स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमः निष्यन्दः २५७
उदित । 'सहज' स्वाविर्भूत, सरल, अकृत्रिम, स्वयंभू, स्वाभाविक, आदि अर्थों का
द्योतक है । 'हठयोगप्रदीपिका' की टीका 'ज्योत्स्ना' में सहज शब्द का अर्थ—'स्वाभा-
विक ध्येयाकार वृत्तिप्रवाह' किया गया है और इस 'सहजतत्त्व' के बिना ज्ञान को
'दंभमिथ्याप्रलाप' भी कहा गया है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है 'ज्ञान' योगसाधना
सापेक्ष है क्योंकि—
(१) 'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे
यावद्विन्दुर्न भवति दृढः प्राणवातप्रबन्धात् ।
यावद्ध्याने सहज सदृशं जायते नैव तत्त्वं
तावज्ज्ञानं वदति तदिदं दंभमिथ्याप्रलापः ॥' (ह०प्र०)
(२) योगियों की 'सहजावस्था'—
उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (ह०प्र०)
(३) 'ज्योत्स्ना' में 'सहजावस्था' का स्वस्वरूप—
'जातः कुण्डलीबोधो यस्य तस्य परिहृतानि समग्राणि कर्माणि येन तस्य योगिनः
आसनेन कायिकव्यापारे त्यक्ते प्राणेन्द्रियेषु व्यापारस्तिष्ठति । प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-
संप्रज्ञात समाधिभिर्मानसिक व्यापारे व्यक्ते बुद्धौ व्यापारस्तिष्ठति । असंगो ह्ययं पुरुषः
शुद्धः पुरुषः सत्वगुणात्मिका परिणामिनी बुद्धिरिति परवैराग्येण दीर्घकालसंप्रज्ञाताभ्यासेनैव
बुद्धिव्यापारे परित्यक्ते निर्विकारस्वरूपावस्थितिर्भवति । सैव सहजावस्था'
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ (ह०योग०)
('तत्त्वदर्शनमात्माऽपरोक्षानुभवः दुर्लभं, सहजावस्था
विकल्प-संस्कार-आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक') (आ०४) में कहते हैं कि—
(१) परमेश्वर के 'स्व' भाव में प्रवेशेच्छा विकल्पों के संस्कार से ही निष्पादित
होती है ।
(२) साधक को सर्वप्रथम विकल्पों का संस्कार करके सद्विकल्प-गणपति बनना
चाहिए । एतदर्थ उसे सर्वप्रथम-शास्त्र-स्वाध्याय, चिन्तन एवं मनन करना चाहिए । →
पुष्टि, तुष्टि की प्राप्ति, स्वात्म कुसुम का प्रस्फुटन 'प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात्संस्कार-
मञ्जसा ॥' (तन्त्रालोक ४।२)
(३) संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प
विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्यात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोप्यन्नं सदृशात्मकम् ॥ (४।३)
(४) संस्कार-शुद्ध विकल्प → स्वात्म संस्कृत शुद्धविकल्प ।
अस्फुट संस्कृत विकल्प → स्फुट संस्कृत विकल्प—
'भ्रश्यदस्फुटत्व' 'भाव्यमान स्फुटीभाव' → निर्विकल्प भाव ।
स्पं० १७