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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

२५२ स्पन्दकारिका
'प्राणापानसमायोगाच्छब्दतत्त्वसमाश्रयात् ।
विज्ञानतत्त्वं सापेक्षात् ब्रह्माद्वैतं प्रकाशते ॥'
गीता में 'प्राणापान' (सूर्य-चन्द्र) को प्राणायाम के प्रसंग में इस प्रकार निरूपित
किया गया है— 'अपाने जुह्वति प्राणं प्राणापाने तथापरे ॥
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥'
प्राणापान की गति रोककर या समान करके योगी सुषुम्णा नाड़ी में प्राणों का
संचार करके परमपद प्राप्त करते हैं ।
'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि प्राणापान, नादबिन्दु की एकता से योग
की संसिद्धि प्राप्त होती है—
'प्राणापानौ नादबिन्दूमूलबन्धेन चैकताम् ।
गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नाम संशयः ॥ (३।६४)
योग पद्धति के अनुसार—इड़ा पिंगला में वायुसंचार रोककर इसे सुषुम्णा
(मध्यमा) में प्रवाहित करके इसे ब्रह्मरंध्र में रोकना चाहिए—
'ज्ञात्वा सुषुम्नासद्भेदं कृत्वा वायु च मध्यगम् ।
स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरंध्रे निरोधयेत् ॥ (ह० ४।१६)
शाक्तभूमिका में प्रविष्टोन्मुखी योगियों की स्थितियों का विवेचन—
स्पन्दसूत्रकार ने मूढ़ एवं प्रबुद्ध योगियों की साधनावर्ती अनुभूतियों के अन्तर का
विवेचन करते हुए कहा है कि—
'यह स्पन्दस्वरूपात्मिका चिद्रूपा शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शानात्मिका
अनुभूति प्रदान करेगी मैं उस पर आरूढ़ रहूँगा'—इस प्रकार संकल्प लेकर जिस प्रकार
की वृत्तिप्रत्यस्तमितावस्था का आश्रय ग्रहण करके अवस्थित रहता है ।
(जिस अवस्था का आलम्बन ग्रहण करके यह मुझसे जो कहेगी उसे मैं अवश्य
करूँगा—इस प्रकार का संकल्प ग्रहण करके ही योगी (अग्रवर्ती साधना के लिए) स्थित
रहता है ।)
भट्टकल्लट की व्याख्या—जिस स्पन्दस्वरूपा अवस्था को ग्रहण करके 'यह
मुझसे जो कुछ भी कहेगी उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार के अध्यवसाय पूर्वक जो
योगी स्पन्दतत्त्व में अधिष्ठित होकर—
'यां स्पन्दस्वरूपरूपामवस्थामवलम्ब्य' 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि'—इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥'
उसका आश्रय ग्रहण करके सोम एवं सूर्य (प्राणापान) दोनों शरीर छोड़कर ऊर्ध्व
मार्ग से सुषुम्ना मार्ग में लय हो जाते हैं ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस पुरुष की उस अवस्था का आश्रय ग्रहण करके,
सोम और सूर्य दोनों को सुषुम्ना मार्ग में अर्थात् मध्यनाड़ी में स्तमित करके तथा

प्रथमः निष्यन्दः २५३
'ब्रह्माण्डगोचर' (शरीमार्ग) का त्याग करके योगी गण—'तस्य तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य
सोमसूर्यौ द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्यभिधाने अस्तमयं कुरुतः ब्रह्माण्डगोचरं शरीर-
मार्गं परित्यज्य योगिनः ॥'
'उस समय उस महाव्योम में शशि-भास्कर (प्राणापान) के प्रलीन हो जाने पर भी
मूढ़ साधक उस अवस्था में भी सुषुप्तिपद के समान प्रगाढ़ अंधकार में पड़ा रहता है
किन्तु प्रबुद्ध भूमिका पर अवस्थित योगी की चिन्मात्र आत्म संवित् की अनुभूति पर कोई
भी आवरण नहीं रहता ॥'
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस महाव्योम में सूर्य-चन्द्र के अस्त हो जाने के
उपरान्त भी जिसके स्वभाव (आत्मा) की अभिव्यक्ति नहीं होती वह स्वप्न आदि के
मुह्यमान अप्रबुद्ध योगी (आत्माभिव्यक्ति के ऊपर पड़े आवरण द्वारा) मोहावृत (निरुद्ध)
रहता है किन्तु प्रबुद्ध योगी की आत्माभिव्यक्ति के ऊपर ऐसा कोई आवरण नहीं रहता—
'तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न सम्यक् वृत्ता
स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरावृत एव भवति ॥'
सौषुम्ण अध्व = 'सुषुम्णा' को ही 'पश्चिम पथ' भी कहा गया है। योगपद्धति यह
है कि प्राण संचार इड़ा-पिंगला से रोककर सुषुम्णा में प्रवाहित किया जाता है—'इडां च
पिंगला बद्ध्वा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥' (३।७४) ऊपर 'चन्द्रमा' है और नीचे 'सूर्य' है—
'ऊर्ध्वनाभेरधस्तात्तोरुध्वं भानुरधः शशी' विपरीतकरणी मुद्रा में सूर्य ऊपर चन्द्र नीचे से
जाता है ।
शरीर में ७२ हजार नाड़ियाँ हैं । उनमें १४ तथा १४ में ३ नाड़ियाँ प्रमुख हैं
और उनमें भी 'सुषुम्णा' नाड़ी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । इसीलिए योगी स्वात्माराम
मुनीन्द्र ने 'कुण्डलिनी' एवं 'मनोन्मनी' के साथ सुषुम्णा की भी वन्दना की है—
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रजन्मने ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।६४)
स्वात्माराम मुनीन्द्र कहते हैं कि जब तक प्राण 'मध्यमार्ग' (सुषुम्णा नाड़ी) में
प्रवेश नहीं करता तब तक ज्ञान की बात करना केवल दम्भ एवं मिथ्या प्रलाप है—
'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे ।
तावज्ज्ञानं वदति तदिद दम्भ मिथ्या प्रलापः ॥ (हठयोगप्र० ४।११४)
'अमृतसिद्धि' में भी यही बात कही गई है—
'यावद्धि मार्गतो वायुर्निश्चलो नैव मध्यगः ।
असिद्धं तं विजानीयाद्वायुं कर्मवशानुगम् ॥'
योग का सर्वोच्च सोपान 'असंप्रज्ञात समाधि' है । सुषुम्णा उसका भी साधन है
क्योंकि प्राणों के सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश करने पर मनोन्मनीरूप असंप्रज्ञात समाधि की भी
प्राप्ति होती है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे सिद्ध्यत्येव मनोन्मनी ।' (४।२०)

२५४ स्पन्दकारिका
सुषुम्ना में प्राणसंचार एवं 'मनोन्मनी' का उदय—चित्त के अस्तित्व के दो
घटक हैं—(१) 'वासना' (२) 'प्राण' । इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर दूसरा
स्वयमेव नष्ट हो जाता है—
'हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः ।
तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तौ द्वावपि विनश्यतः ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।२२)
'द्वे बीजे राम! चित्तस्य प्राणस्पन्दनवासने ।
एकस्मिंश्च तयोर्नष्टे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः ॥' (योगवासिष्ठ)
'मध्यमार्गे सुषुम्नायां चरन् गच्छन् मारुतः प्राणवायुः यावत् यावत्कालपर्यन्तं न
प्रविशति प्रकर्षेण ब्रह्मरंध्रपर्यन्तं नं विशति ब्रह्मरंध्रं गतस्य स्थैर्यंति ब्रह्मरंध्रं गत्वा न स्थिरो
भवति ॥ सुषुम्नायामसंचरन् वायुरसिद्ध इत्युच्यते । ('ज्योत्स्ना' ह०प्र०)
योग-विधान के अनुसार नाड़ी चक्र का विशोधन करके प्राण-संयम करने से
सुषुम्णा के प्रवेशद्वार का भेदन करके प्राण उसके मुख में प्रवेश कर जाता है और
सुषुम्णा में प्राण के प्रवेश से मन में स्थिरता का उदय हो जाता है । मन का यही
सुस्थिरीभाव या सुस्थिरावस्था 'मनोन्मनी' (असंप्रज्ञात समाधि) कहलाती है—
(१) विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचक्रविशोधिते ।
सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ (२।४१)
(२) मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते ।
यो मनः सुस्थिरीभावः सैवावस्था मनोन्मनी । (२।४२)
अभ्यस्त (प्राणायाम से नियंत्रित) वायु जठराग्नि के साथ कुण्डली-बोधन के साथ
सुषुम्णा में प्रवेश कर जाता है—
'वायुः परिचितो यस्मादग्निना सह कुण्डलीम् ।
बोधयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ (हठयोग प्र०४।१९)
सुषुम्णा और कालभक्षण—जब प्राणवायु सुषुम्णा में प्रवाहित होने लगता है तब
मन, देश, काल एवं वस्तु के परिच्छेद से शून्य ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है और तब
चित्तवृत्ति के निरोध का ज्ञाता योगी प्रारब्धसहित संपूर्ण कर्मों को निर्मूल कर देता है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे
तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ॥'
सुषुम्ना में प्राण-प्रवाह से 'अमरोली', 'वज्रोली' एवं 'सहजोली' भी उदित हो
उठती हैं— चित्ते समत्वमापन्ने वायौ व्रजति मध्यमे ।
तदाऽमरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ॥ (हठयोग प्र० ४।१४)
सोमसूर्य रात्रिदिवसात्मक काल के धारक हैं किन्तु सुषुम्णा काल की भोक्त्री है—
'सूर्याचन्द्रमसौ धत्तः कालं रात्रिंदिवात्मकम् ।
भोक्त्री सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ॥' (ह०प्र०)

