सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
Introduction lxvii
the long ascendancy of the Almagest was fast
coming to a close. Chandrasekhara's Almagest was
Surya-Siddhanta, and his Copernicus was Bhaskara.
Both Tycho and Chandrasekhara detected at an
early age discrepancies between observation and
calculation. Tycho held and Chandrasekhara still
holds the same views about the solar system. The
Copernican theory was before Tycho, and
Chandrasekhara knew the theory of Aryabhatta,
and we may add, heard not only of the diurnal
rotation of the earth propounded by the renowned
Aryabhatta, but of the annual revolution of the
earth round the Sun from modern Geography. But
both declined to accept the new theory on almost
precisely the same grounds. Tycho rejected the
Copernican theory chiefly for two reasons. "One
reason," says Professor Young, was that it was
unfavourably regarded by the clergy, and he was a
good churchman. The other was the scientific
objection that if the earth moved round the Sun,
the fixed stars all ought to appear to move in a
corresponding manner each star describing annually
an oval in the heavens of the same apparent
dimensions as the earth's orbit itself, seen from the
star. Technically speaking, they ought to have an
annual parallax."¹ Chandrasekhara is equally
- The fact that the stars should have parallaxes if the earth
revoired around the Sun was known at a very early date.
Tycho Brahe observed them in order to discover whether
they were sensibly fixed in the sky or not. So far his
observations went they did not change their positions
during the year. He inferred from this that the earth
remained fixed and that the Sun moved. His error was
due to the fact that his observatons were not sufficiently
accurate to show the slight displacement which the stars
lxviii सिद्धान्त दर्पण
supersitious wit Tycho, a staunch Hindu to the
backbone. How can he disbelieve the Sastras ? And,
besides, “the stars do not shift their places
according to the seasons of the year.”¹
The parallel drawn between Tycho and
Chandrasekhara is close so far. But it fails when we
remember that Tycho had the benefit of a university
education, of the patronage of kings, and what is
more important, that he had instruments as delicate
as he could desire. Chandrasekhara has spent his
life among his native hills, has seldom been five
miles away from his little village and did not receive
any encouragement from anybody in respect of his
work. Tycho had the friendship of Frederick II of
Denmark who gave him an estate in Norway; “a
pension of £400 a year for life, a site for a large
observatory, and 20,000 to build it with,” and
philosophers and statesmen and kings came to visit
his observatory and dined at his table.
And what did our Indian Tycho receive ? He
have. His observations were made shortly before the
invention of the telescope and he could not measure the
minute angles through which the stars were displaced.
In fact, there distances are so great and the parallactic
displacements are so small that the 19th century was well
advanced before astronomers succeeded in finding any
stars with measurable parallaxes.
- Many of his arguments are dircted against a
misconception of the new theory. For instance, he argues
that if the earth be rolling like a wheel, then it ought to
move only 12,000 Krosa per day; for that is the length of
the earth's circumference. But you say, its daily motion
is 8,00,000 Krosa. A stone whirled round has always the
same face turned towards us; how can there be an
alternation of day and night by the rotation of the earth,
and so on.
Introduction lxix
met with sneers from his equals in position, because
he shook off the aristocratic prejudice against
star-gazers and fortune-tellers. He had no one to
encourage him in his pursuit, and no notice was
taken of his work. Our Government could only
confer upon him an empty title which he had never
coveted. Geniuses are liek declicate plants, never
plentiful anywehre and depend upon tender care
for growth and development and fertility. Let me
therefore hope that the past neglect of his
countrymen may yet be compensated, and that
better days may yet dawn upon our old and crippled
observe of heavenly bodies.
Jogesh Chandra Roy¹
- The above article reproduced is the introduction written
in Feb' 1899 at Katak (presently Cuttack) by Late Professor
Jogesh Chandra Roy to the book 'Siddhanta-darpana' of
Samanta Chandrasekhara, published for the first time in
devanagari script.
