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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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तथा पूर्ववर्त्ती वाक्य की अनुवृत्ति के आधार पर
परब्रह्म की कारणता का अवधारण । —पृ०५८२-८७
५ जगद्वाचित्वाधिकरण सूत्र (१६-१८)
१. पूर्वपक्ष-“यः एतेषां” श्रुत्युक्त पुरुष शब्द से साङ्गोक्त
पुरुष का समर्थन ।
२. (सिद्धान्त)-कर्त्ता पद से परमात्मता का निरूपण तथा
जीवात्म दर्शन पक्ष का खण्डन । जीव और मुख्य
प्राण परता का प्रत्याख्यान जैमिनि मत के अनुसार
परमात्मसत्ता के ज्ञापन के लिए जीव के उल्लेख का
निरूपण । —पृ०५८७-६६
६ वाक्यान्वयाधिकरण [सूत्र १६-२२]
१. पूर्वपक्ष-“आत्मा वा अरे” श्रुति कथित आत्मा की
जीवता की परिकल्पना ।
२. (सिद्धान्त)- समस्त वेदांत वाक्यों की तात्पर्य पर्यालो-
चना से आत्मा शब्द की ब्रह्मार्थकता का प्रतिपादन ।
३. आश्मरथ्य 'औडुलोमि, काशकृत्स्न आदि आचार्यों के
मत से भी परमात्मकता का प्रतिपादन । पृ०५६६-६१६
७ प्रकृत्यधिकरण [सूत्र २३-२८]
१. पूर्वपक्ष-उपादान और निमित्त कारणकी लोकसिद्ध
पृथकता से परब्रह्म की निमित्तकारणता मात्र की
परिकल्पना ।
२. (सिद्धान्त -सृष्टि विषयक चिन्ता प्रणाली के आधार
पर तथा साक्षात् संबंध से ब्रह्म की निमित्त और
उपादान कारणता का विवेचन । स्थूल, सूक्ष्म अवस्था
भेद से निरंजनता आदि बोधक वाक्यों का उपपादन
तथा ब्रह्म के जगदुपादानता बोधक वाक्य का
वर्णन । —पृ०६१६-३५
८ सर्वव्याख्यानाधिकरण [सूत्र २६]
जगत् कारणता बोधक समस्त वेदांत वाक्यों की ब्रह्म
कारणपरता का निरूपण । —पृ०६३५-३६
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