श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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६ आरम्भणाधिकरण [सूत्र १५-२०]
१. असत्कार्यवादी कणाद आदि के मतों का दिग्दर्शन
स्वमतानुसार कार्य कारण के अभेद का समर्थन ।
शंकरादि सम्मत जीव ब्रह्मादि विषयक सिद्धान्त का
दिग्दर्शन शंकरादिमतों का निराकरण । अपने मत
और सिद्धान्त का उपसंहार ।
२. कार्याधीन करणोपलब्धि के आधार पर कार्य कारण
की अभिन्नता का समर्थन । वेदोक्त “असत्” शब्द
के अर्थान्तर का विवेचन । कार्य कारण के अभेद
में पटादि के दृष्टान्त का प्रदर्शन । एक ही वायु के
प्राण अपान आदि भेद के दृष्टान्त से एक ही ब्रह्म
की विचित्र जगत्कारणता का उपपादन । —पृ० ६६६-७२४,
७. इतरव्यपदेशाधिकरण (सूत्र २१-२३)
१. पूर्वपक्ष—जीव और ब्रह्म की एकता के मत में,
सर्वज्ञ ब्रह्म ने अपने लिए अहितकर दुःखमय जगत
रचना की, इस असंगति की आशंका ।
२. (सिद्धान्त)—श्रुति स्मृति पुराणों के आधार पर जीव
ब्रह्म के भेद का उपपादन । जड़ और जीव की
ब्रह्मभावानुपपत्ति का प्रदर्शन । स्थूल-सूक्ष्म, चेतना-
चेतन शरीरक ब्रह्म की कारण और कार्यावस्था का
निरूपण । पाषाण आदि के दृष्टान्त से उसकी पुष्टि ।
अविद्या के हेतु से जीव, ब्रह्म के विभागवादी मत
का खण्डन । —पृ० ७२४-३०,
८. उपसंहार दर्शनाधिकरण (सूत्र २४-२५)
१. पूर्वपक्ष—साधन निरपेक्ष ब्रह्म की जगत्कर्त्तृत्वानुपपत्ति
का दिग्दर्शन ।
२. (सिद्धान्त)--क्षीर जल आदि के दृष्टान्त से साधन
निरपेक्ष ब्रह्म की कर्त्तृता का प्रतिपादन । —पृ० ७३०-३३,