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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 519 में से

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पृष्ठ 499

३९८ स्पन्दकारिका
मन्मय (स्वस्वरूप) मानकर जो पूर्णाहन्ता की अनुभूति है वही जीवन्मुक्ति है और इस
संवेदन का अनुभविता जीवन्मुक्त है—
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत्।
स पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'१
अर्थात् समग्र जगत् मेरा ही स्वरूप है—इस प्रथा का जिसे ज्ञान है वह समस्त
जगत् को 'अपनी आनन्दक्रीड़ा (लीला) के समान देखता हुआ सतत योग से युक्त होने
से जीवन्मुक्त है'—इसमें संशय नहीं है।
भोक्तृभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति—
यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥ ५१ ॥
जब (साधक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में अवस्थित होता हुआ
चित्त को लीन करके ध्वंस एवं प्रादुर्भाव दोनों को निष्पादित करता हुआ भोक्तृभाव प्राप्त
कर लेता है तथा उसके अनन्तर शक्तिचक्र का स्वामी बन जाता है ॥ ५१ ॥

  • सरोजिनी *
    जब बन्धनग्रस्त प्राणी परम तत्त्व में समावेश की क्रियाओं पर ध्यान आकृष्ट करता
    है और जब वह उसके द्वारा लय हो जाता है या उस पराहंता या स्पन्द तत्त्व के साथ
    अभिन्न हो उठता है तब वह निमीलन और उन्मीलन समाधि के उपायों के द्वारा लय का
    नियंत्रण करता है और विकास को दिशा देता है।
    एकत्र = पूर्णाहन्तात्मक स्पन्दतत्त्व में। स्थूल-सूक्ष्म पुर्यष्टक में।
    तस्य = उसके। पुर्यष्टक के।२ (भोग्यभाव = पशुत्व। पशुपति पशुभाव से मुक्त)
    संरूढ = लीन चित्त होकर: 'संरूहः सन्' ।
    बन्ध एवं मोक्ष पर विचार करने पर बोध का उदय एवं प्रतिबन्ध की निवृत्ति हो
    जाती है। दो पुर्यष्टकों में किसी एक स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टक में पतित्व के सिंहासन पर
    आरूढ़ हो जाओ। अपने चित्त को विलीन कर दो। तब उनमें उदय-विलय होने वाले
    शब्दादि प्रत्ययों का नियंत्रण हो जाएगा। फिर तुम उनके भोग्य नहीं। भोक्ताभाव प्राप्त
    करोगे। भोग्यरूप पशुत्व से मुक्त होकर प्रभुभाव प्राप्त कर लोगे। कहा भी गया है—
    पशुओं के पति होकर पशुओं के पति हो जाओ। पशुपति होते ही तत्काल पशुत्व से
    मुक्त हो जाओगे।'—
    'पशूनां तु पतिर्भूत्वा पशूनां तु पतिर्भवेत्।
    पशुत्वान्मुच्यते सद्यो भूत्वा पशुपतेः पतिः ॥'
    स्वबोधोदयमञ्जरी—में भी कहा गया है—जो-जो कुछ भी मनोहर वस्तु तुम्हारे
    १. स्पन्दकारिका (३०) 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में उद्धृत सूत्र १६।
    २. स्पन्दनिर्णय।