श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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और वही स्वाभाविक, निस्सीम, आनन्दमय विपश्चित् संपूर्ण
जीवों को भय और अभय देने वाले, सत्य संकल्प, समस्त जड़ चेतनात्मक
जगत के अन्तर्यामी परब्रह्म; बद्ध और मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से
विलक्षण हैं— इसका भी समाधान किया गया—
स चाप्राकृताकर्मनिमित्तस्वासाधारणदिव्यरूप इत्युदैरिरम् ।
वह अप्राकृत और शुभाशुभ कर्मों के अधीन नहीं हैं, वह तो
असाधारण सर्वतंत्र स्वतंत्र हैं, इसका भी उल्लेख किया गया ।
आकाशप्राणाद्यचेतनविशेषाभिधायिभिर्जगतकारणतया प्रसिद्ध
वन्निर्दिश्यमानःसकलेतरचेतनाचेतनविलक्षणस्स एवेति समग्रि-
ष्महि ।
अचेतन वाचक आकाश-प्राण आदि शब्द, जगत कारण रूप से
प्रसिद्ध की तरह निर्दिष्ट हैं जो कि जड़-चेतन से विलक्षण परमात्मा के
ही द्योतक हैं, यह भी कहा गया ।
परतत्त्वासाधारणनिरतिशयदीप्तियुक्तज्योतिश्शब्दाभिधेयो
द्युसंबंधितया प्रत्यभिज्ञानात स एवेत्यातिष्ठामहि ।
वह परब्रह्म ही असाधारण अतिशय ज्योति स्वरूप हैं, ऐसा ज्योति
वाचक वेदांत वाक्यों के लिए निर्णय किया गया ।
परमकारणासाधारणामृतत्वप्राप्ति हेतुभूतः परमपुरुष एव
शास्त्रदृष्ट्येन्द्रादिशब्दैरभिधीयत इत्यब्रूमहि ।
परम कारण परब्रह्म की जो असाधारण विशेषता, अमरता है,
उसकी प्राप्ति का हेतु भी परब्रह्म ही है, जो कि शास्त्रों में इन्द्र इत्यादि
नामों से उपास्य है, यह बतलाया गया ।
तदेवमत्तिपतितसकलेतरप्रमाणसंभावनाभूमिसार्वज्ञसत्यसंकल्प
त्वाद्यपरिमितोदारगुणसागरत्वादीस्वेतरसकलवस्तुविलक्षणः परंब्रह्म-
पुरुषोत्तमो नारायण एव वेदांतवेद्य इत्युक्तम् ।
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