सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

तृतीयः निष्यन्दः ३९७
(१) जब साधक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में स्थित रहते हुए वहीं
अपने चित्त को लीन करके, अन्तर्बहिःप्रदेश में एकाकार स्पन्दतत्त्व का आत्मानुभव प्राप्त
कर लेता है तब स्वातन्त्र्यपूर्वक प्रत्ययोद्भव के सृष्टि एवं संहार को निष्पादित करता हुआ
अपनी पूर्व लुप्त भोक्तृत्व पदवी प्राप्त कर लेता है फिर वह शक्तिचक्र का ईवर (स्वामी)
बन जाता है।
(२) प्रत्यभिज्ञाहृदयम् में कहा गया है—
'तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मकपूर्णांहन्तावेशात् सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिज-
संविद्देवताचक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवतीति शिवम् ॥'१
अर्थात् तब प्रकाशानन्दसार महामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णांहन्ता के साथ अभेद होने से
सदा सब प्रकार की सृष्टि एवं लय करने वाली अपनी संवित् शक्तियों पर प्रभुत्व स्थापित
हो जाता है।
(३) शिवत्व प्राप्त करने हेतु पशु को किसी नव्य वस्तु की शोध नहीं करनी
पड़ती और न तो कोई विलक्षण उपलब्धि प्राप्त करनी होती है। क्योंकि शिवत्व पशु का
अपना स्वभाव है। हाँ वह अपना स्वभाव ही भूल जाता है और इसीलिए बन्धन में पड़
जाता है किन्तु स्वरूप का परामर्श होते ही वह पुनः शिव बन जाता है—
'शिवत्वमस्य योगिनो न अपूर्वम्, अपितु स्वभाव एव, केवलं माया शक्त्युत्था-
पितस्वविकल्पदौरात्म्यात् भासमानमपि तत् नायं प्रत्यवम्रष्टुं क्षमः ॥'२
इस मुक्ति की प्रक्रिया के दो चरण हैं—(१) बोध का उदय ('शिवोऽहं शिवोऽहं
शिवोऽहं शिवोऽहं' की प्रत्यभिज्ञा) (२) अबोध का अन्त (अनात्मकता में आत्मभाव की
अनुभूति का उच्छेद) या प्रतिबन्ध की निवृत्ति ॥
इस सिद्धावस्था में योगी स्वातन्त्र्य एवं शक्ति चक्र का स्वामी बन जाता है—
चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति हो जाती है—खोयी हुई शक्तियाँ पुनः प्राप्त हो जाती हैं—और
यही है निर्वाण, मुक्ति, जीवन्मुक्ति, मोक्ष एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति।
शैवदर्शन की मुक्ति की विलक्षणताएँ—
इस दर्शन के अनुसार मुक्ति किसी उत्कृष्टतर देवलोक, शिवलोक, गोलोक,
वैकुण्ठ लोक, साकेत आदि की प्राप्ति नहीं है। प्रत्युत् मुक्ति—
(१) अपने सत्स्वरूप = परमार्थस्वरूप = या शिवत्व की प्रत्यभिज्ञा है।
(२) (यह स्वर्गलोक या मुक्ति धाम की प्राप्ति नहीं है प्रत्युत्) यह स्वस्वरूपा-
वस्थान है न कि कोई उत्क्रान्ति।
(३) यह स्वस्वरूप पर चढ़े आवरण को हटाना मात्र है।
(४) समस्त जगत् को अपना क्रीड़ांगन मान कर एवं विश्व के प्रत्येक पदार्थ को
१-२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।

३९८ स्पन्दकारिका
मन्मय (स्वस्वरूप) मानकर जो पूर्णाहन्ता की अनुभूति है वही जीवन्मुक्ति है और इस
संवेदन का अनुभविता जीवन्मुक्त है—
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'१
अर्थात् समग्र जगत् मेरा ही स्वरूप है—इस प्रथा का जिसे ज्ञान है वह समस्त
जगत् को 'अपनी आनन्दक्रीड़ा (लीला) के समान देखता हुआ सतत योग से युक्त होने
से जीवन्मुक्त है'—इसमें संशय नहीं है।
भोक्तृभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—
यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ ५१ ॥
जब (साधक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में अवस्थित होता हुआ
चित्त को लीन करके ध्वंस एवं प्रादुर्भाव दोनों को निष्पादित करता हुआ भोक्तृभाव प्राप्त
कर लेता है तथा उसके अनन्तर शक्तिचक्र का स्वामी बन जाता है ॥ ५१ ॥

  • सरोजिनी *
    जब बन्धनग्रस्त प्राणी परम तत्त्व में समावेश की क्रियाओं पर ध्यान आकृष्ट करता
    है और जब वह उसके द्वारा लय हो जाता है या उस पराहंता या स्पन्द तत्त्व के साथ
    अभिन्न हो उठता है तब वह निमीलन और उन्मीलन समाधि के उपायों के द्वारा लय का
    नियंत्रण करता है और विकास को दिशा देता है।
    एकत्र = पूर्णाहन्तात्मक स्पन्दतत्त्व में। स्थूल-सूक्ष्म पुर्यष्टक में।
    तस्य = उसके। पुर्यष्टक के।२ (भोग्यभाव = पशुत्व। पशुपति पशुभाव से मुक्त)
    संरूढ = लीन चित्त होकर: 'संरूहः सन्' ।
    बन्ध एवं मोक्ष पर विचार करने पर बोध का उदय एवं प्रतिबन्ध की निवृत्ति हो
    जाती है। दो पुर्यष्टकों में किसी एक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टक में पतित्व के सिंहासन पर
    आरूढ़ हो जाओ। अपने चित्त को विलीन कर दो। तब उनमें उदय-विलय होने वाले
    शब्दादि प्रत्ययों का नियंत्रण हो जाएगा। फिर तुम उनके भोग्य नहीं। भोक्ताभाव प्राप्त
    करोगे। भोग्यरूप पशुत्व से मुक्त होकर प्रभुभाव प्राप्त कर लोगे। कहा भी गया है—
    पशुओं के पति होकर पशुओं के पति हो जाओ। पशुपति होते ही तत्काल पशुत्व से
    मुक्त हो जाओगे।'—
    'पशूनां तु पतिर्भूत्वा पशूनां तु पतिर्भवेत्।
    पशुत्वान्मुच्यते सद्यो भूत्वा पशुपतेः पतिः ॥'
    स्वबोधोदयमञ्जरी—में भी कहा गया है—जो-जो कुछ भी मनोहर वस्तु तुम्हारे
    १. स्पन्दकारिका (३०) 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में उद्धृत सूत्र १६।
    २. स्पन्दनिर्णय।