विषय सूची
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
भूमिका i-iii
गणित क्रया शब्द iv-vi
सिद्धान्त दर्पण में प्रयुक्त अंकों के पर्याय शब्द vii-x
INTRODUCTION xi-lxix
१. मध्यमाधिकार
प्रथम प्रकाश - काल वर्णन १-१२
मंगलाचरण १
प्रतिज्ञा १०
गणित स्कन्ध की उपयोगिता १२
पुराने सिद्धान्तों की अपेक्षा विशेष बातें १३
वेदांग के रूप में ज्योतिषशास्त्र १५
सिद्धान्त नहीं जानने वाले की निन्दा १६
सिद्धान्त लक्षण १७
सिद्धान्त प्रशंसा १८
सिद्धान्त बरहस्य १९
पूर्व और उत्तर भागों के विषय २०
परब्रह्म से सृष्टि की उत्पत्ति २१
भचक्र का भ्रमण २२
ज्योतिष चक्र का काल रूप २३
काल के दो प्रकार २४
मूर्त्त और अमूर्त्त काल २५
त्रुटि आदि सूक्ष्म काल प्राण
आदि स्थूल काल २८
मुहूर्त के सूक्ष्म और स्थूल विभाग २९
नाक्षत्र, सावन, चान्द्र तथा
सौर दिन आदि ३१
देव और असुर दिन ३२
सन्धि सहित चार युगों का प्रमाण ३५
lxxii सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
सन्धि सहित मन्वन्तर का मान ३७
ब्रह्मा की दिन आदि आयु का मान ४०
सृष्टि आरम्भ से ग्रन्थ आरम्भ
तक का काल ४२
ब्रह्मा के दिन के दण्ड आदि ४४
सृष्टि अब्द ४६
भगण आदि प्रवृत्ति काल ४८
ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर प्रलय ५२
भगण राशि आदि विभाग ५४
श्री जगन्नाथ स्तव ५५
ग्रन्थ कार का परिचय ५६
द्वितीय प्रकाश - भगण आदि का वर्णन १३-१८
रवि, बुध, शुक्र का मध्य तथा मंगल
गुरु, शनि के शीघ्र के कल्प भगण १
मंगल, गुरु, शनि के मध्य, ग्रहों के मन्दोच्च
तथा चन्द्र पात के कल्प भगण ३
कल्प में नक्षत्र दिन ५
ग्रहों के कु दिन ५
चान्द्र मास निकालना ६
अधिमास निकालना ७
चान्द्र दिन निकालना ७
तिथि क्षय निकालना ७
सौर और चान्द्र मास संख्या ८
अधिमास संख्या ९
सौर सौर चान्द्र दिन संख्या १०
सावन दिन ११
क्षयतिथि ११
मन्द और शीघ्र केन्द्र के भगण १२
कल्प भगण, शीघ्र मन्दोच्च १३
नाक्षत्र और चान्द्र तथा भौम दिनों के
मध्यम प्राण १४
व्यावहारिक सावन दिन १५
विषय सूची lxxiii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
ग्रहों की दैनिक गति १६
भगण दिन आदि निकालना १६
दिन के अवयव १७
सूर्य भगण के दिन आदि १७
मध्यम गुरु के राशि भोग का समय १८
ग्रहों की दस प्रकार की गति, चन्द्र
का उच्च और पात १९
श्री जगन्नाथ स्तुति २५
उपसंहार २६
तृतीय प्रकाश - मध्यम ग्रह १९-३२
मध्यम ग्रह के लिये रवि मध्यम सावन
दिन निकालना १
अहर्गण में एक दिन कम या
अधिक करना ९
वार अधिपति १३
मास अधिपति १५
वर्ष अधिपति १६
मास वर्ष का गत तथा गम्य काल १६
वर्ष अधिपति के बारे में दूसरा मत १७
पालक अधिपति २०
अहर्गण से ग्रहों के भगण राशि
आदि निकालना २२
मध्यम गुरु के प्रभव आदि संवत्सर २६
