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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 519 में से

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पृष्ठ 66

परिचय एवं पृष्ठभूमि ६५
गुरुप्रदत्त ज्ञान द्वारा विकल्प विगलित हो जाते हैं। इस अनुत्पन्नावस्था में भावना आदि की
अपेक्षा न रखने वाली अविकल्परूपा संवित् शिव के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाली
अवस्था का उदय होता है। इसका साधन ही है— 'शांभवोपाय'।
१. अकिंचिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः ।
उत्पद्यते य आवेशः शांभवोऽसावुदीरितः ॥ (तन्त्रा० आ० १ । १६८)
२. अकिञ्चिन्तकस्येति विकल्पानुपयोगिता ।
तथा च झटिति ज्ञेयसमापत्तिर्निरूप्यते ॥ (१७१)
३. तेनाविकल्पा संवित्तिर्भावनाद्यनपेक्षिणी ।
शिवतादात्म्यमापन्ना समावेशोऽत्र शांभवः ॥ (१७८)¹
समावेशों की संख्या
┌────────────────────────┴────────────────────────┐
३ (शांभव । शाक्त । आणव) ५० भेद—'श्रीपूर्वशास्त्र'
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भूत तत्त्व आत्मा मन्त्र शक्ति (५ रुद्रशक्ति
५ ३० ३ १० २ समावेश)
भेद भेद भेद भेद भेद = ५० भेद ।
(३) शाक्तोपाय— 'तन्त्रालोक' (आ० १ । २२०) 'भेदाभेदौ हि शक्तिता': 'शाक्तो-
पाय, भेदाभेदात्मक है। इसे ही 'ज्ञानोपाय' भी कहा गया है। 'आत्मैवेदं सर्वं' का
चिन्तन करने पर आत्मा और अनात्मा (आत्मा+इदम्) दो विकल्पांशों की विद्यमानता
रहती है-'आत्मा ही अनात्मा के रूप से प्रकाशित हो रहा है।'-इस प्रकार पौनःपुन्येन
अभ्यास करने पर अभेदपरामर्श प्राप्त होता है। विकल्प निर्विकल्पता में रूपान्तरित हो
जाते हैं—यही ज्ञान है। इसीलिए इसे 'ज्ञानोपाय' भी कहते हैं।
भूयो भूयो विकल्पांशान्निश्चयक्रमचर्चनात् ।
यत्परामर्शमभ्येति ज्ञानोपायं तु तद्विदुः ॥
उपायत्रय
┌──────────────────────┬──────────────────────┬──────────────────────┐
'अभेदोपाय' │ 'भेदाभेदोपाय' │ 'भेदोपाय' │ ── अभेदोपायमन्त्रोक्तं शांभवं शाक्तमुच्यते ।
(शांभव उपाय) │ (शाक्त उपाय) │ (आणव उपाय) │
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'इच्छोपाय' │ 'ज्ञानोपाय' │ 'क्रियोपाय' │ ── भेदाभेदात्मकोपायं भेदोपायं तदाणवम् ॥
└──────────────────────┴──────────────────────┴──────────────────────┘
—(तन्त्रालोक आ० १)
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१. ज्ञान
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आणव शाक्त शाम्भव
स्पं. भू. ४