प्रथमः निष्यन्दः २५५
सुषुम्णा और कुण्डलिनी—सुषुम्णा के समानार्थक एवं पर्याय—स्वात्माराम
मुनीन्द्र ने 'हठयोगप्रदीपिका' में सुषुम्णा नाड़ी के निम्न पर्याय बताए हैं—
'सुषुम्ना शून्यपदवी ब्रह्मरंध्रं महापथः ।
श्मशानं शांभवी मध्यमार्गश्चेत्येकवाचकाः' ॥ ४ ॥
यह सच्चिदानन्द ब्रह्म की प्राप्ति का द्वार है और कुण्डलिनी इसी सुषुम्णा के द्वार
को रोककर सो रही है—
(१) 'कुण्डलीबोधनेनैव षट्चक्रभेदादिकं भवति तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सर्वेण प्रयत्नेन
ब्रह्मसच्चिदानन्दलक्षणं तस्य द्वारं प्राप्त्युपायः सुषुम्ना तस्या मुखेऽग्रभागे मुखेन सुषुम्नाद्वारं
पिधाय सुप्तामीश्वरीं कुण्डलीं प्रबोधयितुं प्रकर्षेण बोधयितुं मुद्राणां ... समावृत्ति
समाचरेत् ।। (ज्योत्स्नाः ३।४-५) ।
सुषुम्णा और प्राणापत ऐक्य—(२) 'अपानवायुम् ऊर्ध्वं प्रोत्सारयन् मूलबन्धं-
कृत्वा सुषुम्नामार्गेण प्राणमूर्ध्वं नयन् पूरितं पूरकेण अन्तर्धारितं प्राणं न्यञ्चन्नीचैरधोऽञ्चन्
गमयन् । प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा । नरः पुमानमतुलं बोधं निरुपमज्ञानं शक्तिप्रभावा-
च्छक्तिराधारशक्तिः कुण्डलिनी तस्याः प्रभावात्सामर्थ्यादुपैति प्राप्नोति ।
(३) 'प्राणापानयोरैक्ये कुण्डलिनीबोधो भवति ।'
सुषुम्णा एवं चित्तस्थैर्य मुक्ति—(४) 'कुण्डलिनी बोधे सुषुम्नामार्गेण प्राणो ब्रह्म-
रंध्रं गच्छति । तत्र गते चित्तस्थैर्यं भवति । चित्तस्थैर्ये संयमादात्मसाक्षात्कारो भवति ।।'
(हठयोगप्रदीपिका 'ज्योत्स्ना' १।४८) ।
पद्मासन लगाकर सुषुम्णा मार्ग से प्राण को मस्तक में ले जाने वाला योगी मुक्त
है— 'पद्मासने स्थितो योगी नाडीद्वारेण पूरितम् ।
मारुतं धारयेद्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ।।' (१।४९)
(५) मारुते प्राणवायौ मध्ये सुषुम्नामध्ये संचारः सम्यक् चरणं गमनं मूर्धपर्यन्तं
यस्य स मध्य संचारस्तस्मिन् सति मनसः स्थैर्यं ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो जायते प्रादुर्भवति ।
यो मनसः सुस्थिरीभावः सुष्ठु स्थिरीभवनं सैव मनोन्मन्यवस्था ।।' (ज्योत्स्नाः २।४२)
सुषुम्णा एवं उन्मनी—'महावेध' के अभ्यास से भी इड़ा-पिंगला के मार्गों को
छोड़कर वायु मध्यममार्ग (सुषुम्णामार्ग) में प्रवेश कर जाती है—
पुटद्वयमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः ।। (३।२७)
ऐसा करने से तीनों नाड़ियों (इड़ा-पिंगला-सुषुम्णा) का वायु अभिन्न हो जाता है
और मोक्ष का कारण बनता है—'सोमसूर्याग्नि संबन्धो जायते चामृताय वै ।।' (३।२८)
ऐसी अवस्था में इड़ा—पिंगला में प्राणसंचार का अभाव होने से 'मृतावस्था' उत्पन्न हो
जाती है—'मृतावस्था समुत्पन्ना' (३।२८) ।
'मध्यमा नाड़ी' को सरल करने के उपाय निम्न है—(१) आसन (२) प्राणायाम
(३) मुद्रा—'इयं मध्यमा नाड़ी सुषुम्ना योगिना दृढ़ाभ्यासेनासनं स्वस्तिकादि प्राणसंयमः
प्राणायामः मुद्रा महामुद्रादिका तैः सरला भवेत् ।'

२५६ स्पन्दकारिका
'इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (३।१२४ ह०प्र०)
ध्यातव्य बिन्दु—स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में योग की साधना का आत्मीकरण
इसलिए किया गया क्योंकि इन योगियों ने अनुभव किया न तो मात्र 'ज्ञान' से और न तो
मात्र 'योग' से । 'परमार्थ' 'परमपद' 'उन्मनी' 'सहजावस्था' 'प्रत्यभिज्ञा' 'शाक्तभूमिका'
प्राप्त की जा सकती है अतः उन्होंने दोनों का आत्मीकरण किया । कारण सुस्पष्ट है—
'विना युद्धेन वीर्येण कथं जयमवाप्नुयात् ।
तथा योगेन रहितं ज्ञानं मोक्षाय नो भवेत् ॥ ('योगबीज')
स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का योग हठयोग नहीं राजयोग है । राजयोग का
स्वरूप निम्नाङ्कित है—वृत्त्यन्तरनिरोधपूर्वकात्मगोचरधारावाहिकनिर्विकल्पवृत्ति राजयोगः ।
(ज्योत्स्ना ३.१२६) ।
सहजविद्योदय निष्यन्द
'सा विद्या या विमुक्तये, ज्ञानान्न ऋते मुक्तिः' के अनुसार 'विद्या' एवं 'ज्ञान' दोनों
मोक्ष के साधन हैं । योगियों ने ज्ञान का स्वरूप पृथक् रीति से परिभाषित किया है ।
यदि विद्या को 'ज्ञान' का पर्याय मान लिया जाय तो 'ज्ञान' का निम्न अर्थ विद्या का
पर्याय माना जाना चाहिए । ज्ञान क्या है?
ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् ।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्या, मोक्षं स गच्छति नरः न कथंचिदन्यः ॥
—हठयोग प्र०
आचार्य भट्टकल्लट ने अपनी 'स्पन्दकारिकावृत्ति' ('स्पन्दसर्वस्व') के द्वितीय
निष्यन्द का नामकरण—'सहजविद्योदय' किया है ।
स्वरूपस्पन्द निष्यन्द में तो रचनाकार ने यह प्रमाणित किया कि—
(१) विश्व के कण-कण में चैतन्यस्वरूपा स्पन्दशक्ति अनुस्यूत है ।
(२) साधक विकल्पों को संस्कृत करके स्वसंवेदन को विशुद्ध बनाकर अपने
हृत्पद्म में शाक्त भूमिका की अनुभूति एवं विश्वात्मभाव को अधिगत करके पशुभाव से
मुक्त होकर विश्वात्मैक्य की अनुभूति करते हैं ।
सहजविद्योदय निष्यन्द में रचनाकार यह प्रतिपादित करता है कि विकल्पसंस्कार
की पद्धति का अनवरत अभ्यास प्रबुद्ध योगियों को शुद्धविकल्पात्मक, अहंविमर्शात्मक,
निर्मलशुद्धविद्यास्वरूप 'सहजविद्या' की अनुभूति प्रदान करता है । 'सहजविद्या'
अहंविमर्श स्वरूप का साक्षात्कार कराती है और यह शुद्ध विकल्पात्मिका है । इसके द्वारा
स्वस्वरूप का साक्षात्कार भी होता है । योगी को मन्त्रवीर्य की अनुभूति होती है तथा वह
प्रबुद्धावस्था से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश करता है ।
'सहज' शब्द दो शब्दों से निर्मित हुआ है—'सह' + 'ज' = जन्म के साथ-साथ