अधिवत्सर का निर्णय २८
लुप्त संवत्सर का निर्णय २८
महा अतिचार २९
अच्युत आदि द्वादश युग ३०
पांच प्रकार के आंगिरस वर्ष ३०
इन वर्षों के अधिपति ३१
प्रभव आदि साठ संवत्सरों के
शुभ अशुभफल ४४
बारह युगों के अधिपति ४६
lxxiv सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
रवि चन्द्र निकालने की संक्षिप्त विधि ४७
अन्य प्रकार के अहर्गण ४८
उसमें अन्य मत ५०
द्वापर अन्त में ग्रहों का ध्रुव ५१
द्वापर अन्त में अन्य ध्रुव ५४
करणाब्द से मध्यम सौर वर्ष के अहर्गण ५५
पञ्जिका का प्रथम दिन ५५
उसके पहले दिन के ग्रह ध्रुव आदि ५८
मन्दोच्च तथा पातों के ध्रुव ५९
गत वर्ष से ये मान निकालना ७१
वर्ष हार से ये मान निकालना ७२
हार संख्या ७३
मंगल बुध शनि के मन्दोच्च का चलन ७४
श्री जगन्नाथ स्तुति ७७
उपसंहार ७८
चतुर्थ प्रकाश - ग्रहों के संस्कार तथा पदक ३३-४१
देशान्तर संस्कार के लिये पृथ्वी का मान १
भू परिधि संस्कार २
अन्य विधि ३
भूमध्य रेखा ४
देशान्तर योजन ६
देशान्तर पल आदि ७
अन्य विधि ८
वार प्रवृत्ति ९
अन्य मत ११
भास्कर मत की वार प्रवृत्ति का खण्डन १३
देशान्तर घटी से ग्रह संस्कार १५
चन्द्र ग्रहण से अपने देशान्तर का निर्णय १६
ग्रह में उदय और अस्त काल
का चर संस्कार १८
सूक्ष्म कार्य के लिये गताब्द का चर २५
भुजान्तर फल निकालना २७
विषय सूची lxxv
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
उसकी अन्य विधि २८
उदयान्तर फल निकालना ३२
भुजान्तर तथा उदयान्तर फल से
ग्रह का संस्कार ३३
स्फुट ग्रह में भी संस्कार की आवश्यकता ३८
चर, भुजान्तर और उदयान्तर
की आवश्यकता ३९
निरक्ष देश से अभीष्ट स्थान का अन्तर ४२
मध्यम ग्रह सहज निकालने के लिये पदक ४३
सौर वर्षों का दिन निकालने की विदि ४५
दिन गणना में वार द्वारा शुद्धि ४५
एक से दस करोड़ दिनों के मध्यम
ग्रहों की तालिका ४६
पदकों के अन्त में ध्रुव का मान ४७
चन्द्र पात ५१
सन्दिग्ध अंक का संशोधन ५२
मन्द और शीघ्र गति के खण्ड फल ५३
विभिन्न प्रकार के अहर्गण ५४
अहर्गण के अनुसार ग्रहों की राशि आदि ५५
उत्कल मध्य तथा पुरुषोत्तम क्षेत्र की गणनायें ५६
श्री जगन्नाथ स्तुति ५७
उपसंहार ५८
२. स्फुटाधिकार
पंचम प्रकाश - स्फुट ग्रह ४२-७७
भूपृष्ठ से देखे गये ग्रह की गणना १
प्रवह वायु २
ग्रहों की पूर्व पश्चिम गति ३
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार शीघ्र मन्दोच्च पात ५
अपने मत से ग्रह कक्षा का केन्द्र मध्य रवि ६
मंगल आदि का सूर्य के साथ पृथ्वी
की परिक्रमा ७
गति के आधार पर मध्य और शीघ्र ८
lxxvi सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
सूर्य बुध आदि की दूरी का क्रम ९
उसके अनुसार गति में कमी ११
चन्द्र का भ्रमण १२
