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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

( २५३ )
दृष्टान्तानुपरोधात् “न वियदश्रुतेः” सूत्रों में सुष्ठु प्रतिपादन करेंगे ।
अन्य प्रमाणों से अगम्य वह ईश्वर, एकमात्र शास्त्र का ही विषय है”
“यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्य, उक्त लक्षणों वाले ब्रह्म के ही प्रतिपादक
सिद्ध होते हैं ।
४ समन्वयाधिकरण :—
यद्यपि प्रमाणान्तरागोचरं ब्रह्म; तथापि प्रवृत्तिनिवृत्तिपरत्वा-
भावेन सिद्धरूपं ब्रह्म न शास्त्रं प्रतिपादयतीत्याशंक्याह—
ब्रह्म, यद्यपि अन्य प्रमाणों का विषय नहीं है, फिर भी, शास्त्र
कभी स्वतः सिद्ध ब्रह्म का, प्रतिपादक नहीं हो सकता, क्योकि-ईश्वर में
प्रवृति निवृति कुछ भी नही है-इस संशय पर कहते है—
तत्तु समन्वयात् ।१।१।४—
प्रसक्ताशंकानिवृत्त्यर्थः तु शब्दः । तत् शास्त्र प्रमाणकत्वं
ब्रह्मणः संभवत्येव । कुतः ? समन्वयात्-परमपुरुषार्थतयाऽन्वयः
समन्वयः, परम् पुरुषार्थभूतस्यैव ब्रह्मणोऽभिधेयतयाऽन्वयात् ।
की गई आशंका की निवृति के लिए, सूत्र में तु शब्द का प्रयोग
किया गया है । तत् शब्द ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता की सम्भावना का
द्योतक है । सारे शास्त्र, एक मात्र ईश्वर को ही परं पुरुषार्थ प्रतिपादन
करते हैं । विधिपूर्ण अन्वय अर्थात् सम्बन्ध को ही समन्वय कहते है,
अर्थात् सारे शास्त्र ईश्वर को पर पुरुषार्थ मानने में एकमत है, इसीसे
ब्रह्म की शास्त्र प्रमाणकता सिद्ध होती है ।
एवमिव समन्वितो हि औपनिषदः पदसमुदायः “यतो वा
इमानि भूतानि जायन्ते”—“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्विती-
यम्”—“तदैक्षत् बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” “ब्रह्म वा
इदमेकमेवाग्र आसीत्”— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्”—
“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः
संभूतः” —— “एको ह वै नारायण आसीत् ” आनन्दो ब्रह्म”
इत्येवमादिः ।
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