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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ७५ )
किं च—अहमर्थो न चेदात्मा प्रत्यक्त्वं नात्मनो भवेत् ।
अहम्बुद्ध्या परागर्थात् प्रत्यगर्थोहि भिद्यते । निरस्ताऽखिल दुःखोऽह
मनन्तानन्दभाक् स्वराट् । भवेयमिति मोक्षार्थी श्रवणादौ प्रवर्त्तते ।
अहमर्थ विनाशश्चेन्मोक्ष इत्यध्यवस्यति । अपसर्पेदसौ मोक्षकथा-
प्रस्ताव गन्धतः । मयिनष्टेऽपि मत्तोऽन्या काचित्ज्ञप्तिरवस्थिता,
इति प्राप्तयेत्नः कस्यापि न भविष्यति । स्वसम्बन्धितयाह्यस्याः
सत्ताविज्ञप्तितादि च, स्वसम्बन्ध वियोगेतुज्ञाप्तिरेव न सिद्ध्यति ।
छेत्तुश्छेद्यस्य चाभावे छेदनादेरसिद्धिवत् अतोऽहमर्थो ज्ञातैव प्रत्य-
गात्मेति निश्चितम् । विज्ञातारमरे केन जानात्येवेति च श्रुतिः,
एतद्योवेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति च स्मृतिः । नात्माश्रुतेरित्यारभ्य
सूत्रकारोऽपि वक्ष्यति, ज्ञोऽत एवेत्यतोनात्मा ज्ञप्तिमात्रमितिस्थितम् ।
अहं का अर्थ आत्मा नहीं है, तथा प्रत्यगात्मा परमात्मा नहीं हो
सकता, अहं बुद्धि से एक दूसरी ही वस्तु की प्रतीति होती है, अहं के अर्थ
से प्रत्यगात्मा का भिन्न अर्थ है। “मैं समस्त दुःखों से मुक्त हो गया,
अनंत आनंद युक्त स्वच्छन्द हूँ” ऐसे मोक्ष की कामना वाला श्रवण
आदि नवधा भक्ति में संलग्न होता है । “अहं अर्थ का विनाश ही मोक्ष
है” ऐसे मोक्ष कथा के प्रस्ताव की गंध भी जहाँ हो, वहाँ से दूर ही भागना
चाहिए। “अहंता” के नष्ट हो जाने पर भी यदि “अहं” से भिन्न किसी
प्रकार की ज्ञप्ति होती है तो, ऐसी प्राप्ति के लिए प्रयास किसी में भी
नहीं हो सकता । ज्ञान की सत्ता और विज्ञप्ति आदि सब जीव की सत्ता
पर ही निर्भर है, यदि इन सबका जीव से संबंध विच्छेद हो जाय तो,
ज्ञप्ति की सिद्धि नहीं हो सकती जैसे कि—वृक्ष और वृक्ष के काटने वाले
के अभाव में काटना आदि कार्य नहीं हो सकते । इसलिए “अहं” अर्थ
का ज्ञाता जीवात्मा ही निश्चित होता है । “विज्ञातारमरे केन जानाति
एव” ऐसा श्रुति वचन तथा “एतद्योवेत्तित्तं प्राहुः क्षेत्रज्ञः” ऐसा गीता
स्मृति का वचन उक्त कथन में प्रमाण है सूत्रकार भी “नात्माश्रुतेः” से
लेकर “ज्ञोऽतएव” सूत्र तक, आत्मा ज्ञप्ति मात्र ही नहीं हैं, ऐसा निर्णय
करते हैं ।
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( ७६ )

अहं प्रत्यय सिद्धो हि अस्मदर्थः युष्मत् प्रत्ययविषयो युष्मदर्थः।
तत्राहं जानामीति सिद्धो ज्ञाता युष्मदर्थ इति वचनं जननी मे बन्ध्या
इतिवत् व्याहतार्थच । न चासौज्ञाता अहमर्थो अन्याधीन प्रकाशः
स्वयंप्रकाशत्वात् । चैतन्य स्वभावता हि स्वयं प्रकाशता । यः प्रकाश
स्वभावः सो न अन्याधीन प्रकाशः दीपवत् , न हि दीपादेः स्वप्रभा-
बलनिर्भासितत्वेनाप्रकाशत्वमन्याधीन प्रकाशत्वंच । किं तर्हि ?
दीपः प्रकाशस्वभावः स्वयमेव प्रकाशते । अन्यानपि प्रकाशयति
स्वप्रभया ।
“अहं” प्रत्यय की सिद्धि अस्मत् शब्द से तथा “त्वं” प्रत्यय की
सिद्धि युष्मद् शब्द से होती है। मैं जानता हूँ” इस प्रतीति का ज्ञाता
युष्मद्वाची को कहा जाय तो वह कथन “मेरी माता बन्ध्या है” के
समान मूर्खतापूर्ण होगा । उक्त प्रतीति का ज्ञाता “अहं” वाची व्यक्ति
उक्त प्रतीति में स्वयं प्रकाश है, इसलिए उसे उक्त प्रतीति में अन्य के
द्वारा प्रकाशित नहीं कह सकते । व्यक्ति स्वभाव से चैतन्य है, इसलिए
उसमें स्वयं प्रकाशता है । स्वयं प्रकाशता दीपक के समान स्वाभाविक
और स्वायत्त होती है । दीप आदि अपनी प्रकाश शक्ति से ही उद्भासित
होते हैं, दूसरे के प्रभाव से उनमें प्रकाश नहीं होता, अधिक क्या ? वह
स्वयं तो प्रकाशित होते ही हैं, अपनी प्रभा से अन्यों को भी प्रकाशित
करते हैं ।
एतदुक्तं भवति—यथैकमेव तेजोद्रव्यं प्रभा प्रभावद् रूपेण
अवतिष्ठते । यद्यपि प्रभा प्रभावद् द्रव्यगुणभूता, तथापि तेजो
द्रव्यमेव, न शौक्ल्यादिवद् गुणः । स्वाश्रयादन्यत्रापि वर्त्तमानत्वात्
रूपवत्वाच्च शौक्ल्यादिधर्म वैधर्म्यात् प्रकाशवत्वाच्च तेजोद्रव्यमेव
नार्थान्तरम् । प्रकाशवत्वंच स्वस्वरूपस्यान्येषांच प्रकाशकत्वात् ।
अस्यास्तु गुणत्वव्यवहारो नित्यतदाश्रयतवतच्छेषत्व निबंधनः । न
चाश्रयावयवा एव विशीर्णाः प्रचरन्तः प्रभेत्युच्यन्ते, मणिद्युमणि
प्रभृतीनां विनाश प्रसंगात् ।

( ७७ )