चक्र और चक्रार्ध में ग्रह का दीखना १३
सीधी तथा वक्र गति १५
सम और विषम पाद में शीघ्र परिधि १६
ग्रहों का मन्दोच्च द्वारा आकर्षण २३
भुज का धन या ऋणमान २४
चन्द्र आदि का पात के अनुसार विक्षेप २८
परम विक्षेप ३१
आठ प्रकार की स्फुट गति ३२
रवि चन्द्र की पांच प्रकार की गति ३६
सूर्यसिद्धान्त के अनुसार स्फुटग्रह ४२
ज्या, धनु तथा कर्ण का अर्थ ४३
ज्यार्द्ध को ज्या मानना ४५
ज्या का रूप ४७
त्रिज्या ४८
२४ खण्डों की ज्या का साधन ४९
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार इनका मान ५५
क्रम और उत्क्रम ज्या ६६
शीघ्र तथा मन्द केन्द्र ६७
भुज और कोटि राशि ६८
इनकी ज्या ६९
इष्ट राशि की ज्या और उत्क्रम ज्या ७०
इष्ट ज्या से चाप निकालना ७३
भुज की कोटिज्या से कोटि की भुजज्या ७४
मंगल, बुध, शनि के मन्द तथा बुध
शीघ्र का परोच्च ७६
परोच्चों का स्थान ७७
अदृश्य ग्रह के उपयोग ७९
तीन ग्रहों का परोच्च ८१
स्फुट मन्दोच्च तथा उसकी गति ८४
विषय सूची lxxvii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
बुध शीघ्र का स्फुट मान ८७
सूर्य सिद्धान्त तथा भास्कर मत-रवि
चन्द्र की मन्दपरिधि ८९
दृक् सिद्ध मन्द परिधि १०६
शीघ्र परिधि निकालना १०६
मंगल आदि की मन्द परिधि १०७
मंगल बुध शुक्र की मन्द परिधि १०९
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मन्दफल
तथा शीघ्रफल १११
शीघ्र और मन्द संस्कार का क्रम १२१
मंगल और बुध के संस्कार १२४
ग्रहों की स्फुट गति निकालना १३२
मंगल, बुध, शनि का गति साधन १५१
मंगल आदि का वक्र और ऋजु केन्द्रांश १५९
स्फुट ग्रह से मध्य ग्रह निकालना १६६
खण्ड फल की सरल विधि १६७
सूर्य चन्द्र मंगल का मन्द फल १७८
मंगल के स्थिर फल के सात खण्ड १७९
खण्ड फल से गति निकालना १८०
ऋजु और वक्र गति का निर्णय १८७
नष्ट फल निकालना १८८
उदयांश और अस्तांश तथा खण्डफल १८९
चतुर्थ केन्द्र गति १९९
तिथि आदि का भोगकाल २००
तिथि, मास की वृद्धि क्षय की स्थूल गणना २०१
स्थूल पंजिका के उपयोग २१०
श्री जगन्नाथ स्तुति २११
उपसंहार २१२
षष्ठ प्रकाश - सूक्ष्म पंचांग ७८-१०६
विवाह आदि में सूक्ष्म पंजिका का उपयोग १
चन्द्र बिम्ब आदि निकालना ५
तुंगान्तर पाक्षिक तथा दिगंश संस्कार ६
lxxviii सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
भुजान्तर फल के नियम १६
चन्द्र की सूक्ष्म गति १७
पक्ष का आधा तथा पाद निर्णय २३
ग्रहण काल के लिये चन्द्र की सूक्ष्म गति २४
तुंगान्तर आदि का कारण २७
स्थूल सूक्ष्म विचार ३१
दृक् कर्म के नियम ३३
भविष्य में चन्द्र गति में संशोधन ४७
पूर्व आचार्यों के स्थूल मत का कारण ५७
सूक्ष्म नक्षत्र निकालना ५८
ग्रहों का संक्रान्ति काल ६१
तिथि आदि का सन्धि काल ६९
