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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 511

४१० स्पन्दकारिका
(२) 'विज्ञानभैरव' 'सर्वं जगत् स्वदेहं वा स्वानन्दभरितं स्मरेत् ।
युगपद् स्वामृतेनैव परानन्दमयो भवेत् ॥'
अहं—
'अहं' : विश्वात्मक एवं विश्वोत्तीर्ण दोनों है ।
'विश्वात्मविश्वोत्तीर्णं च स्वतन्त्रं दिव्यमक्षरम् ।
अहमित्युत्तमं तत्त्वं समाविश्य बिभेति कः ॥ (विमर्शदीपिका)
गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट के द्वारा स्पन्दकारिका के प्रणयन की पुष्टि—
अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् ।
वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥ ५२ ॥
वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।
रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥
मैं गंभीर एवं अपार संशय के समुद्र से पार उतारने वाली तथा विचित्र शब्दार्थों
वाली तथा अद्भुत गुरुवाणी की वन्दना करता हूँ ॥ ५२ ॥
तत्त्वद्रष्टा गुरु वसुगुप्त से यह (उपदेश) प्राप्त करके श्री भट्टकल्लट ने इसके
रहस्य को भलीभाँति श्लोकबद्ध कर दिया ॥ ५३ ॥
भट्टकल्लट की 'स्पन्दकारिकावृत्ति' एवं रामकण्ठाचार्य की 'स्पन्दकारिकाविवृति'
में तिरपनवीं कारिका समाविष्ट नहीं है ।

  • सरोजिनी *
    गुरुभारती = गुरु की शक्ति सम्पन्ना वाणी ॥
    ग्रन्थ के अन्त में ग्रन्थकार परम स्पन्द भूमि (The Supreme state of
    spanda) रूपा 'गुरुभारती' (गुरु वाणी) को नमस्कार करते हैं ।
    विज्ञानभैरव (२०) में शिव की शक्ति को शिव का मुख कहा गया है—'शैवी
    मुखमिहोच्यते ॥'१
    अगाधसंशयाम्भोधि = अथाह शङ्काओं का समुद्र । (Fathomless sea)
    'अगाधो ह्यप्रतिष्ठोऽनन्तः ॥ (कल्लट) समुत्तरणतारिणी = उद्धार करने की नाव ।
    वन्दे = अभिवादन करता हूँ । (समाविशामि) 'सर्वोत्कृष्टेन समाविशामि' विचि-
    त्रार्थपदां = विचित्र अर्थों से युक्त पदों वाली ।
    चित्रां = विचित्र । लोकोत्तर चमत्कार रूपा ।
    तां = उस । गुरु = शिवधाम प्राप्ति कराने वाले आचार्य ।२
    गुरुभारतीम् = गुरुवाणी को । वह वाक् जो कि गुरु का कार्य करती हो ।
    परावाक् को ।
    १-२. स्पन्दनिर्णय ।