कथन यह है कि—जैसे एक ही ज्योति, प्रभा और प्रभावान होती है
वैसे ही आत्मा चित्स्वरूप और चैतन्यता दोनों से संपन्न है। यद्यपि प्रभा
की प्रभावत्ता उसका गुण है, फिर भी है वह ज्योति रूप ही, शुक्लता,
पीतिमा आदि की तरह कोई पृथक् गुण नहीं है। वह ज्योति अपने
आश्रय दीप से दूर रहते हुए भी, अपने रूप में उद्भासित होती है,
शुक्लता आदि गुणों की तरह न होकर, तेजोमय द्रव्य ही रहती है, कुछ
और नहीं। स्वयं को और अपने स्वरूप से दूसरों को प्रकाशित करना ही
उसकी प्रकाशता है। ज्योति को रूपवाली होने से रूप गुण संपन्न कहा
जाता है। प्रभा की आश्रय दीप ज्योति के अवयव जो इधर-उधर फैलते
हैं, उन्हें ही प्रभा कहते हों सो बात नहीं है, यदि ऐसा मानेंगे तो मणि
और सूर्य की तो सत्ता ही न रह जायगी।
दीपेऽप्यवयवि प्रतिपत्तिः कदाचिदपि न स्यात्, न हि विशरण-
स्वभावावयवा दीपादश्चतुरंगुलमात्रं नियमेन पिंडीभूता ऊर्ध्वमुद्गम्य
ततः पश्चाद् युगपदेव तिर्यगूर्ध्वमधश्चैकरूपा विशीर्णाः प्रचरन्तीति
शक्यंवक्तुम्, अतः सप्रभाकाएवदीपाः प्रतिक्षणं उत्पन्ना विनश्यन्तीति
पुष्कलकारणक्रमोपनिपातात् तद् विनाशे विनाशाच्चावगम्यते ।
प्रभायाः स्वाश्रयसमीपे प्रकाशाधिक्यम् औष्ण्याधिक्यम् इत्यादि
उपलब्धि व्यवस्थापि अयमग्न्यादीनां औष्ण्यादिवत्, एवमात्मा
चिद्रूप एव चैतन्यगुण इति, चिद्रूपता हि स्वयं प्रकाशता।
दीप की ज्योति में अवयव अवययी की बात लागू नहीं हो सकती,
और न इसके अवयव फैलने वाले हैं, ऐसा ही कह सकते हैं, क्योंकि दीप
की चार अंगुल वाली ज्योति पहिले ऊपर उठकर प्रायः आड़ी तिरछी
ऊपर नीचे होती हुई भी एक ही प्रकार की बनी रहती है। रुई तेल
आदि वस्तुओं के संयोग से प्रकाशवान दीप, उन वस्तुओं की स्थिति से
सत्तावान तथा उनके विनाश से विनष्ट होते देखे जाते हैं। अग्नि के
सामीप्य में जैसी ऊष्मा की प्रतीति होती है, ज्योति भी, अपने आश्रय दीप
के निकट, वैसी ही ऊष्मा और प्रकाश देती है इसे स्वयं अनुभव करके
जाना जा सकता है। इसी प्रकार आत्मा भी चिद्रूप होता हुआ ही
चैतन्य गुणवाला है, उसकी चिद्रूपता ही स्वयं प्रकाशता है।
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( ७८ )
यथाहि श्रुतयः—“सयथां सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो
रसघन एव, एवं वाअरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन
एव”—विज्ञानघन एव”—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति” “न
विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपोविद्यते”—“अथयोवेदेदं जिघ्राणीति स
आत्मा—“कतम आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः
पुरुषः—‘‘एष द्रष्टा श्रोता रसयिता घ्राता मंता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा
पुरुषः”—‘‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्”—‘‘जानात्येवायं
पुरुषः” “न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्”—‘‘स उत्तमः
पुरुषः” “नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्”—“एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः
षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति”—“तस्माद् वा
एतस्माद् मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः”—इत्याद्याः ।
वक्ष्यतिच “ज्ञोऽत एव” इति ।
श्रुतियाँ भी उक्त विषय का प्रतिपादन करती हैं—“जैसे सेंधे
नमक की डली बाहर से भीतर तक रसघन है, वैसे ही यह आत्मः बाहर
से भीतर तक प्रज्ञानघन (ज्योतिर्मय) है ।” यह विज्ञान घन ही है । यह
पुरुष स्वयं ज्योतिरूप होता है । इस विज्ञाता का विज्ञान कभी लुप्त नहीं
होता । जो ऐसा अनुभव करता है कि सूं घ रहा हूँ वही आत्मा है ।
आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय, प्राणों में स्थित, हृद्यन्तर्ज्योति है ।
वह विज्ञान मय आत्मा ही, मनन करने वाला, कर्त्तव्य निर्धारक, स्वाद
लेने वाला, सूं घने वाला और कर्त्ता है । अरे ! उस विज्ञाता को और
कैसे जानोगे । जो जानता है वही आत्मा है । जो उसे देख लेता है, वह
मृत्यु को नहीं देखता और न रोग तथा दुःखों को भोगता है । वह उत्तम
पुरुष है । उसे जानकर निकटस्थ इस शरीर का भी भान नहीं रहता ।
आत्मदर्शी पुरुष के आश्रित इस सोलह कला वाले पुरुष को प्राप्त कर
तृप्त हो जाता है । इस मनोमय कोष का अन्तरवर्त्ती विज्ञानमय आत्मा
है” इत्यादि । सूत्रकार भी “ज्ञोऽत एव” सूत्र में उक्त तथ्य की ही पुष्टि
करते हैं ।
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( ७१ )
अतः स्वयं प्रकाशोऽयमात्मा ज्ञातैव, न प्रकाशमात्रम्। प्रकाश-
त्वादेव कस्यचिदेव भवेत्प्रकाशः दीपादि प्रकाशवत् तस्मान्नात्मा
भवितुमर्हति संवित्, संविदनुभूतिज्ञानादिशब्दाः संबन्धि शब्दा इति
च शब्दार्थविदः, न हि लोक वेदयोर्जानाति इत्यादेरकर्मकस्याकर्तृ कस्य
च प्रयोगो दृष्टचरः ।
उक्त शास्त्र वाक्यों से ज्ञात होता है कि— स्वयं प्रकाशमय आत्मा
केवल प्रकाश ही नहीं है, ज्ञाता भी है । प्रदीप आदि के प्रकाश की तरह,
इसकी प्रकाशता भी अन्याधीन नहीं है, क्योंकि यह स्वयं प्रकाश है,
इसलिए आत्मा संवित् नहीं हो सकता । शब्द वेत्ताओं का कथन है कि—
संवित्, अनुभूति, ज्ञान आदि शब्द, किसी से संबंध रखने वाले शब्द हैं।
लोक या वेद में कहीं भी “जानता है” इत्यादि पदों का कर्म रहित या
कर्त्ता रहित प्रयोग नहीं देखा जाता ।
यच्चोक्तम्—अजडत्वात् संविदेवात्मेति, तत्रेदं प्रष्टव्यम् अजड-
त्वमिति किमभिप्रेतम् ? स्वसत्ताप्रयुक्तप्रकाशत्वमिति चेत्, तथासति
दीपादिष्वनैकान्त्यम्, संविदतिरिक्तप्रकाशधर्मानभ्युपगमेनासिद्धि-
विरोधश्च । अव्यभिचरितप्रकाशसत्ताकत्वमति सुखादिषु व्यभि-
चारान्निरस्तम् ।
जो यह कहा कि—जड न होने से संवित् ही आत्मा है; उस पर
प्रश्न यह है कि, अजडता से आपका क्या तात्पर्य है ? यदि कहें कि—
स्वयं प्रकाशता ही अजडता है, सो तो दीप आदि अनेकों में विद्यमान
है। जब तक संवित् · से भिन्न, प्रकाश नामक किसी धर्म विशेष को नहीं
मानोगे, तब तक तुम्हारा अभिप्राय सिद्ध नहीं हो सकेगा अपितु विरोध
ही होगा । यदि कहो कि जिसकी कभी भी प्रकाश रहित सत्ता नहीं होती,
वही अजडता है, सो यह बात भी सुख दुःख आदि के विनाश से कट
जाती है ।
यदि उच्येत, सुखादिरव्यभिचरितप्रकाशो अपि अन्यस्मै
प्रकाशमानतया घटादिवज्जडत्वेन अनात्मेति । ज्ञानंवा किं स्वस्मै
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( ८० )