प्रतिमण्डल, अपमण्डल, विमण्डल ७३
क्रान्ति पात के भगण ७५
उससे अयनांश निकालना ७९
दैनिक गति ८१
करणाब्द के ध्रुव ८१
चलांश का धन ऋण विचार ८३
छाया द्वारा गणित सूर्य तथा स्फुट सूर्य से
अयनांश की जांच ८८
क्रान्ति का निर्णय ९२
द्युज्या ९७
क्रान्ति गति ९८
सौम्य याम्य गोल
क्षितिज्या १००
चर प्राण निकालना १०२
दिनरात्रि का मान १०३
विक्षेप के कारण स्फुट क्रान्ति १०५
व्यावहारिक स्थूल फल १०६
ग्रहों के अपने अहोरात्र का मान ११६
स्थूल सावन दिन १२०
लग्न निकालना १२१
विषय सूची ix
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
अस्त लग्न १३४
होरा आदि विभाग १३५
इष्ट काल से स्फुट लग्न १३६
स्फुट लग्न से इष्ट काल १४१
मध्य लग्न १४३
अयनांश अनुसार लग्न का मान १५३
गर्ग मत से सूक्ष्म नक्षत्र १५७
करणाब्द के ध्रुव , १५८
अयनांश की अन्य विधि १५९
जगन्नाथ स्तुति १६०
उपसंहार १६२
३. त्रिप्रश्नाधिकार
सप्तम प्रकाश – शंकु छाया वर्णन १०७-१२५
शंकु छाया द्वारा दिशा निर्णय १
छाया भुज और कोटि के कर्ण शंकु के रूप १०
छाया वृद्धि १४
आकाश के मण्डल, अग्रा, अक्षप्रभा आदि २२
अक्ष और लम्बांश, यष्टि, दृग्ज्या आदि ४१
भुज निकालना ४३
सममण्डल ५०
छाया लम्बाई से स्फुट सूर्य आदि ५५
कोण शंकु का छाया कर्ण ५६
करणी साधन ५८
अक्षफल कोणशंकु ६०
दृग्ज्या, कोणशंकु का छाया कर्ण ६२
उदयज्या ६४
क्रान्ति आदि का असकृत् कर्म ६६
अभीष्ट काल के छाया की लम्बाई ६७
छाया से समय निकालना ६८
अन्त्या, उन्नतज्या तथा छेद ६९
शंकु से तत प्राण ७४
तारा ध्रुव से रात्रि में समय निकालना ८५
lxxx सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
स्तुति तथा उपसंहार ९४-९५
अष्टम प्रकाश – चन्द्र ग्रहण वर्णन १२६-१४६
चन्द्र और सूर्य ग्रहण की सम्भावना १
रवि चन्द्र का बिम्ब व्यास १२
उनके मध्य और स्फुट मार्ग कर्ण, बिम्बकला १५
मन्द और स्फुट कर्ण २०
भूछाया की लम्बाई २५
तम का मान २७
वेद पुराण के अनुसार ग्रहण का अर्थ ३२
ग्रहण की दिशा ३३
चन्द्रपात में दिगंश संस्कार ३४
चन्द्र का विक्षेप शर की दिशा ३५
विक्षेप और शर के अनुसार ग्रास का मान ४०
ग्रहण की स्थितियों की अवधि ४५
दृक् सिद्ध तम मान ५१
इष्ट ग्रास काल, आयन वलन ५७
आक्ष वलन, चन्द्र का उदय अस्त ६०
चान्द्र दिन मान ६५
कदम्ब वृत्त में वलन ६६
अक्षज्या, क्रान्तिज्या ६९
अवतमस ७८
विभिन्न तमसों का मान ७९
ग्रहण के वर्ण भेद ८६
स्तुति और उपसंहार ८७-८८
नवम प्रकाश – सूर्य ग्रहण वर्णन १४७-१६२
सूर्य ग्रहण के लिये लम्बन १
सम पर्वकाल ४
वित्रिभ लग्न, नति साधन, दृग्गति ११
असकृत् विधि से स्फुट लम्बन १५
(सकृत एकबार) विधि से लम्बन, पर्वकाल २०
पर्वकाल, त्रिभोनलग्न क्रान्ति २५
विषय सूची lxxxi
