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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४४ )
तदिदमनाकलितानुभवविभवस्य स्वमतिविजृम्भितम्, अनु-
भूतिव्यतिरेकिणो विषयधर्मस्य प्रकाशस्य रूपादिबदनुपलब्धेः
उभयाभ्युपेतानुभूत्यैवाशेषव्यवहारोपपत्तौ प्रकाशस्य धर्मकल्पना-
नुपपत्तेश्च । अतो नानुभूतिरनुमीयते, नापि ज्ञानान्तरसिद्धा, अपितु
सर्वं साधयन्त्यनुभूतिः स्वयमेव सिद्ध्यति । प्रयोगश्च अनुभूतिरन्या-
धीनस्वधर्मव्यवहाराः, स्वसंबन्धादर्थान्तरे तद्धर्मव्यवहारहेतुत्वात्,
यः स्वसंबन्धादर्थान्तरे यद्धर्मव्यवहारहेतुः, स तयोः स्वस्मिन्ननन्या-
धीनो दृष्टः, यथा रूपादिश्वाक्षुषत्वादौ । रूपादिर्हि पृथिव्यादौ स्व-
संबन्धाच्चाक्षुषत्वादि जनयन् स्वस्मिन् न रूपादि संबन्धाधीनश्चाक्षु-
षत्वादौ, अतोऽनुभूतिरात्मनः प्रकाशमानत्वे प्रकाशत इति व्यवहारे
च स्वयमेव हेतुः ।
उक्त प्रकार की आपत्तियां, अनुभूति के महत्व को न जानने वालों
की मनगढन्त कल्पनामात्र हैं । अनुभूति से भिन्न, स्थूल विषयों की, रूप
आदि धर्मों से जैसी अभिव्यक्ति होती है, वैसी उपलब्धि अनुभूति की
तो होती नही। यदि (वादी-प्रतिवादी) दोनों की अनुभूति चिन्तन
के आधार पर ही सारे व्यवहारों की सिद्धि हो जायतो विषय प्रकाशक
नामक अतिरिक्त धर्म कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ? अनुभूति
का अनुमान नहीं किया जा सकता और न किन्ही अन्य प्रकार के ज्ञान
से ही उसे सिद्ध किया जा सकता है, अपितु सभी व्यवहारों की साधिका
अनुभूति स्वयं सिद्ध वस्तु है । इसके लिए ऐसा कहा जा सकता है
कि—अनुभूति अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति में किसी अन्य के अधीन नहीं
है, अनुभूति तो अपने से संबद्ध अन्य विषयों के व्यवहार की कारण है ।
जो अन्य विषयों के व्यवहार का हेतु है, वह अपने धर्म और व्यवहार में
दूसरे के अधीन नहीं हो सकती। जैसे कि—श्वेत पीत आदि रूप, जो
स्वसंबंधी पृथिवी आदि का चाक्षुष प्रत्यक्ष कराते हैं, वे स्वयं किसी
पृथक् कारणों की अपेक्षा नहीं करते । इससे सिद्ध होता है कि—
अनुभूति स्वयं प्रकाश होने से, “प्रकाशते” इस व्यवहार की स्वयं ही
कारण है ।

( ४५ )
सेयं स्वयंप्रकाशाऽनुभूतिर्नित्या च, प्रागभावाद्यभावात् ।
तदभावश्च स्वतस्सिद्धत्वादेव । न हि अनुभूतेः स्वतस्सिद्धायाः
प्रागभावः स्वतोऽन्यतो वाऽवगन्तुं शक्यते । अनुभूतिः स्वाभावमवग-
मयन्ती, सती तावन्नावगमयति । तस्याः सत्त्वे विरोधादेव तदभावो
नास्तीति कथं सा स्वाभावमवगमयति ? एवमसत्यपि नावगमयति,
अनुभूतिः स्वयमसती स्वाभावे कथं प्रमाणं भवेत् । नाप्यन्यतोऽव-
गन्तुं शक्यते, अनुभूतेरनन्यगोचरत्वात् । अस्याः प्रागभावे साधयत्
प्रमाणम् “अनुभूतिरियम्” इति विषयीकृत्य तदभावं साधयेत् ।
स्वतस्सिद्धत्वेन इयमिति विषयीकारानर्हत्वात्, न तत्प्रागभावोऽन्यतः
शक्यावगमः, अतो अस्याः प्रागभावाभावात् उत्पत्तिर्न शक्यते
वक्तुम् इति, उत्पत्ति प्रतिबद्धाश्चान्येऽपि भावविकारास्तस्या न
सन्ति ।
ऐसी स्वयं प्रकाशा अनुभूति नित्या है क्योंकि इसमें प्रागभाव आदि
अभावों का अभाव है। यह स्वतः सिद्ध है, इसीलिए इसमें किसी प्रकार
के अभाव नहीं हैं। स्वतः सिद्ध अनुभूति का प्रागभाव,स्वयं यां किसी अन्य
साधन से जाना नहीं जा सकता। अनुभूति अपने अभाव को जानती हुई
भी स्वयं उतना नहीं जानती । क्योंकि, अनुभूति के अस्तित्व में तो उसका
अभाव रहता नहीं,इसलिए वह अपने अभाव को जाने भी कैसे? इसी प्रकार
वह अपने अनस्तित्व को भी नहीं जान सकती। अनुभूति जब स्वयं
अस्तित्व हीन होती है उस समय अपने अभाव को प्रमाणित भी कैसे कर
सकती है ? उसके अभाव को किसी अन्य साधन से भी नहीं जान सकते,
क्यों कि-अनुभूति किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है । कोई भी प्रमाण इसके प्राग-
भाव को बतलाने के प्रथम “वह अनुभूति है” ऐसा अस्तित्व का अनुभव करके
ही उसका अभाव बतला सकता है; पर जो स्वयं सिद्ध वस्तु है, उसे “यह”
कहकर संबोधित करना भी शक्य नहीं है । इसलिए अनुभूति के प्रागभाव
को अन्य किसी भी प्रमाण से प्रमाणित नहीं कर सकते । इस प्रकार जब
इसका प्रागभाव ही नहीं सिद्ध होता, तो इसकी उत्पत्ति की बात भी कैसे
कही जा सकती है, और जब इसकी उत्पत्ति असिद्ध हो जाती है, तब अन्य

( ४६ )

(वृद्धिक्षय आदि) होने वाले विकार भी इसमें नहीं है यह भी निश्चित
बात है ।
अनुत्पन्नेयमनुभूतिरात्मनि नानात्वमपि न सहते, व्यापक-
विरुद्धोपलब्धेः । न हि अनुत्पन्नं नानाभूतं दृष्टम् । भेदादे. ।मनुभा-
व्यत्वेन च रूपादेरिवानुभूतिधर्मत्वं न संभवति, अतोऽनुभूतेरनुभव-
स्वरूपत्वादेवान्योऽपि कश्चिदनुभाव्यो नास्या धर्मः यतो निद्धू ्तनि-
खिलाभेदा संवित् । अतएव नास्याः स्वरूपातिरिक्त आश्रयो ज्ञाता
नाम कश्चिदस्तीति स्वप्रकाशरूपा सैवात्मा अजडत्वाच्च । अना-
त्मत्वव्याप्तं जडत्वं संविदि व्यावर्तमानमनात्मत्वमपि हि संविदि
व्यावर्तयति ।
जन्म रहित यह अनुभूति अपने मे अनेकता भी नही सह सकती' क्योकि
अनेकता होने से उसकी व्यापक उपलब्धि से विरुद्धता होती है । जन्म
रहित वस्तु की अनेकता देखी भी नही जाती । अनुभव से होने वाले
भेद आदि की, रूप रस आदि की

( ४७ )
पिण्डात्माभिमानवत् ज्ञातृत्वमपि अध्यस्तम् । ज्ञातृत्वं हि ज्ञानक्रिया-
कर्तृत्वम्, तच्च विक्रियात्मकं जडं विकारिद्रव्याहंकारग्रन्थिस्थम्
अविक्रिये साक्षिणि चिन्मात्रात्मनि कथमिव संभवति ?
