उन दोनों अंगुष्ठ प्रमित विषयक दोनों वाक्यों के बीच में परब्रह्म
के असाधारण धर्म सर्वतेजोभिभावक एवं समस्त तेजों के कारण अनु-
ग्राहक ज्योतिष रूप का जो वर्णन मिलता है, अंगुष्ठ प्रमित के लिए भी
वैसी ही ज्योति का वर्णन मिलता है—“वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है,
न चंद्रमा न तारों का समुदाय ही न ये बिजलियाँ ही प्रकाशित होती हैं,
इस अग्नि की तो गणना ही क्या है; उसके प्रकाशित होने पर ही सूर्य
आदि प्रकाशित होते हैं, उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण जगत प्रकाशित
होता है” यही श्लोक अथर्वण उपनिषद् में परब्रह्म के लिए कहा गया है,
( ५४३ )
परब्रह्म के लिए ही सर्वत्र परंज्योति स्वरूप का प्रयोग किया गया है,
जैसे कि—“परं ज्योति को प्राप्त कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता
है” देवगण, उन्हें ज्योतियों की ज्योति, अमृत और वायु रूप से उपासना
करते हैं “ये जो द्युलोक से ऊपर ज्योति प्रकाशित हो रही है ।” इत्यादि,
इससे सिद्ध होता है कि-अंगुष्ठ प्रमित परमात्मा ही है ।
१० अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशाधिकरण :-
आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ।१।३।४२॥
छांदोग्ये श्रूयते-“आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते
यदन्तरा तद्ब्रह्म तदमृतं स आत्मा” इति । तत्र संशयः किमया-
माकाश शब्द निर्दिष्टो मुक्तात्मा, उत परमात्मा—इति किं युक्तम् ?
मुक्तात्मेति, कुतः ? “अश्व इव रोमाणि विधूय पापं, चंद्र इव
राहोर्मुखात् प्रमुच्य, धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभि-
संभवामि” इति मुक्तस्यानंतर प्रकृतत्वात् “ते यदंतरा” इति च
नामरूपविनिर्मुक्तस्य तस्याभिधानात् “नामरूपयोर्निर्वहिता” इति
च स एव पूर्वावस्थयोपलिलक्षयिषतः स एव हि देवादि रूपाणि
नामानि च पूर्वमबिभः, तस्यैव नामरूपविनिर्मुक्ता सांप्रतिक्यवस्था
“तद्ब्रह्म तदमृतम्” इत्युच्यते आकाशशब्दश्च तस्मिन्नप्यसंकुचित
प्रकाशयोगादुपपद्यते । ननु दहर वाक्यशेषत्वादस्य स एव दहरा-
काशोऽयमिति प्रतीयते, तस्य च परमात्मत्वं निर्णीतम् ।मैवं, प्रजा-
पति वाक्य व्यवधानात् । प्रजापति वाक्ये च प्रत्यगात्मनो
मुक्त्यवस्थान्तं रूपमभिहितम्, अनन्तरं च “विधूय पापम्” इति स
एव मुक्तावस्था प्रस्तुतः । अतोऽत्राकाशो मुक्तात्मा ।
छांदोग्योपनिषद का वाक्य है—“आकाश ही नाम और रूप का
निर्वाहक है, ये नामरूप जिसके अन्तर्यामी हैं, वही ब्रह्म, वही अमृत
( ५४४ )
वही आत्मा है" इत्यादि । इस पर संशय होता है कि - आकाश शब्द
निर्दिष्ट मुक्तात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि मुक्तात्मा, क्यों कि
"जैसे कि घोड़ा रोंए झाड़कर निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार मैं पापों
को धोकर, राहुके मुख से निकले चन्द्रमा के समान शरीर त्याग कर
कृतकृत्य हो, नित्य ब्रह्मलोक को प्राप्त होता हूँ" ऐसा मुक्तात्मा का वर्णन
मिलता है। "वह नाम और गुण उसके अन्तर्गत हैं" इस वाक्य में नाम
रूप से मुक्त उसका वर्णन प्रतीत होता है "वह नाम रूप का निर्वाहक
है" इस वाक्य में भी, इसी की, सृष्टि की पूर्व स्थिति का वर्णन किया