प्रथमः निष्यन्दः २५७
उदित । 'सहज' स्वाविर्भूत, सरल, अकृत्रिम, स्वयंभू, स्वाभाविक, आदि अर्थों का
द्योतक है । 'हठयोगप्रदीपिका' की टीका 'ज्योत्स्ना' में सहज शब्द का अर्थ—'स्वाभा-
विक ध्येयाकार वृत्तिप्रवाह' किया गया है और इस 'सहजतत्त्व' के बिना ज्ञान को
'दंभमिथ्याप्रलाप' भी कहा गया है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है 'ज्ञान' योगसाधना
सापेक्ष है क्योंकि—
(१) 'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे
यावद्विन्दुर्न भवति दृढः प्राणवातप्रबन्धात् ।
यावद्ध्याने सहज सदृशं जायते नैव तत्त्वं
तावज्ज्ञानं वदति तदिदं दंभमिथ्याप्रलापः ॥' (ह०प्र०)
(२) योगियों की 'सहजावस्था'—
उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (ह०प्र०)
(३) 'ज्योत्स्ना' में 'सहजावस्था' का स्वस्वरूप—
'जातः कुण्डलीबोधो यस्य तस्य परिहृतानि समग्राणि कर्माणि येन तस्य योगिनः
आसनेन कायिकव्यापारे त्यक्ते प्राणेन्द्रियेषु व्यापारस्तिष्ठति । प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-
संप्रज्ञात समाधिभिर्मानसिक व्यापारे व्यक्ते बुद्धौ व्यापारस्तिष्ठति । असंगो ह्ययं पुरुषः
शुद्धः पुरुषः सत्वगुणात्मिका परिणामिनी बुद्धिरिति परवैराग्येण दीर्घकालसंप्रज्ञाताभ्यासेनैव
बुद्धिव्यापारे परित्यक्ते निर्विकारस्वरूपावस्थितिर्भवति । सैव सहजावस्था'
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ (ह०योग०)
('तत्त्वदर्शनमात्माऽपरोक्षानुभवः दुर्लभं, सहजावस्था
विकल्प-संस्कार-आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक') (आ०४) में कहते हैं कि—
(१) परमेश्वर के 'स्व' भाव में प्रवेशेच्छा विकल्पों के संस्कार से ही निष्पादित
होती है ।
(२) साधक को सर्वप्रथम विकल्पों का संस्कार करके सद्विकल्प-गणपति बनना
चाहिए । एतदर्थ उसे सर्वप्रथम-शास्त्र-स्वाध्याय, चिन्तन एवं मनन करना चाहिए । →
पुष्टि, तुष्टि की प्राप्ति, स्वात्म कुसुम का प्रस्फुटन 'प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात्संस्कार-
मञ्जसा ॥' (तन्त्रालोक ४।२)
(३) संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प
विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्यात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोप्यन्नं सदृशात्मकम् ॥ (४।३)
(४) संस्कार-शुद्ध विकल्प → स्वात्म संस्कृत शुद्धविकल्प ।
अस्फुट संस्कृत विकल्प → स्फुट संस्कृत विकल्प—
'भ्रश्यदस्फुटत्व' 'भाव्यमान स्फुटीभाव' → निर्विकल्प भाव ।
स्पं० १७

२५८ स्पन्दकारिका
विकल्प-संस्कार की चार अवस्थायें—(तन्त्रालोक)
अस्फुट विकल्प | भविष्यत् स्फुटत्व (भविष्य में स्फुटता की प्रक्रिया होती है ।) | प्रस्फुटता का प्रवर्तन | पूर्णाप्रस्फुटन (कली, मुकुल, विकसदवस्थ सुमन कुसुम की भाँति)
विकल्प शीघ्र विकसित नहीं होते । अतः अन्तराल में अनेक अवस्थायें आती हैं—
(१) अस्फुट—स्फुटताभावी के मध्य-‘भ्रश्यदस्फुटत्व’ अवस्था
(२) ईषत्प्रस्फुटत्व के बाद अंकुरित प्रस्फुटत्व अवस्था
(३) आसूत्रित स्फुटत्व, उद्गच्छत्स्फुटत्व आदि अनेक अवस्था
विकल्पों की संस्कार-प्रक्रिया का क्रमिक विकास—स्फुटतम वैकल्पिक तद्रूपतामयी
एक संवित् शक्ति का उल्लास $\rightarrow$ ‘स्व’ रूप की प्राप्ति $\rightarrow$ सङ्कोच का कलङ्क नष्ट ।
(४) पारमार्थिक विकल्प भी हेय हैं—
परमार्थविकल्पेऽपि नावलीयेत पण्डितः ।
को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथ वाशुभे ॥
विकल्प चाहे शुभ हों या अशुभ—विकल्प तो विकल्प ही हैं $\rightarrow$ निर्विकल्पात्मक भाव ही श्रेयस्कर है—
(५) विकल्प संविद के संस्कार से और अविकल्प संविद रूप में क्रमशः स्फुरित होने से स्वात्म में ही ज्ञान, क्रियात्मक संविद्रूप भैरवीय तेज का विमर्श होने लगता है ।
इस विमर्श में ‘मैं स्वयं भैरव शिव हूँ’ यह महानुभूति उदित होती है । अस्फुटत्व $\rightarrow$ स्फुटतमावस्था = शांभव समावेश की आनन्द भूमि यही है । यही है प्रस्फुटित विमर्श भूमि का आवेश—
अतश्च भैरवीयं यत्तेजः संवित्स्वभावकम् ।
भूयो भूयो विमृशतां जायते तत्स्फुटात्मता ।। (तन्त्रा० ४।७)
विकल्पों का संस्कार करते-करते अपने संवेदन को निर्मल बनाया जाता है और अपने हृदय में शाक्तभूमिका की अनुभूति करके पशुत्व से मुक्त होकर विश्वात्मभाव प्राप्त किया जाता है ।
विकल्प-संस्कार का निरन्तर अभ्यास $\rightarrow$ (प्रबुद्ध योगियों के हृदय में) ‘सहज विद्या’ (विशुद्ध विकल्प या अहंविमर्शात्मक स्वरूप की अनुभूति) $\rightarrow$ शुद्ध विद्या का प्रकाश स्वरूप का साक्षात्कार एवं मन्त्र वीर्य की अनुभूति—प्रबुद्ध से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश ।।
बौद्ध दर्शन में सहज तत्त्व का स्वरूप—(१) वज्रयानी सिद्धों एवं मत्स्येन्द्र के

