श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔपनिषद् पद समूह इसी प्रकार एक मत है—"जिससे यह सारा
भूत समुदाय उत्पन्न होता है—हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह जगत
निश्चित ही एक अद्वितीय सत था-उसने इच्छा की अनेक हो जाऊँ तब
उसने तेज की सृष्टि की-यह जगत् सृष्टि के पूर्व एक ब्रह्म रूप ही था ।
सृष्टि के पूर्व यह आत्म स्वरूप ही था— ब्रह्म, सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप
है-इस आत्मा से आकाश प्रकट हुआ-सृष्टि के पूर्व प्रसिद्ध यह नारायण
रूप ही था-ब्रह्म आनंद स्वरूप है ।'' इत्यादि ।
न च व्युत्पत्तिसिद्धपरिनिष्पन्नवस्तुप्रतिपादनसमर्थानां
पदसमुदायानां अखिलजगदुत्पत्तिस्थितिविनाशहेतु भूताशेषदोष
प्रत्यनीकापरिमितोदारगुणसागरानवधिकातिशयानन्दस्वरूपे ब्रह्मणि
समन्वितानां प्रवृत्तिनिवृत्तिरूपप्रयोजन विरहादन्यपरत्वं,
स्वविषयावबोधपर्यवसायित्वात् सर्वं प्रमाणानाम् न च प्रयोजनानु-
गुण्या प्रमाण प्रवृत्तिः । प्रयोजनं हि प्रमाणानुगुणम् । न च प्रवृत्ति-
निवृत्त्यन्वयविरहिणः प्रयोजनशून्यत्वम् पुरुषान्वयप्रतीतेः । तथा
स्वरूप परेष्वपि "पुत्रस्तेजातः" "नायं सर्प" इत्यादिषु हर्षभयनिवृत्ति-
रूप प्रयोजनत्वं दृष्टम् ।
शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार सुव्यवस्थित वस्तु के प्रतिवादन में समर्थ
शास्त्रीय पदों का, जब समस्त जगत की सृष्टि-स्थिति और प्रलय के हेतु
निर्दोष, असीम उदार गुणों के सागर, अन्यन्त आनन्द स्वरूप ब्रह्म में ही
ऐकमत्य है तब, प्रवृत्ति-निवृत्ति रूप प्रयोजन रहित ईश्वर के होने से,
शास्त्रों की अन्यपरता होगी; ऐसी शंका भी असंगत है । समस्त प्रमाणों
की, अपने अपने विषयों को सुस्पष्ट करा देने में ही चरितार्थता होती है ।
प्रयोजन के अनुसार प्रमाणों की प्रवृत्ति होती हो, ऐसा भी नहीं है, अपितु
प्रयोजन ही प्रमाणों के अनुरूप होता है । प्रवृत्ति-निवृत्ति एकता से रहित
वाक्यों को प्रयोजन हीन भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि-सारे वाक्य
परमपुरुषार्य में एक मत प्रतीत होते हैं । उसी प्रकार "तुम्हारे पुत्र हुआ"
यह सर्प नहीं है" इत्यादि निष्पन्नार्थ बोधक वाक्यों में भी, हर्ष और भय
निवृत्ति रूप प्रयोजन दिखलाई देता है ।