गया है । उसने ही पहिले देवादि रूपों में बहुत से नाम धारण किये, वही
ब्रह्म, वही अमृत है" इस वाक्य में भी उसी की नाम रूप रहित अवस्था
का वर्णन है । अव्याहत प्रकाश से संबद्ध होने से, उसे ही आकाश कहा
गया है ।
यह प्रकरण दहर वाक्य का शेषांश है इसलिए यह वर्णन दहरा-
काश का ही प्रतीत होता है, दहराकाश परमात्मा ही है, यह निर्णय कर
ही चुके हैं, इसलिए यह परमात्मा का वर्णन है, इत्यादि शंका नहीं की
जा सकती, क्यों कि दहर प्रकरण और इस प्रकरण के मध्य में प्रजापति
वाक्य का व्यवधान है। प्रजापति वाक्य में जीवात्मा की मुक्तावस्था का
ही वर्णन है, उसके बाद ही "पापों को धोकर" वाक्य भी मुक्तात्मा का
ही बोधक है। इससे सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा ही आकाश है ।
सिद्धान्तः - इति प्राप्त उच्यते-आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात्
इति आकाशः परब्रह्म, कुतः ? अर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् । अर्थान्तर
व्यपदेशस्तावत्- "आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इति नाम-
रूपयोः निर्वोढृत्वं बद्धमुक्तोभयावस्थात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वमा-
काशस्योपपादयति । बद्धावस्थः स्वयं कर्मवशान्नामरूपे भजमानो न
नामरूपे निर्वोढु शक्नुयात्, मुक्तावस्थस्य जगद्व्यापारासंभवात् न
नितरां नामरूपनिर्वोढृत्वम् । ईश्वरस्य तु सकल जगन्निर्माण
धुरंधरस्य नामरूपयोः निर्वोढृत्वम् श्रुत्यैव प्रतिपन्नम्- "अनेन
[email protected]
( ५४५ )
जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि"-यः सर्वज्ञः सर्व-
विद्यस्य ज्ञानमयंतपः, तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते-
“सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन्यदास्ते”
इत्यादिषु । अतो निर्वाह्यनामरूपात्प्रत्यगात्मनो नामरूपयोर्निर्वो-
ढाऽयमाकाशोऽर्थान्तरभूतः परमेव ब्रह्म। तदेवोपपादयति “ते यदंतरा”
इति । यस्मादयमाकाशो नामरूपे अन्तरा-ताभ्यां अस्पृष्टोऽर्थान्तर-
भूतः, तस्मात्तयोर्निर्वोढा अपहतपाप्मत्वात् सत्यसंकल्पत्वाच्च निर्व-
हितेत्यर्थः । आदिशब्देन ब्रह्मत्वात्मत्वामृतत्वानि गृह्यंते। निरुपाधिक-
वृहत्वादयो हि परमात्मन एव संभवंति, तेनात्राकाशः परमेव ब्रह्म।
उक्त संशय पर सूत्रकार सिद्धान्त रूप से “आकाशोऽर्थान्तर” सूत्र
प्रस्तुत करते हैं। उनके मत से आकाश, परब्रह्म है, क्यों कि उपनिषदों में
इसी अर्थ में आकाश शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे कि-“आकाश
नाम रूप का निर्वाहक है" इत्यादि जिसे निर्वाहिका शक्ति की चर्चा की
गई है, वही बद्धमुक्त उभय अवस्था वाले जीवात्मा से पार्थक्य बतलाती
है। बद्ध अवस्था वाला जीव, कर्मों के वश होकर स्वयं ही नाम और रूप
का अनुसरण करता है इसलिए वह तो निर्वाहक हो नहीं सकता। मुक्त
अवस्था वाले जीव में जागतिक व्यवहार होता नहीं, इसलिए वह भी,
नाम रूप का निर्वाहक नहीं हो सकता। सारे विश्व के निर्माण में पटु
ईश्वर की नामरूप निर्वाहकता शास्त्र प्रसिद्ध है-जैसे कि-“इस जीव में
प्रवेश कर नामरूप का व्यवहार करूँगा”-सर्वज्ञ, सर्वविद्, ज्ञानमय तप
वाले उस परमेश्वर से ही यह विराट जगत और नाम रूप तथा अन्न की
