श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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अनुभव को निमित्त मान भी लें तो, जीवन निमित्तक (आजीवन) अग्नि-
होत्र आदि अनुष्ठान की तरह नित्य हो जायगा, जिससे मोक्ष के बाद
भी उसका अनुष्ठान आवश्यक हो जायगा । फल नियोज्य विशेषण भी
नहीं हो सकता, क्यों कि-फलस्वरूप होने से, नियोग निष्पन्न स्वर्ग आदि
फल की तरह, ब्रह्म ज्ञान का फल भी अनित्य हो जायगा ।
कश्चात्र नियोगविषयः ? ब्रह्मवेति चेत्, न-तस्य नित्यत्वे
नाभव्यरूपत्वात्, अभावार्थत्वाच्च । निष्प्रपंचंब्रह्म साध्यमिति चेत्,
साध्यत्वेऽपि फलत्वमेव । अभावार्थत्वान्न विधिविषयत्वम् ।
साध्यत्वं च कस्य ? किं ब्रह्मणः ? उत् प्रपंचनिवृत्तेः ? न तावत्
ब्रह्मणः सिद्धत्वात्, अनित्यत्वं प्रसक्तेश्च । अथ प्रपंचनिवृत्तेः । न
तर्हि ब्रह्मणः साध्यत्वम् । प्रपंचनिवृत्तिरेकविधि विषय इति चेत्,
न-तस्याः फलत्वेन विधिविषयत्वायोगात् । प्रपंचनिवृत्तिरेव हि
मोक्षः । स च फलम् । अस्य च नियोगविषयत्वे नियोगात् प्रपंच-
निवृत्तिः प्रपंचनिवृत्त्या नियोगः इतीतरेतराश्रयत्वम् ।
यहाँ नियोग का विषय है कौन ? ब्रह्म को नियोग का विषय
कहना असंगत होगा, क्यों कि-ब्रह्म नित्य है इसलिए वह भव्य अर्थात्
क्रिया संपाद्य नहीं हो सकता । निष्प्रपंचीकरण रूप नियोग का विषय
यदि ब्रह्म हो जायगा तो उसमें अभावात्मकता होगी; यदि ब्रह्म के
निष्प्रपंचभाव को ही साध्य मानते हो तो, वह साध्य होकर फलमात्र
ही रहेगा, अभावात्मक होने के कारण, विधिका विषय तो हो नहीं
सकेगा । फिर यहाँ साध्यता है किसकी ? ब्रह्म की या प्रपंचनिवृत्ति की
ब्रह्म की तो हो नहीं सकती, क्यों कि वह तो नित्य सिद्ध है, साध्य मानने
से वह अनित्य हो जावेगा । प्रपंचनिवृत्ति की साध्यता होने पर फिर
ब्रह्म की तो साध्यता हो नहीं सकती । प्रपंच निवृत्ति को ही विधि का
विषय नहीं कह सकते, क्यों कि-उसे विधि का फल बतलाया गया है,
इसलिए वह विधि का विषय नहीं हो सकता । प्रपंच की निवृत्ति ही
मोक्ष है, और वही फल है । मोक्ष नामक फल को विधि का विषय
बतलाने से अन्योन्याश्रय दोष होगा, अर्थात् नियोग जैसे प्रपंच निवृत्ति
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