तृतीयः निष्यन्दः ३९९
नेत्रों के सम्मुख आये, एकाग्र होकर उसकी तब तक भावना करो जब तक मन लीन न
हो जाय । निरोध तुम्हारा सेवक बन जाएगा—
‘तद्धन्मनोहरं किंचिदक्षिगोचरमागतम् ।
एकाग्रं भावयेत्तावद्यावलीनं निरोधकृत् ॥’
इस प्रकार स्वातन्त्र्य की प्राप्ति होती है तब पुरुष शक्तिचक्र का स्वामी (सर्वज्ञ,
सर्वाधिपति) होकर अभिव्यक्त हो जाता है—
‘एवं सति स्वातन्त्र्याप्तेस्ततश्चक्रेश्वरः शक्तिचक्रस्वामी सर्वज्ञतादियुतः सर्वाधि-
पतिर्भवेत् ॥’१
इस कारिका में बन्धनों के उच्छेद के उपायों पर प्रकाश डाला जा रहा है । अब
आत्मा रूप शिव के ऐश्वर्यरूप पतित्व की जिससे अभिव्यक्ति होती है उन उपायान्तर पर
प्रकाश डाला जा रहा है—
यदा तु = जब जिस दूसरे काल में स्थूल-सूक्ष्म होने के कारण इन पुर्यष्टकों के
प्रत्ययों के उद्भव के मूल स्रोत शरीर द्वय के मध्य ‘एकत्र’ = अन्यतर में (या प्राक्
प्रतिपादित उपपत्ति के द्वारा संवेद्यमान अर्थ के शरीर में व्यवस्थित होने पर भूतात्मक
भावात्मक भेदद्वय द्वारा स्थूल-सूक्ष्म शरीरों के मध्य एकत्र या ध्येय रूप में आलम्बनीय
स्थूल सूक्ष्म भावद्वय के मध्य एकत्र) संरूढः = सम्यक् रूप से अविलम्ब रूढ़; एकाग्रता
के प्रकर्ष द्वारा अभिन्न रूप से परिणत संवित्-साधक ।२
तदा = उस क्षण तस्य = उसका । अभेदप्रतिपन्न शरीर का । लयोद्भवौ =
त्याग-ग्रहणरूप विनाशोत्पाद । नियच्छन् = भोक्तृ शब्द से वक्ष्यमाण सत्य के कर्ता को
अपने कार्य के रूप में अवधारित करते हुए—अर्थात् मैं ही नित्य निरावरण स्वतन्त्र-
चिन्मात्रस्वरूप—इन दोनों का कर्ता हूँ—इस प्रकार निर्विकल्प रूप में व्यवस्थापित करते
हुए—भोक्तृतामेति—भोक्तृता प्राप्त कर लेता है, भोक्ता का अर्थात् उपलब्धिमात्र स्वभाव
परमात्मा का भाव भोक्तृता है । उसी समय वह प्रत्यभिज्ञा के द्वारा स्वीकार करता है—
ततः—सत्यात्मस्वरूप प्रत्यभिज्ञालक्षण के कारण ‘चक्रेश्वरो भवेत्’ चक्र का
(प्राक्प्रतिपादित चराचरभावपर्यन्त प्रसृत प्रपंच के द्वारा विस्तारित शब्दराशिसमुत्थित
स्वशक्तिसमूह का)—ईश्वर (अधिष्ठाता) अर्थात् स्वैश्वर्यवृजृंभामात्र रूप में अवगम्यमान
यथेष्ट विनियोक्ता—भेवत् = (संपद्येत्)—हो जाता है । तभी स्वाभाविक स्वातन्त्र्या-
भिव्यक्ति द्वारा पशुप्रत्यय के प्रध्वस्त हो जाने पर शक्तिचक्र की भोग्यता का त्याग करके,
उसके भोक्तृभावरूप ऐश्वर्य को प्रतिपादित करना चाहिए । अतः लयोद्भव दोनों को
भोक्ता आत्मा में—नियच्छेत्—निश्चित करना—चाहिए (निश्चयेत्) ॥
भाव यह है कि जिस प्रकार देहमात्र में आत्माभिमान रखने वाला कोई प्राणी
घटादिक बाह्य पदार्थ का (ग्राह्यतया प्रतिपन्न पदार्थ का) त्याग एवं ग्रहण अपने में यह
निश्चित करता हुआ कि—‘मैं ही इन दोनों का कर्ता हूँ’—करता है और इसी के
१. उत्पलदेव = ‘स्पन्दप्रदीपिका’ । २. रामकण्ठाचार्य—‘स्पन्दविवृति’ ।

४०० स्पन्दकारिका

अनुसार स्वतन्त्रकर्ता—को शरीरितानिविष्ट आत्मा मानता है—ठीक उसी प्रकार उस
शरीर की वेद्यभूमिका के आपादन द्वारा क्रियमाण त्याग एवं ग्रहण से विलक्षण, वेद्यत्व-
संस्पर्शासहिष्णु तथा अनन्यसाधारण कर्तृत्वस्वभाव वाली स्वात्मा में वस्तुसामर्थ्य द्वारा
नियमों का पालन करते रहने पर भी उसका पालन अबुद्धता के कारण नहीं हो पाता।
अतः शरीर एवं शरीरी में पार्थक्यगत विवेक का जिसको बोध हो उसी के लिए यह
उपदेश है अन्य के लिए नहीं। क्योंकि उसी प्रकार का साधक, जिसकी कि अनुग्रह
शक्ति से संशयग्रंथि शकलित हो चुकी है, परमात्मविषयक उपदेश का सत्पात्र है अन्य
नहीं। कहा भी गया है—'अयं सर्वस्य प्रभव इतः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति रमयन्ति च ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मां प्रापयन्ति ते ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥'
जिसके उपदेश से और उपदेश के अनुशील्यमान होने से—एकत्र = प्रतिपादित
शरीर के (अभेदात्मक रूप से प्रतिभासमान शरीर के) समनन्तर वेद्यीक्रियमाण का त्याग
ग्रहात्मक लयोद्भव उसके विधर्मी भोक्ता सर्वेश्वर स्वात्मा में ही स्वातन्त्र्यपूर्वक कार्यरूप
में नियम्यमान किये जाने पर नियंता के परस्वभाव प्रत्यभिज्ञा का आवाहन करने पर
समस्त ऐश्वर्यों की उपलब्धि प्रदान करता है।
अतः आत्मा रूप शिव की स्वेच्छा के ही अधीन है यह जगत् का प्रलय और
उसकी सृष्टिः 'प्रलयोदय' ॥१
आत्मस्वरूप शिव की स्वेच्छा से ही जगत् का प्रलय एवं उदय होता है—
'आत्मन एवं शिवस्य स्वेच्छामात्राधीनौ जगतः प्रलयोदयौ ।' जगत् भी उसके स्वरूप से
अभिन्न है अतः उसकी स्वशक्ति के चक्र का वैभव है—'जगदपि तत्स्वरूपाभेदात तस्य
स्वशक्तिचक्रमयो विभव इति ।' एक ही तत्त्व है। स्वरूप-परामर्श होने पर वह
अव्यभिचारधर्मक दिखाई देता है अतः उससे अतिरिक्त कोई अन्य पदार्थ हो भी नहीं
सकता—'अतो व्यतिरिक्तं किंचित् न संभवति' । कहा भी गया है—
'परमार्थे तु नैकत्वं पृथक्त्वाद् भिन्नलक्षणम् ।
पृथक्त्वैकत्वरूपेण तत्त्वमेकं प्रकाशते ॥
यत्पृथक्त्वमसंदिग्धं तदेकत्वान्न भिद्यते ।
यदेकत्वमसंदिग्धं तत्पृथक्त्वान्न भिद्यते ॥
द्यौः क्षमा वायुरादित्यः सागराः सरितो दिशः ।
अन्तःकरणतत्त्वस्य भागा बहिरवस्थितः ॥'
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति'।

तृतीयः निष्यन्दः ४०१
इसी भाव को अन्यत्र भी कहा गया है—
चित्रालोकविकल्पकल्पितनवाकल्पाङ्क नानाकृतिं,
नृत्यन्तीं बहुधा बहिः स्ववपुषोऽप्यन्तर्निभिन्नां पुनः ।
नित्यं नूतनकौतुकः प्रियतमां स्वां शक्तिमालोकयन्,
अच्छिन्नाप्रतिमप्रमोदमहिमा शंकुर्जयेत्येककः ॥
यहाँ श्लोक की समनन्तर व्याख्या करते हुए पुस्तक के प्रथम श्लोक में प्रतिज्ञात
स्वसंवेदन संवेद्य आत्मैश्वर्याद्रियलक्षणात्मक अर्थ को निर्वाहित किया गया है ।१
भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या करते हुए कहा है कि जब साधक स्थूल
या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होकर अपने चित्त को (स्पन्द तत्त्व)
लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार एवं सृष्टि को स्वातन्त्र्यपूर्वक सम्पन्न
करता हुआ अपने (विलुप्त) भोक्तृभाव । को प्राप्त कर लेता है और उसके अनन्तर
समस्त चक्रों का अधिपति बन जाता है—
‘यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः । तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य
लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति । ततः चक्रेश्वरो भवेत्
सर्वाधिपतिर्भवति ॥' (भट्टकल्लटः स्पन्दका० वृत्ति)
चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—५१वीं कारिका में सूत्रकार चक्रेश्वरत्व की उपलब्धि के
उपाय पर प्रकाश डालतें हैं। ५०वीं कारिका में सूत्रकार ने कहा था कि पुर्यष्टकत्व स्वयं
में ही एक बन्धन है—चाहे वह स्थूल पुर्यष्टक हो और चाहे सूक्ष्म पुर्यष्टक हो बन्धन-
स्वरूप तो दोनों हैं । पुर्यष्टक ही प्रत्ययोद्भव (सुख दुःख संवेदन) को जन्म देते हैं ।
यदि आत्मा को अपनी शक्ति या अपना अमृतस्वरूप आत्मस्वभाव ज्ञात न हो
सका तो यह अज्ञान ही आत्मा को बन्धन में डाल देता है ।
(१) अपनी शक्ति का अज्ञान बन्धन में डाल देता है ।
(२) आत्मविस्मृति बन्धन में डाल देती है । (स्वस्वरूप का अज्ञान = बन्ध)
(३) स्वस्वभाव (अपना आत्मस्वभाव) न जानना बन्धन में डाल देता है ।
(४) पुर्यष्टकत्व बन्धन में डाल देता है ।
(५) अशुद्धि (मल त्रय) बन्धन में डाल देती है ।
बन्धन से मुक्ति कैसे प्राप्त हो? चक्रेश्वरत्व कैसे अधिगत हो?
(१) संकल्पविकल्पात्मक चित्त को चितिशक्ति में संलीन करना चाहिए ।
(२) वासनापिण्डात्मक अपने पुर्यष्टक से मुक्ति भी आवश्यक है ।
(३) भोग्यभाव से मुक्त होकर भोक्ताभाव प्राप्त करना आवश्यक है ।
(४) स्वस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा करना आवश्यक है ।
(५) अपने पशुत्व का त्याग करके अपने पशुपतित्व के वास्तविक स्वस्वरूप की
अभिज्ञा आवश्यक है ।


