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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 190 में से

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पृष्ठ 55

( ५२ ) सिंहासनबत्तीसी.
पर तुम्हारी मिहरबानी हो उसीको दर्शन मिलताहै. यह सुनकर
सूर्य बोले कि-तू कौन है ? तेरा क्या नाम है ? तुझे देख देख के
मेरे जीमे तरस आतीहै. अपना नाम तू जल्दीसे कह तब
राजा बोला कि-स्वामी ! नगर अंबावतीमें गंधर्वसेन नाम जो
राजा था उसका मैं बेटा हूं. मेरा नाम विक्रम है. आपकी कथा मैंने
एक ब्राह्मणके मुंहसे सुनीथी. तब मुझे आपके दर्शनकी इच्छा
हुई और आपकी तवज्जोहसे आपके चरण देखे. अब मेरे ताईं
आज्ञा दीजिये तो मै विदा हूं. यह सुन सूर्यने हँसकर अपना
कुंडल उतारकर राजाको दिया और कहा अब तूं निडर राज
कर. फिर सूर्यका रथ आगे बड़ा और खंभभी घटने लगा. जब
राजा अकेला रहगया तब बीरोंको अपने पास बुलाया वे आकर
हाजिर हुये. उनके कांधेपर सवार होके अपने मकानको आया.
जब शहरमें दाखिल होने लगा तब सामनेसे एक गुंसाई
आया, और राजासे अपने योगकी मतिसे कहा-महाराज ! जो
आप सूर्यके पाससे कुंडल लायेहो सो मुझे दान दीजिये, और
यश धर्म, बड़ाई लीजिये. राजा बोला-ऐ मतिहीन ! ऐसा योग
तूने कब कमाया ? जो तू कुंडल मांगता है. वह संन्यासी कहने
लगा कि-महाराज ! मैंने योग तो कुछ नहीं साधा. पर सुनाथा,
कि, राजा विक्रम बडा दानी है इससे मैंने आपको जांचा. राजाने
हँसकर कुंडल उतार उसके हाथ दिया. वह खुश होता हुआ
अपने घरमें गया. कामकंदला यह बात सुनाकर कहने लगी-