(शं०- "मैं जानता हूं" ऐसी ज्ञातृता तो प्रतीति सिद्धा है (फिर कैसे
कहते हैं कि-अनुभूति स्वयं सिद्ध वस्तु है, किसी अन्य से ज्ञेय नहीं है ?)
(समाधान) बात ऐसी नहीं है सीप के टुकड़े में जैसी चांदी की भ्रांति
होती है, वैसी ही" मैं जानता हूं" इस प्रतीति में आत्मज्ञान की भ्रांति
होती है । आत्मा में स्वतंत्र अनुभूति करने का अभाव है । मैं मनुष्य हूं"
ऐसी जो प्रतीति होती है, वह आत्मा से अत्यन्तभिन्न, मनुष्यता आदि
विशिष्ट गुणों से युक्त पांचभौतिक शरीर में होती है जो कि वस्तुतः
आत्मा नहीं है; शरीर में अहं की प्रतीति आत्माभिमान मात्र है जो कि
भ्रांति है । उसी तरह" मैं जानता हूं" यह प्रतीति भी मिथ्या भ्रांति है ।
ज्ञान क्रिया कर्तृत्व ही तो ज्ञातृता है, जो कि विक्रियात्मक, जड, विकारी
द्रव्य अहंकार ग्रन्थि में स्थित है, अविकृत साक्षिस्वरूप चिन्मात्र आत्मा
में ऐसी विकृत ज्ञातृता कैसे संभव है ? (अर्थात विकारी अहंकार ग्रन्थि
में स्थित ज्ञातृता अनात्म है, इसलिए वह भ्रांत और अप्रामाणिक है ।
अनुभूति आत्म स्वरूप है अतः वही सत्य और प्रामाणिक है)
दृश्याधीनसिद्धित्वादेव रूपादेरिव कर्तृत्वादेर्नात्मधर्मत्वम् सुषुप्ति-
मूर्च्छादौ अहं प्रत्ययापाये अपि आत्मानुभवदर्शनेन नात्मनोऽहंप्रत्यय-
गोचरत्वम् । कर्तृत्वेऽहंप्रत्ययगोचरत्वे चात्मनोऽभ्युपगम्यमाने देहस्येव
जडत्वपराक्त्वानात्मकत्वादिप्रसङ्गो दुष्परिहरः । अहंप्रत्यय-
गोचरात् कर्तृतया प्रसिद्धात् देहात् तत्क्रियाफलस्वर्गादेः भोक्तुः
आत्मनोऽन्यत्वं प्रामाणिकानां प्रसिद्धमेव । तथाऽहमर्थात् ज्ञातुरपि
विलक्षणः साक्षी प्रत्यगात्मेति प्रतिपत्तव्यम् ।
ज्ञानाधीन रूप रस आदि की प्रतीति जैसे आत्मा का धर्म नहीं है
वैसे ही ज्ञानाधीन प्रतीति के विषय कर्तृत्व आदि भी आत्मा के धर्म
नहीं है । सुपुप्ति, मूर्च्छा आदि अवस्थाओं में "अहं" प्रत्यय का अभाव रहने
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( ४८ )
से आत्मानुभूति नहीं होती, इससे स्पष्ट है कि “अहं” प्रतीति का विषय
आत्मा नही है । आत्मा में कर्तृंता, अहं प्रतीति विषयता, मानने
से देह की तरह जडता, वाह्यपदार्थता और अनात्मता आदि दोष
उसमें घटित हो जावेंगे, जिन्हें उसमें से अलग करना कठिन हो जायेगा
अहं बुद्धि के विषय, कर्त्ता रूप से प्रसिद्ध देह से, उसकी क्रियाओं के
फलस्वरुप प्राप्त होने वाले स्वर्गादि फलो के भोक्ता आत्मा का, जो
प्रभेद है, उसे प्रमाग ज्ञाता लोग जानते ही है उसी प्रकार "अह"
अर्थात ज्ञाता(अहंकार)से भी विलक्षण, साक्षी प्रत्यगात्मा (जीव) है,
ऐसा जानना चाहिए ।
एवमविक्रियाऽनुभवस्वरूपस्यैवा।भिव्यंजको जडोऽप्यहंकारः
स्वाश्रयतयातमभिव्यनक्ति । आत्मस्थतयाऽभिव्यंग्याभिव्यंजनमभिव्यं-
जकानां स्वभावः । दर्पणजलखंडादिर्हि मुखचंद्रबिंबगोत्वादिकं
आत्मस्थतयाऽभिव्यनक्ति । तत्कृतोऽयंजानाम्यहमिति भ्रमः ।
स्वप्रकाशाया अनुभूतेः कथमिव तदभिव्यंग्यजडरूपाहंकारेण अभि-
व्यंगत्वमिति मावोचः, रविकरनिकराभिव्यंग्यकरतलस्य तदभिव्यं-
जकत्वदर्शनात् जालकरंध्रनिष्क्रान्त द्युमणिकरणानां तदभिव्यंगेनापि
करतलेन स्फुटतरप्रकाशो हिद्रष्टचरः । यतोऽहं जानामीति ज्ञाताऽय-
महंमर्थः चिन्मात्रात्मनो न पारमार्थिको धर्मः । अतएव सुषुप्ति-
मुक्त्योः न अन्वेति । तत्र हि अहमर्थोल्लेखविगमेन स्वाभाविका-
नुभवमात्ररूपेण आत्माऽवभासते । अतएव सुप्तोत्थितः कदाचिन्मा-
मप्यहं न ज्ञातवानिति परामृशति, तस्मात् परमार्थतो निरस्त-
समस्तभेद विकल्पनिर्विशेष चिन्मात्रैकरसकूटस्थ नित्य संविदेव
भ्रान्त्या ज्ञातृज्ञेयज्ञान रूप विविध विचित्रभेदा विवर्त्तत इति,
तन्मूलभूता अविद्या निवहंणाय नित्य शुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव-
ब्रह्मात्मैकत्व विद्या प्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ताः आरभ्यन्ते इति ।
इसी प्रकार अविकृत अनुभव के स्वरूप का अभिव्यंजक, अहंकार
स्वयं जड होते हुए भी, अपने आश्रय से उस अनुभव को, अभिव्यक्त
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( ४६ )
करता है। अभिव्यंग्य वस्तु को आत्मस्थरूप से अभिव्यंजित करना ही
अभिव्यंजक का स्वभाव होता है। दर्पण, जल आदि मुख, चन्द्र आदि
को आत्मस्थ रूप से ही अभिव्यक्त करते हैं। इसी प्रकार "मैं जानता हूं"
ऐसी प्रतीति भी व्यंग्यव्यंजक भाव कृत भ्रममात्र है।
स्वयं प्रकाश अनुभूति अपने अभिव्यंग्य जड रूप अहंकार से कैसे
अभिव्यंजित हो सकती है ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए क्योंकि-
