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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 696 में से

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पृष्ठ 353

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किं प्राप्तम् ? प्रधानमिति । कुतः ? “सदेव सौम्येदमग्र-
आसीदेकमेव” इत्यादि शब्दवाच्यस्य चेतनभोग्यभूतस्य सत्त्वरज-
स्तमोमयस्य वियदादिनानारूपविकारावस्थस्य वस्तुनः कारणावस्थां
वदति । अतो यद्द्रव्यं यत्स्वभावं च कार्यावस्थम्, तत्स्वभावं तदेव
द्रव्यं, कारणावस्थम् सत्त्वादिमयं च कार्यमिति गुणसाम्यावस्थं
प्रधानमेव हि कारणम् । तदेवोपसंहृतसकलाविशेषं सन्मात्रमिति
“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” इत्यभिधीयते । तत एव
च कार्यकारणयोरनन्यत्वम् । तथा सत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञान
प्रतिज्ञोपपत्तिः, अन्यथा “यथा सोम्येकेन मृत्पिण्डेन इत्यादि मृत्पिण्ड
तत्कार्यं दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोर्वैरूप्यं चेति जगत्कारणवादिवाक्येन
महर्षिणा कपिलेनोक्तं प्रधानमेव प्रतिपाद्यते । प्रतिज्ञादृष्टान्तरूपेणा-
नुमानवेषमेव चेदं वाक्यमिति सच्छब्दवाच्यमानुमानिकमेव ।
उक्त संदेह होने पर आनुमानिक प्रधान को ही सत् शब्द वाच्य मानने
का पक्ष प्रस्तुत करते हैं-“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्” इत्यादि-इस वाक्य
का “इदं” शब्द, चेतन भोग्य भूत सत्वरजतमोमय, अनेक रूपों में विकृत
आकाश आदि वस्तु की ही कारणावस्था बतलाता है [अर्थात् इदं शब्द
प्रत्यक्ष ग्राह्य सन्निहित वस्तु का ही बोधक है] कारण वस्तु की अवस्था-
न्तर प्राप्ति ही कार्यावस्था होती है [आकाश आदि महाभूत ही गुणमय
होकर स्थूलाकार में जगत् रूप से प्रकट होते हैं यही प्रधान कारणवाद
का सिद्धान्त है] जिस द्रव्य का जो स्वभाव कार्यावस्था में होता है वही
कारणावस्था में भी होगा । सत्व रजतमोमय जगत ही कार्य है तथा
साम्यावस्था वाला त्रिगुणात्मक प्रधान ही उसका करण है। अपनी
संपूर्ण विशेषताओं को छिपाये हुए यह प्रधान ही “सत्’था, ऐसा
“सोम्येदमग्र” आदि में कहा गया है । इस प्रकार कार्य कारण की
अभिन्नता भी प्रमाणित हो जाती है । तथा ऐसा मानने से “एक के
विज्ञान से सबका ज्ञान हो जाता है” यह सिद्धान्त भी सुसंगत हो जाता
है [अर्थात् जैसे पकते हुए चावलों में से एक चावल के देखने से सारे
चावलों की अवस्था का ज्ञान हो जाता है, वैसे ही त्रिगुणात्मक प्रधान को
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