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
शराक्ष दृक् क्षेप ३०
सूक्ष्म शराक्ष और दृक्क्षेप ३४
तम कर्ण ४५
स्फुट तम ४५
काल होरा ४९
स्पर्श, मोक्ष काल ५४
ग्रास की दिशा ६१
वलय ग्रास का काल ६८
ग्रहण काल का परमान, क्षयवृद्धि ८७
स्तुति और उपसंहार ८८-८९
दशम प्रकाश - परिलेख वर्णन १६३-१६
परिलेख का उद्देश्य १
शंकु और छेद, अर्द्ध ग्रास का अंगुल २
ख वृत्त में दिशा, वलन ग्रास की दिशा तथा शर २१
स्पर्श मोक्ष और मध्य ग्रहण १४
ग्राहक मार्ग, इष्टकालिक ग्रह २३
शलाका और वलन चालन ३२
सूर्य ग्रहण के लिये विशेष फलक ३५
ग्रहण फल का वर्णन नहीं ३६
स्तुति और उपसंहार ३७-३८
एकादश प्रकाश - ग्रहयुति वर्णन १७०-१८७
युति युद्ध और समागम १
सीधी और वक्र गति में गत और गम्य काल ५
ग्रहों की लिप्ता समान करना, उसके समय
का स्थिर मान ११
बुध शुक्र का मन्दफल, विक्षेप तथा स्पष्ट शर १६
पातोन ग्रह, क्षेपकर्ण, शरश्रुति २४
विक्षेप आयनदृक्कर्म, ध्रुव सूत्र ३१
स्फुट क्रान्ति, चर, नतोन्नत काल,
गत गम्य काल ३७
तारा ग्रहों का बिम्बमान ४१
बिम्ब विकला और योजन ५०
lxxxii सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
स्फुट बिम्ब मान, भास्वर बिम्ब, दृग्बिम्ब ५५
युद्धों के प्रकार ६९
भौम आदि का नति, लम्बन ७१
ग्रह तारा युति, बुध शुक्र से सूर्य का भेद ७५
चन्द्र और तारा ग्रहों की युति ८४
शराक्ष आदि की दिशा, ग्रह नक्षत्र युति ९०
उसके छेदक छाया अग्रा १०१
नलिका वेध ११०
स्तुति और उपसंहार १११-११२
द्वादश प्रकाश – ग्रह और नक्षत्र का योग १८८-२०४
नक्षत्रों का ध्रुवांश १
नक्षत्रों का विक्षेप ७
नक्षत्रों की तारा संख्या १२
नक्षत्रों की आकृति १५
योगतारा की स्थिति १९
योगतारा का विकलामान, लुब्धक की स्थिति २३
अगस्त्य की स्थिति ३५
सप्तर्षि की स्थिति ४१
ध्रुव की स्थिति ५०
भानांश, कालांश और क्षेत्रांश ६४
ध्रुव भगण, दृक् कर्म स्फुट विक्षेप आदि ७१
नक्षत्र चलन में क्रान्ति भेद, विभिन्न
स्थानों से दृश्यता ७८
ग्रहयुति साधन ८०
बिम्ब भेद योग्य नक्षत्र, रोहिणी शकट भेद ८६
धायापथ, यन्त्र द्वारा विशेष दृष्टि ९२
स्तुति तथा उपसंहार ९६-९७
त्रयोदश प्रकाश – ग्रह नक्षत्र का उदय और अस्त २०५-२१९
सूक्ष्म उदय और अस्त, उसकी दिशा, दृक् कर्म १
आक्ष कर्म, कालांश और लम्बान्तर १०
चन्द्र का विक्षेप, भानांश का मान और दिशा १५
विषय सूची lxxxiii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
मान विकला के अनुसार उदय अस्त मय अंश २४
शुक्र आदि का उदय और अस्त, गत
और गम्य काल ३४
स्फुट क्रान्ति के लिये दृक् कर्म ध्रुव ४३
ग्रह नक्षत्रों के उदय अस्त का कारण,
दिङ्मण्डल संस्कार ५०
सूर्य का स्फुट केन्द्र, नत तथा
उन्नति, कालांश संस्कार ५७
