श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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प्रथमेन पंचशब्देन समूहाः पंचेति प्रतीयंते, यथा पंच पंचपूल्य इति ।
अतः “पंच पंचजनाः” इति पंचविंशतिपदार्थावगतौ ते कतम इत्य-
पेक्षायां मोक्षाधिकारान्मुमुक्षुभिः ज्ञातव्यतया स्मृति प्रसिद्धाः प्रकृत्या-
दय एव ज्ञायंते । “मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः
सप्त, षोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः” इति हि
कापिलानां प्रसिद्धिः, अतस्तंत्रसिद्ध तत्त्व प्रतिपादन परः ।
वाजसनेयी बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया कि--“पाँच, पांच-
जन और आकाश जिसपर प्रतिष्ठित हैं, उसी को आत्मा मानकर अमृत-
स्वरूप ब्रह्मवेत्ता पुरुष अमर होते हैं ।” इस पर संदेह होता है कि--
यह कापिल तंत्रोक्त तत्त्व का प्रतिपादक है या नहीं ? कह सकते हैं
कि - सांख्य तत्त्व का ही प्रतिपादक है, क्योंकि- इसमें पांच-पांच जनों
का वर्णन विशेष रूप से किया गया है, जो कि सांख्योक्त पच्चीस तत्त्वों
की ही प्रतीति कराता है । “पंचजनाः” पद समाहार समास विषयक है,
पांच जनों के समूह को “पंचजन” कहते हैं, यह “पंचपुल्यः” की तरह
समस्त पद है। इस पद में वैदिक व्याकरण के अनुसार लिंग विपर्यय है
( पुल्लिंग प्रयोग किया गया है अन्यथा स्त्रीलिंग “पंचजनी” प्रयोग होना
चाहिए था) । ये पांच समूह कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा होने पर—पंचजन
शब्द के विशेषणीभूत, दूसरे “पंच” शब्द से ऐसा ज्ञात होता है कि केवल
पांच ही हैं; जैसा कि “पंच पंचपूल्यः” में है । “पंच पंचजनाः” इस वाक्य
में कहे गए पांच पांच के वे पांच समूहित पदार्थ कौन हैं ? ऐसी आकांक्षा
होने पर--सांख्यतत्त्वप्रसिद्ध मुमुक्षुओं के लिए ज्ञातव्य प्रकृति आदि
तत्त्व ही ज्ञात होते हैं, यह शास्त्र एकमात्र मोक्षाधिकार का ही उपदेश
देता है । “मूल प्रकृति अविकृत है, महत् आदि सात ( रूप-रस-गंध-स्पर्श-
शब्द-महत्-अहंकार ) प्रकृति विकृति दोनों हैं । सोलह ( जिह्वा-चक्षु-
कर्ण-त्वग्-घ्राण, हस्त-पाद-पायु-उपस्थ-वाक्-मन-पृथ्वी-जल-वायु-तेज-
आकाश ) विकार हैं, पुरुष न प्रकृति है न विकृति ।” ये कापिल तंत्रसिद्ध
पच्चीस तत्त्व हैं । इससे यही ज्ञात होता है कि—उक्त श्रुति वाक्य इन
तत्त्वों का ही प्रतिपादक है ।