सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवीं पुतली १९. ( १२३ )
मेहनत झूठ कर्मके पीछे गवाई तो आगे संसारमें क्या फल
मिलेगा ! उससे भगवद्भजन करना अच्छा है इस लिये कि,
स्वार्थ न हो तो परमार्थ तो होगा यह विचार करता करता
राजाके पास जाकर पहुँचा, और राजाको आशीद दी. तब
राजाने दंडवत् करके कहा कि-देवता ! तुम इतना मन मलीन
होगये इसका कारण क्या ? क्या दुःख तुम्हारे मनमें उपजा है ?
सो मुझसे कहो ? ब्राह्मणने कहा कि-राजा ! तू पहले अपना
चरण मुझे दिखा तो मेरे चित्तका संदेह जाय. तब राजाने
अपना पांव ब्राह्मणको दिखाया और उसने कुछ लक्षण उसमें
न पाया. वह देख शीश नवाय चुप होरहा और अपने जीमें
कहने लगा कि, पोथियां सब जला संसारको त्याग वैराग्य ले
देश देश फिरिये. यह तो अपने जीमें विचार कर रहाथा,
राजाने कहा-पंडित ! तूं क्यो क्रोधकर शिर डुलाय पछताय
चुप हो रहा है ? अपने मनकी बात मुझे कह कि तूने अपने मनमें
क्या ठानी है ? तब ब्राह्मण बोला कि-सुनो महाराज ! मेरे पास
सामुद्रिक पोथी है और बारह बरस मैंने पढकर याद की है सो
मेहनत मेरी निष्फल गई इस वास्ते संसारसे मेरा जी उदास
हुआ है. राजाने हँसकर कहा कि-यह तुमने प्रत्यक्ष क्यों कर
देखा. वह बोला-महाराज ! एक मैंने बडा दुःख देखा कि
जिसके पावमें ऊर्ध्व रेखा और कमल था और उसकी रोजी यह