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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 190 में से

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आठवीं पुतली ८. (६१)

कर बोली कि-महाराज ! हमारी ओर और दृष्टिसे मत देखो,
क्योंकि, हम तपस्विनी हैं. जो हम सरापेंगी तो तुम भस्म हो
जाओगे राजा बोला कि-शाप मुझे न लगेगा. मैं राजा वीर
विक्रमादित्य हूं. कोई मेरा क्या कर सक्ता है ? मेरे हुक्ममें
ताल बेताल हैं. विक्रमका नाम सुनतेही वह राजाके चरणपर
गिरपड़ी. और कहा महाराज ! तुम नरेश हो. हमारा उप-
देश सुनो. जल्दी यहांसे जाओ अभी यती आवेगा तो मुझे और
तुम्हें दोनोंको शाप देकर जलादेगा. तब नरपति बोला-कि,
हम यतीके सामने न होंगे, तो हमारा कुछ वह कर न सकेगा.
पर स्त्रीहत्या लेनी उचित नहीं; क्योंकि स्त्री हत्या लेनेसे आ-
खिरको नरक भोग करना पडताहै. फिर राजाने कहा कि-उस
सिद्धने तुझे कहां पाया ? तब वह बोली कि, कामदेव मेरा
बाप है और पुष्पवती मेरी मा है. मैने उनके कुलमें अवतार
लिया था. जब बारह बरसकी में होगई तब उन्होंने मुझे एक
आज्ञा की सो मैंने न मानी. इतनेही अपराधसे माता पिताने
क्रोधकर मुझे यतीको दे डाला. और मुझे यह अपने वश करके
इस बनमें ले आया. और यहां आकार बंदरी करके रूखपर
चढा दिया. इस शक्लसे एक बरस गुजरा कि, मैं इस बनमें
पडी हूं. सच है कि, किस्मतके लिखेको कोई मिटा नहीं सक्ता,
यह मनमें सोचकर चुपकी हूं. तब राजा बोला-मेरा जी