उत्पत्ति हुई-“धीर परमेश्वर, समस्त रूप का विस्तार कर उनका
नामकरण करके, उन्हीं नामों को व्यवहृत करते हुए स्थित हैं" इत्यादि
से सिद्ध होता है कि-नाम रूप का निर्वाहक आकाश, अपने कार्यभूत
नामरूप संपन्न जीवात्मा से भिन्न, परब्रह्म ही है। उसी का प्रतिपादन
“ते यदन्तरा” इत्यादि वाक्य में किया गया है, उसमें बतलाया गया है
कि-यह आकाश, नामरूप से अस्पृष्ट पृथक् पदार्थ है, इसीलिए वह
नामरूप का निर्वाहक है, अर्थात् वह निष्पापता और सत्यसंकल्पता को
[email protected]
( ५४६ )
चरितार्थ करने के लिए, नामरूप का निर्वाह करता है । सूत्र में प्रयुक्त
आदि शब्द का तात्पर्य है-ब्रह्मत्व आत्मत्व और अमृतत्त्व । अहैतुक
महानतां आदि गुण परमात्मा में ही संभव हैं इसलिए इस प्रकरण का
उपदिष्ट आकाश तत्त्व, परब्रह्म का ही रूप है ।
यत् पुनरुक्तं "धूत्वा शरीरम्" इति मुक्तोऽनंतर प्रकृत. इति
तन्न, 'ब्रह्मलोकमभिसंभवामि" इति परस्यैव ब्रह्मणोऽनन्तर
प्रकृतत्वात् । यद्यप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्याभिसंभाव्यतया परं ब्रह्मनि-
र्दिष्टम्, तथाप्यभिसंभवितुर्मुक्तस्य नामरूपनिर्वोढृत्वाद्यसंभावाद-
भिसंभाव्यं परमेव ब्रह्म तत्र प्रत्येतव्यम् ।
“धूत्वाशरीरम्" यह परवर्त्ती वाक्य, मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा
के लिए कहा गया है, यह कथन भी असगत है, “ब्रह्मलोक को प्राप्त
होऊँगा" यह वाक्य, उपर्युक्त वाक्य के ठीक बाद का जो कि परमात्मा
के लिए कहा गया है । यद्यपि, ब्रह्मभाव लब्ध मुक्तपुरुष का प्राप्य रूप
परब्रह्म ही कहा गया है, तथापि, उस ब्रह्मभाव लब्ध मुक्त पुरुष मे जब,
नाम रूप निर्वाक्त्व है नहीं, तो अभिसद्भाव्य परमात्मा को ही निर्वाहक
मानना पड़ेगा ।
कि च आकाश शब्देन प्रकृतस्य दहराकाशस्यात्र प्रत्यभिज्ञानात्
प्रजापतिवाक्यस्याप्युपासक स्वरूप कथनार्थत्वादुपास्य एव दहरा-
काशः प्राप्यतयोपसंह्रियत इति युक्तम् । आकाश शब्दश्च प्रत्यगा-
त्मनि न कश्चिद् दृष्टचरः । अतोऽत्राकाशः परंब्रह्म ।
उक्त प्रकरण में, आकाश शब्द से प्रस्तावित दहराकाश ही निर्दिष्ट
है, मध्यवर्त्ती प्रजापति वाक्य का तात्पर्य, उपासक के स्वरूप का कथन
मात्र है, इस जगह उपास्य रूप से दहराकाश को ही प्राप्य बतलाकर
उपसंहार किया गया है, यही मानना युक्ति संगत है । आकाश शब्द
का, जीवात्मा के लिए कहीं भी प्रयोग दिखलाई नही देता । इसलिए
निश्चित होता है कि उक्त प्रकरण में आकाश शब्द, परब्रह्म का ही
वाचक है ।
[email protected]
( ५४७ )
अथस्यात्-प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतमात्मान्तरमेव, नास्ति,
ऐक्योपदेशात् द्वैत प्रतिषेधाच्च। शुद्धावस्थ एव हि प्रत्यगात्मा,
परमात्मा परंब्रह्म परमेश्वर इति च व्यपदिश्यते, अतः प्रकृतान्मुक्ता-
त्मनोऽभिसंभवितुनार्थान्तरमभिसन्भाव्यो ब्रह्मलोकः अतोनामरूपयो-
र्निर्वहिता आकाशोऽपि स एव भवितुमर्हति-इति। अत उत्तरं
पठति-
श्रुति वाक्यों के अद्वैत वर्णन और द्वैत के प्रतिषेध से ज्ञात होता
है कि-जीवात्मा से पृथक् किसी अन्य का अस्तित्व नहीं है, शुद्ध अवस्था
वाला जीवात्मा ही, परमात्मा, परब्रह्म, परमेश्वर आदि नामों से उल्लेख्य