प्रथमः निष्यन्दः २५९
योगिनी कौल मार्ग में 'सहज' = पुरुष तत्त्व + शक्ति तत्त्व का समागम प्रज्ञा + उपाय,
(यो० कौ० में—शिव + शक्ति) का समागम !! (२) 'कौलज्ञाननिर्णय' में— 'सहज' =
'कुरुते देहमध्ये तु सा शक्तिः सहजा प्रिये ।।' (सहज शक्ति को शरीरस्थ करके वहीं
उपलब्ध करना चाहिए ।) 'सहज' = सहज ज्ञान सहज स्वभाव आदि ।
नाथपंथ में 'सहज' के प्रयोगों की दिशायें—(१) 'सहज' = परम तत्त्व (२)
'सहज' = परमज्ञान, परम स्वभाव, (३) 'सहज' = परमपद, परमसुख, (४) 'सहज'
= सहज जीवन पद्धति । (५) शरीर के भीतर शक्ति से संगम प्राप्त करने की योग पद्धति ।
विकल्प—घट पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ 'विकल्प' है । अहं
परामर्श के भेद—शुद्ध अहं परामर्श ।। मायीय अहं परामर्श ।।
जब मितात्मा विश्व से अभिन्नतयावस्थित सविन्मात्र में या विश्व से असंस्पृष्ट
स्वच्छ आत्मा में अवस्थित रहता है तब उसे शुद्ध अहं परामर्श कहते हैं । जब की मायीय
(अशुद्धपरामर्श) वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता
है—उन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है तब इसे अशुद्ध परामर्श कहते हैं । इसी भेद
दशा की प्रतीति ही 'विकल्प' है । इसी की शुद्धि से सहजविद्या का उदय होता है ।
कारिकाकार ने जिस सद्विद्या (सहज विद्या) का प्रतिपादन किया है एतत्संबन्ध में
अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक' (३।१०) में कहते हैं कि (१) भावों के प्रतिघाती भाव
मायात्मक होते हैं किन्तु (२) अप्रतिघाती भाव तो सद्विद्यामय होते हैं । मायात्मक भाव
स्थूल एवं भेदप्रधान होते हैं ।
भावानां यत्प्रतीघाति वपुर्मायात्मकं हि तत् ।
तेषामेवास्ति सद्विद्यामयं त्वप्रतिघातकम् ।। (३।१०)१
सद्विद्यामय भाव ज्ञान शक्तिस्वभाव होते हैं—'तत्सद्विद्यामयं ज्ञानशक्तिस्वभावम् ।।
(विवेक पृ० ३२९) ।। मायात्मकपदार्थप्रतिबिम्बरूप एवं ज्ञानात्मकभाव उनके ग्राहक
होते हैं ।२
प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द शास्त्र के जो छत्तीस तत्त्व हैं उनमें 'ईश्वर तत्त्व' से निम्न
स्तर पर किन्तु मायातत्त्व के स्तर से उच्चतर स्तर पर एवं दोनों के अन्तराल में
'शुद्धविद्यातत्त्व' अवस्थित है—
(१) 'विश्वं पश्चात्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः ।
सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ।।' ३
(२) 'ईश्वरो' बहिरुन्मेषो, निमेषोऽन्तः सदाशिवः ।
सामानाधिकरण्यं च, सद्विद्याहमिदं धियोः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।३)४
(३) 'तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका ।
विद्याशक्तिस्तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।७७)५
१. तन्त्रालोक । २. विवेक ।
३. षट्त्रिंशत्तत्वसंदोह । ४-५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ।

२६० स्पन्दकारिका
(४) 'उन्मेषनिमेषौ बहिरन्तः स्थिती ऐवैश्वर सदाशिवौ बाह्याभ्यन्तरयोर्वेद्यवेदकयो-
रेकचिन्मात्र विश्रान्तेर्भेदात्सामानाधिकरण्येनेदं विश्वमहमिति विश्वात्मनो मतिः
शुद्धविद्या' —प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।१
इस स्वरूप वाली 'शुद्धविद्या' जो एक तत्त्व है वह इस प्रसंग में ग्राह्य नहीं है ।
शुद्ध विद्या इस प्रसंग की 'सहज विद्या' नहीं है ।
यहाँ 'शुद्धविद्या' पद उस शुद्धविमर्श को द्योतित करता है जिसके उदित होते ही
योगी के अन्तःकरण में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि माहेश्वर षडात्मक स्वधर्म प्रकाशित हो
उठते हैं ।
विद्या शब्द का व्युत्पत्यात्मक अर्थ—
'विद्या' पद लाभवाचक 'विद्लृ' धातु एवं विचारमूलक 'विद्' धातु एवं ज्ञानार्थक
'विद्' धातु से व्युत्पन्न हुआ है ।
सहज विद्या—(१) विद्लृ (लाभ)—'विद्या'
(२) विद् (ज्ञान)—'विद्या'
(३) विद् (विचार)—'विद्या'
(१) लाभद्योतक 'विद् लृ' धातु = 'विद्या' । इस अर्थ में 'विद्या' पद 'विमर्श'
की उस उच्चतमावस्था का सूचक है जिसका विकास होने पर योगी माहेश्वर शक्तियों
(सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि) को या शिव धर्मों को सहज रूप से अधिगत कर लेता है ।
(२) विचार-द्योतक विद् धातु = 'विद्या' = इस अर्थ में 'विद्या' पद विमर्श
की उस उच्चतमावस्था को द्योतित करती है जिसका विकास होने के बाद योगी—'मैं
अनादि हूँ' स्वातन्त्र्य, स्वात्मविमर्श, शिवत्व मेरा स्वभाव है'—का ज्ञान या अनुभव
होने लगता है ।
(३) ज्ञान द्योतक विद् धातु = 'विद्या' । मैं स्वयं शक्तियों का स्वामी शिव हूँ ।
'विश्व' मेरा स्पन्दन है । यही उन्मनन भी है ।
'सहज अभ्यास', 'सहज जप', 'सहज ज्ञान', 'सहजयोग, 'सहज विद्या' आदि का
उदय संभव है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि—'सहजावस्था' योग की एक
उच्चावस्था है । इसके निम्न लक्षण हैं—
(१) इस अवस्था में समस्त कार्य कलाप अकृत्रिम रूप से निष्पादित होते हैं ।
(२) इसमें कुण्डलिनी उद्बुद्ध रहती है ।
(३) इसमें समस्त सायास कार्यों का त्याग कर दिया जाता है ।
(४) यह स्वयमेव उत्पन्न होती है—स्वयंभू स्थिति है—
'उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (उपदेश ४।११)
१. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।

प्रथमः निष्यन्दः २६१
(५) 'सहजावस्था' अत्यन्त दुर्लभ है—
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना॥ (हठ० प्र० ४।९)
'सहजविद्या' सहज ज्ञान (यौगिक ज्ञान) को आत्मीकृत (क्रोडीकृत) करके चलता
है और यौगिक विद्या या यौगिक ज्ञान योग की दृष्टि में इस प्रकार है—
ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्,
प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत्।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो,
मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्यः॥ (४।१५)
जब तक 'सहज सदृश तत्त्व' का ध्यान में उदय नहीं होता तब तक 'ज्ञान' दंभ
एवं मिथ्या प्रलाप मात्र है—
यावद्ध्याने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वम्।
तावज्ज्ञानं वदति तददिं दंभ मिथ्याप्रलापः॥ (ह० प्र० ४।११४)
योगियों ने 'राजयोग', 'समाधि', 'उन्मनी', 'मनोन्मनी', 'तत्त्व', 'अमरत्व',
'लय', 'शून्याशून्य', 'परं पद', 'अद्वैत', 'निरालम्ब', 'निरञ्जन', 'अमनस्क', 'तुर्या',
'जीवन्मुक्ति' एवं 'सहजा' सभी को समानार्थक माना है—
राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी।
अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम्।
अमनस्कं तथाद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम्।
जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः॥
—स्वात्माराम मुनीन्द्र (हठयोगप्रदीपिका ४।३-४)

[५] द्वितीयो निष्यन्दः
सहजविद्योदयनिष्यन्दः
स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि—
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥ २६ ॥
उस स्पन्दस्वरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से समस्त मन्त्र सर्वज्ञता
आदि (षड्विध) शांभव बलों को प्राप्त कर लेते हैं और (वे मन्त्र) मांत्रिक साधक के
अभीष्टों को उसी प्रकार सिद्ध कर देते हैं यथा शरीरधारी प्राणियों की इन्द्रियाँ (अपने
अभीष्टों को सिद्ध कर देती हैं) ॥ २६ ॥