प्रकाशते ? तदपि हि अन्यस्यैवाहमर्थस्य ज्ञातुरवभासते, अहं सुखी-
तिवज्जानाम्यहमिति, अतः स्वस्मै प्रकाशमानत्वरूपजडत्वं संविद्य-
सिद्धम्, तस्मात्स्वात्मानं प्रति स्वसत्तयैव सिध्यन्नजडोऽहमर्थ एवात्मा ।
ज्ञानस्यापि प्रकाशता तत्सम्बन्धायत्ता; तत्कृतमेव हि ज्ञानस्य सुखा-
देरिव स्वाश्रयचेतनंप्रतिप्रकटत्वं इतरंप्रत्यप्रकटत्वं च, अतो न
ज्ञप्तिमात्रमात्मा अपितुज्ञातैवाहमर्थः ।
यदि कहो कि-सुख आदि का निरन्तर होने वाला प्रकाश भी
दूसरे से प्रकाशमान होने से, घट आदि की तरह जड़ है इसलिए वे
अनात्म तत्त्व है । मै पूछता हूँ कि-ज्ञान क्या स्वतः प्रकाशित होता है ?
“मै सुखी हूँ” की तरह “मै जानता हूँ” ऐसी ज्ञानात्मक प्रतीति भी,
“अहं” पद से विख्यात ज्ञाता द्वारा ही उद्भासित होती है । इसलिए
स्वतः प्रकाशता ही संवित् की अजडता है, यह बात असिद्ध हो जाती है ।
अपनी सत्ता से अपने में स्वयं सिद्ध “अहं” पद वाच्य आत्मा ही अजड
है । ज्ञान की प्रकाशता भी उसी से संबद्ध होने से, उसी के अधीन है ।
इसीलिए ज्ञान, सुख आदि की तरह, अपने आश्रय चेतन आत्मा के समक्ष
व्यक्त तथा अन्यों के समक्ष अव्यक्त रहता है । इससे सिद्ध होता है कि
ज्ञान ही आत्मा नही है, अपितु ज्ञान करने वाला “अहं” वाच्य ज्ञाता,
आत्मा है ।
अथ यदुक्तम्-“अनुभूतिः परमार्थतो निर्विषया निराश्रया च
सती भ्रान्त्या ज्ञातृतयाऽवभासते, रजततयेवशुक्तिर्निरधिष्ठान
भ्रमानुपपत्तेः” इति । तदयुक्तम्-तथा सत्यनुभवसामानाधिकरण्ये-
नानुभविताऽहमर्थः प्रतीयेत, अनुभूतिरहमिति पुरोऽवस्थित भास्वर
द्रव्याकारतया रजतादिरिव अत्रतु पृथगवभासमानैवेयमनुभूतिरर्था-
न्तरमहमर्थं विशिनष्टि, दंड इव देवदत्तं, तथा हि अनुभवाम्यहमिति
प्रतीतिः, तदेवमस्मदर्थमनुभूतिविशिष्टं प्रकाशयन्ननुभवाम्यहमिति
प्रत्ययो दंडमात्रे दंडी देवदत्त इति प्रत्ययवद् विशेषणभूतानुभूति-
मात्रावलंबनः कथमिव प्रतिज्ञायेत ?

( ८१ )
और जो यह कहा कि--"सीप जैसे भ्रांतिवश रजत रूप में प्रतीत
होती है, निर्विशेष निराश्रित अनुभूति भी, उसी प्रकार ज्ञाता रूप से
अवभासित होती है।" यह कथन भी असंगत है—ऐसा होने से, सामने
पड़ी हुई समुज्ज्वल सीप में जैसे रजत की अभेद प्रतीति होती है, उसी
प्रकार "अहं" पद वाच्य अनुभावक और अनुभूति दोनों एक प्रतीत होंगे,
अतः अनुभावक भ्रांतिवश यह भी कह सकता है कि "मैं अनुभूति हूँ।"
"अहं" से पृथक् अवभासमान होने से, अनुभूति "अहं" से निश्चित ही
भिन्न है। जैसे कि "दंडी देवदत्तः" कहने से देवदत्त और उसके दंड की
पृथकता स्पष्ट भिन्न प्रतीत होती है, वैसे ही 'मैं अनुभव करता हूँ' ऐसी
प्रतीति होती है। "मैं अनुभव करता हूँ" इस कथन में अनुभूति, "अहं"
पदवाच्य आत्मा की विशेष्य, ज्ञात होती है। ऐसी अनुभूति "अहं" पद
वाच्य आत्मा के विशेषण के रूप से कैसे ज्ञात हो सकती है ?
यदप्युक्तम्—"स्थूलोऽहमित्यादि देहात्माभिमानवत् एव ज्ञातृत्व
प्रतिभासमानात् ज्ञातृत्वमपि मिथ्येति।" तदयुक्तम्—आत्मतया
अभिमतया अनुभूतेरपि मिथ्यात्वं स्यात् तद्वत एव प्रतीतेः सकले-
तरोपमर्दिततत्त्वज्ञानाबाधितत्वेनानुभूतेर्नमिथ्यात्वमिति चेत् हन्तैवं
सति तदबाधादेव ज्ञातृत्वमपि न मिथ्या ।
और जो यह कहा कि—"मैं मोटा हूँ" इत्यादि भान जैसे देहा-
त्माभिमानी व्यक्ति मे ज्ञातृत्वरूप से प्रतिभासित होता है, वैसे ही ज्ञातृता
भी मिथ्या है।" यह कथन भी असंगत है—यदि ऐसा कहोगे तो तुम्हारे
द्वारा आत्मा रूप से मानी हुई अनुभूति भी मिथ्या हो जायगी, और
उसकी प्रतीति भी मिथ्या हो जायगी। यदि कहो कि—समस्त दोषों को
नष्ट करने वाले तत्त्वज्ञान से अनुभूति बाधित नहीं होती इसलिए वह
मिथ्या नहीं है; यदि ऐसी बात है तो, तत्त्वज्ञान से बाधित न होने वाली
ज्ञातृता भी मिथ्या नहीं है।
यदप्युक्तम्—"अविक्रियस्यात्मनो ज्ञानक्रियाकर्तृत्वरूपे ज्ञातृत्वं
न संभवति, अतो ज्ञातृत्वं विक्रियात्मकं जडे विकारास्पदाव्यक्त
परिणामाहंकारग्रन्थिस्थमिति न ज्ञातृत्वमात्मनः अपितु अन्तःकरण
[email protected]

ता आदि दोष घटित हो जावेंगे ।"
Wait, look at "बाह्यदार्थता":
Is it "बाह्यपदार्थता" or "बाह्यदार्थता"?
Look closely at line 14:
"ब" "ा" "ह" "्" "य" "द" "ा" "र" "्" "थ" "त" "ा" -> "बाह्यदार्थता"!
Wait, in line 18: "वाह्यपदार्थता" (with 'व' and 'प'!).
In line 14, it is "बाह्यदार्थता" (misprint for बाह्यपदार्थता, missing 'प')!
Wait, look at line 14 again:
"बाह्यदार्थता" or "वाह्यदार्थता"?
First letter: looks like 'व' or 'ब'?
In line 14: "वाह्यदार्थता" or "बाह्यदार्थता"?
Look at the belly of the letter: in line 14, it's 'व' or 'ब'? No slash inside, but sometimes 'ब' is without slash.
Wait, look at line 18: "वाह्यपदार्थता" - it has 'व'.
Line 14: "वाह्यदार्थता" or "बाह्यदार्थता"?
Wait, look at line 14: "वाह्यदार्थता" -> wait, does it have 'प'? No, it definitely says