१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' ।
स्पं० २६

४०२ स्पन्दकारिका
वृत्तिकार भट्टकल्लट कहते हैं कि—जब योगी स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी
भी एक पुर्यष्टक में स्थित रहकर ('यदा पुनः तु एकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः')
अपने चित्त को स्पन्दतत्त्व में संलीन कर देता है तब उस 'प्रत्ययोद्भव' के ध्वंसप्रादुर्भाव
('लयोद्भव') का निष्पादन करता हुआ अपने स्वाभावात्मक भोक्तृभाव को प्राप्त कर लेता
है और 'चक्रेश्वर' बन जाता है। अर्थात् समस्त शक्तियों का स्वामी बन जाता है।
'यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य
लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति । ततः चक्रेश्वरो भवेत्
सर्वाधिपतिर्भवति ॥'
स्थूल शरीर तो मृत्यूपरान्त छूट जाता है किन्तु सूक्ष्मशरीर जन्म जन्मान्तर कभी
नहीं छूट पाता। जब तक कि स्वरूप का साक्षात्कार नहीं होता तब तक सूक्ष्म शरीर से
मुक्ति नहीं मिल पाती ॥ पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन है। स्वरूप-लाभ ही उससे मुक्ति
का उपाय है। स्थूलशरीर—भूतात्मक शरीर है। सूक्ष्मशरीर—भावात्मक शरीर है।
कारिकाकार ने इस उपसंहार सूत्र में तीन बातों की ओर ध्यान दिलाया है—
(१) दोनों शरीरों में से किसी भी शरीर में अवस्थित रहिए किन्तु चित्त को स्पन्द
तत्त्व में संलीन कीजिए।
(२) 'स्पन्द तत्त्व' में चित्त का विलय करके प्रत्ययोद्भव के सृष्टि-संहार पर
आधिपत्य स्थापित करके भोक्ताभाव प्राप्त कीजिए।
(३) इस विस्मृत भोक्ताभाव को पुनः प्राप्त करके शक्तिचक्र के स्वामी अर्थात्
चक्रेश्वर बनिए। यही चक्रेश्वरत्वाधिगम साधना का सर्वोच्च फल है।
(४) भोक्तृत्वभाव की स्थिर उपलब्धि ही चक्रेश्वरता की प्राप्ति है। यही
शिवत्वाप्ति है। यही संसृति का अवसान है। यही मुक्ति या मोक्ष है।
सर्वोच्च सत्ता के रूप में केवल एक ही तत्त्व है जो कि 'तत्त्व' होते हुए भी
तत्त्वातीत है, विश्वात्मक होते हुए भी विश्वोत्तीर्ण है। वह प्रकाशात्मक शिव एवं
विमर्शात्मक शक्ति की समरसावस्था है।
तात्त्विक स्वरूप की दृष्टि में शिवा ही 'शक्ति' है और 'शक्ति' ही शिव है। शक्ति
= अहंविमर्शात्मक 'स्पन्द' ॥ विश्व = शिव की बहिर्मुखी शाक्त स्पन्दना ॥ सृष्टि =
'शक्ति' 'सृष्टिस्तु कुण्डलीख्याता'।
अभेदभूमि के स्तर पर देखा जाय तो पूर्णांहन्तात्मक स्पन्दशक्ति एक ही है।
बचती है बहिर्मुखीभूमि—यह है भेद भूमि। बहिर्मुखी विश्वावभासन करते रहना तो
'स्पन्द' का स्वस्वभाव है।
'स्पन्दतत्त्व' सामान्य भूमि का त्याग करके जब विशेष भूमिका पर अवरोहण करती
है तब वह भावभूमि एवं पाञ्चभौतिक भूमि दोनों पर भी अवतरित होती है और घट,पट,
सुख, दुःख आदि सभी भावों में रूपान्तरित होकर स्पन्दित होती है। विशेष स्पन्द क्या
है? घट, पट, एवं अन्य अनन्त जड़-चेतन, अनन्त शाक्त स्पन्द ही 'शक्तिचक्र' है।

तृतीयः निष्यन्दः ४०३
'तन्त्रालोक' (४ आ०) में अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं कि—शिव अपने
इच्छात्मक विमर्शन के माध्यम से सदैव शक्तिचक्र के 'संयोजन-वियोजन' (निमेषोन्मेष)
द्वारा अपने पंचकृत्यों का युगपत निष्पादन करते हैं और शक्ति चक्र के स्वामी होने के
कारण 'चक्रेश्वर' कहलाते हैं ।¹
बन्धन होता कैसे है? चक्रेश्वरत्व लुप्त कैसे हो जाता है? 'पति' पशु क्यों बन
जाता है । स्वरूपतः तो पशु एवं पशुपति में आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है
फिर एक मुक्त एवं दूसरा बन्धन ग्रस्त क्यों है?
शिव अपनी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आविर्भूत पुर्यष्टक की कारा में अपने को कैद
करके पशु बन जाता है और इस आवरणमूलक अवस्था में स्वस्वरूप को पूर्णतः भूलकर
अविवेकी, बन्धनग्रस्त, असमर्थ, अस्वतन्त्र, विमूढ़, मलावृत पराधीन पशु बना लेता है
—क्योंकि वह अपनी 'स्वतन्त्रता' खो देता है—अपनी शक्तियाँ खो देता है—आत्म-
स्वभाव का विमर्शनस्वरूप रत्नराशि खो देता है—
'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुपचर्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र्य-
शक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयन् अणुः इति उच्यते यथोक्तम्—
'व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्तसंकोचमुद्रणात् ।
विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥'
इति निजस्वरूपगोपनकेलिलोलम् एवं माहेशशक्तिपरिस्पन्दं प्रवरगुरवः प्रतिपेदिरे ॥
कहा भी गया है—
'अतिदुर्घटकारित्वात् स्वाच्छन्द्यान्निर्मलादसौ ।
स्वात्मप्रच्छादनक्रीडां पण्डितः परमेश्वरः ॥
अनावृते स्वरूपेऽपि यदात्माच्छादनं विभोः ।
सैवाविद्या यतो भेद एतावान्विश्ववृत्तिकः ॥'
बन्धन की प्रक्रिया—वही निखिलजगदात्मा, सर्वोत्तीर्ण, सर्वमय, संवित्प्रकाश,
अनवच्छिन्न चिदानन्दविश्रान्त, सर्वशक्तिखचित संविदात्मा महेश्वर अपने को संकुचित
करके अपनी माया शक्ति के द्वारा (अपनी आत्मा को अपने से ही संकुचित की भाँति
अवभासित करता हुआ) 'विज्ञानाकल' 'प्रलयाकल' एवं 'सकल' बन जाता है—'असौ
भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरित स्वातन्त्र्यशक्ति महिम्ना स्वात्मना एव आत्मानं
संकुचितमिव अवभासयन (१) विज्ञानाकलः (२) प्रलयाकलः (३) सकलश्च संपद्यते ।'²
वही शिव पशु बन जाता है यथा—
(१) १ आणवमल से संयुक्त = 'विज्ञानाकल' ।
(२) २ (आणव-मायीय) मलों से संयुक्त = 'प्रलयाकल' ।
१. अभिनवगुप्त : 'तन्त्रालोक' (चतुर्थ आह्निक) ।
२. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार' ।