सूर्य किरणों से अभिव्यंग्य करतल की अभिव्यंजकता देखी जाती
है। खिड़की के छिद्रों से आने वाली सूर्य किरणों से करतल प्रका-
शित होता है, उस करतल से वे किरणें और अधिक प्रकाशित
होती हैं।
“मैं जानता हूं" इस प्रतीति का ज्ञाता “अहं” आत्मा का
स्वाभाविक धर्म नहीं है, इसलिए सुषुप्ति और मुक्ति में वह संबद्ध
नहीं रहता; उन परिस्थितियों में “अहं” प्रतीति नहीं रहती, आत्मा
केवल स्वभाव सिद्ध अनुभव के रूप में स्वयं प्रकाशित रहता है ।
इसीलिए प्रगाढ निद्रा से उठा हुआ व्यक्ति कभी “मैं अपने को भी
नहीं जानता” ऐसा परामर्श (संदेहात्मक विचार) करता है।
इससे सिद्ध होता है कि-सब प्रकार की भेद कल्पनाओं से रहित
निर्विशेष, चिन्मयमात्र एकरस, कूटस्थ नित्य संवित् (अनुभूति) ही भ्रांति-
वश ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान रूप अनेक विभिन्न भेदों में विवर्त्तित
होती हैं(अर्थात् स्वभाव से उसी प्रकार रहते हुये केवल रूपान्तरित
होती रहती है) उक्त अनुभूति विवर्त्त की मूल कारण अविद्या की
निवृत्ति के लिए ही, नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव ब्रह्मात्मा के अद्वैत
ज्ञान को बतलाने के लिए समस्त वेदांत वाक्य प्रयास करते हैं।
महासिद्धान्तः—तदिदमौपनिषद परमपुरुष वरणीयता हेतु गुण
विशेष विरहिणामनादिपापवासनादूषिताशेषशेमुषीकाणामनधिगतपद
वाक्यस्वरूपतदर्थं याथात्म्य प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणवृत्ततदितिक-
र्त्तव्यता रूप समीचीन न्यायमार्गाणां विकल्पासहविविधकुतर्क
कल्ककल्पितमिति न्यायानुगृहीत प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणवृत्तया-
थात्म्यविद्भिः अनादरणीयम् ।
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( ५० )
महासिद्धान्त ( शांकरमत निरसन ) उपनिषद प्रतिपाद्य परम
पुरुष की प्राप्ति हेतु उनके गुण ही है' अनादि पाप वासना से दूषित'
खोखली बुद्धि वाले लोग ही उन्हें 'निर्गु ण मानकर' शास्त्र वचनों की
साररहित, कुतर्क पूर्ण काल्पनिक व्याख्या करते है; उन्हें शास्त्र के
प्रकृत पद, वाक्य, वाक्यार्थ तात्पर्य, प्रत्यक्ष आदि प्रमाण और तज्जन्य
ज्ञान के रूप और उनकी इतिकर्त्तव्यता आदि का यथार्थ ज्ञान नहीं
रहता । जो लोग न्यायानुसार समस्त वाक्य और प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणों से लब्ध ज्ञान के यथार्थ मर्म को जानते है, उनकी दृष्टि मे
उनका मत अनादरणीय है ।
तथा हि निर्विशेषवस्तुवादिभिर्निविशेषे वस्तुनि इदं प्रमाणम्
इति न शक्यते वक्तुम् । सविशेषवस्तु विषयत्वात् सर्व प्रमाणानाम् ।
यस्तु स्वानुभवसिद्ध इति स्वगोष्ठी निष्ठः समयः सोऽप्यात्मसाक्षिक
सविशेषानुभवादेव निरस्तः । इदमहमदर्शमिति केनचिद् विशेषेण
विशिष्टविषयत्वात् सर्वेषामनुभवानां स विशेषोऽप्यनुभूयमानोऽनुभवः
केनचिद् युक्त्याभासेन निर्विशेष इति निष्कृष्यमाणः सत्ताऽतिरेकिभिः
स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः निष्कृष्टव्यः, इति निष्कर्ष हेतुभूतैः
सत्ताऽतिरेकिभिः स्वासाधारणैः स्वभावविशेषैः सविशेष एवाव-
तिष्ठते । अतः कैश्चिद् विशेषैर्विशिष्टस्यैववस्तुनोऽन्ये विशेषा निर-
स्यंत इति न क्वचिन्निर्विशेषवस्तु सिद्धिः ।
निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन करने वाले, निर्विशेष की वस्तु
सिद्धि में" अमुक प्रमाण है" ऐसा नही कह सकते । क्यों कि-शास्त्र
के समस्त प्रमाण सविशेष वस्तु परक ही हैं। और जो उस निर्विशेष
वस्तु को" स्वानुभव सिद्ध" ही अपने मत का परम्परित सिद्धान्त
बतलाते हैं, वह भी आत्म प्रतीति सिद्ध सविशेष के अनुभव से निरस्त
हो जाता है। "मैंने इसे देखा है" ऐसे अनुभव में किसी विशेषण
से विशिष्ट वस्तु की ही प्रतीति होती है (अर्थात अनुभव सगुण वस्तु
पर ही आधारित रहता है, जो वस्तु कभी भी दृश्य संभव नहीं है'
उसके लिए" अनुभवसिद्ध" कैसे कह सकते हैं) अनुभव गम्य सविशेष

( ६१ )
वस्तु को यदि किसी थोथी युक्ति से निर्विशेष सिद्ध किया जाय तो
वैसा करने में भी अस्तित्व हीन उस वस्तु को अपने से विलक्षण
स्वभाव विशेष विशेषित मानना पड़ेगा और तब वह अस्तित्वहीन
वस्तु अपने से विलक्षण स्वभाव विशेष से विशेषित होने पर स्वतः
ही सविशेष सिद्ध हो जायगी । वस्तु के, किसी भी विशेषण से
विशेषित होने पर उस वस्तु की अन्य विशेषतायें निरस्त हो
जाती हैं इसलिए किसी भी प्रकार निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नहीं हो
