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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 696 में से

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पृष्ठ 354

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जान लेने से संपूर्ण जगत उसी के समान है, ऐसा सिद्ध हो जाता है] यदि
प्रधान को कारण न मानेंगे तो "हे सौम्य ! एक ही मिट्टी के ढेले से"
इत्यादिवाक्य में कथित मिट्टी के ढेले और उसके निर्माण पृथिवी के
दृष्टांत और दार्ष्टान्तिक में विषमता हो जावेगी। ऐसा जगत् कारण
वादी वाक्यों के विश्लेषण के प्रसंग में "प्रधान ही जगत का कारण है"
प्रतिपादन करते हुए, महर्षि कपिल ने कहा है। प्रतिज्ञा, दृष्टान्त
आदि सभी से सिद्ध होता है कि "सदेव" इत्यादि वाक्य आनुमानिक
प्रधान का ही बोधक है तथा वह प्रधान ही "सत्" शब्द वाच्य है।
इत्येवं प्राप्तेऽभिधीयते "ईक्षतेर्नाशब्दम्" इति । यस्मिन् शब्द
एव प्रमाणं न भवति, तदशब्दमानुमानिकं प्रधानं इत्यर्थः । न
तज्जगतकारणवादिवाक्य प्रतिपाद्यम् कुतः: ? ईक्षतेः, सच्छब्दवाच्य
संबंधव्यापार विशेषाभिधायिन ईक्षतेः धातोः श्रवणात् । "तदैक्षत
बहुस्यां प्रजायेयेति" ईक्षतक्रियायोगाश्चाचेतने प्रधाने न संभवति ।
अतः ईदृशेक्षणक्षमश्चेतनः विशेषः सर्वज्ञः सर्वशक्तिः पुरुषोत्तमः
सच्छब्दाभिधेयः । तथा च सर्वेष्वेव सृष्टिप्रकरणेष्वीक्षापूर्वकैव
सृष्टिः प्रतीयते "स ईक्षत् लोकान्नुसृजा इति स इमांल्लोकानसृजत"
"स ईक्षाञ्चक्रे-स प्राणानसृजत्" इत्यादिषु ।
उक्त मत के निराकरण के लिए "ईक्षतेर्नाशब्दम्" सूत्र प्रस्तुत करते
हैं। प्रधान के लिए शब्द (आगम) प्रमाण का नितांत अभाव है, इसलिए
आनुमानिक प्रधान जगत् कारण वाक्योक्त "सत्" शब्द का वाच्यार्थ
नहीं हो सकता, यही इस सूत्र का तात्पर्य है। यह प्रधान जगतकारण-
वादी वाक्य का प्रतिपाद्य तत्व नहीं है, क्योंकि-शास्त्र में जगतकर्त्ता के
लिए ईक्षण क्रिया का प्रयोग किया गया है। "उसने संकल्प किया कि-
अनेक होकर प्रकटूं" इस श्रुति में सत् शब्द बोध्य कारण का, संबंधी
व्यापार विशेष "ईक्षण" क्रिया का प्रयोग किया गया है। ईक्षण क्रिया का
योग अचेतन प्रधान में संभव नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि-ईक्षण की
क्षमता वाले चेतन विशेष, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति संपन्न पुरुषोत्तम ही "सत्"
शब्द वाच्य हैं। सारे सृष्टि प्रकरण में "ईक्षा" ही मुख्य कारण बतलाया