स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ स्पन्दकारिका
'शाक्तोपाय' क्या है?
उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् ।
यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥
'इच्छोपाय' क्या है?
तत्राद्ये स्वपरामर्शैर्निर्विकल्पैकधामनि ।
यत्स्फुरेत् प्रकटं साक्षात् तदिच्छाख्यं प्रकीर्तितम् ॥ १४६ ॥
'शांभवोपाय' क्या है?
एवं परेच्छाशक्त्यंशसदुपायमिमं विदुः ।
शांभावाख्यं समावेशं सुमत्यन्ते निवासिनः ॥ २१३ ॥
'शाक्तोपाय' में बाह्योच्चार, करण, ध्यान, वर्ण एवं स्थान की कल्पना करके
इनकी साधना नहीं की जाती । अतः यहाँ अभेदावस्था ही होने से शाक्तोपाय भेदाभेदमय
है—(तन्त्रालोक)—
'उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयत् ।
यः समावेशमाप्नोति शाक्तः सोत्राभिधीयते ॥ (अ०१।१६९)
(४) आणवोपाय—'आणवोपाय' यह भेदप्रधान है । 'अणुषु भेदिषूपायेषु भवः
आणवः ॥' इसके अनेक साधन हैं—
उच्चार ध्यान वर्ण करण स्थान
(प्राणायाम एवं मन्त्र जप)
इन पाँचों अंगों से समन्वित समावेश का उपाय 'आणवोपाय' कहा जाता है ।
यही 'क्रियोपाय' भी कहा जाता है ।
आणवोपाय के साधन एवं उनके उपसाधन१
उच्चार करण ध्यान वर्ण स्थान
पञ्चप्राणात्मक चिदात्मक (प्राणात्मक उच्चारण में स्वस्फुरित अनाहत नाद । नाद -> वर्ण) (सृष्टि-संहार बीजात्मक वर्ण) प्राण ५ भेद देह २ भेद बाह्य ११ भेद
चित्प्राधान्य विमर्शप्राधान्य
ग्राह्य ग्राहक संवित्ति संनिवेश व्याप्ति आक्षेप त्याग
१. उच्चारकरणं ध्यानं वर्णस्थानप्रकल्पनैः ।
यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ —तंत्रालोक आ० १/१७०