४०४ स्पन्दकारिका
(३) ३ (आणव-मायीय-कार्म) मलों से संयुक्त = 'सकल' । 'सकल' है—
'कलादिधरण्यन्तमयाः ॥'
सृजनोन्मुख बन्धन प्रक्रिया—सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में स्थित रहकर
अपनी शक्तियों के द्वारा माया को क्षुब्ध करके—
(१) किंचित्कर्तृत्वलक्षणात्मक—'कलातत्त्व' ।
(२) किंचिदवबोधात्मक—'विद्यातत्त्व' ।
(३) किंचिदभिलाषरूपात्मक—'रागतत्त्व' ।
(४) 'तदेतत्सरार्गं कर्तृत्वं, भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यते तत् 'काल-
तत्त्वं'—'कालतत्त्व' ।
(५) 'तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् 'नियतितत्त्वं'—
'नियतितत्व' ।
इन (कला, विद्या, राग, काल एवं नियति) पञ्च-कञ्चुकों की सृष्टि करता है, इन्हीं
से आच्छादित होकर 'शिव' (मलावृत शिव) पशु बन जाता है । अन्तर्मलावृत पशु के ये
ही 'बहिराच्छादक तत्त्व' हैं—'कञ्चुकषट्कम् अन्तर्मलावृतस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् ॥'१
कहा भी गया है कि—अमित शिव कुञ्चकों से मित बन जाता है । ये कञ्चुक
आत्मा को बाह्यावरण की भाँति बनकर ढक लेते हैं किन्तु ये नित्य नहीं है प्रत्युत धान्य
की भूसी (तुषा) के समान होने के कारण पृथक् भी हो सकते हैं—
'माया कला शुद्धविद्या रागकालौ नियन्त्रणा ।
षडेतान्यावृतिवशात्कञ्चुकानि मितात्मनः ॥
एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कञ्चुकवत्स्थितः ।
तुषवत्कञ्चुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ॥'२
इस 'कला' से अग्रिम सृष्टि-संतति अस्तित्व में आती है—
कला → पुरुष में परिमित कर्तृत्व एवं (सुख दुःख मोहरूप भोग्य) का सृजन
करती है ।
→ अष्टगुणात्मिका बुद्धि तत्त्व का सृजन करती है ।
→ सात्विक-राजस-तामस त्रिस्कंधात्मक अहङ्कार का सृजन करती है । अहङ्कार
→ मन ।
अहङ्कार → इन्द्रियाँ । अहङ्कार → इन्द्रियाँ । अहङ्कार तन्मात्रा । अहङ्कार →
पञ्चमहाभूत ।३
यह जो समस्त सृष्टि है और यह जो निःशेष विश्व-प्रपञ्च है तथा जो यह ३६
तत्त्वों का प्रसार है—यह सब कुछ शिव का ही प्रसार है ।४ ये सारे तत्त्व संवित्-सिन्धु
की तरंगें हैं—
१-४. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार' ।

तृतीयः निष्यन्दः ४०५
'भूतानि तन्मात्रगणेन्द्रियाणि,
मूलं पुमान्कञ्चुकयुक्त्यशुद्धम्।
विद्यादि शक्त्यन्तभियान्ससंवित्,
सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'
'स अल उत्पुरिपुण्णा उ, स अल्ल उत्त उत्तिण्ण।
परि आणह अत्ताण उ, परि मसिनेण समाण उ ॥' १
'स्वातन्त्र्यशक्ति की महिमा से संसार में संसरण करते हुए परिमितप्रमातृता का
अवलम्बन करने वाले एक ही आदिदेव का यह अनेकात्मक तत्त्वप्रसार है जो कि जगत्
कहलाता है—
'एकस्यैव आदिदेवस्य स्वातन्त्र्यमहिम्ना संसारे संसरतः परिमितप्रमातृताम् अव-
लम्बमानस्य तत्त्वप्रसरः ॥' २
मुक्ति = भोक्तृ भाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—'मुक्ति' क्या है? उसकी प्राप्ति
की पद्धति क्या है?
'इच्छोपाय' 'ज्ञानोपाय' 'क्रियोपाय' या 'अनुपाय' के माध्यम से पारमात्मिकी
अनु-ग्रह शक्ति, शक्तिपात से पवित्रीभूत होकर तथा दीक्षादिक उपायों द्वारा यह
बन्धनग्रस्त अणु अपने 'संविदानन्दविश्रान्त, अद्वय एवं निजी स्वस्वरूप का साक्षात्कार
करता है—परामर्श करता है और इसके द्वारा ही वह अपने मौलिक एवं नित्य स्वस्वरूप
की प्राप्ति करता है और शिवत्व प्राप्त कर लेता है—
'कदाचित्परमेश्वरानुग्रहशक्तिपातपवित्रितः केनापि दीक्षादिना उपायेन संविदानन्द-
विश्रान्त अद्वयं निजं रूपं परामृशति, ततः स्वरूपमालम्बते ॥' ३
इसके अनन्तर वह 'शिव' बन जाता है—
तत्क्षणाद्भोपभोगाद्वा देहपाते शिवं व्रजेत् ॥ ४
ब्राह्मी आदि पशु शक्तियों का समुदाय विकल्पों के अनन्त अरण्य में दिग्भ्रमित
करके 'अणु' को स्वस्वरूप के चिन्तन से विरत करके उसे अपने भोक्ताभाव से च्युत
करके भोग्यभाव में अवतरित करके उसे जो बन्धन में डाल देती हैं उससे मुक्ति का
उपाय है।
(१) स्वरूप का परामर्श—(मलों से मुक्ति। पुर्यष्टक से मुक्ति)
(२) आत्म-प्रत्यभिज्ञा (शिवत्व की प्राप्ति)
(३) चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति (रामस्त शक्तियों का स्वामित्व)
(४) अहं विमर्शात्मक अनुसंधान (चित्त का चित् शक्ति में लय और स्वस्वरूपा-
नुभूति)
१-३. वामदेव भट्टाचार्यः 'जन्ममरणविचार'। ४. मालिनीविजय।

४०६ स्पन्दकारिका
'भोक्तृता एवं 'चक्रेश्वरत्व' ही इस अन्तिम (उपसंहारात्मक) कारिका का मुख्य
प्रतिपाद्य विषय होने के कारण निष्कर्ष यह निकलता है कि स्पन्द विज्ञान (स्पन्द सूत्र) का
अन्तिम लक्ष्य—भोक्ताभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति है और उसका साधन है
स्वरूपानुसंधान ॥
सूक्ष्मशरीर से आबद्ध पुरुष पराधीन होकर सूक्ष्मशरीर में समुत्थित सुख-दुःखादिक
संवेदन रूप प्रत्ययों का उपभोग करता है और इसी के परिणामस्वरूप वह आवागमन-
चक्र में फँसकर संसरण करता हुआ दुःखों का भोग करता है। आचार्य क्षेमराज ने ठीक
ही कहा है—'सुखदुःख मोहमयाध्यवसायादिवृत्तिरूपं तदुचितभेदावभासानात्मकं यत् ज्ञानं
तत बन्धः । तत्पाशितत्वादेव हि अयं संसरति' ।१
तन्त्रसद्भाव में भी कहा गया है—
सत्त्वस्थो राजसस्थश्च तमस्थो गुणवेदकः ।
एवं पर्यटते देही स्थानात्स्थानान्तरं व्रजेत् ॥२
इसी तथ्य को कारिकाकार ने भी कहा है—
'तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ।
पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थं प्रत्ययोद्भवम् ॥
भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात्संसरेत् ॥'३
'अतः संसृति प्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥'४
भट्टकल्लट 'स्पन्दसन्दोह' में कहते हैं—'अस्वतन्त्रो (पशुप्रमाता) भोगं सुखदुःख-
संवेदनरूपं भुङ्क्ते अश्नाति । तस्य पुर्यष्टकस्य भावात् संसरति संसारशरीरे, अतः
संसृति-प्रलयस्य जन्मरणप्रवाहरूपस्य 'संसारस्य विनाशकारणं संप्रचक्ष्महे वक्ष्यामः ॥'५
इस पुर्यष्टकाधीन अवस्था में पशुप्रमाता अपने पति प्रमातृत्व का विस्मरण कर
देता है और अपनी सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्वनित्यत्व-व्यापकत्व आदि शक्तियों को
संकुचित करके क्रमशः कला-विद्या-राग-काल-नियति का अनुवर्ती होकर 'शक्तिदरिद्री
संसारी' बन जाता है—
'तथा सर्वकर्तृत्व-सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-नित्यत्व-व्यापकत्व शक्तयः तथाविधश्च अयं
शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते ॥'६
किन्तु वही अपनी संकुचित शक्तियों के ऊपर आरोपित संकोचावरण हटा लेने पर
शिव बन जाता है—
'स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ॥'७
सारांश यह कि—पुर्यष्टकत्व संसारित्व एवं बन्धन का कारण है।


१. शिवसूत्रविमर्शिनी (३।२)। २. तन्त्रसद्भाव ।
३-४. स्पन्दकारिका । ५. स्पन्दसन्दोह
६-७. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (१०) ।