मेष में सायन सूर्य रहने पर उत्कल
देश के क्षेत्रांश आदि ६८
अन्य स्थानों में ग्रह सूर्य की अन्तर
कला की गणना ७३
दृक् कर्म से स्फुट उदय और अस्त काल ८१
उदय अस्त काल, सूर्य चन्द्र शुक्र के प्रकाशांश ८४
स्तुति और उपसंहार ८५-८६
चतुर्दश प्रकाश - चन्द्रशृंगोन्नति वर्णन २२०--२३०
अध्याय का विषय १
दृक्कर्म संस्कार से सूर्य चन्द्र का
नित्य उदय अस्त २
सावन और नाक्षत्र दिन, चान्द्र सावन दिन ७
शृंगोन्नति काल, शृंग के वक्र होने का कारण ११
आयन तथा आक्ष वलन और वलन,
सूर्य चन्द्र अन्तर २६
ख वृत्त लेखन ३०
उसमें सूर्य बिन्दु चन्द्र बिम्ब तथा
कपाल लेखन ३५
शुक्ल भाग का निर्णय, किरण व्याप्ति ४०
चन्द्र कला का योग तथा घटाव ४५
शुक्ल अंगुल मान, छेदक न्यास ५१
सूर्य पृथ्वी पृष्ठ तथा ऊर्ध्वाकाश लेखन ५५
वर्ण सूत्र से सित भाग की स्थिति, प्राचीन
सिद्धान्त में सुधार ६१
lxxxiv सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
यन्त्र से बुध और शुक्र के शृंग का
दर्शन, व्याख्या ६७
स्तुति और उपसंहार ६८-६९
पञ्चदश प्रकाश – महापात वर्णन २३१-२४४
विषय १
वैधृति तथा व्यतीपात की सम्भावना २
उनका स्वरूप तथा साधन ६
मध्यकाल, चक्र चक्रार्द्ध काल, दृक्
कर्म का निषेध १७
गत और गम्य काल, सूर्य चन्द्र
क्रान्ति का अन्तर २१
क्रान्ति गति के लिये असकृत् कर्म २५
स्पर्श, मोक्ष और स्थिति अर्द्ध का स्थिर मान ३४
मध्य काल का दारुण फल, वार निर्णय,
गोल और अयनभेद ४३
पात द्वारा ग्रह का क्षेप, २७ योगों में महापात ५१
सृष्टि काल, सृष्टि तथा कलि आरम्भ
से युग प्रवृत्ति ५९
करणाब्द आरम्भ का निर्णय तथा उसके ध्रुव ६३
सिद्धान्त तन्त्र तथा करण का फल ६७
भास्कर ध्रुव की त्रुटि, ब्रह्मा की आयु
के विषय में मत ६९
स्तुति तथा उपसंहार ७०-७१
४. गोलाधिकार
षोडश प्रकाश – प्रश्न वर्णन २४५-२५७
मंगलाचरण और विषय १
गोल ज्ञान का महत्व ६
गुरु शिष्य संवाद से सन्देह निवारण,
भूगोल के प्रश्न १२
पौराणिक मत १७
बौद्ध तथा जैन मत २५
भूभ्रमण मत (आधुनिक) २८
विषय सूची lxxxv
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
पूर्व सिद्धान्त तथा आर्य भट्ट मत ३८
सृष्टि क्रम, पृथ्वी का मान तथा
उसकी स्थिति, लोक ४२
संवत्सर, भेद, पदक तथा अतिरिक्त संस्कार,
मन्द और शीघ्र परिधि ४९
भुजगति फल दिनरात, लग्न मान
में अन्तर क्रान्ति ५३
सूर्य मान में अन्तर, लम्बन, नति,
वित्रिभ लग्न ५६
शराक्ष, शंकु कल्पना ६०
शरवलन ग्रह कक्षा में अन्तर, स्फुट शर ६२
रात्रि के अन्धकार का कारण ६६
ग्रह और तारा की दृष्टि सीमा ६७
नक्षत्र कक्षा, मेरु का उदय अस्त ६८
चन्द्र की कला शंकु तथा शृंगोन्नति के प्रश्न ७१
महापात, महः आदि लोक ७३
सौर, पितृ दिन, ब्रह्मा दिन ७५
प्रलय और वर्ष भेद, काल यन्त्र तथा मान यन्त्र ७६