  • सरोजिनी *
    तत् + बलं = उस स्पन्दरूपात्मक आत्मबल ॥
    'सर्वज्ञबलशालिनः मन्त्राः तद् बलं आक्रम्य देहिनाम् करणानीव अधिकाराय
    प्रवर्तन्ते ॥'
    तत् = वह । स्पन्द तत्त्वात्मक बल, प्राणरूप वीर्य । स्पन्दरूप 'आत्मबल'
    आक्रम्य = ('अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य') ॥ (On catching hold of that
    strength) बलं = प्राणरूप वीर्य ॥ (Life vitality) निरावरण चिद्रूप (कल्लट) तद्
    बलं = वह शक्ति (That strength) आक्रम्य = अधिष्ठाय = (कल्लट) 'स्पन्द-
    तत्त्वात्मक' : स्पन्द तत्त्व से युक्त ॥१ तत् = उस (बल को) 'तदाक्रम्य' = तत् +
    आक्रम्य ॥ (कल्लट)
    सर्वज्ञता = सर्वज्ञता (सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वज्ञातृत्व, पूर्णतृप्तित्व आदि)
    सब कुछ जानने की क्षमता ॥
    सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों से समृद्ध 'मन्त्र'
    स्पन्दात्मक शक्ति या प्राण रूप वीर्य को, (सम्यक् अभेदापत्ति के साथ) प्राप्त करके
    प्राणियों को अधिकार सम्पन्न बनाने हेतु उसी प्रकार प्रवर्तित होते हैं जिस प्रकार इन्द्रियाँ
    प्राणियों को ऐन्द्रिय विषय प्राप्त कराने हेतु प्रवर्तित होती हैं ।२
    १. क्षेमराज : स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।

द्वितीयः निष्यन्दः २६३
मान्त्रीशक्ति के प्रकटीकरण की विधि एवं जाग्रत मन्त्रों की अचिन्त्य शक्ति
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में इस श्लोक को द्वितीय अध्याय के प्रथम श्लोक के
रूप में प्रस्तुत किया है और सात श्लोकों में समाप्त कर दिया है । यह 'सहजविद्योदय
निष्यन्द' का प्रथम श्लोक है ।१
प्रस्तुत श्लोक में 'मन्त्र शक्ति' का निरूपण किया गया है और उसके प्रथमोदय पर
प्रकाश डाला गया है । 'मन्त्र' उस बल को प्राप्त करके सर्वज्ञत्व की शक्ति से आवेष्टित
हो उठते हैं (Get endued with the power of omniscience) और अपने कार्यों
का संपादन उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार सशरीरी व्यक्ति की इन्द्रियाँ किया करती हैं ।
ये 'मन्त्र' अपने आराधकों के चित्त के साथ लयीभूत हो जाते हैं (Get absorbed) वे
शान्तरूप एवं अशुद्धियों से रहित होकर आराधकों के चित्त में लीन हो जाते हैं अतः ये
मन्त्र शिव की यथार्थ शक्ति प्राप्त किये हुए होते हैं ।२
'अनन्त', 'व्योमव्यापी' आदि मन्त्र सर्वज्ञत्वादि सामर्थ्य आदि के द्वारा प्राणियों के
अधिकार के लिए प्रवर्तित होते हैं । जिस प्रकार प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने बल के द्वारा
ऐन्द्रिय विषयों के प्रकाशन का कार्य करती हैं ठीक उसी प्रकार 'मन्त्र' भी साधकों के
लिए कार्य संपादित करते हैं और ये सृष्टि-संहार-तिरोधान-एवं अनुग्रह आदि कार्य
निष्पादित करते हैं ।
उस शक्ति (स्पन्दात्मक शक्ति) को प्राप्त करके ये पवित्र मन्त्र (यथा अनन्त,
व्योमव्यापी आदि मन्त्र) सर्वज्ञता आदि की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं तथा सृष्टि-स्थिति-
संहार-तिरोधान एवं अनुग्रह आदि देव कार्यों को निष्पादित करते हैं । ('तत् स्पन्द-
तत्त्वात्मकं बलं प्राणरूपं वीर्यमाक्रम्य अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य भगवन्तोऽनन्तव्योम-
व्याप्यादयो मन्त्राः सर्वज्ञबलेन जृंभमाणा देहिनां प्रवर्तन्ते—सृष्टिसंहारतिरोधानअनुग्रहादि
कुर्वन्ति ।।')३
मन्त्र-विज्ञान और उसका विधान—
मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—(१) 'बीज' (२) 'पिण्ड' (३) 'पद' (४)
'नाम' । उनका धर्म है—(१) मनन एवं (२) त्राण । उनका बल है—निरावरण चित्
का उल्लास (पराशक्ति) उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर
प्रदीप्त होते हैं उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग
करता है तब वे—(१) 'अनुग्रह' और (२) 'निग्रह' करने में समर्थ होते हैं ।
जिस प्रकार एक शरीरधारी अपने कर-चरणों का प्रयोग करता है ठीक उसी प्रकार
एक सिद्धमन्त्री मन्त्रों का प्रयोग करता है । आत्मा के परत्व का अवबोध होने के कारण
मन्त्रज्ञ इच्छा मात्र से मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।
'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का
बोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ किंकर हो जाते हैं अर्थात् वशीभूत हो जाते हैं ।
१-३. स्पन्दनिर्णय ।

२६४ स्पन्दकारिका
‘विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥’
यदि ऐसा नहीं है तो बड़े प्रयत्न से प्रयोग करने पर भी कठपुतली के समान
निष्फल चेष्ट ही रहते हैं क्योंकि सत्यसंकल्पचिच्छक्ति के बल का स्पर्श न होने के कारण
वे केवल वर्ण-मात्रा अर्थात् मात्र जड़ अक्षर ही बने रहते हैं—‘त्रिकसार' में यही कहा
गया है—
हंसपारमेश्वर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूप 'मन्त्र' पशुभाव
में स्थित है। सुषुम्नामार्ग से उच्चारण करने पर वे 'पशुपति' हो जाते हैं। वस्तुतः शाक्त
मार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है।
‘पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥’
वस्तुतः शाक्त मार्ग में ही मन्त्र साकल्य प्रदान करते हैं—‘ऐष शाक्तो मार्गोऽत्र च
मन्त्राणां साकल्यम्' ।
तत्त्वरक्षा-विधान में कहा गया है—आत्म संवित् अथवा परम पद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह शक्ति और क्रिया से रहित है शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए। वही जप सफल होता है अन्य नहीं—
‘अशक्तत्वान्निष्क्रियत्वान्न पुंसि न परे पदे ।
शक्तौ नियोजयेन्मन्त्रं जपस्तु सफलो भवेत् ॥’
श्रीवैहायसी नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—
संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित 'जप' करना चाहिए यथा सूत्र में मणि
ग्रथित होते हैं। ठीक इसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करना
चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में रहती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त रीति से
'जप' करने पर 'मन्त्र' अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है अपने को आच्छादित नहीं
रखता—
‘विषुवत्कं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् ।
मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ॥
तामेव च परे व्योम्नि परमामृतबृंहिताम् ॥’
श्रीकालपरा नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शब्द नादात्मक हैं अतः उसके
साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहकर बढ़ाती रहती है। मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित
संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है—
‘शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्येनोपबृंहितः ।
मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ॥’
संकर्षणसूत्र में भी इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—चिद्रूपता
स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव और अभाव उसकी दशायें हैं—परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदन

द्वितीयः निष्यन्दः २६५
संवेद्य है। प्रकृति से अतीत भी वहीं, प्रकृति का विषय भी वही यही मन्त्रों का प्रत्य-
यात्मक कारण है। मन्त्र बाहर और भीतर वर्णरूप से प्रकट होते हैं। वे शाश्वत
पदरूप होते हैं। वे मनुष्य के कर चरणादिक के समान हैं। वीर्य का योग होने पर किसी
भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध होते हैं—
स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् ।
स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यतीतगोचरम् ॥
इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका ।
ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥
नैष्कालिकपदावस्थाः करणानीव देहिनाम् ।
प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥
जब शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप
किया जाता है तब वह लक्ष बार किये हुए जप के समतुल्य हो जाता है।
'जपसंहिता' में भी कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में
उदित होकर एक हो जाता है और तब उस जप को लक्ष्य संख्या से भी अधिक समझना
चाहिए'— 'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'१
तेन = उसके द्वारा। प्रस्तुत व्याख्यान के कारण।
एते = ये मन्त्र। आराध्यदेवतावाचकवर्णादिसंनिवेश पूर्णमन्त्र।
शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञता आदिगुण
(धर्म) वाले ! शिव से अभिन्नस्वरूप ॥
किस कारण? क्योंकि 'तत्' = समनन्तर प्रतिपादितस्वरूप वाले शिव से
सम्बद्ध। बल = सामर्थ्य ॥ शक्ति।
आक्रम्य = उच्चिचारयिषावस्था में उसके साथ अभेदोपपत्ति स्थापित करते हुए
स्वीकार करके।
सर्वज्ञबलशालिनः = सर्वज्ञ शिव के बल द्वारा श्लाघमान होकर 'अधिकाराय
प्रवर्तन्ते' = यथास्व प्रतिनियत कार्य संपादन के स्वाम्यर्थ प्रस्तुत होते हैं (प्रसरन्ति)।
मन्त्र-विज्ञान
ये मन्त्र यदि परमेश्वर से अभेदावस्था प्राप्त न कर लें तब तक ये उत्पादविनाश-
धर्मक एवं वर्णमात्रात्मक होने के कारण तृण को भी झुकाने में असमर्थ हैं। पारमात्मिकी
शक्ति से भिन्न रहने पर ये तृणा को भी टेढ़ा नहीं कर सकते ॥
मन्त्रों की असमर्थता कब और क्यों?—
'एते हि अनासादित परमेश्वराभेददशा उत्पाद-विनाशधर्मक वर्णमात्रात्मकाः तृण-
मपि कुब्जयितुमशक्ताः ।।'—परमेश्वर में अभेदापत्ति के बिना मन्त्रों की यही स्थिति रहती
१. उत्पलदेवाचार्य : 'स्पन्दप्रदीपिका'।

२६६ स्पन्दकारिका
हैं क्योंकि उस स्थिति में ये आद्यन्त, उत्पन्न एवं विनष्ट एवं अनित्यधर्मा वर्णाक्षर मात्र
रहते हैं। ये मन्त्र— 'तद बलं आक्रम्य सर्वज्ञबलशालिनः' हुआ करते हैं।
उक्त पारमेश्वर शक्ति को पाकर ('उक्त बलाक्रमणेन') ये मन्त्र सुनिश्चित कार्यों या
अभीष्टों को निष्पादित करने में सहायक हो जाते हैं और ये दीक्षादिक के द्वारा वृश्चिक-
विष की अपसारणा से लेकर आकर्षण (स्तंभन, मोहन, वशीकरण, आकर्षण आदि)
पर्यन्त परापर सिद्धियों (अभीष्ट-साधन) के निष्पादनाधिकार में अप्रतिहतशक्ति बन जाते
हैं—'उक्त बलाक्रमणेन तु नियतेतिकर्तव्यतासहाया दीक्षादि वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापर
स्वकार्यसंपादनाधिकाराप्रतिहतशक्तयो भवन्ति।'
यदि सभी मन्त्रों में उक्त पारमेश्वर शक्ति के प्राप्ति की पराक्रम-क्षमता समान है तो
फिर इनमें अधिकारों की भिन्नता क्यों है? वे सभी साधनों में अभीष्टार्जन करने में सफल
क्यों नहीं हो पाते? ये मन्त्र किस प्रकार साधकों के नियत अधिकार के लिए प्रवर्तित
होते हैं? ये साधकों के कार्यों में उसी प्रकार सहायक होते हैं जैसे कर्मेन्द्रियाँ एवं
ज्ञानेन्द्रियाँ ('देहिनां करणानिव') ॥
परमेश्वर के द्वारा ही चेतनत्वापादन हेतु उत्पन्न प्रवृत्ति आदि में साम्य होते हुए भी
इन्द्रियाँ अपने लिये प्रकृति द्वारा प्रदत्त शक्ति के बल से शब्दादिक विषयों के प्रकाशन में
समर्थ है—और उनका सामर्थ्य उसी सीमा तक पर्यवसित है।
इन इन्द्रियों का अधिकार पृथक्-पृथक् है। सभी इन्द्रियाँ सभी इन्द्रियों के
अधिकार या सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर पातीं (यथा—नेत्रेन्द्रिय देख पाती है किन्तु
सुन नहीं पाती और श्रवणेन्द्रिय सुन पाती है किन्तु देख नहीं पाती आदि-आदि)। उसी
प्रकार ये मन्त्र साधकों के स्वीकृत परस्वभाव एवं अहम्भाव की प्रतिपत्तियों के विषय में
यथा नियताधिकार के क्षेत्र में ही प्रवर्तित होते हैं उसका अतिक्रमण करके नहीं—
मन्त्र विज्ञान—'मन्त्राः साधकानां स्वीकृतपरस्वभावाहंभावप्रतिपत्तीनां यथानियमिता-
धिकाराय प्रवर्तन्ते ॥'—
अतः सर्वज्ञबलशाली होने के बाद भी ये मन्त्र इन्द्रियों की ही भाँति नियताधिकार
मात्र हैं—'तस्मात् करणवत् सर्वज्ञबलशालिनोऽपि मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥'¹
'मन्त्र' का स्वरूप, उसका लक्षण एवं उसके प्रभाव के विषय में शास्त्रों ने बहुत
विवेचन किया है निम्नांकित उद्धरण ध्यातव्य हैं—
'मननमयी निजविभवे निजसंकोचे भये त्राणमयी' ॥
(१) कवलितविश्वविकल्पा अनुभूति कापि मन्त्रशब्दार्थः²।
(२) 'मननत्राणधर्माणो मन्त्राः'।
(३) 'वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पंचवदनोऽपि ।³
संकल्पपूर्वकूटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'⁴
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दकारिकाविवृति'। २-४. महार्थमञ्जरी।

द्वितीयः निष्यन्दः २६७
(४) ‘सेयमेवंविधा भगवती संविद्देव्येव मन्त्रः ।’१
(५) ‘सर्वक्रोडीकारो स्थितत्वाद् देव्येव मन्त्रः ॥’२
(६) ‘चिदग्निसंहारमरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान् ग्लपयन्नुदेति’ ।३
(७) मन्त्राश्चिन्मरीचयः ।
(८) जब तक कि मन्त्र निर्मल नहीं हो जाते तब तक ये सिद्ध नहीं हो सकते—
‘यावन्न निर्मला मन्त्रास्तावत्सिद्धिः कथं भवेत्? (१६।४४ ने०तं०) ।
(९) पशुप्रमाताओं के लिए तो मन्त्र एक ‘करण’ है किन्तु आचार्य ‘कारण’
हैं—और शिवस्वरूप हैं—
मन्त्राकरणरूपास्तु पशुकार्यस्य साधने ।
आचार्यः कारणं तत्र शिवरूपो यतः स्मृतः ॥ (ने०तं० १६।३।१६०)
(१०) मन्त्रोदय होता कैसे है? इन्हें शिवात्मक क्यों कहते हैं?
शिवशक्तिनियोगाच्च मन्त्राणामुदयः परः ।
सर्वत्रकलदा मन्त्रा यतस्तेऽतः शिवाः स्मृताः ॥ (ने०तं० १६।४६)
(११) मन्त्र शक्ति का प्रभाव क्या है? अचिन्त्य है—
यद्यत्प्रकुरुते ज्ञानी शिवशक्तिसमाश्रयात् ।
तत्तत्प्रसिद्ध्यते तस्य शिवशक्तिप्रभावतः ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७०)
तस्य वै संमुखा मन्त्रा दृष्टप्रत्ययकारकाः ।
क्षणेन कुरुते सर्वं शिवः परमकारणम् ॥ (नेत्रतन्त्रः १६।७१)
तं प्रबोध्येत यस्तु ज्ञानयोगबलान्वितः ।
मन्त्रशक्तिप्रभावेण स दीक्ष्यान्दीक्षयेत्प्रिये ।
क्षयं नयत्यसौ पाशान् ददात्येव परं पदम् ॥ (नेत्रतन्त्र १६।७४)
अचिन्त्या मन्त्रशक्तिर्वै परमेशमुखोद्भवा । (ने०तं० १६।७०)
(१२) मन्त्र-सिद्धि के उपाय—(१) दीपन (२) बोधन (३) ताडन (४)
अभिषेचन (५) विमलीकरण (६) इंधन (७) निवेशन (८) सन्तर्पण (९) गुप्तिभाव—
एवं नव प्रकारेण मन्त्रवादमशेषतः ।
यो जानाति स जानाति मन्त्र-साधन-साधनम् ॥
मन्त्र और मन्त्रविज्ञान—श्लोक क्र० २६ एवं २७ में कारिकाकार ने यह प्रति-
पादित किया है कि योगियों की जो पवित्र भारती है उसमें आत्मशक्ति का सञ्चार हो जाता
है और उनके द्वारा उच्चारित मन्त्र वर्णमात्र नहीं रहते प्रत्युत् वे ‘सर्वज्ञबलशाली’ बन
जाते हैं और किसी भी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने वाले एवं सारे कार्यों का निष्पादन
करने वाले होते हैं ।
१-३. महार्थमञ्जरी ।

