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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 190 में से

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पृष्ठ 123

(१२२) सिंहासनबत्तीसी.
राजाके हैं और यह इतना दुःखी क्यों है ? फिर उसने पूछा कि-
कितने दिनोंसे तूं यह काम करता है ? उसने कहा-जबसे मैंने
होश संभाला हे तबसे यही उद्यम करके खाताहूं और राजा
धीर विक्रमादित्यके नगरमें रहताहूं. ब्राह्मणने पूंछा कि-तू बहुत
दुःख पाता है. वह बोला-महाराज ! यह भगवतकी इच्छा है
कि किसीको हाथीपर चढ़ावे और किसीको पैदल फिरावे,
किसीको धन दौलत बिन मांगे दे और किसीको भीख मांगे
टुकडाभी न मिले ! कोई सुखमें चैन करते है कोई दुःखमें धौरा
रहते है. भगवतकी गति किसीसे नहीं जाती जानी कि कौन रूप
किसमें रचा है ? और जो कर्ममें लिख दिया है सो मनुष्यको
भुगतना होता है ! उसके हाथ सुख दुःख हैं. इसमें किसीका कुछ
जोर नहीं चलता. उससे यह बातें सुन और वह चिन्ह देख
ब्राह्मणने अपने जीमें अचरज किया. कहा कि-मैंने बड़ी मह-
नतसे विद्या पढीथी. सो मेरा श्रम व्यर्थ गया. और सामुद्रिकमें
जो विधी लिखी है पुरुषके लक्षण देखनेकी सो झूठ गंवाई और
यह कह मनमें मलीन हो विचार करता राजाके पास चला कि
जाकर उसकाभी पांव देखूं कि उसमेंभी निशान है या नहीं ?
और जो लक्षण पोथीके प्रमाण न मिलें तो सब पोथियां फाड
जला संन्यासी हो तीर्थ यात्राको चला जाऊं. फिर संसारमें रहनेसे
कुछ अर्थ नहीं और न मानूंगा क्योंकि इतनी मुद्दतकी