है अभिसद्भविता ( ब्रह्मभाव प्राप्त ) मुक्तात्मा से अभिसद्भाव्य (प्राप्य)
ब्रह्मलोक कोई भिन्न वस्तु नहीं है, इसलिए नाम रूप का निर्वाहक
आकाश भी जीवात्मा ही है। इस भ्रांति का उत्तर सूत्रकार देते हैं--
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥१।३।४३॥
व्यपदेशादिति वर्तते, सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरत्वेन
परमात्मनो व्यपदेशात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्माऽस्त्येव ।
तथाहि-वाजसनेयके-"कतम आत्मायोऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु" इति
प्रकृतस्य प्रत्यगात्मनः सुषुप्त्यवस्थायामकिंचिद्ज्ञस्य सर्वज्ञेन पर-
मात्मना परिष्वंग आम्नायते-"प्राज्ञेनात्मनासंपरिष्वक्तो न बाह्यं वेद
नान्तरम्" इति। तथोत्क्रांतावपि- "प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन-
न्द्याति" इति । न च स्वपत उत्क्रामतो वा किंचिद् ज्ञस्य तदानीमेव
स्वेनैव सर्वज्ञेन सतापरिष्वंगान्वारो हौ संभवतः न च क्षेत्रज्ञान्तरेण
तस्यापि सर्वज्ञत्वासंभवात् ।
जीवात्मा के लिए सुषुप्ति और उत्क्रांति इन दो अवस्थाओं का
वर्णन मिलता है, जिससे, जीवात्मा-परमात्मा का भेद स्पष्ट हो जाता
है, इसलिए जीव से भिन्न परमात्मा नामक कोई तत्त्व है यह मानना
( ५४८ )
होगा । जैसा कि-वाजसनेय उपनिषद् में—"आत्मा कौन है ? जो कि—
प्राणों के मध्य में विज्ञानमय नामवाला है" इत्यादि उपक्रम के बाद,
सामान्य अज्ञ जीवात्मा का सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ परमात्मा से मिलन
बतलाया गया है जैसे कि—"प्राज्ञ परमात्मा से मिलकर बाह्याभ्यंतर
ज्ञान से शून्य हो जाता है।" तथा उत्क्रान्ति में भी जैसे—"प्राज्ञ परमात्मा
से अधिष्ठित होकर ( जीव ) शरीर त्याग कर जाता है।" इन दोनों
वर्णनों से स्पष्ट हो जाता है कि—जीवात्मा और परमात्मा भिन्न हैं, एक
नहीं है, एक ही वस्तु में अज्ञता और प्राज्ञता, एकीभाव और प्रतिष्ठान
आदि विलक्षणतायें संभव नहीं हैं और न क्षेत्रज्ञ जीवात्मा का साहचर्य
ही संभव हैं क्योंकि—उसमें सर्वज्ञता का अभाव है।
इतश्च प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तरभूतः परमात्मेत्याह—
इसलिए भी जीवात्मा को परमात्मा से भिन्न बतलाया जाता
है कि—
पत्यादिशब्देभ्यः : १।३।४४॥
अयं परिष्वंजकः परमात्मा उत्तरत्र पत्यादिशब्दैः व्यपदिश्यते 'सर्व-
स्याधिपतिः सर्वस्यवशी सर्वस्येशानः स न साधुनाकर्मणा भूयान्नो एव
असाधुना कनीयान्, एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपालन एष
सेतुः विधरण एषां लोकानामसंभेदाय, तमेतंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा
विविदिषंति एतमेव विदित्वा मुनिर्भवति, एतमेव प्रत्राजिनो लोक-
मिच्छन्तः प्रव्रजंति"—"स वा एष महानज आत्माऽन्नादोवसुदानः"—
अजरोऽमृतोऽभयोब्रह्म" इति एते च पतित्व जगद्विधरणत्व सर्वेश्वर-
त्वादयः प्रत्यगात्मनि मुक्तावस्थेऽपि न कथंचिद् संभवंति । अतो
मुक्तात्मनोऽर्थान्तरभूतो नामरूपयोनिर्वहिता आकाश. । ऐक्योप-
देशस्तु सर्वस्य चिदाचिदात्मकस्य ब्रह्मकार्यत्वेन तदात्मकत्वायत्त
इति "सर्वंखल्विदं ब्रह्म तज्जलान" इत्यादिभिर्वाक्यैः प्रतिपाद्यत
इति पूर्वमेव समर्थितम् । द्वैत प्रतिषेधश्च तत एषेत्यनवद्यम् ।