२६८ स्पन्दकारिका
मन्त्रात्मिकाशक्ति—सभी प्रकार के मन्त्र (मन्त्राः) स्पन्दस्वरूपात्मिका संवित् शक्ति
के साथ एकाकारता प्राप्त करने के फलस्वरूप सर्वज्ञता आदि (सर्वज्ञता, सर्वात्मक बोध,
अप्रतिबंधित स्वातन्त्र्य, अपनी अनन्त शक्तियों का निर्बाध प्रसार, अनन्तशक्ति, शक्ति
चक्रों के ऐश्वर्य, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, परम संतृप्ति आदि) आत्मबलों (बल) को
अधि-गत करके यथाकांक्षित कार्यों के निष्पादन करने का अधिकार उसी प्रकार अधिगत
कर लेते हैं जिस प्रकार शरीरी प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने निजी संकल्प मात्र के द्वारा ही
अपने समस्त आकांक्षित कार्यों का निष्पादन कर लेती हैं ॥ २६ ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—समस्त प्रकार के मन्त्र आवरण शून्य चिद्रूपता (आत्म
चैतन्य) के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेने के परिणामस्वरूप सर्वज्ञता आदि माहेश्वर
बलों को प्राप्त कर लेते हैं तथा समस्त शरीरधारी जीवों की इन्द्रियों की भाँति अपनी
अनुकम्पा आदि अधिकार सम्बद्ध कार्यों को निष्पादित करने लगते हैं । आत्मबल का
संस्पर्श प्राप्त करने के बिना वे मन्त्र किसी आकारान्तर विशेष (शक्ति शून्य वर्णों, मन्त्रों
और मात्राओं वाले विशेष रूप वाले) के द्वारा किसी भी कार्य का निष्पादन एवं फल-
सिद्धि में समर्थ नहीं हो पाते ।
‘तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिन बलेन श्लाघा-
युक्ताः प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे, करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि
विशेषेण ।।' ॥ २६ ॥ १
वहीं ये शान्त रूप एवं निरञ्जन (माया जन्य रागों से मुक्त) मन्त्र आराधकों के चित्त
के साथ चिदाकाश में संलीन हो जाते हैं अतः ये समस्त मन्त्र शिव धर्मात्मक माने जाने
चाहिए ॥
भट्टकल्लट कहते हैं—ये ‘शान्तरूप’ ‘निरञ्जन’ (मायाकालुष्यविवर्जित) मन्त्र
सांसारिक भोगसिद्धि से निवृत्त होकर साधक के चित्त के साथ स्वभाव (निर्मल
संवित् तत्त्व = स्वस्वभाव) में या सामान्य स्पन्दात्मिका शाक्त भूमि में विलीन हो
जाते हैं । मन्त्रों का स्वस्वभाव है कि वे आत्मा का शिव के साथ तादात्म्य स्थापित कर
देते हैं । इसी कारण समस्त मन्त्रों को शिवात्मक कहा जाता है । भट्टकल्लट के
शब्दों में—‘तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, माया-
कालुष्यरहिताः, सह साधकचित्तेन अनेन कारणेन शिव संयोजनास्वभावेन, इति
शिवात्मिका उच्यन्ते ।।' २
‘मन्त्र’ आवरणशून्य चिद्रूपता के साथ तादात्म्य (एकाकारता) अधिगत करने के
अनन्तर ही सर्वज्ञता आदि माहेश्वर बल प्राप्त कर पाते हैं इसके पूर्व नहीं । मन्त्र के दो
रूप हैं—(१) 'साञ्जन एवं (२) 'निरञ्जन' । सांसारिक भोगों की प्राप्ति की ओर उन्मुख
मन्त्रों को साञ्जन मन्त्र कहा जाता है किन्तु जिनका प्रयोग निराकांक्ष होकर स्वस्वरूपा-
भिव्यक्ति के लिए किया जाता है उन्हें 'निरञ्जन' कहा जाता है ।
१. 'स्पन्दसर्वस्व' । २. 'स्पन्दसर्वस्व' ।

द्वितीयः निष्यन्दः २६९
मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता—
तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सह साधकचित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥
वे शान्त (शुद्ध संवित्) एवं निरञ्जन (मायिक आच्छादनों से शून्य) मन्त्र
(निवृत्ताधिकार होकर) आराधक के चित्त के ही साथ वहीं (स्वस्वभाव व्योम, या
स्पन्दात्मक बल या विशुद्ध चिद्रूप सामान्य स्पन्द रूप शाक्त भूमिका में) लीन हो जाते
हैं । अतः वे (समस्त मन्त्र) शिवस्वरूप (ही) हैं ॥ २७ ॥

  • सरोजिनी *
    तत्रैव = 'स्वस्वभाव व्योम में' = विशुद्धचिद्रूपता में,
    तत्रैव = वहीं (स्पन्दात्मक बल में) ॥ (स्वस्वभाव व्योम में—भट्टकल्लट)
    निरञ्जनाः = अञ्जन+शून्य (कृतकृत्य होने के कारण निवृत्तअधिकारमल) ॥ कृतकृत्य =
    अपने पदार्थ या लक्ष्य प्राप्त करने पर आत्मतृप्त ॥ (निरञ्जनाः शान्तरूपाः मन्त्राः
    स्पन्दात्मके बले सम्यक् अभेदापत्या प्रकर्षेण अपुनरावृत्या लीयन्ते । अधिकार-मलान
    मुच्यन्ते आराधकचित्तेन सह ।¹
    मन्त्र-विज्ञान—समस्त मन्त्र शिवधर्मी या शिवस्वरूप हैं । 'मन्त्र' अपने मूल रूप
    में आत्मा की किरणें हैं—चैतन्य की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः' । 'प्रणव' (महा-
    मन्त्र) की १२ कलायें हैं । उनमें 'बिन्दु' नाद के रूप में विकसित होता है । नाद ही
    'मन्त्र' के रूप में आकार ग्रहण करता है । मन्त्र भी अशुद्धियों से मुक्त हो जाते हैं और
    उनके कार्यों की अशुद्धियाँ भी, उनके द्वारा लक्ष्य-प्राप्ति के अनन्तर, लुप्त हो जाती हैं ।
    ये मन्त्र एवं उनके स्वामी महेश्वर शिव के स्वभाव वाले हैं—शिवस्वभावी हैं—शिवधर्मी
    हैं—और स्पन्दसार हैं । ये स्पन्द से उत्पन्न होते हैं और उसी में लय हो जाते हैं ।²
    एक प्रश्न यह उठता है कि—मन्त्र एवं करणों का उदय तो समान स्रोत से होता
    हैं—उदय में तो दोनों समधर्मी हैं फिर करण सर्वज्ञात्मक क्यों नहीं हैं? परमेश्वर
    'मायाशक्ति' के द्वारा शरीर एवं इन्द्रियों का आविर्भाव करता है और ये भेदपूर्ण हैं—
    द्वैतात्मक हैं । परमात्मा 'विद्याशक्ति' के द्वारा आकाश के माध्यम से मन्त्रों को जन्म देता
    है । इन मन्त्रों का सार तत्त्व अधिष्ठात्री शक्तियों में निवास किया करता है । मन्त्रों के
    द्वारा सर्वज्ञता आदि गुण एवं शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं यह संगत तथ्य है क्योंकि
    मायिक धरातल पर भी मन्त्र में (किसी देवी के वाचक के रूप में) शरीर एवं पुर्यष्टक की
    भाँति बोध-संकोचत्व (Limitation in knowledge) नहीं है प्रत्युत् उसमें सर्व-
    ज्ञत्वादि गुण निहित है ।³
    इस पंक्ति की व्याख्या उपर्युक्त विधि से अनन्त भट्टारक के संदर्भ में भी की जानी
    चाहिए जो कि विद्यापाद पर स्थित है एवं सृष्टि करते हैं ।
    १-३. स्पन्दनिर्णय ।