( ५३ )
स्वाभाविकमपि वक्ष्यति । अस्य ज्ञानस्वरूपस्यैव मणिप्रभृतीनां प्रभा-
श्रयत्वमिव ज्ञानाश्रयत्वमपि अविरुद्धमित्युक्तम् । स्वयमपरिच्छिन्न-
मेव ज्ञानं संकोचविकासाहंमित्युपपादयिष्यामः ।
कथन यह है कि—देह आदि जैसे दृश्यता परार्थता आदि कारणों
से विपरीत, दृष्टता आदि धर्मों से विवेचित होते हैं वैसे ही अन्तःकरण
रूप अहंकार भी दृश्यता, अचेतनता, परिणामता आदि से उन्हीं कारणों
से विवेचित हो सकता है। दृश्यता और दृष्टता की तरह, ज्ञातृता और
अहंकार की भी एकता नहीं है। जैसे दृश्यता (ज्ञान) अपने कर्म अहंकार
का धर्म नहीं हो सकता वैसे ही ज्ञातृता भी अपने कर्म का धर्म नहीं हो
सकता । और न ज्ञातृता विकारात्मक ही है, अपितु ज्ञान गुणाश्रयता ही
ज्ञातृता है। इस नित्यज्ञातृता का, ज्ञान स्वाभाविक धर्म है, इसलिए
वह भी नित्य है। आत्मा की नित्यता “नात्माश्रुतेः” इत्यादि में तथा
“ज्ञोऽतएव” में ज्ञ के उल्लेख से आत्मा की स्वाभाविक ज्ञान गुणाश्रयता
सूत्रकार ने भी बतलाई है। इसकी ज्ञान स्वरूपता मणि आदि की
स्वाभाविक प्रभा की तरह अविरुद्ध और स्वाभाविक है। ज्ञान स्वयं
निस्सीम होते हुए भी संकोच और विकासशील है, इस तथ्य का उपपादन
आगे करूँगा।
अतः क्षेत्रज्ञावस्थायां कर्मणा संकुचित स्वरूपंतत्तत्कर्मानुगुणतर-
तमभावेनवर्त्तति, तच्चेन्द्रियद्वारेण व्यवस्थितम्, तमिमममिन्द्रियद्वारा
ज्ञानप्रसरमपेक्ष्योदयास्तमयव्यपदेशः प्रवर्त्तते ज्ञानप्रसरे तु कर्त्तृत्वम-
स्त्येव । तच्च न स्वाभाविकम्, अपितु कर्मकृतम् इति अविक्रियस्वरूप
एवात्मा । एवंरूप विक्रियात्मकंज्ञातृत्वं ज्ञानस्वरूपस्यात्मन एवेति न
कदाचिदपि जडस्याहंकारस्य ज्ञातृत्व संभवः ।
क्षेत्रज्ञ ( जीव ) की अवस्था में ज्ञान यथायोग्य कर्म के अनुसार
तारतम्य से रहता है, यह तारतम्य इन्द्रिय द्वारा ही प्रकट होता है,
इन्द्रियों में जो ज्ञान की वृद्धि और क्षीणता होती है वह किसी चेतन वस्तु
की अपेक्षा रखती है, इससे सिद्ध होता है कि—ज्ञान के प्रसार में आत्मा

( ८४ )

की कर्तृता निश्चित है, पर वह कर्तृता आत्मा का स्वाभाविक धर्म नहीं
है, अपितु कर्मानुसार उसके साथ संलग्न है, आत्मा तो निर्विकार ही
है। उक्त प्रकार की विकारात्मक ज्ञातृता ज्ञानस्वरूप आत्मा की ही है,
जड़ अहंकार की ज्ञातृता कभी भी संभव नहीं है ।

जडस्वरूपस्याप्यहंकारस्य चित्संनिधाने न तच्छायापत्या
तत्संभव इति चेत्, केयं चिच्छायापत्तिः ? किमहंकारच्छायापत्तिः
संविदः ? उत् संविच्छायापत्तिरहंकारस्य ? य तावत् संविदः,
संविदि ज्ञातृत्वानभ्युपगमात् । नाप्यहंकारस्य उक्तरीत्या तस्य
जडस्य ज्ञातृत्वायोगात् द्वयोरप्यचाक्षुषत्वाच्च न हि अचाक्षुषाणां
छाया दृष्टा । अथ-अग्नि संपर्कात् अयः पिंड औष्ण्यवत् चित्
संपर्कात् ज्ञातृत्वोपलब्धिरिति । नैतत् संविदि वास्तव ज्ञातृत्वान-
भ्युपगमादेव तत्संपर्कादहंकारे ज्ञातृत्वं तदुपलब्धिर्वा । अहंकारस्यतु
अचेतनस्य ज्ञातृत्वासंभवादेव सुतरां न तत्संपर्कात् संविदि ज्ञातृत्वं
तदुपलब्धिर्वा ।

यदि कहो कि—जड स्वरूप अहंकार का चित् से संपर्क होने से
चित् की छाया पड़ने से अहंकार में ज्ञातृता हो सकती है, तो विचारना
होगा कि यह चित् छाया किसकी है ? अहंकार की छाया संवित् पर
पड़ती है, या संवित् की छाया अहंकार पर पड़ती है ? संवित् की तो
हो नहीं सकती, क्योंकि संवित् में ज्ञातृता आपको ही स्वीकार नहीं है ।
अहंकार की छाया भी संभव नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त नियमानुसार जड़
अहंकार का ज्ञातृता से कोई सम्बन्ध नहीं है । दोनों ही अप्रत्यक्ष वस्तु है,
अप्रत्यक्ष वस्तु की छाया पड़ती देखी नहीं जाती । अग्नि संपर्कित लोहे
की उष्णता की तरह, चित् संपर्क से ज्ञातृता की उपलब्धि होती हो,
सो भी नहीं है; जब संवित् में ही वास्तविक ज्ञातृता का अभाव है तो
उसके संपर्क से अहंकार में ज्ञातृता की उपलब्धि होगी ही कैसे ? जड़
अहंकार में तो ज्ञातृता असंभव ही है, इसलिए उसके संपर्क से संवित् की
ज्ञातृता हो, इसका कोई प्रश्न ही नहीं है ।

[email protected]