सकती [अर्थात् वस्तु की सत्ता मानने पर, उसमें कोई न कोई विशेषता
तो स्वीकारनी ही पड़ेगी अन्यथा उसकी सत्ता सिद्ध न हो सकेगी,
सत्ता मानना ही उसे सविशेष स्वीकारना है]
धियो हि धीत्वं स्वप्रकाशता च ज्ञातुर्विषय प्रकाशनस्वभावतयोप-
लब्धेः । स्वापमदमूर्च्छासु च सविशेषएवानुभवः इति स्वावसरे
निपुणतरमुपपादयिष्यामः । स्वाभ्युपगताश्च नित्यत्वादयो हि अनेके
विशेषाः सन्त्येव । ते च न वस्तुमात्रम् इति शक्योपपादनाः, वस्तु-
मात्राभ्युपगमे सत्यपि विधाभेद विवाददर्शनात् स्वाभिमततद् विधा-
भेदैश्च स्वमतोपपादनात्, अतः प्रामाणिक विशेषैर्विशिष्टमेव वस्तु
इति वक्तव्यम् ।
ज्ञातव्य विषय को प्रकाशित करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति के
कारण, ज्ञाता की ज्ञातव्यता और स्वप्रकाशता सदा बनी रहती है । निद्रा
मद मूर्च्छा आदि में जो अनुभूति होती है वह भी सविशेष ही होती है,
इन विषयों के विवेचन के अवसर में भलीभाँति सतर्क विवेचन करेंगे ।
वस्तु में अपनी अभिन्न नित्यता आदि अनेक विशेषतायें तो रहती ही हैं ।
वे विशेषतायें वस्तुमात्र में ही नहीं रहतीं (सभी जगह रहती हैं) ऐसा
प्रतिपादन करने की चेष्टा करोगे तो सामान्य वस्तुओं में जो विभिन्नभेद
देखे जाते हैं वे सभी भेद तुम्हारी स्वीकृत अपनी वस्तु में भी घटित होंगे
जिससे यह सिद्ध हो जायगा कि तुम अपने मत में विभिन्न भेदों को भी
स्वीकारते हो । फिर तो तुम्हें "वस्तु प्रामाणिक विशेषताओं से विशिष्ट
है" ऐसा भी कहना पड़ेगा ।

( ५२ )
शब्दस्य तु विशेषेण सविशेष एवं वस्तुनि अभिधान सामर्थ्यम्
पदवाक्यरूपेणप्रवृत्तेः। प्रकृति प्रत्यययोगेन हि पदत्वम् । प्रकृतिप्रत्ययोरर्थ
भेदेन पदस्यैव विशिष्टार्थप्रतिपादमवर्जनीयम् । पदभेदश्चार्थभेदनिब-
न्धनः, पदसंघातरूपस्य वाक्यस्यानेकपदार्थसंसर्गविशेषाभिधायित्वेन
निर्विशेष वस्तु प्रतिपादनासामर्थ्यात् न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः
प्रमाणम् ।
शब्द की, विशेष रूप से, सविशेष वस्तु के प्रतिपादन में ही, अभि-
धा शक्ति होती है (अर्थात् शब्द सविशेष वस्तु का ही बोध करा सकता
है) क्यों कि-वह पद और वाक्यों के रूप से ही वस्तु का वर्णन करता
है । प्रकृति और प्रत्यय के योग से ही शब्द पदरूप प्राप्त करता है ।
प्रकृति और प्रत्यय में स्वाभाविक अर्थ भेद रहता है, जिससे पद को
विशिष्ट अर्थ प्रतिपादकता अनिवार्य हो जाती है (अर्थात् पद विशिष्ट का
ही प्रतिपादन करता है, ऐसा निश्चित हो जाता है क्यों कि विशेषण और
विशेष्य भाव में दोनों पदों का अर्थ भिन्न होता है, जैसे नील कमल, यहाँ
कमल पद विशेष्य और नील पद विशेषण है, दोनों पद क्रमशः पुष्प और
वर्ण विशेष के बोधक हैं । "जलज" पद में "जल" प्रकृति और "ज"
प्रत्यय है, ये दोनों ही विभिन्न अर्थविबोधक हैं, दोनों प्रकृति के संहित रूप
"जलज" पद का अर्थ जल से उत्पन्न होने वाला होता है) अर्थ भेद से ही
पद भेद होता है, तथा अनेक पदों का संहित रूप वाक्य होता है जोकि
अनेक पदों के अर्थों का बोध कराता है । इससे सिद्ध होता है कि वाक्य भी
विशेष अर्थविबोधक होता है, उसमें निर्विशेष वस्तु के प्रतिपादन की
क्षमता नहीं है । इसलिए निर्विशेष वस्तु में शब्द प्रभाव नहीं है; यह
निश्चित बात है ।
प्रत्यक्षस्य निर्विकल्पकसविकल्पकभेदभिन्नस्य न निर्विशेष
वस्तुनि प्रमाणभावः । सविकल्पकं जात्यादि अनेकपदार्थविशिष्ट
विषयत्वादेव सविशेष विषयम् । निर्विकल्पकमपि सविशेषविषयमेव,
सविकल्पके स्वस्मिन्ननुभूतपदार्थविशिष्टप्रतिसंधान हेतुत्वात् ।
निर्विकल्पकं नाम केनचिद् विशेषेण वियुक्तस्य ग्रहणम् , नसर्वविशेष
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( ५३ )
रहितस्य, तथाभूतस्य कदाचिदपि ग्रहणादर्शनादनुपपत्तेश्च केनचिद्
विशेषेण इदमित्थमिति हि सर्वा प्रतीतिरूपजायते, त्रिकोण सास्नादि
संस्थान विशेषेण विना कस्यचिदपि पदार्थस्य ग्रहणायोगात्-
अतोनिर्विकल्पकमेकजातीय द्रव्येषु प्रथम पिण्ड ग्रहणम् । द्वितीयादि
पिण्डग्रहणं सविकल्पमित्युच्यते । तत्र प्रथम पिण्डग्रहणे गोत्वादेरनु-
वृत्ताकारता न प्रतीयते । द्वितीयादि पिण्डग्रहणेष्वेवानुवृत्तिप्रतीतिः
प्रथम प्रतीत्यनुसंहितवस्तुसंस्थानरूपगोत्वादेरनुवृत्तिधर्मं विशिष्टत्वं
द्वितीयादि पिण्ड ग्रहणावसेयमिति, द्वितीयादि ग्रहणस्य सविकल्पकत्वं
सास्नादिवस्तुसंस्थानरूप गोत्वादेरनुवृत्तिर्न प्रथम पिण्ड ग्रहणे
गृह्यत इति, प्रथम पिण्ड ग्रहणस्य निर्विकल्पकत्वम् । नपुनः संस्थानरूप
जात्यादेरग्रहणात् संस्थान रूप जात्यादेरपि-ऐन्द्रियकत्वाविशेषात् ,
