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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

२५६ स्पन्दकारिका
'इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (३।१२४ ह०प्र०)
ध्यातव्य बिन्दु—स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में योग की साधना का आत्मीकरण
इसलिए किया गया क्योंकि इन योगियों ने अनुभव किया न तो मात्र 'ज्ञान' से और न तो
मात्र 'योग' से । 'परमार्थ' 'परमपद' 'उन्मनी' 'सहजावस्था' 'प्रत्यभिज्ञा' 'शाक्तभूमिका'
प्राप्त की जा सकती है अतः उन्होंने दोनों का आत्मीकरण किया । कारण सुस्पष्ट है—
'विना युद्धेन वीर्येण कथं जयमवाप्नुयात् ।
तथा योगेन रहितं ज्ञानं मोक्षाय नो भवेत् ॥ ('योगबीज')
स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का योग हठयोग नहीं राजयोग है । राजयोग का
स्वरूप निम्नाङ्कित है—वृत्त्यन्तरनिरोधपूर्वकात्मगोचरधारावाहिकनिर्विकल्पवृत्ति राजयोगः ।
(ज्योत्स्ना ३.१२६) ।
सहजविद्योदय निष्यन्द
'सा विद्या या विमुक्तये, ज्ञानान्न ऋते मुक्तिः' के अनुसार 'विद्या' एवं 'ज्ञान' दोनों
मोक्ष के साधन हैं । योगियों ने ज्ञान का स्वरूप पृथक् रीति से परिभाषित किया है ।
यदि विद्या को 'ज्ञान' का पर्याय मान लिया जाय तो 'ज्ञान' का निम्न अर्थ विद्या का
पर्याय माना जाना चाहिए । ज्ञान क्या है?
ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् ।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्या, मोक्षं स गच्छति नरः न कथंचिदन्यः ॥
—हठयोग प्र०
आचार्य भट्टकल्लट ने अपनी 'स्पन्दकारिकावृत्ति' ('स्पन्दसर्वस्व') के द्वितीय
निष्यन्द का नामकरण—'सहजविद्योदय' किया है ।
स्वरूपस्पन्द निष्यन्द में तो रचनाकार ने यह प्रमाणित किया कि—
(१) विश्व के कण-कण में चैतन्यस्वरूपा स्पन्दशक्ति अनुस्यूत है ।
(२) साधक विकल्पों को संस्कृत करके स्वसंवेदन को विशुद्ध बनाकर अपने
हृत्पद्म में शाक्त भूमिका की अनुभूति एवं विश्वात्मभाव को अधिगत करके पशुभाव से
मुक्त होकर विश्वात्मैक्य की अनुभूति करते हैं ।
सहजविद्योदय निष्यन्द में रचनाकार यह प्रतिपादित करता है कि विकल्पसंस्कार
की पद्धति का अनवरत अभ्यास प्रबुद्ध योगियों को शुद्धविकल्पात्मक, अहंविमर्शात्मक,
निर्मलशुद्धविद्यास्वरूप 'सहजविद्या' की अनुभूति प्रदान करता है । 'सहजविद्या'
अहंविमर्श स्वरूप का साक्षात्कार कराती है और यह शुद्ध विकल्पात्मिका है । इसके द्वारा
स्वस्वरूप का साक्षात्कार भी होता है । योगी को मन्त्रवीर्य की अनुभूति होती है तथा वह
प्रबुद्धावस्था से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश करता है ।
'सहज' शब्द दो शब्दों से निर्मित हुआ है—'सह' + 'ज' = जन्म के साथ-साथ