तृतीयः निष्यन्दः ४०७
'पूर्णाहन्ता' एवं 'चक्रेश्वरत्व' – त्रिकदर्शन का उच्चतम प्राप्तव्य एवं उसकी
पूर्णतम उपलब्धि 'पूर्णाहन्ता' एवं 'चक्रेश्वरत्व' है—
स्पन्दशास्त्र—(१) 'स्पन्दकारिका' यदा त्वेकत्वसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ (तृ०१५१)१
प्रत्यभिज्ञा शास्त्र—(२) 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' – (आचार्य क्षेमराज)
'तदा प्रकाशानन्दसारमहामन्त्रवीर्यात्मक पूर्णाहन्तावेशात् ।
सदा सर्वसर्गसंहारकारिनिजसंविद्देवता चक्रेश्वरता प्राप्तिर्भवति ॥२
तब प्रकाशानन्दसार, महामन्त्रवीर्यात्मक, पूर्ण अहन्ता के साथ अभेद होने से सदा,
सब प्रकार की सृष्टि एवं लय करने वाली अपनी संवित् शक्तियों पर प्रभुत्व स्थापित हो
जाता है ।
अहन्ता और मन्त्र—यही 'अहन्ता' समस्त मन्त्रों के उदय एवं विश्रान्ति का स्थान
है । इसके बल से ही भिन्न-भिन्न प्रयोजनों की सिद्धि होती है अतः इसे महती
'वीर्यभूमि' कहा गया है ।
'स्पन्दशास्त्र' में भी कहा गया है कि ३–'उस निरावरण चिद्रूपबल को अधिष्ठित
करके 'मन्त्र' सर्वज्ञत्व आदि सामर्थ्य से युक्त होकर (अनुग्रह आदि स्वाधिकार में प्रवृत्त
होते हैं यथा देहधारियों में इन्द्रियाँ) ..... 'तदाक्रम्य.... शिवधर्मिण ।
'प्रकाश' अर्थात् नील, सुख आदि की आत्मा में विश्रान्ति या लय 'अहंभाव'
दया 'पराहन्तापरामर्श' कहा गया है । समस्त अपेक्षाओं के निरुद्ध होने पर वही
'विश्रान्ति' (तृप्ति) 'स्वातन्त्र्य' 'मुख्य कर्तृत्व' एवं 'ऐश्वर्य' कहा जाता है—४
'प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहम्भावो हि कीर्तितः ।
उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वापेक्षानिरोधतः ॥
स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ॥'
'नित्योदित समाधि' के समुपलब्ध हो जाने पर चिदानन्दघन समस्त मन्त्रों की
प्राणरूपा, पराभट्टारिका अहन्ता (अकृत्रिम स्वात्म चमत्कार) से योगी अभिन्न हो जाता है
और तब कालाग्नि से लेकर शान्त्यतीता चरम कला पर्यन्त विश्व के विचित्र सृष्टि एवं
प्रलय करने वाली संवित् शक्तियों का ऐश्वर्य प्रस्तुत परमयोगी को प्राप्त होता है । यह
सब शिवस्वरूप ही है ।५
'अहन्ता' क्या है? अहन्ता अकृत्रिम स्वात्मचमत्कार है—
'अहन्ता अकृत्रिमः स्वात्मचमत्कारः ॥'६
महामन्त्रवीर्य रूप पूर्णाहन्ता में आवेश का अर्थ है—देह, प्राण आदि के
निमज्जन (विलय) से पराहन्ता पद की प्राप्ति द्वारा देहादिकों एवं नीलादिकों का भी उसी
रस में डूबने से तन्मयीकरण ॥ 'विभु की मायाशक्ति द्वारा भिन्न-भिन्न बाह्य एवं आभ्यन्तर
१. स्पन्दकारिका (तृ०१५१) २-६. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

४०८ स्पन्दकारिका
वस्तुसमूह का विश्रान्ति स्थान वही प्रत्यवमर्शात्मक परावाक् स्वरूप चिति, ज्ञान,
सङ्कल्प, अध्यवसाय, स्मृति एवं संशय के नाम से कही गई है ।
'माया शक्त्या विभोः सैव भिन्नसंवेद्यगोचरा ।
कथिता ज्ञानसङ्कल्पाध्यवसायादिनामभिः ॥'१
स्वप्नादिक अवस्थाओं, देह, प्राण, सुख दुःख आदि द्वारा परिबद्ध मनुष्य अपनी
माहेश्वरी चिति शक्ति को नहीं पहचानता । जो ज्ञानात्मक अमृत सिन्धु में फेनपिण्ड के
समान विश्व को देखे वही साक्षात् शिव है ।२
अहंता और पूर्णतम सिद्धि—तांत्रिक त्रिक दृष्टि १. परिमित अहंता का त्याग ।
२. भगवत्स्वरूप अहंता का ग्रहण । 'विश्वाहंता' परम सिद्धि है—परम उपलब्धि है ।
विश्व में अपने शिवस्वरूप को देखना अहंपरामर्श के प्रकार—शुद्ध अहंपरामर्श और
मायीय अहं परामर्श हैं ।
(१) शुद्ध परामर्श—विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में या विश्व की
छाया से अस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है ।
(२) मायीय या अशुद्ध परामर्श—वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को
आलम्बन बनाता है ।
विज्ञानभैरव : 'सर्वं देहं चिन्मयं हि जगत् वा परिभावयेत् ।
युगपन्निर्विकल्पेन मनसा परमोदयः ।। (६२)
(१) ब्रह्मवादी—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता एवं परमसिद्धि
'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति है ।
(२) शाक्त = परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमसिद्धि एवं
आत्म विकास की पराकाष्ठा—
'अहं देवी न चान्योस्मि' की अनुभूति में है ।
(३) शैव—परमज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राणि,
परमतत्त्वरूपता, परम सिद्धि एवं अपने स्व का सर्वोच्च विकास—
'शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं शिवोऽहं' की अनुभूति में है ।
(४) बौद्ध—परम ज्ञान, परमोच्चता, परमोपलब्धि, पूर्णता, परम पद का
अधिगम, परम तत्त्वज्ञा, परमसिद्धि एवं अपने स्व का पूर्णतम विकास 'विज्ञान' एवं
'शून्य' या शून्यस्थानीय 'महासुख' की प्राप्ति में है ।
(५) त्रिक, स्पन्द, क्रम (काश्मीरीय शैवदर्शन) परमज्ञान, परमोच्चता,
परमोपलब्धि, पूर्णता, परमपद की प्राप्ति, परमतत्त्व रूपता, परमसिद्धि, अपने स्व का
पूर्णतम विकास, 'चक्रेश्वरत्व' 'नित्योदित समाधि' 'स्वरूपावस्थान' 'स्वात्मपरामर्श'--
इस अनुभूति में है कि—
१-२. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ।

तृतीयः निष्यन्दः ४०९
(क) 'मैं विश्वमय हूँ'—विश्व मेरा विराट् प्रसार है।
(ख) मैं विश्वमय के साथ उससे परे 'विश्वातीत भी हूँ'
(ग) मैं पंचकृत्यकारी शिव हूँ।
पूर्णाहन्ता—पूर्णाहन्ता में स्वातन्त्र्य अभिन्न रूप में रहता है—इसी स्वातन्त्र्य का
नाम 'परावाक्' या 'महामातृका' है। मातृका ही प्रत्यवमर्शकारिणी शक्ति है यानी प्रकाश
तभी अपने को प्रकाश रूप में पहचान पाता है जब उससे मातृका जुड़ती है। मातृका के
अन्तर्लीन हो जाने से प्रकाश ही प्रकाश रहता है किन्तु वह अपने को प्रकाश कहकर
पहचान नहीं सकता क्योंकि प्रत्यवमर्शन शक्ति 'मातृका' में ही रहती है। मातृका
स्वरूपभूता शक्ति है। यह जो शक्ति है इसी का आश्रय लेकर ही समस्त सत्ता प्रकाशित
होती है।
समस्त जगत्, ईश्वर, जीव एवं ज्ञेय जड़ पदार्थ व्यष्टि एवं समष्टि रूप में मातृका
से उद्भूत हैं। पूर्ण एवं अपूर्ण दोनों अहं में मातृका की ही क्रीड़ा है। पूर्ण अहं
सम्पूर्णमातृकामय है आदि में अकार एवं अन्त में हकार—यह महामण्डल मातृका
मण्डल है। अ = प्रकाशमान। ह = विमर्श॥
'पूर्ण अहं' परमेश्वर का नित्यसिद्ध निजस्वरूप है। पूर्ण अहं एक एवं अभिन्न
हैं। 'पूर्णअहं' चैतन्यस्वरूप है इसमें इदन्ता नहीं इसमें केवल अहंता ही है। 'इदन्ता'
स्वातन्त्र्यबल से सृष्टिमुख में आविर्भूत होती है। उस सृष्टि का नाम है 'महासृष्टि'। जो
कुछ है—था—या होगा—सभी नित्य वर्तमान रूप में उस 'महासृष्टि' में स्थित है। वहाँ
काल नहीं है। उसमें अतीत, अनागत एवं वर्तमान कुछ भी नहीं है। जिस किसी समय
में, जहाँ कहीं भी कुछ था—या होगा—'महासृष्टि' में वह विद्यमान है किन्तु यह अवस्था
पूर्णावस्था नहीं प्रत्युत संकुचित अवस्था है क्योंकि वह इदरूप में भासमान है अहं रूप में
नहीं। पूर्णअहं—महासृष्टि। महासृष्टि का संहार = महासंहार॥ काल के हिसाब से यह
अकल्पनीय है। इसका अवसान होता है—पूर्णाहंतावबोध के साथ-साथ क्योंकि उस
समय इदंभाव नहीं रहता। इसे ही पूर्णतालाभ, परमेश्वरत्व, परमशिवभाव कहते हैं। यह
पूर्णसत्ता वेदान्त का ब्रह्म नहीं है क्योंकि ब्रह्म—अहंभाव वर्णित है—किन्तु पूर्णाहन्ता में
अहंभाव का पूर्णत्व है। महाशक्ति का सर्वात्मना परमशिव के साथ सामरस्यभाव—इस
अवस्था की विशिष्टता है।
'विश्वाहंता' अहंता का सर्वोच्च शिखर है—उच्चता की परा काष्ठा है—सिद्धि
एवं उपलब्धि का 'एवरेस्ट' है।
'चक्रेश्वरत्व' पूर्णता का वैभवात्मक पक्ष है और 'विश्वाहन्ता' आत्मविस्तार,
चैतन्य-प्रसार एवं आत्मपरामर्श का उच्चतम शिखर है।
'चक्रेश्वरत्व' एवं 'पूर्णाहन्ता' दोनों प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्दशास्त्र में प्रतिपादित है।
विश्वाहंताः समस्त विश्व के साथ अहंभाव है।
(१) विहाय निजदेहास्थां सर्वत्रास्मीति भावयन्।
(दृढ़ेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥) ॥ १०२ ॥