संस्थानेन विना संस्थानिनः प्रतीत्यनुपपत्तेश्च प्रथम पिण्ड
ग्रहणेऽपि ससंस्थानमेव वस्तु इत्थम् इति गृह्यते, अतोद्वितीयादि पिण्ड
ग्रहणेषु गोत्वादेरनुवृत्तिधर्मविशिष्टता संस्थानिवत् संस्थानवच्च सर्वदैव
गृह्यत इति तेषु सविकल्पकत्वमेव । अतः प्रत्यक्षस्य कदाचिदपि न
निर्विशेष विषयत्वम् ।
निर्विकल्पक सविकल्पक भेद वाले प्रत्यक्ष की निर्विशेष वस्तु में
प्रमाणता नहीं हो सकती । सविकल्प प्रतीति, जाति आदि अनेक विशेष-
ताओं से विशिष्ट विषय वाली होती है, इसलिए वह तो सविशेष विषयक
ही है । निर्विकल्पक भी सविशेष विषयक ही है क्यों कि -सविकल्पक
प्रतीति में जात्यादि विशिष्ट विषयों की, निर्विकल्पक प्रतीति, की
स्मृति होती है । किसी एक विशिष्ट विशेषता से रहित वस्तु, संबंधी
ज्ञान को निर्विकल्पक ज्ञान कहते हैं, समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित
को नहीं । समस्त सामान्य विशेषताओं से रहित वस्तु तो कभी उपलब्ध
हो ही नहीं सकती । “अमुक वस्तु” ऐसी प्रतीति में किसी न किसी प्रकार
की विशेषता से युक्त वस्तु की ही उपलब्धि होती है । सास्ना आदि चिन्ह्
विशेष के बिना गो पदार्थ की प्रतीति नहीं हो सकती । एक जातीय द्रव्य

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में सर्व प्रथम जो स्वरूप ज्ञान होता है वह निर्विकल्पक तथा द्वितीय स्व-
रूप ज्ञान सविकल्पक होता है। प्रथम बार स्वरूप देखने पर गाय के परि-
चायक समस्त चिन्हों की सहसा प्रतीति नही होती, द्वितीय आदि दृष्टियों
में समस्त विशेषताओं की प्रतीति हो जाती है। प्रथम प्रतीति में वस्तु की
संस्थान (अवयव संयोजन रूप) जिस गोत्व की प्रतीति होती है द्वितीय
आदि दृष्टियो में उस संस्थान की पूर्ण उपलब्धि हो जाती है, वही सवि-
कल्पकता है। सास्ना लांगूल ककुद खुर विषाण आदि चिन्हों वाली गौ
प्रथम दृष्टि मे ही प्रतीत नहीं हो पाती, यही निर्विकल्पकता है। संस्थान
(आकृति) की जाति आदि की प्रतीति न होने से निर्विकल्पकता होती हो
सो बात नहीं है; जात्यादि की प्रतीति भी इन्द्रियवेद्य ही होती है, आकृति
प्रतीति के बिना ,आकृति विशेष की प्रतीति तो संभव है नहीं प्रथम
आकृति दर्शन में भी आकृति ही “यह वस्तु ऐसी है” उस वस्तु विशेष की
प्रतीति होती है। द्वितीय तृतीय आदि गोपिड दर्शनों में जैसे संस्थान
(अवयव विन्यास) और सस्थानी (गौ) की प्रतीति होती है, वैसी ही
धर्मानुगत गोत्व प्रतीति सदा होती है यही सविकल्पक विषयक प्रतीति है।
इससे सिद्ध होता है, कि प्रत्यक्ष कभी भी निर्विशेष विषयक नहीं होता।
अत एव सर्वत्रभिन्नाभिन्नत्वमपि निरस्तम् । इदमित्थं इति
प्रतीतौ इदमित्थम्भावयोरैक्यं कथमिव प्रत्येतुं शक्यते ? तत्रेत्थंभावः
सास्नादिसंस्थानविशेषः, तदविशेष्यंद्रव्यमिदमंशइत्यनयोरैक्यं
प्रतीतिपराहतमेव । तथाहि प्रथममेव वस्तु प्रतीयमानं सकलेतर
व्यावृत्तमेव प्रतीयते । व्यावृत्तिश्च गोत्वादिसंस्थानविशेष
विशिष्टतयेत्थमिति प्रतीतेः । सर्वत्र विशेषणविशेष्यभाव
प्रतिपत्तौ तयोर्त्यन्तभेदः प्रतीत्यैव सुव्यक्तः । तत्र दंड कुंडला-
द्यः पृथक् संस्थान संस्थिताः स्वनिष्ठाश्च कदाचित् क्वचित्
प्रकारान्तर विशेषण तयावतिष्ठन्ते । गोत्वादयस्तु द्रव्यसंस्थानत-
यैव पदार्थभूतास्संतो द्रव्यविशेषणतया अवस्थिताः । उभयत्र
विशेषणविशेष्यभावः समानः तत एव तयोर्भेद प्रतीतिश्च ।

( ५५ )
इयांस्तु विशेषः पृथक्स्थिति प्रतिपत्तियोग्या दंडादयः, गोत्वादयस्तु
नियमेन तदनर्हाः इति । अतो वस्तु विरोधः प्रतीतिपराहत एव
प्रतीतिप्रकार निह्नवोच्यते । प्रतीतिप्रकारो हि इदमित्थं इत्येव
सर्व सम्मतः । तदेत्सूत्रकारेण “नैकस्मिन्न संभवात्” इति सुव्यक्त-
मुपपादितम् । अतः प्रत्यक्षस्य सविशेषविषयत्वेन प्रत्यक्षादि दृष्ट
संबंधविशिष्टविषयत्त्वादनुमानमपि सविशेषविषयमेव । प्रमाण-
संख्याविवादेऽपि सर्वाभ्युपगत प्रमाणानामयमेव विषय न केनापि
प्रमाणेन निर्विशेष वस्तुसिद्धिः । वस्तुगतस्वभावविशेषैस्तदेव
वस्तु निर्विशेषमिति वदन् जननीवंध्यात्व प्रतिज्ञायामिव स्ववाग्विरोध-
मपि न जानाति ।
जो लोग सब जगह भेदाभेद संबंध मानते हैं, उक्त विचार के आधार
पर, वह मत भी परास्त हो जाता है । “इदं-इत्थं” इस प्रकार की
प्रतीति में “इदं और इत्थं” इन दो भावों की एकता कैसे कही जा सकती
है ? सास्नादि संस्थान विशेष “इत्थं” पद वाच्य तथा उससे अविशिष्ट
द्रव्य “इदं” पद वाच्य है, इन दोनों की ऐक्य प्रतीति असंभव ही है।
जब वस्तु की प्राथमिक प्रतीति होती है, वह सबसे विलक्षण होती है।
