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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 696 में से

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पृष्ठ 643

( ५८१ )
घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानमिति पंचत्वमप्यविरुद्धम् । प्रकाशकानि
मनः पर्यन्तानीन्द्रियाणि पंचजनशब्दनिर्दिष्टानि तदविरोघाय
घ्राणरसनयोस्तन्त्रेणोपादानम् । तदेवम्–“यस्मिन् पंच पंचजना
आकाशश्च प्रतिष्ठितः” इति पंचजन शब्दनिर्दिष्टानि इन्द्रियाणि
आकाश शब्द प्रदर्शितानि महाभूतानि च ब्रह्मणि प्रतिष्ठितानीति
सर्वतत्त्वानां ब्रह्माश्चयत्व प्रतिपादनात् न तंत्रसिद्ध पंचविंशति तत्त्व
प्रसंगः । अतः सर्वत्र वेदांते संख्योपसंग्रहे तदभावे वा न कापिल-
तंत्रसिद्ध तत्त्वप्रतीतिः, इति स्थितम् ।
काण्व शाखीय पाठ में अन्न शब्द के न होते हुए भी, ज्योति शब्द
के निर्देश से इन्द्रियों की ही “पंचजन” शब्द से प्रतीति होती है । उक्त
अर्थ के प्रकाशन के लिए ही वाक्य के शेष में “पंचजन” शब्द का प्रयोग
किया गया है । कथन यह है कि—“पंच पंचजनाः” वाक्य के पूर्ववर्त्ती
“तं देवा ज्योतिषां ज्योतिः” इत्यादि वाक्य में, ज्योतियों के प्रकाशक के
रूप में ब्रह्म का निरूपण किया गया है । उन ज्योतियों का अपना अपना
प्रकाशन कार्य ब्रह्म के ही अधीन है । ‘यस्मिन् पंच’ इत्यादि में जो
विशेष निर्देश किया गया है उससे, विषयों की प्रकाशक पांच इन्द्रियों का
ही बोध होता है । “प्राणस्य” पद में कहे गए प्राण शब्द से स्पर्शनेंद्रिय
का ग्रहण होता है, इस इन्द्रिय का वायु के साथ संबंध है । ज्योति शब्द
का मुख्य प्राण से तो ग्रहण किया जा नहीं सकता । “चक्षुषः” से चक्षु-
रिन्द्रिय, “श्रोत्रस्य’ से श्रोत्रेन्द्रिय का निर्देश किया गया है । “अन्नस्य”
से घ्राण और रसन दोनों इन्द्रियों का निर्देश किया गया है । अन्न का
अर्थ है पृथ्वी, घ्राणेंद्रिय का पृथ्वी से संबंध है, क्योंकि यह इन्द्रिय गंध-
गुणवाली पृथ्वी से ही प्रकट हुई है । “अद्यते अनेन इति अन्नम्” इस
व्याख्या के अनुसार, रसनेन्द्रिय भी अन्न शब्दवाची हो सकती है ।
“मनसः” शब्द से मन का निर्देश है । घ्राण और रसन के एक साथ
निर्देश होने पर भी, पांच संख्या में कोई अन्तर नहीं आता । प्रकाश
स्वभाव वाली मनपर्यन्त इन्द्रियाँ ही “पंचजन” शब्द से निर्दिष्ट हैं,
संख्या विषयक विरोध के परिहार के लिए ही घ्राण और रसन दोनों
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