४१० स्पन्दकारिका
(२) 'विज्ञानभैरव' 'सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।
युगपद् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥'
अहं—
'अहं' : विश्वात्मक एवं विश्वोत्तीर्ण दोनों है ।
'विश्वात्मविश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् ।
अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ॥ (विमर्शदीपिका)
गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट के द्वारा स्पन्दकारिका के प्रणयन की पुष्टि—
अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् ।
वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥ ५२ ॥
वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।
रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥
मैं गंभीर एवं अपार संशय के समुद्र से पार उतारने वाली तथा विचित्र शब्दार्थों
वाली तथा अद्भुत गुरुवाणी की वन्दना करता हूँ ॥ ५२ ॥
तत्त्वद्रष्टा गुरु वसुगुप्त से यह (उपदेश) प्राप्त करके श्री भट्टकल्लट ने इसके
रहस्य को भलीभाँति श्लोकबद्ध कर दिया ॥ ५३ ॥
भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' एवं रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति'
में तिरपनवीं कारिका समाविष्ट नहीं है ।

  • सरोजिनी *
    गुरुभारती = गुरु की शक्ति सम्पन्ना वाणी ॥
    ग्रन्थ के अन्त में ग्रन्थकार परम स्पन्द भूमि (The Supreme state of
    spanda) रूपा 'गुरुभारती' (गुरु वाणी) को नमस्कार करते हैं ।
    विज्ञानभैरव (२०) में शिव की शक्ति को शिव का मुख कहा गया है—'शैवी
    मुखमिहोच्यते ॥'१
    अगाधसंशयाम्भोधि = अथाह शङ्काओं का समुद्र । (Fathomless sea)
    'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥ (कल्लट) समुत्तरणतारिणी = उद्धार करने की नाव ।
    वन्दे = अभिवादन करता हूँ । (समाविशामि) 'सर्वोत्कृष्टेन समाविशामि' विचि-
    त्रार्थपदां = विचित्र अर्थों से युक्त पदों वाली ।
    चित्रां = विचित्र । लोकोत्तर चमत्कार रूपा ।
    तां = उस । गुरु = शिवधाम प्राप्ति कराने वाले आचार्य ।२
    गुरुभारतीम् = गुरुवाणी को । वह वाक् जो कि गुरु का कार्य करती हो ।
    परावाक् को ।
    १-२. स्पन्दनिर्णय ।

तृतीयः निष्यन्दः ४११
वह सर्वोच्च वाणी (Supreme speech) जो पश्यन्ती, मध्यमा आदि समस्त
वाणियों का केन्द्र हो । यही वाक् शिवधाम पहुँचाती है ।
(अथ च गुरुं पश्यन्त्यादि क्रोडीकारात् महतीं भारतीं परां वाच्यम्)
'वन्दे' = वह गुरुभारती जो असाधारण एवं सभी के लिए सर्वोच्च है उसमें प्रवेश
करता हूँ ।
विचित्रार्थपदां = (नानाचमत्कारप्रयोजनानि पदानि विश्रायन्तो यस्यां परस्यां वाचि
तां विचित्राणि)१
मैं उस असामान्य (लोकोत्तर) गुरुवाक् के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ या
उसमें सम्यक् रूप से प्रवेश करता हूँ जो कि सर्वोत्कृष्ट है, जो लौकोत्तर है—अद्वितीय
आनन्द स्वरूप है । या मैं—
उस वाणी का अभिकथन करता हूँ जो कि मुझे आह्लाद प्रदान करती है क्योंकि
यह सभी अवस्थाओं में स्फुरित है और जो कि व्यक्ति को अपनी सत्यता (स्वरूप) को
जानने हेतु आत्मचिंतन में निरत रहने की योग्यता प्रदान करती है ।
गुरुभारती—वह परा वाणी जो कि पश्यन्ती प्रभृति समस्त वाणियों के विभिन्न
रूपों को आलिंगित किये हुए हैं ।
वन्दे = 'स्वरूपविमर्शनिष्ठां तां समावेश्टुं संमुखीकरोमि ।' 'सर्वावस्थासु स्फुरद्रू-
पत्वात् अभिवदन्ती उद्यन्तृता प्रयत्नेन अभिवादये ।।'२
वसुगुप्तात् = आचार्य वसुगुप्त से । वसुगुप्त ने ही शिव सूत्रों को पहाड़ के
पत्थरों पर उत्कीर्ण रूप में पाया था ।
अवाप्य = प्राप्त करके ।
इदं = इस त्रिक ज्ञान को । ज्ञानघन को ।
तत्त्वार्थदर्शी—तत्त्वों के रहस्यों को जानने वाले ।
रहस्यं = अवाच्य, अगम्य एवं गूढ़ तत्त्व ।
नित्य शङ्करात्मक स्वस्वभाव समावेश को प्राप्त करने हेतु इस शास्त्र का उपदेश
किया गया है ।
आचार्य उत्पलदेव कहते हैं—हमारे गुरु की वाणी आश्चर्यकारिणी है । उसके वाच्य
और वाचक—अर्थ और पद—दोनों ही विचित्र हैं । अगाध संदेह के पयोधि में निमज्जित
होते हुए लोगों का संतरण करने वाली यह नौका है । मैं उसकी वन्दना करता हूँ ।
गुरु से श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है । जयाख्यसंहिता में कहा गया है—स्वयं
प्रकाश भगवान् जगन्नाथ ही मन्त्रमय शरीर धारण करके करुणावश अपने शास्त्ररूपी कर
कमलों से संसार—समुद्र में डूबते हुए लोगों का उद्धार करते हैं—
'यस्माद्देवो जगन्नाथः कृत्वा मन्त्रमयीं तनुम् ।
मग्नानुद्धरते लोकान् कारुण्याच्छास्त्रपाणिना ।।'
१-२. स्पन्दनिर्णय ।

