स्मृतिचन्द्रिका: व्यवहारकाण्ड (देवण्णभट्ट - दक्षिण भारत का मूर्धन्य न्याय-दर्शन महाग्रन्थ)

स्मृतिचन्द्रिका: व्यवहारकाण्ड (देवण्णभट्ट - दक्षिण भारत का मूर्धन्य न्याय-दर्शन महाग्रन्थ)
Smritichandrika: Vyavaharakanda of Devannabhatta
देवण्णभट्ट (सम्पादक: एल. श्रीनिवासाचार्य) द्वारा
DevanagariSanskritpublished474 पृष्ठ
पृष्ठ 473, कुल 474 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 473
अशुद्धसंशोधनम्.
——————
पुटे. पङ्क्तौ. अशुद्धम्. शुद्धम्.
6 19 धुत्राभावे पुत्राभावे
8 6 बिधिं विधिं
16 8 पि दिषु पित्रादिषु
19 14 सर्वसिन्वा सर्वस्मिन्वा
27 19 शतभिषशुक्ता शतभिषग्युक्ता
28 तमपुटे 12 पङ्क्त्यनन्तरं—‘शुक्ले पौर्वाह्निकी ग्राह्या कृष्णे
चैवापराह्निकी’ इत्यर्धश्लोकेन भाव्यम्.
46 16 संसुखा संमुखा
48 6 अमावात्या अमावास्या
81 21 श्राद्धावधानात् श्राद्धविधानात्
85 6 तदष्युक्त तदप्युक्त
85 11 कुर्याच्छूद्रं कुर्याच्छ्राद्धं
96 15 त्राद्धं श्राद्धं
117 1 सूर्ति मूर्ति
162 19 अनुशंस्यं आनृशंस्यं
165 11 रैहितमिति रहितमिति
207 11 प्रभृतीत्यर्थ प्रभृतीत्यर्थः
235 16 व्यक्तिमात्रयेव व्यक्तिमात्रमेव
244 4 भोज्यो भोज्यौ
282 9 प्रधमं प्रथमं
SMRITI CHA.—Vol. V.