श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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द्वितीय अध्याय
(प्रथम पाद)
१. स्मृत्यधिकरण (सूत्र १-२)
सांख्य आदिदर्शनों से ब्रह्म के कारणतावादी वेदांत
का विरोध प्रदर्शन मनु आदि स्मृतियों की सहायता
से ब्रह्मकारणतावाद की निर्दोषता का समर्थन ।
सर्वज्ञ मनु आदि से अनुमोदित न होने से सांख्योक्त
तत्त्वों की अप्रामाणिकता का निरूपण । —पृ० ६३६-४८
२. योग प्रत्युक्ति अधिकरण [सूत्र ३]
योग साधना से अतिरिक्त सिद्धान्त विषय में
पातञ्जल दर्शन की अप्रामाणिकता का निरूपण । —पृ० ६४८-५४
३. विलक्षणत्वाधिकरण [सूत्र ४-१२]
१. पूर्वपक्ष-विलक्षणताहेतुक अचेतन जगत की चेतन
ब्रह्मोपादानकता का प्रतिषेध तथा पृथिव्यादि के
चेतनाधिष्ठान का प्रतिपादन ।
२. (सिद्धान्त)—दृष्टान्त और युक्ति द्वारा विलक्षण
दो पदार्थों के कार्य कारणभाव का समर्थन । उत्पत्ति
के पूर्व भी ब्रह्म में जगत् की विद्यमानता का प्रति-
पादन । प्रलयकाल में विलीन जगत के दोषों से ब्रह्म
कलुषता की संभावना की शंका का दृष्टांत द्वारा
समाधान । पृ० ६५४-६४
४. शिष्ट परिग्रहाधिकरण [सूत्र १३]
सांख्य स्मृति की तरह, वेदवाह्य सभी स्मृतियों की
अप्रामाणिकता का निरूपण । पृ० ६६४-६५
५. भोक्त्रापत्याधिकरण [सूत्र १४]
चेतन अचेतन शरीरधारी ब्रह्म में भी जीव के समान
भोग प्राप्ति की कल्पना का निराकरण । पृ० ६६५-६६
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