४१२ स्पन्दकारिका
'नारद संग्रह' में भी कहा गया है—संसार का मूलोच्छेद करने वाले गुरु को
अपने सर्वस्व की दक्षिणा दे देना भी बहुत थोड़ा है'—
'गुरवे दक्षिणां दद्यात् सर्वस्वं सार्थमेव वा ।
सर्वस्वमथवाऽत्यल्पं संसारोच्छेदहेतवे ॥'
'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा गया है—जिसके मन में भगवत्प्राप्ति की अभिलाषा हो,
उसे पहले गुरु का अन्वेषण करना चाहिए ।' भगवान् की पहचान होती है—शास्त्र से
और शास्त्र का अनुभवात्मक ज्ञान होता है—गुरु से । शास्त्रज्ञान से विषयज्ञान का विलय
हो जाता है । सच पूछो तो प्रत्यभिज्ञा भर का विलम्ब है; भगवान् तो मिला हुआ ही है ।
अतः शास्त्र और ईश्वर दोनों से गुरु श्रेष्ठतर है—
'भवत्प्राप्तिकामो यस्तेनान्वेष्यो गुरुर्यतः ।
भगवान् ज्ञायते शास्त्राच्छास्त्रं च ज्ञायते गुरोः ॥
तद्बोधात् ज्ञानविलयाज्ज्ञानाप्तौ प्राप्त एव स ।
तस्माच्छास्त्रादीश्वराच्च गरीयान् गुरुरुच्यते ॥'¹
पञ्चरात्र में भी कहा गया है—'यथा भगवत्येव वक्तुरि वृत्तिः' अर्थात् 'गुरु के साथ
वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा भगवान् के साथ ।'
भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य सम्यक् रूप से प्राप्त
करके इसे श्लोकबद्ध किया ।'
यह ब्रह्मविद्या का बीज है । बिना परीक्षा किए अयोग्य क्षेत्र में इसको बोना नहीं
चाहिए—'इदं च ब्रह्मविद्याबीजं नाऽपरीक्ष्याऽस्थाने वपेत् ॥'
भट्टकल्लट ने अन्यत्र भी कहा है—सिद्ध विद्या एक गुणवती कन्या के समान
है । गुणवर्जित पुरुष के प्रति उसका दान करने से वह संभोग तो देती ही नहीं, दाता को
अपकीर्ति का भी कारण बनाती है । इसलिए सद्गुणसम्पन्न को ही इस विद्या का उपदेश
देना चाहिए—
'गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणावर्जिताय ।
संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥'
इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता ।
सतां सुपर्णादिशेव शुद्धामलगुणोज्ज्वला ॥
वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु ।
शुद्ध बोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका ।
तस्मात् प्रोत्सार्य मात्सर्यमर्थमर्थं विचार्य च ।
आर्यैराश्चर्यभूताया न कार्योऽस्या अनादरः ॥
अब कारिकाकार एक, अद्वैत आत्म तत्त्व के अज्ञान का कारण मात्र संशय को
बताता हुआ कहता है कि वह महाकारण सद्गुरु के बिना उन्मूलित होना संभव नहीं है ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—(उत्पलदेवाचार्य) ।

तृतीयः निष्यन्दः ४१३
परमेश्वर गुरुमूर्ति में प्रवेश करके अपने अनुग्राह्यों को स्वप्रत्यभिज्ञापन द्वारा उपदेश देता
है—'परमेश्वरो हि गुरुमूर्तिमाविश्य अनुग्राह्यान् स्वप्रत्यभिज्ञापनेन प्रबोधयति ।।'
ताम् = उसको । उस । जिसके स्वरूप का प्रतिपादन करना अशक्य है ऐसी उस,
हृदय में स्फुरित वाणी को ।
गुरुभारतीं वन्दे = गुरु वसुगुप्त के सिद्धमुख से निःसृत समस्त रहस्योपनिषद्भूत
स्पन्दतत्त्वामृतनिष्यन्दरूपा वाणी को नमन करता हूँ—स्तुति करता हूँ । वह वाणी है
कैसी ? अगाध = जिसका गाध (विश्रान्ति भूमिका) अविद्यमान हो ।
संशय = तत्त्व की अप्राप्ति रूप विभ्रमः 'संशयः तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः ।।'
अम्भोधि = समुद्र । यह संशयपूर्ण विभ्रम दुर्जरकल्पोर्मि जाल संकुलत्व से परिपूर्ण है ।
समुत्तरणे = सम्यक् विलङ्घन । तारिणीम् = नावम् । संसार सागर से पार करने
वाली नौका ।
विचित्रार्थपदां = अत्यद्भुत अभिधेय (विचित्रार्थ) वस्तु जिसमें ऐसे पदों वाली ।
चित्रां = विचित्र । घटनाविशेषशाली होने के कारण विस्मयाधायी ।। विचित्र एवं
चित्र—दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग शब्दगत एवं अर्थगत वैचित्र्य का संसूचक है ।
सकल लोकाशय निर्विषय लोकोत्तर प्रबुद्ध हृदय संवादी विचित्रार्थ पदों के अर्थ
का प्रतिपादन करने वाली चित्रा पदवाक्य रचना । वृत्तिकार ने कहा है—'अगाधो हि
अप्रतिष्ठोऽनन्तः ।।' १
यद्यपि तिरपनवीं कारिका भट्टकल्लट एवं रामकण्ठ की 'वृत्ति' एवं 'विवृति' में
नहीं है किन्तु उत्पलाचार्य की 'स्पन्दप्रदीपिका' में है । भट्टकल्लट ने इस पर कोई
व्याख्या भी नहीं की ।
उत्पलदेवाचार्य ने स्पन्दप्रदीपिका के अन्त में संभवतः 'रहस्य' शब्द को दृष्टि में
रखकर इसे अपायों को अदेय कहा है क्योंकि यह 'ब्रह्मविद्या बीज' है—'इदं च ब्रह्म-
विद्याबीजं नाऽपरीक्षाऽस्थाने वपेत्' उक्तञ्च—
गुणैरुपैताऽपि तु सिद्धविद्या कन्येव दत्ता गुणवर्जिताय ।
संभोगहीना विदधात्यकीर्तिं दातुर्यतस्तत्प्रगुणाय दद्यात् ॥
इत्यविद्यातमःस्थानां दर्शनाय प्रकाशिता ।
सतां सुपर्णा देशेव शुद्धामल गुणोज्ज्वला ॥ २
वागलुण्ठनार्थमन्येषां विद्वन्मन्यताऽपि तु ।
शुद्धबोधोल्लासवशात् कृता स्पन्दप्रदीपिका ॥ ३
'अगाधसंशयाम्भोधि' = अगाध = 'अविद्यमानो गाधो विश्रान्ति भूमिका यत्र'
(रामकण्ठाचार्य)
संशय = तत्त्वाप्रतिपत्तिरूपो विभ्रमः । दुर्जर विकल्पोर्मिजालसंकुल होने से अम्भोधि
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दविवृति' । २-३. स्पन्दप्रदीपिका ।

४१४ स्पन्दकारिका
समुत्तरण = सम्यक् विलंघन (रामकण्ठ) कारिकाकार का कथन है कि मैं आश्चर्यान्वित
करने वाले शब्दों एवं अर्थों से संवलित एवं अतिशय अद्भुत (सरस्वती के समान अनन्त
ज्ञान, अनन्त योगसिद्धि, अनन्त शक्ति पावित्र्य तथा अमोघ फल प्रदा) गुरु-वाणी की
वन्दना करता हूँ जो कि अत्यन्त गंभीर तथा अमित संशय-सागर को पार कराने वाली है ।
वृत्तिकार भट्टकल्लट ने इस कारिका की सविस्तार व्याख्या तो नहीं की है किन्तु
'अगाध' शब्द को रेखांकित अवश्य किया है । 'अगाध' शब्द सामान्यतया अथाह,
अपार एवं अपरिमेय का बोधक है । वृत्तिकार ने इसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' एवं 'अनन्त'
किया है—'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः' ।१
भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में 'संशय' को विनाश का कारण माना है—'संशयात्मा
विनश्यति' (गीता) ।
अगाध = (१) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्य ।' (जिसका अपना कोई
अधिष्ठान नहीं है ।)
(२) 'न अस्ति गाधो विश्रान्ति भूमिका यस्मिन् ।' (जिसमें विश्राम लेने के लिए
कोई पुलिन नहीं है ।)
(क) अप्रतिष्ठ = जिसका कोई अधिष्ठान या वास्तविक आधार नहीं है ।
(ख) अनन्त = जो अन्तहीन है । 'दुष्पार' 'दुरतिक्रम' । अप्रतिष्ठ = निराधार,
आधार-शून्य, अयथार्थ । अज्ञान-कल्पित होने के कारण संशय निराधार है ।
वृत्तिकार का अभिप्राय—वृत्तिकार यह संदेश देना चाहते हैं कि—
(१) जीवों के डूबने का कारण 'संशय' है ।
(२) यह संशय दुस्तर समुद्र के समान है ।
(३) स्वरूप-साधना (स्वस्वरूप-प्रत्यभिज्ञा) यथार्थ का दर्शन कराकर समस्त
संशयों का उच्छेद कर देती हैं अतः संशय समुद्रवत् दुस्तार दिखाई पड़ते रहने पर भी
गुरु भारती के द्वारा प्रकाशित आत्मस्वरूप का साक्षात्कार होने के कारण दुस्तार समुद्र
सूखकर इतना निर्विघ्न बन जाता है कि मानों वह पूर्णतया 'अप्रतिष्ठ' (आधारहीन) हो
और केवल मन की भ्रान्ति मात्र हो, न कि वास्तविक ॥ यही वास्तविकता भी है क्योंकि
जीवत्व (अणुत्व) सत्य नहीं है अपितु शिवत्व ही सत्य है—जीवत्व केवल एक 'संशय'
है—कल्पना है—मायावरण है और वास्तविकता तो यह है कि—'सर्वशक्ति योगेऽपि
आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरूपचर्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्मानं संकु-
चितमिव आभासयन् 'अणुः' इति उच्यते । यथोक्तम्—'व्यापको हि शिवः स्वेच्छाक्लृप्त-
संकोचमुद्रणात् विचित्रफलकर्मौघवशात्तत्तच्छरीरभाक् ॥'२
स्वयं 'शिव' ही अपनी 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के माध्यम से अपनी माया शक्ति के द्वारा
अपने अमित स्वरूप को संकुचित करके अणु (अज्ञानोपहित जीव) बन जाता है ।
१. 'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) । २. 'जन्ममरणविचार' ।