गोत्वादि संस्थान विशेष विशिष्टता ही विलक्षणता का कारण है जो कि
“इत्थं” रूप से प्रतीत होती है। सब जगह विशेषणविशेष्य भाव की
प्रतिपत्ति में, विशेषणविशेष्य के अत्यन्त भेद की सुस्पष्ट प्रतीति होती
है। दंड कुंडल आदि, पृथक संस्थान संस्थित और स्वनिष्ठ आकृतियाँ हैं,
कभी कहीं दूसरे द्रव्य के विशेषण के रूप से भी स्थित रहती हैं। तथा
गोत्व आदि द्रव्य संस्थान, पदार्थ भूत होकर उसी द्रव्य के विशेषण रूप
से स्थित रहते हैं। दोनों ही जगह विशेषणविशेष्य भाव समान है तथा
उसी प्रकार विशेषणविशेष्य भाव की भेद प्रतीति भी समान है
विशेषता केवल इतनी ही है कि-दंड कुंडल आदि पृथक् पृथक् संस्थान
संस्थित होने से, प्रतिपत्ति करने योग्य हैं गोत्व आदि एक संस्थान में
नियमित होने से, प्रतिपत्ति योग्य नहीं है। इसलिए वस्तु की भिन्नता की
बात, परास्त हो जाती है; प्रतीति का प्रकार जरा छिपा कर
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प्रकारान्तर से बतलाया गया है; वस्तुतः कोई भेद नही है। “इदं-
इत्थं” ही सर्व सम्मत प्रतीति का प्रकार है। इस तथ्य को सूत्रकार
“नैकस्मिन्न संभवात्” में सुस्पष्ट रूप से समर्थन करते है। प्रत्यक्ष
की सविशेषप्रमाणता निश्चित हो जाने से, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से
ज्ञात संबन्ध विशेष वाले अनुमान की भी सविशेष प्रमाणता निश्चित हो
जाती है, प्रमाणों की संख्या के विषय में शास्त्रकारों का मतभेद है,
पर जितने भी भेद हैं; सभी सविशेष वस्तु को ही प्रमाणित करते है;
किसी भी प्रमाण से निर्विशेष वस्तु की सिद्धि नही हो सकती। प्रत्येक
वस्तु का अपना एक विशेष स्वभाव होता है, यदि ऐसी विशेष स्वभाव
वालो वस्तु को निर्विशेष कहा जाता है तो वह वैसी ही अज्ञानता है, जैसे
कोई प्रतिज्ञा करे कि “मै बन्ध्या का पुत्र हूँ”। इस बेचारे को अपने
वाग् विरोध तक का ज्ञान नही होता ।
यत्तु प्रत्यक्षं सन्मात्रग्राहित्वेन न भेदविषयम्, भेदश्च
विकल्पासहत्वादुर्निरूपः इत्युक्तम्, तदपि जात्यादिविशिष्टस्यैव
वस्तुनः प्रत्यक्षविषयत्वाज्जात्यादेरेव प्रतियोग्यपेक्षया वस्तुनः
स्वस्य च भेदव्यवहारहेतुत्वाच्च दूरोत्सारितम् संवेदनवद्
रूपांदिवच्च परम्व्यवहारविशेषहेतोः स्वस्मिन्नपि तद् व्यवहार
हेतुत्वं युष्माभिरभ्युपेतं भेदस्यापि संभवत्येव; श्रत एव च मानव-
स्थान्योन्याश्रयणंच। एकक्षणवर्त्तित्वेऽपि प्रत्यक्षज्ञानस्य तस्मि-
न्ने वक्षणे वस्तुभेदरूप तत्संस्थानरुप गोत्वादेर्गृहीतत्वात् क्षणान्तर
ग्राह्यं न किंचिदिह तिष्ठति ।
जो यह कहा कि प्रत्यक्ष प्रमाण सद्‌वस्तु मात्र ग्राही होता है, इस-
लिए भेद विषयक नही है, तथा भेद विकल्प को न सहने से दूर्निरूप है।
सो इसमें भी, कथन यह है कि—जात्यादि विशिष्ट वस्तु की ही प्रत्यक्ष
विषयता होती है वे जाति आदि ही उस वस्तु की अन्य वस्तुओं से
भिन्नता ज्ञापन करते है। संवेदन और रूपरस आदि जैसे आश्रय के
परिचय विशेष का ज्ञापन करके अपना भी परिचय ज्ञापन करते हैं उसी
प्रकार अन्य पदार्थ भी अपरवस्तु के व्यवहार विशेष का ज्ञापन करके

तदनुरूप अपने व्यवहार का भी ज्ञापन करते हैं, इससे तो आपको यह
मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्ष, भेद को भी प्रमाणित करता है। इस
प्रकार भेद ग्रहण में न तो अनवस्था दोष होता है और न अन्योन्याश्रय
दोष। प्रत्यक्ष ज्ञान एक क्षणवर्त्ती होते हुए भी, उसी क्षण में उस वस्तु
का भेद, आकृति, धर्म आदि सभी वस्तुओं का ग्राहक होता है, दूसरे क्षण
उसके लिए ग्रहण करने को कुछ भी शेष नहीं रह जाता ।
अपि च—सन्मात्र इति ग्राहित्वे घटोऽस्ति पटोऽस्तीति विशिष्ट
विषयाप्रतीतिर्विरुध्यते । यदि च सन्मात्रातिरेकवस्तुसंस्थानरूप
जात्यादिलक्षणोभेदः प्रत्यक्षेण गृहीतः किमित्यश्वार्थी महिष
दर्शने निवर्त्तते , सर्वासुप्रतिपत्तिषु सन्मात्रमेव विषयश्चेत् तत्
तत्प्रतिपत्तिविषयसहचारिणः सर्वे शब्दाः एकैकप्रतिपत्तिषु किमिति
न स्मर्य्यन्ते ?
तथा प्रत्यक्ष को सन्मात्र ग्राही मानेंगे तो "घट है" "पट है" ऐसी
विशिष्ट विषयक प्रतीति के विरुद्ध होगा । यदि सन्मात्र के अतिरिक्त,
वस्तु संस्थान रूप जाति आदि लक्षण भेदों की प्रतीति, प्रत्यक्ष से संभव
न होती तो, घोड़ा को चाहने वाला कोई व्यक्ति घुड़साल में बंधे भैंसे को
देखकर लौट नहीं सकता । यदि कहो कि—सभी प्रतीतियाँ सन्मात्र विष-
यक हो होती है ; तो फिर भिन्न भिन्न प्रतीति विषयक शब्द, हर प्रति-
पत्ति में स्मृत क्यों नहीं होजाते ?