( ८५ )
तदप्युक्तम्—"उभयत्र न वस्तुतो ज्ञातृत्वमस्ति । अहंकार-
स्त्वनुभूतेरभिव्यंजकः स्वात्मस्थामेवानुभूतिमभिव्यनक्ति, आदर्शादिवत्
इति । "तदयुक्तम्—आत्मनः स्वयं ज्योतिषो जडस्वरूपाहंकारा-
भिव्यंग्यत्वायोगात् । तदुक्तम्—"शान्तांगार इवादित्यमहंकारो जडा-
त्मकः, स्वयंज्योतिषमात्मानं व्यनक्तीति न युक्तिमत् ।" स्वयं-
प्रकाशानुभवाधीन सिद्धयो हि सर्वेपदार्थाः । तत्र तदायत्तप्रकाशोऽ
चिदहंकारोऽनुदितानस्तमितस्वरूप प्रकाशमशेषार्थसिद्धिहेतुभूतमनु-
भवमभिव्यनक्ति इति आत्मविदः परिहसंति ।
उस पर जो कहो कि—"दोनों मे वास्तविक ज्ञातृता नही है ।
अहकार तो स्वयं अनुभूति का अभिव्यंजक है, जो कि दर्पण आदि की
तरह अपने में ही अनुभूति को अभिव्यक्त करता है ।"
यह भी नितांत असंगत बात है—स्वयं प्रकाश आत्मा, जड स्वरूप
अहंकार से कभी अभिव्यंजित नहीं हो सकता । जैसा कि कहा भी है—
"अग्निरहित अंगारे की तरह जड अहंकार, सूर्य की तरह स्वयं प्रकाश
आत्मा को व्यंजित करता है, यह बात युक्ति संगत नहीं है ।" सारे पदार्थ
स्वयं प्रकाश अनुभव के अधीन सिद्ध हैं । उसका वह स्वाधीन प्रकाश उदय
अस्त रहित जड अहंकार से अभिव्यक्त होता है. इस बात को सुनकर,
आत्मवेत्ता लोग हंसते हैं ।
किं च—अहंकारानुभवयोः स्वभावविरोधात् अनुभूतेरननुभूतित्व
प्रसंगाच्च नव्यङ्क्तृ व्यंग्यभावः यथोक्तम्—
"व्यङ्क्तृव्यंग्यत्वमन्योन्यं न चस्यात् प्रातिकूल्यतः ।
व्यंग्यत्वे अननुभूतित्वमात्मनि स्यात् यथा घटः ॥" इति
न च रविकरनिकराणां स्वाभिव्यंग्यकरतलाभिव्यंग्यत्ववत् संविद्-
भिव्यंग्याहंकाराभिव्यंग्यत्वं संविदस्साधीयः, तथापि रविकर-
निकराणां करतलाभिव्यंग्यत्वाभावात्, करतलप्रतिहतगतयो हि

( ८६ )
रश्मयो बहुलाः स्वयमेव स्फुटतरमुपलभंते, इति तद्बाहुल्यमात्रहेतु-
त्वात् करतलस्य नाभिव्यंजकत्वम् ।
अहंकार और अनुभव के स्वाभाविक विरोध तथा व्यंग्य होने पर
अनुभूति, अनुभूति न रह जायगी, इन दोनों ही बातों से सिद्ध होता है
कि—दोनों में व्यंजक व्यंग्य भाव नहीं है। जैसा कि कहा भी गया है—
‘स्वाभाविक विरोध तथा वैलक्षण्य होने से दोनों में परस्पर व्यंग्य
व्यंजक भाव नहीं है, यदि व्यंग्य भाव होगा तो, घट की तरह, आत्मा
में अनुभूति का अभाव हो जायगा।’
सूर्य किरणें जैसे करतल को अभिव्यक्त करके, स्वयं भी उससे
अभिव्यक्त होती हैं, उसी प्रकार संविद् भी अहंकार को अभिव्यक्त करके
उससे अभिव्यक्त हो, ऐसा भी संभव नहीं है, क्योंकि—सूर्य रश्मियां
करतल से व्यंजित नहीं होतीं, अपितु करतल में प्रतिहत वे रश्मियां,
इधर उधर फैलकर अधिक स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष दीखने लगती हैं, उनकी
विस्तृति के आधार पर ही, करतल को उनकी अभिव्यक्ति का कारण नहीं
कहा जा सकता ।
किं च—अस्य संवित् स्वरूपस्यात्मनोऽहंकारनिर्वर्त्याभिव्यक्तिः
कि रूपा ? न तावदुत्पत्तिः, स्वसिद्धतयाऽनन्योत्पद्यत्वाभ्युपगमात्
नापि तत्प्रकाशनम्, तस्या अनुभवान्तराननुभाव्यत्वात्, ततएव च
न तदनुभवसाधनानुग्रहः । स हि द्विधाज्ञेयस्येन्द्रिसंबंधहेतुत्वेनवा,
यथा जाति निजमुखादिग्रहणे व्यक्ति दर्पणादीनां नयनादीन्द्रिय संबंध-
हेतुत्वेन, बोद्धृगतकल्मषापनयनेन वा, यथा परतत्त्वावबोधन,
साधनस्य शास्त्रस्य शमदमादिना । यथोक्तम्—“करणानामभूमि-
र्त्वान्न तत्संबंध हेतुता” इति ।
इस संवित् स्वरूप आत्मा की अहंकार द्वारा जो अभिव्यक्ति होती
है, उसका क्या रूप है.? वह अभिव्यक्ति, उत्पत्ति रूप है, ऐसा तो कह
नहीं सकते, क्योंकि, स्वयंसिद्धता के आधार पर उसकी किसी अन्य के

( ८७ )

  • द्वारा उत्पत्ति नही हो सकती, ऐसा निर्णय कर चुके है । वह अभिव्यक्ति,
    प्रकाश रूप भी नही हो सकती, क्योकि--संवित् स्वय प्रकाश है, उसे
    प्रकाश मे किसी अन्य की अपेक्षा नही होती । इससे सिद्ध होता है कि--
    ज्ञानानुभूति मे, अहकार द्वारा अभिव्यक्ति की सहायता अपेक्षित नही
    है । सहायता दो ही प्रकार से हो सकती है (१) ज्ञेय की, इन्द्रिय सबंधी
    कारणो से होने वाली, जैसे कि--मनुष्य आदि जाति के जानने के लिए,
    उस जाति के साथ चाक्षुष सबध वाले व्यक्ति द्वारा दी गई अथवा अपनी
    आकृति की जानकारी मे दर्पण की सहायता, (२) ज्ञाता के (हृदयगत)
    दोषों के अपनयन द्वारा दी जाने वाली, जैसे कि--परतत्त्व परमेश्वर को
    बतलाने वाले शास्त्रो से सम्मत, शम दम आदि उपायो द्वारा दी जाने
    वाली सहायता । जैसा कि--कहा गया है--‘‘वह अधोक्षज है (इन्द्रिय
    गम्य नही है) इसलिए इन्द्रियो की उससे कोई सबध हेतुता नही है ।’’
    किंच-अनुभूतेरनुभाव्यत्वाभ्युपगमेऽप्यहमर्थेन न तदनुभव साध-
    नानुग्रहः सुवचः, स हि अनुभाव्यानुभवोत्पत्तिप्रतिबंधनिरसनेन
    भवेत् । यथा रूपादिग्रहणोत्पत्तिनिरोधितमसनिरसनेन चक्षुषो
    दीपादिना । न चेह तथाविधं निरसनीयं संभाव्यते । न तावत्सविदा-
    त्मगतं तज्ज्ञानोत्पत्तिनिरोधि किंचिदप्यहंकारापनेयमस्ति ।
    अस्तिहि अज्ञानमिति चेत्, न अज्ञानस्याहंकारापनोद्यत्व अनभ्यु-
    पगमात् । ज्ञानमेव हि अज्ञानस्य निवर्त्तकम् ।
    अनुभूति की अनुभाव्यता मान लेने पर भी, अहकार को, अनुभूति
    का सहयोगी साधक नही कहा जा सकता । ऐसा तो तभी सभव है,
    जब कि--अनुभाव्य के, अनुभवोत्पत्ति के अन्य प्रतिबन्धकों का, निराकरण
    कर दिया जाय । जैसे कि--प्रदीप आदि का आलोक, रूप आदि प्रत्यक्ष
    के विरोधी घने अधकार का निराकरण कर, नेत्रों का सहायक होता है ।
    अनुभूति की अभिव्यक्ति में उस प्रकार के निवारण की संभावना ही
    नही है, अर्थात् ज्ञानस्वरूप आत्मा की ज्ञान प्रतिबन्धक ऐसी कोई वस्तु
    नहीं हैं, जिसे अहंकार दूर कर सके यदि कहो कि-अज्ञान, ज्ञान का
    प्रतिबंधक है; सो अज्ञान का निराकरण, अहंकार से हो नहीं सकता ।
    [email protected]