तृतीय: निष्यन्द: ४१५
वह एक आणव मल से उपहित होकर—'विज्ञानाकल' बन जाता है । वह दो
आणव मलों से उपहित होकर—'प्रलयाकल' बन जाता है और वह तीन आणव मलों से
उपहित होकर—'सकल' बन जाता है ।
'असौ भगवान् स्वमायाशक्त्याख्येन अव्यभिचरितस्वातन्त्र्यशक्तिमहिम्ना स्वात्म-
नैव आत्मानं संकुचितमिव अवभासयन् विज्ञानाकलः, प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ॥' १
अतः जीवत्व भी एक भ्रान्तिमूलक उपाधि है । सत्य तो 'शिवत्व' है । जीवत्व
शङ्कराचार्य की दृष्टि के समान मिथ्या भी नहीं है क्योंकि स्वयं शिव ही जीव है । होता
यह है कि सृष्ट्युन्मुख भगवान् शुद्धाध्वा में वर्तमान होकर अपनी शक्तियों द्वारा माया को
विक्षुब्ध करके—
(क) 'कलातत्त्व' को किञ्चित्कर्तृत्व में परिवर्तित करके
(ख) 'विद्या तत्त्व' को किञ्चिद् अवबोध में परिवर्तित करके
(ग) 'राग तत्त्व' को किञ्चिद् अभिलाषा में परिवर्तित करके
(घ) 'काल तत्त्व' को भूत, भविष्य, वर्तमान के खण्डित एवं संकुचित काल
खण्डों में विभक्त करके स्थित कालावच्छेद में परिवर्तित कर देता है ।
(ङ) 'नियति तत्त्व' को कर्तृत्वावच्छेद में परिवर्तित कर देता है ।
'कला तत्त्व' शिव के सर्वकर्तृत्व को किञ्चिद् कर्तृत्व में बदल देता है और सुख-
दुःख एवं मोह के आवरण उत्पन्न कर देता है शिव का जीवत्व-ग्रहण केवल 'निजस्वरूप
गोपनकेलि' मात्र है । २ अतः स्पष्ट है कि स्वरूप गोपन की क्रीड़ा के अभिनय के लिए
संशय भूमिका पर स्वेच्छा से स्थित शिव के लिए यह पाशव भूमिका छोड़कर संशयों का
उच्छेद करना तो अत्यन्त सरल है क्योंकि यह संशयावृत पशु भूमिका उसने अपनी
स्वेच्छा से गृहीत किया है अतः यह सत्य नहीं है अपितु भट्टकल्लट के मतानुसार
'अप्रतिष्ठ' (आधार शून्य, निराधार एवं अयाथार्थ) है किन्तु पाशवभूमिका का त्याग न
करने पर यह 'संशय' 'अनन्त' समुद्रवत् दुस्तर भी है तथापि 'गुरुभारती' की शक्ति से
यह 'अगाध' (अनन्त समुद्र) तरना अत्यन्त सरल है । इसी दृष्टि से वृत्तिकार कहते हैं—
'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥'
कारिकाकार कहते हैं—'अगाध संशयांभोधिसमुत्तरणतारिणीम्' ।
वृत्तिकार का प्रधान संदेश—वृत्तिकार 'अगाधसंशयाम्भोधि' की व्याख्या के
संदर्भ में 'अगाध' की व्याख्या में जो उसका अर्थ—'अप्रतिष्ठ' करते हैं उसके पीछे
उनका शैव सम्प्रदाय के 'बन्धन' एवं 'मुक्ति' के स्वरूप पर प्रकाश डालना है जो कि
निम्नानुसार है—
शैवदर्शन में 'बन्धन' नामक कोई यथार्थवस्तु है ही नहीं—
न मे बन्धो न मोक्षो में भीतस्यैता विभीषिकाः ।
प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ ३
१-२. वामदेव भट्टाचार्य—'जन्ममरणविचारः' । ३. विज्ञानभैरव ।

४१६ स्पन्दकारिका
कल्हण ने 'बन्धन को फूस का निर्मित मुझौसा जैसा मिथ्या कहा है—
'शालीनपलालपुरुषोऽवति यः कृशानुः ।
दग्धाननश्चटकपेटकभीतिदानैः ॥'
जिस प्रकार किसान लोग अपनी फसल की रक्षा करने के लिए घास-फूस का एक
आदमी बनाकर खड़ा कर देते हैं और उसे जानवर आदमी समझते हुए भयभीत होकर
खेतों से भाग जाते हैं किन्तु हाथी उससे भयभीत होकर नहीं भागता क्योंकि पलाल पुरुष
भला हाथियों का क्या बिगाड़ सकता है? इसी प्रकार पञ्चकञ्चुक, वासना, अनात्म पदार्थ,
इन्द्रिय, उनके विषय, माया एवं अज्ञान एवं तज्जन्य बन्धन किसी अज्ञ प्राणी को तो
भयभीत कर सकते हैं किन्तु किसी स्वरूपावस्थित योगी का क्या बिगाड़ सकते हैं?
जैसे सूर्य ही जल के मध्य प्रतिबिम्ब के रूप में उल्टा भासित होता है उसी प्रकार
परिमित विषय वाली बुद्धि ही 'मैं बद्ध हूँ, मैं मुक्त हूँ'—आदि आकारों में परिणत होती
रहती है—इससे चिदात्मा का—मेरा क्या बनता-बिगड़ता है?—
'प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ।'¹
बन्धनोपहित चेतना 'जीव' कहलाती है तथा बन्धनमुक्त 'शिव' कहलाती है,
पहला 'पशु' कहलाता है दूसरा 'पशुपति' (पति) कहलाता है। दोनों में मूलतः भेद नहीं
है— स्वांगरुपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते 'पति' ।
मायातो भेदिषु क्लेश कर्मादि कलुषः 'पशुः' ॥²
अर्थात् ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वभावस्थायां तु
रागादिक्लेशकर्मविपाकाशयैः परीतः 'पशु' ।³
जो समस्त विश्व को अपने शरीर के रूप में देखकर उसे अपने से अभिन्न मानता
है उसे 'पति' एवं जो उसे अपने से भिन्न मानकर माया द्वारा भेददृष्टि के कारण
रागादिक्लेशों से कर्मविपाक के वात्याचक्र में फँस जाता है उसे 'पशु' कहा जाता है ।
शिवसूत्रकार की दृष्टि—शिवसूत्रकार का कथन है कि बन्धन कोई मौलिक एवं
नित्य वस्तु नहीं है और न तो निरपेक्ष स्वतन्त्र सत्ता ही है प्रत्युत् यह एक स्वारोपित
मिथ्या कल्पना है—अज्ञान है—मल है अज्ञता है—'ज्ञानं बन्धः' (१।२)
वरदराज कहते हैं—अज्ञानमिति तत्राद्यं चैतन्यस्फाररूपिणि ।
आत्मन्यनात्मताज्ञानं ज्ञानं पुनरनात्मनि ॥
देहादावात्ममानित्वं द्वयमप्येतदाणवम् ।
मलं स्वकल्पितं स्वस्मिन्बन्धः स्वेच्छाविभाजतः ॥⁴
शङ्कराचार्य की बन्धन-दृष्टि एवं त्रिक-दृष्टि में भी भेद है । त्रिक दृष्टि में
'बन्धन' भी शिव की आत्मगोपन जन्य, स्वेच्छा-निष्पादित एवं रसात्मिकी क्रीड़ा है
१. विज्ञानभैरव । २. प्रत्यभिज्ञाकारिका (उत्पलदेव) ।
३. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति । ४. शिवसूत्रवार्तिक ।