किं च अश्वे हस्तिनि च संवेदनयोरेक बिषयत्वेनोपरितन-
स्य गृहीत ग्राहित्वात् विशेषाभावाच्च स्मृति वैलक्षण्यं न स्यात् । प्रति
संवेदनं विशेषाभ्युपगमे प्रत्यक्षस्य विशिष्टार्थ बिषयत्वमेवभ्युपगतं
भवति सर्वेषां संवेदनामनेकविषयतायामेकेनैव संवेदनेनाशेषग्रहणा
दंधबधिराद्यभावश्च प्रसज्येत् ।
घोड़ा और हाथी की प्रतीतियं यदि एक प्रकार ही मानली जाएं तो
गृहीत, ग्राहिता तथा विशेषता के अभाव से किसी प्रकार की स्मृति विलक्ष-
णता न रह जाएगी [अर्थात् घोड़ा संबंधी प्रतीति के समान ही यदि हाथी
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की भी प्रतीति हो जाय तो घोड़ा के समान हाथी को भी चाबुक से
हाँकने की चेष्टा हो सकती है तथा घोड़े को अंकुश से । क्यों कि भिन्न
प्रकार की स्मृति तो रहेगी नही] यदि प्रत्येक संवेदन को एक विशेष संवे-
दन मानेंगे तो प्रत्यक्ष की विशिष्टार्थ विषयता माननी पड़ेगी । सभी
प्रतीतियों की एक विषयता मानने में एक ही प्रतीति से सभी विषयों की
प्रतीति हो जानी चाहिए जिसके फलस्वरूप अंधे, बहरे आदि भेदों का
अभाव हो जाना चाहिए [पर ऐसा होता नहीं, इसलिए उक्त सभी
संभावनाये शक्य नहीं हैं]
न च चक्षुषा सन्मात्रं गृह्यते, तस्यरूपरूपिरूपैकार्थ ग्राहित्वात्
नापि त्वचा, स्पर्शवद् वस्तुविषयत्वात् । श्रोत्रादीन्यपि न सन्मात्र
विषयाणि; किन्तु शब्दरसगंधलक्षणविशेषविषयान्येव । अतः
सन्मात्रस्य ग्राहकं न किंचिदिह दृश्यते ।
शुद्ध सद् वस्तु नेत्र से तो देखी नहीं जा सकती क्यों कि नेत्र रूप
और रूप युक्त वस्तु को ही देख पाते हैं । त्वचा से भी ग्राह्य नहीं है क्यों
कि त्वचा स्पर्शवान

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निर्विशेष सन्मात्र को प्रत्यक्ष से ही ग्राह्य प्रमाणित करने वाला,
शास्त्र अनुवादक मात्र ही है, क्योंकि—उक्त विषय की प्राप्ति की जान-
कारी तथा सन्मात्र ब्रह्म का प्रमेय भाव, उसमें बतलाया गया है। उक्त
शास्त्र को सही मान लेने से, उस सन्मात्र ब्रह्म में जड़ता क्षीणता आदि
दोष तुम्हीं बतलाने लगोगे । इससे सिद्ध होता है कि, वस्तु संस्थान रूप
जाति आदि लक्षण भेदों वाला विशिष्ट विषय ही प्रत्यक्ष द्वारा प्रमाणित
है । भिन्न आकृति वाली अनेक वस्तुओं में एकाकार बुद्धि विषयक ज्ञान
नहीं हुआ करता, तभी गोत्व आदि जातियों का व्यवहार उपपन्न होता
है । संस्थान से अतिरिक्त जातिवाद मानने से भी संस्थान की स्थिति पूर्व
वत् रहती है, इसलिए संस्थान ही एक जाति होती है। अपने असाधारण
विशिष्ट रूप को ही संस्थान कहते हैं। वस्तु के स्वरूपानुसार उसके
संस्थान को जानने की चेष्टा करनी चाहिए । जाति संबंधी ज्ञान से ही
भिन्नता के व्यवहार का परिज्ञान होता है। संस्थान के अतिरिक्त वस्तु को
जाति मानने पर भी; संस्थान के अतिरिक्त, जाति नामक किसी वस्तु की
प्रतीति न होने से तथा एक मात्र संस्थान में ही जाति की प्रतीति होने
से गोत्व आदि भेदों की प्रतीति होती है ।
ननुच जात्यादिरेव भेदश्चेत्, तस्मिन् गृहीते तद्व्यवहार-
वद् भेदव्यवहारः स्यात् । सत्यम् भेदश्च व्यवह्रियत एव गोत्वादि
व्यवहारात् । गोत्वादिरेव हि सकलेतरव्यावृत्तिः , गोत्वादौ गृहीते
सकलेतरसजातीयबुद्धिव्यवहारयोर्निवृत्तेः । भेदग्रहणेनैव हि अभेद
निवृत्तिः । "अयम् अस्मात् भिन्नः,, इति व्यवहारे प्रतियोगी निर्देशस्य
तदपेक्षत्वात् प्रतियोगी अपेक्षा भिन्न इति व्यवहार इत्युक्तम
(शंका) जाति आदि ही भेद हैं ऐसा मनाने से तो यह भी मानना
पड़ेगा कि जाति आदि व्यवहार की तरह, भेद का भी व्यवहार होता है।
(समाधान) ठीक है; गोत्व आदि के व्यवहार से ही भेद व्यवहृत
होता है। गोत्व आदि ज्ञान ही अन्य वस्तुओं से उसकी विभिन्नता बत-
लाता है ; गोत्वादि में जानकारी हो जाने पर अन्यान्य समस्त वस्तुओं
में, सजातीय बुद्धि और व्यवहार की निवृति हो जाती है। भेद ज्ञान
से ही अभेद भाव की निवृत्ति होती है। "यह वस्तु अमुक वस्तु से भिन्न

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है" ऐसे व्यवहार मे भेद प्रतीति के लिए ही वस्तु के प्रतियोगी "अमुक"
का निर्देश किया जाता है, तभी "अमुक प्रतियोगी से यह वस्तु भिन्न है"
ऐसा व्यवहार किया जाता है ।
यत्पुनर्घटादीनां विशेषाणा व्यावर्त्तमानत्वेनापारमार्थ्यमुक्तं तदा-
नालोचितबाध्यबाधकभावव्यवहृत्यनुवृत्तिविशेषस्य भ्रांति
परिकल्पितम् । द्वयोर्ज्ञानयोर्विरोधे हि बाध्यबाधक भाव. । बाधितः
स्यैव्यावृत्तिः । अत्र घट पटादिषु देश काल भेदेन विरोध एव नास्ति ।
यस्मिन् देशे यस्मिन् काले यस्यसद्भाव. प्रतिपन्न. तस्मिन् देशे तस्मिन
काले तस्याभाव. प्रतिपन्नश्चेत् तत्र विरोधात् बलवतो बाधकत्वं
बाधितस्य च निवृत्ति. । देशान्तर कालान्तर सबंधितयानुभूतस्यान्य-
देशकालयोरभावप्रतीतौ न विरोध इति कथमत्र बाध्यबाधक
भाव. ?अन्यत्र निवृत्तस्यान्यत्र निवृत्तिर्वा कथमुच

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है, तो बाध्य बाधक भाव कैसे घटित होगा ? एक स्थान के अभाव को,
दूसरे स्थान का कैसे कह सकते हैं ? रज्जुसर्प आदि दृष्टान्त में तो,
एक ही स्थान और एक ही समय में, सर्प रज्जु का व्यावर्तक है, इसीलिए
रज्जु के अभाव की प्रतीति होती है, तभी विरोध, बाधक भाव होते हैं,
और व्यावृत्ति होती है । स्थान और समय की भिन्नता में व्यावृत्ति,
