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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 190 में से

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पृष्ठ 56

सातवीं पुतली ७. ( ५३ )
राजा ! तुझमें इतनी शक्ती हो तो तूभी इस सिंहासनपर
बैठ. यह बात सुन राजा मनमलीन तो महलमें गया. दूसरे दिन
राजा मनमें गुस्सा खाताहुआ फिर सिंहासनपर बैठनेको चला
और वररुचि पुरोहितसे कहा कि-इस बेर में पुतलीके रोकनेसे
न रुकूँगा आज सिंहासनपर मै जरूर बढूंगा. जब राजाने
अपना पांव उठाकर सिंहासनपर बैठनेको चाहा कि, पांव रक्खूं
तब कामोदी नाम—
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सातवीं पुतली-
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कहने लगी- और पांव तले आन गिरी, तब राजाने यह देख
दुखित होके पांव खेंचलिया. और उस पुतलीसे कहा-तू किस कारण
पांवतले आन गिरी ? तब इसने कथा शुरू की कि, हम जो हैं
अबला सो रातयुगकी हैं. राजा ! तेरा अवतार कलियुगमें हुआ.
हमैं पहले एक मर्दको छोड दूसरेका मुँह नजरसे नहीं देखा.
हम पहले अपना माजरा कहती हैं कि, विश्वकर्माने तो हमें जन्म
दिया और बाहुबल राजाके पास आकर रहीं उसने राजा वीर वि-
क्रमादित्यको हमें दिया, वह अपने घर ले आया. जब हम वहांसे बि-
छुड़ीं तबसे कभी सुख नहीं पाया. जो उस राजाके बराबर होवै सोही इस