२७० स्पन्दकारिका
इस श्लोक के दूसरी व्याख्या भी की जानी चाहिए—दीक्षादिक में व्याप्त गुरुजनों
की इन्द्रियों के रूप में समस्त 'मन्त्र' स्पन्द सिद्धान्त पर आश्रित हैं और वे साधक के
मस्तिष्क के साथ स्पन्द में लय हो जाते हैं। दीक्षादिक में प्रवृत्त समस्त आचार्यादिकों के
करण रूप समस्त मन्त्र उन स्पन्द तत्त्व रूप 'बल' को अधिगत करके—आराधक के
चित्त के साथ भोगमोक्ष के साधन आदि के अधिकार के लिए प्रवृत्त होते हैं और वहीं
शान्त, (वाचक शब्दात्मक शरीर रूप) एवं निरञ्जन (शुद्ध) रूप से लय हो जाते हैं। १
(१) मन्त्र स्पन्दसार हैं। मन्त्रों की स्पन्दरूपता एवं स्पन्दसारता का प्रतिपादन
ही इस श्लोक का मुख्याभिप्राय है। शैव संप्रदाय के अनुसार (जिसमें ८ एवं १८ भेद
हैं) 'मन्त्र' स्पन्द के साथ अभिन्न हैं। (२) मन्त्र, मन्त्रेश्वर आदि के रूप में होने वाली
सृष्टि शुद्धसृष्टि है और शिवस्वभावा है किन्तु मायादिरूपा अशुद्ध सृष्टि भी शिव से
भिन्न नहीं है प्रत्युत् शिवस्वरूपा ही हैं।
शुद्धसृष्टि मन्त्ररूपता है और उनके अधिपति देवता शिव के स्वभाव वाले हैं। २
ये 'मन्त्र' साधक के चित्त की प्रवृत्ति एवं निवृत्ति के निमित्त से अर्थात् उसकी
आधारभूत इच्छा से पुनः लीन हो जाते हैं—उसी शक्तिमान् स्वस्वभाव में लय प्राप्त कर
लेते हैं। क्योंकि ये स्वस्वभाव के अनुगामी और शक्तिरूप हैं। यही बात 'कालपरा'
नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—पर अक्षर रूप वृक्ष में अनेक शक्तियाँ विद्यमान हैं।
उनके विवर्त शक्ति के वर्णों के रूप में प्रकट होते हैं और मुख के द्वारा निःसृत होते हैं— ३
पराक्षर तरोधर्तुर्माना शक्तेर्विवर्तगाः ।
शक्तयो वर्णदेहेषु वक्त्राद्दर्णत्वमागताः ॥
ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण स्वयं शान्त हैं और निरञ्जन (कालुष्यरहित)
है, या निरञ्जन तत्त्व से अनुप्राणित हैं। यही कारण है जो शिव शङ्कर में धर्म हैं वे ही
मन्त्र में भी अर्थात् मन्त्र भी सर्वज्ञ एवं सर्वकर्ता हैं।
सह साधक चित्तेन लीयन्ते तत्र यत् स्मृतम् । ४
शिवतात्मनि सर्वात्म्यात् चाहैतत्सोपपत्तिकम् ॥
साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं अर्थात् आत्मा ही शिव है । ५
मन्त्र योग—ये शिवधर्मीमन्त्र जिस सीमा तक अधिकार-सम्पन्न हैं उस सीमा तक
प्रवृत्त होते हुए, अञ्जन (वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता) से मुक्त होकर
एवं शान्तरूप (शुद्ध अर्थात् संविन्मात्रावशिष्ट, एवं निर्विकार आत्मा के स्वरूप वाला)
होकर तत्रैव—परमकारण एवं स्वस्वभावशिव में संप्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लीन हो
जाते हैं अर्थात् उनके साथ ऐक्य प्राप्त कर लेते हैं।
निरञ्जन—अञ्जनरहित । वाच्योपराग मल से या वर्णादिरूप भावनात्मकता से
रहित ।
शान्तरूपाः = संविन्मात्रावशेष । शुद्ध एवं निर्विकार आत्मा वाले ।
१-२. स्पन्दनिर्णय । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका ।

द्वितीयः निष्यन्दः २७१
तत्रैव = स्वस्वभाव, परमकारण शिव में ।
सम्प्रलीयन्ते—सम्यक् रूप से लय हो जाते हैं । उसके साथ एकाकार हो जाते
हैं । एकता प्राप्त कर लेते हैं ।
शिवधर्मिणः = शिव अर्थात् परमेश्वर के अनन्यसाधारण सर्वज्ञत्वादि गुण (धर्म)
वाले अर्थात् शिव से अभिन्न स्वरूप वाले ।
आराधकचित्तेन सह = आराधक के मन के साथ । कैसे चित्त के साथ? उस
अवस्था में अभिसंधि उपाधि से रहित होने के कारण स्वाभाविक मात्रावशेष साधक-चित्त
के साथ ।
इसके द्वारा इसे तात्त्विकमन्त्रवीर्यात्मक प्रतिपादित क्यों किया गया? क्योंकि
मांत्रिक चेतना के उदय एवं अस्तमन की दशाओं की परमकारणस्वरूप शिव के साथ
अभिन्नता है—
'मन्त्रचेतसोः उदयास्तमयदशयोः परमकारणात् शिवाभेदः ॥'
इस प्रकार मन्त्रात्मक एवं साधक के चित्त के साथ एकात्मक होने के कारण स्वयं
शिव एवं शक्ति ही वर्णसंकल्पादिरूपधारिणी होकर प्रकट हो जाती हैं और इस तरह
होकर शिव की शक्ति स्वस्वभावबल का स्पर्श न पाने वाले साधकों में भेदविभ्रम उत्पन्न
करती हुई केवल नियतार्थसाधनाधिकार को ही प्रवर्तित करती है । यथा प्रतिपादित
स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ आत्मप्रतिपत्ति हुआ करती है । १
'मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी हुआ करते हैं: 'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति'
जो यथाप्रतिपादित स्वस्वभाव में ही सुदृढ़ रूप से आत्मप्रतिपत्ति कर चुके हैं उनके
उदय एवं अस्तमय (अस्तमन) के परिज्ञाता समस्त मन्त्र सर्वार्थसाधनाधिकारी होते हैं
और वे इसके लिए उन-उन कर्तव्यों के साहित्य (एक साथ होना या रहना के नियमादिक
की अपेक्षा भी नहीं रखते )
'मन्त्राः सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदितिकर्तव्यतासाहित्यनियमाद्यपेक्षां
बिना' इस स्थिति में—
मन्त्र विज्ञान—
'यद्यद्वचनं येन येनाभिसंधिना उच्चारयति तत तस्यामोघमन्त्रतामापद्यते ॥'
अतः योगियों के द्वारा, स्वभावबलाक्रमण वाले, सिद्ध एवं स्वतः सिद्ध मन्त्रों के
पराक्रम (सामर्थ्य) प्रत्यवमृष्टव्य हैं ।
मन्त्र शिवधर्मी हैं—'मन्त्रा एव शिवधर्मिणो' ।
जब तक कि कोई 'क्रिया' ज्ञान नहीं बन जाती एवं कोई 'कार्य' ज्ञेय नहीं बन
जाता अर्थात् परतत्त्वाभेदापत्तिलब्धात्मक एवं (इस प्रकार) शिवात्मक नहीं बन जाते तब
तक 'मन्त्र' शिवधर्मी नहीं बन पाते । २

१. स्पन्दकारिकाविवृतिः रामकण्ठाचार्य । २. स्पन्दविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।