मिथ्यात्व और व्याप्ति का कहीं भी उदाहरण नहीं मिलता । इसलिए
केवल व्यावृत्ति ही अपारमार्थिकता की हेतु नहीं है ।
यत्तु अनुवर्त्तमानत्वात् सत्परमार्थ इति, तत् सिद्धमेवेति न
साधनमर्हति अतो न सन्मात्रमेव वस्तु अनुभूति सद्विषयोश्च
विषयविषयिभावेन भेदस्यप्रत्यक्षसिद्धत्वात् अबाधितत्वाच्च
अनुभूतिरेवसतीत्येतदपि निरस्तम् ।
और जो, अनुवर्त्तमान होने से सत् की परमार्थता है वह तो सिद्ध ही
है, उसको प्रमाणित करने की कोई आवश्यता नहीं है, इसलिए सत् ही
एक मात्र वस्तु है, ऐसा नहीं कह सकते । अनुभूति और सत् में विषय
और विषयी का भाव होने से उन दोनों का भेद प्रत्यक्ष सिद्ध है, जो
किसी भी प्रकार बाधित नहीं हो सकता । इसलिए, अनुभूति ही सत् है,
यह बात भी कट जाती है ।
यस्त्वनुभूतेः स्वयम्प्रकाशत्वमुक्तं, तद्विषयप्रकाशनवेलायां-
ज्ञातुरात्मनस्तथैव, न तु सर्वेषां सर्वदा तथैवेति नियमोऽस्ति परानु-
भवस्य, हानोपानादिलिंगकानुमानज्ञानविषयत्वात् स्वानुभवस्या-
प्यतीतस्य अज्ञासिषमितिज्ञानविषयत्वदर्शनाच्च, अतोऽनुभूतिश्चेत्
स्वतःसिद्धेति वक्तुं न शक्यते ।
और जो, अनुभूति की स्वयं प्रकाशता बतलाई सो, विषय प्रकाशन
के समय ज्ञाता की स्वतः जैसी स्थिति होती है; सभी की सदा वैसी ही
स्थिति हो ऐसा कोई नियम नहीं है । क्यों कि, परकीय अनभव तो
प्रवृत्ति निवृत्ति लिंगक होने से केवल अनुमान प्रमाण का विषय होता
है तथा स्वानुभव भी (अनुभव के) द्वितीय क्षण में “मैंने जान लिया”

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ऐसे ज्ञान का विषय होता है। इसलिए अनुभूति स्वतः सिद्ध वस्तु है,
ऐसा नहीं कह सकते।
अनुभूतेरनुभाव्यत्वेऽननुभूतित्वमित्यपि दुरुक्तम्, स्वगताती-
तानुभावानां परगतानुभावानांच अनुभाव्यत्वेन अननुभूतित्वप्रसं-
गात् । परानुभवानुमानानभ्युपगमे च शब्दार्थसंबंधग्रहणाभावेन
समस्तशब्दव्यवरोच्छेद प्रसंगः। आचार्यस्य ज्ञानवत्वं अनुमाय तदु-
पसत्तिश्च क्रियते, सा च नोपपद्यते । न च अन्यविषयत्वेऽननुभूति-
त्वम्, अनुभूतित्वं नाम वर्तमानदशायां स्वसत्तयैव स्वाश्रयं प्रति
प्रकाशमानत्वं, स्वसत्तयैव, स्वविषय साधनत्वं वा । ते च अनुभवा-
न्तरानुभाव्यत्वेऽपि स्वानुभवसिद्धेनापगच्छत इति नानुभूतित्वमपग-
च्छति घटादेस्त्वननुभूतित्वमेतत्स्वभाव विरहात् नानुभाव्यत्वात् ।
तथा अनुभूतेरननुभाव्यत्वेऽपि अननुभूतित्वप्रसंगो दुर्वारः गगनकुसु-
मादेरननुभाव्यस्याननुभूतित्वात् ।
अनुभूति, अनुभाव्य है; इसलिए अनुभूति कोई वस्तु नही है, ऐसा
कहना भी कठिन है। अपने अतीत तथा दूसरों के अनुभवों के अनुभाव्य
होने से अननुभूति की बात उठती है (अर्थात जो अपने अतीत अनुभव
हैं, तथा दूसरों के अनुभवों को हम अननुभूति कहते हैं) परंतु अपने बीते
हुए अनुभवों के अनुमान तथा दूसरों के अनुभवों को अस्वीकार करने से
(जो कि शाब्दिक ही होते हैं) शब्दार्थ संबंध के ग्रहण का अभाव हो जायेगा
जिसके फलस्वरूप, स्वानुभव और परानुभव पर आधारित जितना भी
वाङ्मय है उसकी महत्ता ही समाप्त हो जायेगी तथा आचार्य के वैदुष्य
का, अनुमान कर जो छात्र समुदाय, आचार्य के निकट विद्याभ्यास के
लिए जाया करता है, वह भी समाप्त हो जायगा।
अन्य विषयता होने से भी अननुभूति की बात नही उठाई जा सकती
क्योंकि-वर्तमान दशा में अपनी सत्ता से ही जो अपनी आध्रय वस्तु को
प्रकाशित करे अथवा अपनी सत्ता से अपने विषय को सिद्ध करे उमे अनु-
भूति कहते है। अन्यान्य अनेक अनुभूतियो के होते हुए भी, जो अनुभूति
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पहले हो चुकी हैं, उन स्वानुभूतियों का अभाव कभी नहीं होता । घट
आदि पदार्थ स्वयं अनुभूति नहीं कर पाते, वे सब जीव रहित जड़ हैं,
पर वे अनुभाव्य तो हैं ही। अनुभूति स्वयं अनुभाव्य नहीं हैं, फिर भी
उसकी अनुभूति नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता। आकाश पुष्प
आदि असंभव वस्तुएँ तो अनुभाव्य ही नही है, इसलिये उनका अनुभव
नहीं होता।
गगनकुसुमादेरननुभूतित्वमसत्त्वप्रयुक्तम् नानुभाव्यत्वप्रयुक्त-
मिति चेत्, एवं तर्हि घटादेरप्यज्ञानाविरोधित्वमेवाननुभूतित्वनिबन्ध-
नम् नानुभाव्यत्वमित्यास्थीयताम् । अनुभूतेरनुभाव्यत्वे अज्ञाना-
विरोधित्वमपि तस्याः घटादेरिव प्रसज्यते इति चेत्, अननुभाव्य-
त्वेपि गगनकुसुमादेरिवाज्ञानाविरोधित्वमपि प्रसज्यते एव अतोऽनु-
भाव्यत्वेऽननुभूतित्वमिति उपहास्यम् ।
गगन कुसुम आदि में जो अनुभूति राहित्य है, वो तो, असत् प्रयुक्त
है, अनुभाव्य प्रयुक्त नहीं है, यदि ऐसा मानते हो तो घट आदि की जो
अननुभूतिता है, वह अज्ञान के कारण है, अनुभाव्यता से नहीं है, ऐसा
भी मानना पड़ेगा। यदि कहो कि— अनुभूति की अनुभाव्यता स्वीकारने
से, घट आदि को तरह उसमें भी अज्ञान की बात लागू हो सकती है [ तो
मैं कहता हूँ कि अनुभूति कोई „गगनकुसुम की तरह असंभव वस्तु नही
है जो उसकी अनुभाव्यता न मानी जाय ] यह कथन नितान्त हास्यास्पद
है कि अनुभूति अनुभाव्य है, इसलिए अनुभूति नाम की कोई वस्तु
नहीं है।
यत्तु संविदः स्वतस्सिद्धायाः प्रागभावाद्यभावात् उत्पत्तिर्निरस्यते ।
तदन्धस्य जात्यन्धेन यष्टिः प्रदीयते । प्रागभावस्य ग्राहकाभावाद-
भावो न शक्यते वक्तुम्, अनुभूत्यैव ग्रहणात् कथमनुभूतिस्सती
तदानीमेव स्वाभावं विरुद्धमवगमयतीति चेत्; न हि अनुभूतिः स्व
समकालवर्त्तिनमेव विषयीकरोतीत्यस्ति नियमः अतीतानागतयोर-
विषयत्वप्रसंगात् ।