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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 696 में से

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( २५६ )
का कारण है, उसी प्रकार प्रपंचनिवृत्ति भी नियोग का कारण
हो जायगा ।
अपि च-किं निवर्त्तनीयः प्रपंचो मिथ्या रूपो सत्यो वा ?
मिथ्यारूपत्वे ज्ञाननिवर्त्यत्वादेव नियोगेन न किंचित् प्रयोजनम् ।
नियोगस्तु निवर्त्तकज्ञानमुत्पाद्यतद् द्वारेण प्रपंचस्य निवर्त्तक इति
चेत् तत् स्ववाक्यादेव जातमिति नियोगेन न प्रयोजनम् । वाक्यार्थ-
ज्ञानादेव ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यमिथ्याभूतस्यप्रपंचस्य बाधित-
त्वात् सपरिकरस्य नियोगस्यासिद्धिश्च । प्रपंचस्य निवर्त्यत्वे प्रपंच-
निवर्त्तको नियोगः किं ब्रह्मस्वरूपमेव उत् तद्व्यतिरिक्तः ? यदि
ब्रह्मस्वरूपमेव निवर्त्तकस्य नित्यतया निवर्त्यप्रपंच सद्भाव एव न
संभवति । नित्यत्वे न नियोगस्य विषयानुष्ठान साध्यत्वं च न
घटते । अथ ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तः तस्य कृत्स्न प्रपंचनिवृत्ति रूप-
विषयानुष्ठान साध्यत्वेन प्रयोक्ता च नष्ट इत्याश्रयाभावादसिद्धिः :
प्रपंचनिवृत्तिरूपविषयानुष्ठाने नैव ब्रह्मस्वरूप व्यतिरिक्तस्य
कृत्स्नस्य निवृत्तत्वात् न नियोग निष्पाद्यं मोक्षाख्यंफलं ।
और भी एक बात विचारणीय है-निवर्त्तनीय प्रपंच मिथ्यारूप
है अथवा सत्य ? यदि मिथ्या है तो उसकी ज्ञान से ही निवृत्ति हो सकती
है, नियोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है। यदि कहो कि-नियोग ही,
निवर्त्तक ज्ञान को उत्पन्न करके, उसके द्वारा प्रपंच की निवृत्ति कराने
वाला निवर्त्तक है, तो श्रुति के वाक्य से ही जब ज्ञानोत्पत्ति हो
जाती है तो नियोग की आवश्यकता ही क्या है ? वाक्यार्थ ज्ञान से ही
जब, ब्रह्म से भिन्न, मिथ्यारूप सारा प्रपंचमय जगत बाध्य है तो नियोग
और नियोगांग सभी व्यर्थ हैं । यदि नियोग को प्रपंच निवर्त्तक मान भी
लें, तो उस प्रपंच निवर्त्तक नियोग का स्वरूप क्या होगा ? वह ब्रह्म
स्वरूप है अथवा कोई भिन्न वस्तु है ? यदि ब्रह्म स्वरूप है तो, ब्रह्म की
नित्यता से निवर्त्य प्रपंच भी नित्य हो जायगा तथा वह फिर प्रपंच तो
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