श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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ज्ञान ही अज्ञान का निवर्त्तक हो सकता है, अज्ञान, ज्ञान का निवर्त्तक
नहीं है।
न च संविदाश्रयत्वमज्ञानस्य सम्भवति, ज्ञानसमानाश्रयत्वात्-
त्समानविषयत्वाच्च ज्ञातृभाव विषयभाव विरहिते, ज्ञानमात्रेसाक्षिणि
नाज्ञानं भवितुमर्हति । यथा ज्ञानाश्रयत्वप्रसक्तिशून्यत्वेन घटादेर्ना-
ज्ञानाश्रयत्वम् तथा ज्ञानमात्रेऽपि ज्ञानाश्रत्वाभावेन नाज्ञानाश्रयत्वं
स्यात् । संविदोऽज्ञानाश्रयत्वाभ्युपगमेऽपि आत्मतयाऽभ्युपगतायास्त-
स्याज्ञानविषयत्वाभावेन ज्ञानेन न तद्गता ज्ञान निवृत्तिः । ज्ञानं
हि स्वविषय एवाज्ञानं निवर्त्तयति, यथारज्ज्वादौ, अतो न केनापि
कदाचित्संविदाश्रयमज्ञानमुच्छिद्येत् । अस्य च सदसदनिर्वचनीय-
स्याज्ञानस्य स्वरूपमेव दुर्निरूपमित्युपरिष्टाद् वक्ष्यते । ज्ञान प्रागभाव
रूपस्यचाज्ञानस्य ज्ञानोत्पत्ति विरोधित्वाभावेन न तन्निरसनेन
तज्ज्ञानसाधनानुग्रहः अतो न केनापि प्रकारेण अहंकारेणानुभूतेर-
भिव्यक्तिः ।
और न; संविद्, अज्ञान का आश्रय हो सकता है, क्योंकि— अज्ञान
के आश्रय और विषय, ज्ञान के समान ही होते हैं। ज्ञातृता और विषय-
भाव रहित, साक्षि स्वरूप शुद्ध ज्ञान में, अज्ञान का प्रवेश हो ही नहीं
सकता । जैसे ज्ञानाश्रयता की संभावना से शून्य घट आदि में अज्ञान
का आश्रय नहीं होता, वैसे ही ज्ञानाश्रय की संभावना से रहित अज्ञान
के आश्रय में, ज्ञान की संभावना भी नहीं है। संविद् को अज्ञान का
आश्रय मान भी लें, पर संवित् को ही जब आत्मा मान चुके हो, इस
लिए संवित् कभी ज्ञान का विषय ( ज्ञेय ) तो हो नहीं पावेगा, जिसके
फलस्वरूप, संवित् के आश्रित अज्ञान की निवृत्ति का होना कठिन हो
जायगा ( क्योंकि—ज्ञेय वस्तु ही, स्वाश्रित भ्रांति रूप अज्ञान की निवारक
होती है ) ज्ञान ही स्वविषयक अज्ञान की निवृत्ति करता है, जैसे कि—
रज्जु में हुई सर्प की भ्रांति की निवृत्ति स्वतः ज्ञान से ही होती है।
इस प्रकार अज्ञान को ज्ञानाश्रित मान लेने पर, कभी भी, किसी उपाय
से ज्ञानाश्रित उस अज्ञान की निवृत्ति न हो सकेगी। सद् असद् अनिर्वच-
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