( ८८ )

ज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो सकता है, अज्ञान, ज्ञान का निवर्त्तक
नहीं है।
न च संविदाश्रयत्वमज्ञानस्य सम्भवति, ज्ञानसमानाश्रयत्वात्-
त्समानविषयत्वाच्च ज्ञातृभाव विषयभाव विरहिते, ज्ञानमात्रेसाक्षिणि
नाज्ञानं भवितुमर्हति । यथा ज्ञानाश्रयत्वप्रसक्तिशून्यत्वेन घटादेर्ना-
ज्ञानाश्रयत्वम् तथा ज्ञानमात्रेऽपि ज्ञानाश्रत्वाभावेन नाज्ञानाश्रयत्वं
स्यात् । संविदोऽज्ञानाश्रयत्वाभ्युपगमेऽपि आत्मतयाऽभ्युपगतायास्त-
स्याज्ञानविषयत्वाभावेन ज्ञानेन न तद्गता ज्ञान निवृत्तिः । ज्ञानं
हि स्वविषय एवाज्ञानं निवर्त्तयति, यथारज्ज्वादौ, अतो न केनापि
कदाचित्संविदाश्रयमज्ञानमुच्छिद्येत् । अस्य च सदसदनिर्वचनीय-
स्याज्ञानस्य स्वरूपमेव दुर्निरूपमित्युपरिष्टाद् वक्ष्यते । ज्ञान प्रागभाव
रूपस्यचाज्ञानस्य ज्ञानोत्पत्ति विरोधित्वाभावेन न तन्निरसनेन
तज्ज्ञानसाधनानुग्रहः अतो न केनापि प्रकारेण अहंकारेणानुभूतेर-
भिव्यक्तिः ।
और न; संविद्, अज्ञान का आश्रय हो सकता है, क्योंकि— अज्ञान
के आश्रय और विषय, ज्ञान के समान ही होते हैं। ज्ञातृता और विषय-
भाव रहित, साक्षि स्वरूप शुद्ध ज्ञान में, अज्ञान का प्रवेश हो ही नहीं
सकता । जैसे ज्ञानाश्रयता की संभावना से शून्य घट आदि में अज्ञान
का आश्रय नहीं होता, वैसे ही ज्ञानाश्रय की संभावना से रहित अज्ञान
के आश्रय में, ज्ञान की संभावना भी नहीं है। संविद् को अज्ञान का
आश्रय मान भी लें, पर संवित् को ही जब आत्मा मान चुके हो, इस
लिए संवित् कभी ज्ञान का विषय ( ज्ञेय ) तो हो नहीं पावेगा, जिसके
फलस्वरूप, संवित् के आश्रित अज्ञान की निवृत्ति का होना कठिन हो
जायगा ( क्योंकि—ज्ञेय वस्तु ही, स्वाश्रित भ्रांति रूप अज्ञान की निवारक
होती है ) ज्ञान ही स्वविषयक अज्ञान की निवृत्ति करता है, जैसे कि—
रज्जु में हुई सर्प की भ्रांति की निवृत्ति स्वतः ज्ञान से ही होती है।
इस प्रकार अज्ञान को ज्ञानाश्रित मान लेने पर, कभी भी, किसी उपाय
से ज्ञानाश्रित उस अज्ञान की निवृत्ति न हो सकेगी। सद् असद् अनिर्वच-
[email protected]

( ५६ )

नीय अज्ञान के स्वरूप का निरूपण दुर्बोध है, इसे आगे बतलावेंगे।
ज्ञान के प्रागभाव रूप अज्ञान को ज्ञानोत्पत्ति का प्रतिबंधक नही कह
सकते, इसलिए अज्ञान द्वारा ज्ञान का निराकरण भी साध्य नही है।
इसलिए किसी भी प्रकार अहंकार को, अनुभूति का अभिव्यंजक नही
कह सकते।
न च स्वाश्रयतयाभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यंजकानां स्वभावः,
प्रदीपादिष्वदर्शनात्। यथावस्थितपदार्थ प्रतीत्यनुगुणस्वाभाव्याच्च
ज्ञानतत्साधनयोरनुग्राहकस्य च। तच्च स्वतः प्रामाण्य न्यायसिद्धम्।
यह भी नही कह सकते कि—अभिव्यंजक पदार्थों का यह स्वा-
भाविक गुण है कि, वे, स्वाश्रित अभिव्यंग्य वस्तु की ही अभिव्यक्ति
करते है। प्रदीपादि मे तो ऐसा गुण देखा नही जाता। ज्ञान और ज्ञान
की साधक अनुकूल वस्तुओ का तो ऐसा स्वाभाविक गुण होता है कि,
वह, यथार्थवस्तु की प्रतीति मे सहायक होती है। यह, स्वतः प्रामाण्य की,
न्यायसिद्धबात है।
न च दर्पणादि मुखादेरभिव्यंजकः, अपितु चाक्षुषतेजः प्रति
फलं न रूपदोष हेतुः, तद्दोषकृतश्च तत्रान्यथावभासः। अभिव्यंजकस्तु
आलोकादिरेव।
और न दर्पण आदि, मुख आदि के अभिव्यंजक है, अपितु चाक्षुष
तेज ही उस अभिव्यक्ति का कारण है, यदि नेत्र की ज्योति मे किसी
प्रकार की विकृति होती है, तो विपरीत अवभास होता है। मुखादि के
अभिव्यंजक तो आलोक आदि ही है।
न चेह तथाऽहंकारेण संविदि स्वप्रकाशायां तादृशदोषोपपादनं
संभवति। व्यक्तेस्तु जातिराकार इति तदाश्रयतया प्रतीतिः, नतु
व्यक्ति व्यंग्यत्वात्। अतोऽन्त.करणभूताहंकारस्थतया स वि दुपलब्धेर्व-
स्तुतो दोषतो वा न किंचिदिह कारणमिति, नाहंकारस्य ज्ञातृत्वं
तथोपलब्धिर्वा। तस्मात्स्वत एव ज्ञातृतया सिद्ध्यन्नहमर्थ एव प्रत्य-
गात्मा, न ज्ञप्तिमात्रम्। अहम्भावविनिगमे तु ज्ञप्तेरपि न प्रत्यक्त्व-
सिद्धिः इत्युक्तम्।

