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सर्वकोश
सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)

Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished723 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

ग्रहणवासना ३५१
योग्वस्थानात् । नतिस्तथा । उक्तरीत्या सूर्यचन्द्रयोर्याम्योत्तरान्तररूपा तस्मात् । उभयो-
र्याम्योत्तरान्तररूपत्वादित्यर्थः । तथा । नत्या शरः संस्कृतः सूर्यग्रहणोक्तरीत्या । स्फुटः ।
भूपृष्ठसूत्रसक्तचन्द्रगोलकदेशाच्चन्द्रबिम्बपर्यन्तं याम्योत्तररूपं सूर्यग्रहणगणितक्रियोपयुक्तः
स्यात् ।।२९।।
केदारदत्तः— स्पष्ट लम्बन का स्वरूप बताया जा रहा है—
दृङ्मण्डल में जिस किसी भी स्थल पर गर्भीय सूत्र से पृष्ठीय सूत्र में जब सूर्य बिम्ब
लम्बित होता है, उस माप से सूर्यचन्द्र का अन्तर दृङ्मण्डल में पूर्वापर लम्बन होता है ।
तथा पूर्वापर अन्तर के साथ दृक्क्षेप वृत्ताभिप्रायिक सूर्य चन्द्र बिम्बों का याम्योत्तरानुरूप
अन्तर नति होती है । इस प्रकार पृष्ठीय स्पर्शादि मोक्षान्त काल साधन के लिये पूर्वापर
और याम्योत्तरान्तररूप दो अन्तर कलाओं के काल के तुल्य स्पर्शादि-अमान्त से मोक्ष-
पर्यन्त में दो संस्कार आवश्यक होते हैं ।
पूर्वक्षेत्र देखिये—नतिकला = भुज, दृग्लम्बन = कर्ण, दोनों का वर्गान्तर मूल = नति ।
सूर्य दृग्ज्या को परलम्बन से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने से दृग्लम्बन कला होती है,
इसी प्रकार दृक्क्षेप से नति का साधन करना चाहिए ।
उपपत्ति, $\frac{चंगति-सूर्यगति}{१५} = परम लम्बन=४८।४६$
तथा $\frac{गतियोजन}{१५} = भूव्यासार्ध । ७९०।३५$
लम्बन कला को काल में परिणत करने से, $\frac{६०\timesलम्बन कला}{गत्यन्तर} = लम्बन काल होत।$
है ।
प्राक्कपाल में सूर्य से चन्द्रमा आगे रहता है इसलिये लम्बन काल दर्शान्त में ऋण,
तथा पर कपाल में सूर्य से चन्द्रमा पीछे रहता है इस लिये लम्बन काल ऋण होता है ।
क्योकि यह सिद्धान्त है कि दो ग्रहों में यदि शीघ्र गति आगे पहुँच गया तो मन्दगति ग्रह
से संयोग कर आगे गया है इसलिये प्राक्कपाल में ग्रहयोग ऐसा हो चुका तथा यदि
शीघ्रगति ग्रह मन्द गति ग्रह से पीछे है तो गत्यन्तर जन्य काल के पश्चात् मन्द गति
ग्रह का शीघ्रगति ग्रह से योग होगा अतएव ऐसी स्थिति में योग अर्थात् युति गम्य
अर्थात् आगे होगी, स्वयं सिद्ध होती है ।
इसलिये भी प्राक्कपाल में लम्बन ऋण और परकपाल में धन होता है । यद्यपि
श्लो-२१ से २९ तक उपपत्ति स्वरूप यहाँ भी व्याख्या हुई है तथापि छात्रों के लिये
सुविधा की दृष्टि से सविशेष यह विषय यहाँ पर स्पष्ट किया जा रहा है ।