( ६० )
स्वयं प्रकाश संविद् मे, अहंकार के द्वारा उस प्रकार के दोष का
उपपादन संभव नही है। जाति या आकार व्यक्तिगत वस्तु है, जिससे
उसकी तदाश्रित प्रतीति होती है, व्यक्ति द्वारा उसकी अभिव्यक्ति नही
होती। इसी प्रकार अन्तःकरण भूत अहंकार मे स्थित होने से संवित्
की उपलब्धि, वस्तुगत या दोष हेतुक नही है, क्योकि—अहंकार में स्वयं
ही ज्ञातृता और उस प्रकार की उपलब्धि का अभाव है। इसलिए स्वयं
ज्ञातृरूप से प्रसिद्ध "अहं" पदवाच्य ही जीवात्मा है, "अहं" का अर्थ
केवल ज्ञप्ति नही है। अहं भाव के अभाव मे तो ज्ञप्ति की भी जीवात्मता
सिद्ध नही हो सकती।
तमोगुणाभिभवात् परागर्थानुभवाभावाच्चाहमर्थस्य विविक्त
स्फुट प्रतिभासाभावेऽप्याप्रबोधादहमित्येकाकारेणात्मनः स्फुरणात्
सुषुप्तावपि नाहम्भावविगमः। भवदभिमता या अनुभूतेरपि तथैव
प्रथेति वक्तव्यम् ।
सुषुप्ति अवस्था मे तमोगुण से अभिभूत होने तथा किसी भी
बाह्य पदार्थ की प्रतीत न होने से, अहम्भाव की सुस्पष्ट प्रतीति नही होती
यह दूसरी बात है, पर अहं का एकदम लोप ही हो जाता हो, ऐसा नही
है, जागरण होने तक अह आकार वाली आत्मस्फूर्त्ति रहती है। तुम्हे
भी स्वाभिमत ( आत्मारूप से स्वीकृत ) अनुभूति के ऐसे स्फुरण को
स्वीकारना होगा।
न हि सुप्तोत्थितः काश्चिदहंभाववियुक्ताथर्न्तरप्रत्यनीकाकारा
ज्ञप्तिरहमज्ञानसाक्षितयाऽवतिष्ठत इत्येवंविधां स्वापसमकालानुभूतिं
परामृशति। एवं हि सुप्तोत्थितस्य परामर्शः सुखमहमस्वाप्समिति
अनेन प्रत्यवमर्शेन तदानीमप्यहमर्थस्यैवात्मनः सुखित्वं ज्ञातृत्वं च
ज्ञायते।
कोई भी व्यक्ति सोकर उठने पर ऐसा नहीं सोचता कि—"अहं-
भाव या अन्य पदार्थों के सम्बन्ध से रहित हूं" अर्थात् ज्ञातृ ज्ञेय आदि
विशेष भावों से रहित, ज्ञान स्वरूप वाला मैं, अज्ञान के साक्षी रूप से

( ६१ )

सो रहा था । अपितु सोकर उठा हुआ व्यक्ति, यही कहता है कि—"मैं
बडे सुख से सोया ।" जागने वाले व्यक्ति की इस प्रतीति के आधार पर
निश्चित होता है कि—निद्राकाल में भी अहं पदवाची आत्मा की सुख
प्रतीति और ज्ञातृता विद्यमान रहती है ।
न च वाच्यम्, यथेदानीं सुखंभवति, तथा तदानीमस्वाप्स-
मित्येष!प्रतिपत्तिरिति, अतद्रूपत्वात्प्रतिपत्तेः । न चाहमर्थस्यात्मनो-
ऽस्थिरत्वेन तदानीमहमर्थस्य सुखित्वानुसंधानानुपपत्तिः, यतः
सुषुप्तिदशायां प्रागनुभूतंवस्तु सुप्तोत्थितो—"मयेदंकृतं मयेदमनुभूतम-
हमेतदवोचम्" इति परामृशति "एतावंतंकालं न किंचिदहमज्ञा-
सिषम्" इति च परामृशतीति चेत्; ततः किम् ? न किंचिदिति-
कृत्स्न प्रतिषेध इति चेत् न, नाहमवेदिषमितिवेदितुरहमर्थस्यैवानुवृत्तेः
वेद्यविषयो हि स प्रतिषेधः । न किंचिदिति निषेधस्य कृत्स्न विषयत्वे
भवदभिमतानुभूतिरपि प्रतिषिद्धास्यात् । सुसुप्तिसमयेत्वनुसंधीय
मानमहमर्थमात्मानं ज्ञातारमहमिति परामृश्य न किंचिदवेदिषमिति
वेदने तस्य प्रतिषिध्यमाने तस्मिन काले निषिध्यमानाया वित्तोः
सिद्धिमनुवर्त्तमानस्य ज्ञातुरहमर्थस्य चासिद्धिमनेनैव "न किंचिद-
हमवेदिषम्" इति परामर्शेन साधयंस्तमिममर्थ देवानामेव साधयतु ।
यह नहीं कह सकते कि—जागरित अवस्था में जैसा सुख होता है,
वैसा निद्रा अवस्था में भी हुआ होगा, ऐसी अनुभूति मात्र होती है
( स्मृति नहीं ) सो यह प्रतीति का स्वरूप नहीं है, ( स्मृति का ही है )
और न यही कह सकते हैं कि--अहं पदार्थ आत्मा ही जब क्षणभगुर है,
तब जागने के बाद उसे सुख की स्मृति हो ही कैसे सकती है ? सो सोकर
उठा हुआ व्यक्ति सोने के पूर्व जिन वस्तुओं की अनुभूति किये रहता है,
उन्हें ही "मैंने ही अमुक कार्य किया था--मैंने ऐसा अनुभव किया था—
मैंने ही अमुक बात कही थी" विचार करता है । यदि कहो कि-"मैंने अब
तक कुछ भी नहीं जाना" ऐसा परामर्श भी तो करता है तो क्या इस
परामर्श से उक्त परामर्श की बात कट जायगी ? यदि कहो कि "मैंने अब
[email protected]

( १२ )
तक कुछ भी नहीं जाना'' इस परामर्श का तात्पर्य "कुछ नही जानता"
ऐसा निषेधात्मक है, सो बात नहीं है, अपितु उक्त परामर्श करने वाला
ज्ञाता, अहं पदार्थ की ही अनुवृत्ति है, इसलिए उक्त परामर्श केवल ज्ञेय
विषयक ही है, सर्वविषयक नहीं । सर्वविषयक मानने से तो तुम्हारी
अभिमत अनुभूति का ही प्रतिषेध हो जायगा । अर्थात् सुषुप्ति के समय
ज्ञाता आत्मा को अहं पद वाची मानकर "मैने कुछ नही जाना" इस
परामर्श से यदि उसी अह पदार्थ का प्रतिषेध स्वीकारोगे तो तुम्हारे
स्वाभिमत निराकृत ज्ञान के अनुगत अनुभूति स्वरूप आत्मा का भी
प्रतिषेध हो जायगा आपका उक्त कथन तो ( मिट्टी के ) देवताओ के
समक्ष ही शोभित हो सकता है ( जो कि—उत्तर नही दे सकते)
मामप्यहं न ज्ञातवानित्यहमर्थस्यापि तदानीमननुसंधानं प्रतीयत
इति चेत्, स्वानुभवस्ववचनयोर्विरोधमपि न जानंति भवन्तः ।
अहं मा न ज्ञातवानितिहि अनुभववचने । मामिति किं निषिध्यत इति
चेत्, साधुपृष्टं भवता । तदुच्यते-अहमर्थस्य ज्ञातुरनुवृत्तेर्न स्वरूपं
निषिध्यते, अपि तु प्रबोध समयेऽनुसंधीयमानस्य अहमर्थस्य वर्णा-
श्रमादि विशिष्टता । अहं मां न ज्ञातवानित्युक्ते विषयोविवेचनीयः ।
जागरितावस्थानुसंहितजात्यादिविशिष्टो अस्मदर्थो मामित्यंशस्य
विषयः । स्वाप्यावस्थाप्रसिद्धाविशदस्वानुभवैकतानश्चाहमर्थोऽ-
हमित्यंशस्य विषयः । अत्र सुप्तोऽहं ईदृशोऽहमिति च मामपि न
ज्ञातवानहमित्येव खल्वनुभवप्रकारः ।
यदि कहो कि—सुषुप्ति के समय "अपने को भी मै नही जान
सका" इस कथन मे तो अह पदार्थ आत्मा की प्रतीति का अभाव भी
प्रतीति होता है ? ( उत्तर ) वाह ! आप अपने अनुभव और उक्ति के
विरोध को भी नही समझते, "मै अपने को भी न जान सका" इस कथन
में अनुभव और उसकी अभिव्यंजक उक्ति ही है ( अर्थात् यदि अहं पदार्थ
आत्मा न होता तो "न जान सका" ऐसी अनुभूति की बात कैसे कहता )
यदि कहो कि—फिर "माम्" से किसका निषेध किया गया है ? (उत्तर)
यह तो आपने अच्छा प्रश्न किया ? सुनिये—सुषुप्ति दशा में अहं पद

( ६३ )

वाच्य ज्ञाता की अनुवृत्ति रहती है, इसलिए उसके स्वरूप का निषेध नहीं
हो सकता, अपितु जागरित दशा में वर्णाश्रम आदि विशेष धर्मों की जो
प्रतीति होती है, सुषुप्ति में उन्हीं का अभाव हो जाता है। "मैं स्वयं को
न जान सका" इस उक्ति का विषय विवेचनीय है। जागरितावस्था में
अनुभूत जाति वर्णाश्रम आदि धर्म युक्त अहं पदवाच्य आत्मा ही "माम्"
अंश का विषय है, तथा निद्रावस्था में प्रसिद्ध अस्फुट अनुभवमात्रगम्य
"अहं" पदार्थ ही "अहं" अंश का विषय है। इसलिए उक्त उक्ति में
"मैं सोया", मैं ऐसा हूँ, "मुझे भी भान न हुआ" इतने प्रकार के अनुभव
निहित है।
किंच सुषुप्तावात्माऽज्ञानसाक्षित्वेनास्त इति हि भवदीया
प्रक्रिया। साक्षित्वंच साक्षाज्ज्ञातृत्वमेव। न हि अजानतः साक्षित्वम्।
ज्ञातैव हि लोकवेदयोः साक्षीति व्यपदिश्यते, न ज्ञानमात्रम्।
स्मरति च भगवान् पाणिनिः "साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्" इति साक्षा-
ज्ज्ञातर्येव साक्षिशब्दम्। स चायं साक्षी जानामीति प्रतीयमानोऽस्मदर्थ
एवेति कुतस्तानीमहमर्थो न प्रतीयेत। आत्मने स्वयमवभासमानो
ऽहमित्येवावभासत इति स्वाप्याद्यवस्थास्वप्यात्मा प्रकाशमानो
ऽहमित्येवावभासत इति सिद्धम्।
आत्मा सुप्तावस्था में अज्ञान के साक्षी के रूप में रहता है ऐसा
आपको अभिमत है। साक्षात् ज्ञातृत्व ही साक्षित्व है, अज्ञातवस्तु का
साक्षित्व संभव नहीं है। ज्ञातवस्तु को ही लोक और वेद में साक्षी कहा
जाता है, केवल ज्ञान को साक्षी नहीं कहते। जैसा कि भगवान पाणिनि
"साक्षाद् दृष्टरि संज्ञायाम्" सूत्र में साक्षात् दृष्टा की साक्षी का ही
निर्देश करते हैं। "मैं जानता हूँ" ऐसी प्रतीति रूप साक्षी अस्मत् पदार्थ
(आत्मा) के अतिरिक्त किसी और की नहीं है, इसलिए सुप्तावस्था में
"अहं" अर्थ की प्रतीति क्यों न होगी ? स्वयं प्रकाशमान आत्मा "अहं"
रूप में ही अवभासित होता है, सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में, सोने वाला
आत्मा, प्रकाशमान "अहं" के रूप में ही अवभासित होता है।
यत्तु मोक्षदशायां अहमर्थो नानुवर्त्तते इति, तदपेशलम्। तथा
सत्यात्मनाशएवापवर्गः प्रकारान्तरेण प्रतिज्ञातः स्यात्। न च
[email protected]

( ६४ )
अहमर्थो धर्ममात्रम्, येन तद्विगमेप्यविद्यानिवृत्ताविव स्वरूप-
मवतिष्ठेत । प्रत्युत स्वरूपमेवाहमर्थ आत्मनः ज्ञानं तु तस्य धर्मः,
“अहं जानामि, ज्ञानं मे जातम्” इति चाहमर्थधर्मतया ज्ञान-
प्रतीतिरेव ।
मोक्षदशा में अहं अर्थ की अनुवृत्ति नहीं होती; यह भी रुखाई की
बात है। ऐसा कहना तो प्रकारान्तर से आत्मविनाश को ही मोक्ष मानना
है। अहं अर्थ केवल धर्म ही नहीं है जो, अविद्या की तरह, अहंभाव के
अपगम हो जाने पर भी, आत्मा के शुद्ध स्वरूप में स्थित रहा आवे;
अपितु अहं पदार्थ आत्मा का ही स्वरूप है, ज्ञान ही उसका धर्म है।
“मैं जानता हूँ” मुझे ज्ञान हो गया” इत्यादि प्रतीतियाँ, अहं अर्थ आत्मा
के धर्म स्वरूप ज्ञान की ही हैं।
अपि च यः परमार्थतो भ्रान्त्या वाऽध्यात्मिकादि दुःखैर्दुःखितया
स्वात्मानमनुसंधत्ते “अहं दुःखी” इति। सर्वमेतद् दुःखजातमपुनर्भव-
मपोह्य “कथमहमनाकुलः स्वस्थो भवेयम्” इति उत्पन्नमोक्षरागः स
एव तत्साधने प्रवर्त्तते । स साधनानुष्ठानेन “यदि अहमेव न भवि-
ष्यामि” इत्यवगच्छेत्, अपसर्पेदेवासौ मोक्षकथा प्रस्तावात् । ततश्चा-
धिकारिविरहादेव सर्वं मोक्षशास्त्रमप्रमाणंस्यात् ।
तदहमुपलक्षितं प्रकाशमात्रमपवर्गेऽवतिष्ठत इति चेत्; किमनेन ?
मयिनष्टेऽपि किमपि प्रकाशमात्रमपवर्गेऽवतिष्ठत इतिमत्वा न हि
कश्चित् बुद्धिपूर्वककारी प्रयतते । अतोऽहमर्थस्यैव ज्ञातृतया सिध्यतः
प्रत्यगात्मत्वम् । स च प्रत्यगात्मा मुक्तावप्यहमित्येव प्रकाशते
स्वस्मै प्रकाशमानत्वात्, यो यः स्वस्मै प्रकाशते स सर्वोऽहमित्येव
प्रकाशते, यथा तथावभासमानत्वेनोभयवादि सम्मत सं सार्यात्मा ।
यः पुनरहमिति न चकास्ति, नासौ स्वस्मै प्रकाशते, यथा घटादिः ।
स्वस्मै प्रकाशते चायं मुक्तात्मा, तस्मादहमित्येव प्रकाशते ।
[email protected]