ऋतु मान का अन्तर, मोक्ष, सरल पंचांग आदि ७७
स्तुति तथा उपसंहार ८०-८१
सप्तदश प्रकाश – भूगोल स्थिति वर्णन २५८-२८८
पृथ्वी की स्थिति विषय में तर्क तथा
शास्त्र वचन द्वारा समाधान १
पृथ्वी का आधार भूकम्प ६
पृथ्वी का विस्तार १३
गोलाकार तथा समतल रूप दिखायी देना १८
देशान्तर के कारण सूर्य और
चन्द्र दर्शन में अन्तर २१
पुराण और बौद्ध मत से पृथ्वी की स्थिति २८
पृथ्वी भ्रमण का खण्ड ३९
नक्षत्रों की सापेक्षगति का खण्डन प्रवह वायु ४१
जगत् शब्द की व्याख्या ४४
lxxxvi सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
सूर्य केन्द्रित आकर्षण द्वारा ग्रह गति का खण्ड ४८
पृथ्वी के दैनिक अक्ष भ्रमण का खण्डन ५५
दैनिक गति और क्रान्ति वृत्त का विरोध ५७
पृथ्वी की दीर्घवृत्त गति का निराकरण,
चन्द्र कलंक दर्शन ६६
ईश्वर की इच्छा ही प्रमाण ६८
सूर्य और अन्य ग्रहों के अक्ष भ्रमण पर
चन्द्र का नहीं ७३
अक्ष भ्रमण और ग्रहों के आकार में विषमता ७५
भास्कर मत-प्राकृतिक गुण के कारण गति ७७
ग्रह भ्रमण का आरम्भ काल ७९
मध्य सूर्य के बदले स्पष्ट सूर्य को
केन्द्र मानने में भूल ८१
मध्य रवि को केन्द्र मानने से शंका समाधान ८८
मन्द, पात और शीघ्र- देवता या पिण्ड ९४
बडे ग्रहों का अधिक शर तथा पृथ्वी शर हीन ९७
पृथ्वी और अन्य ग्रहों में भेद-सूर्य
से ग्रहों में वाष्प १०२
सौर मण्डल का भार केन्द्र १०५
पृथ्वी भ्रमण के कारण नीचे गिरते पत्थर
की दिशा में अन्तर ११२.
ग्रहों के भ्रमण काल और सूर्य से
दूरी में सम्बन्ध ११६
इस सूत्र के अनुसार सूर्य का अक्ष
भ्रमणवाल नहीं १२१
मन्द और शीघ्र फल दीखने के कारण ग्रहों
द्वारा पृथ्वी और सूर्य दोनों की परिक्रमा १२९
तारागण सूर्य समान और अति दूर
होने में शंका १३४
भचक्र स्थिरता का खण्डन १३९
सूर्य समान असंख्य तारा होने पर रात्रि कैसे १४२
ध्रुवीय व्यास कम होने अक्ष भ्रमण
के कारण नहीं १४६
विषय सूची lxxxvii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
ईश्वर लीला का पार्थिव यन्त्र
द्वारा खण्डन नहीं १४८
पृथ्वी स्थिर तथा सूर्य केन्द्रित ग्रहों का भ्रमण १५१
स्तुति और उपसंहार १६०-१६१
अष्टादश प्रकाश – भूगोल वर्णन २९०-३१७
नाना मत से इष्ट देव को नमस्कार १
पूर्वप्रश्न उत्तर में सृष्टि कथन २
सौर मत से सृष्टि ३
सूर्य आदि का स्वरूप २३
चन्द्र कला का वर्णन ३२
कलंक की उत्पत्ति ३५
जल और तेज भाग ३८
भूमि में जल और स्थल का विभाग ४५
द्वीप और सागर की स्थिति ४८
गोल मत की विस्तृत युक्ति ५२
उसका गणित ५६
शंकु का मान ५९
उत्क्रम ज्या का अर्थ ६४
दृष्टि सीमा का निर्णय ६९
हिमालय का उदाहरण ७२
उसका दृश्य और अदृश्य विभाग ७५
उसकी प्रत्यक्षता ७७
उसकी उन्नत दृक् सीमा ७८
सुमेरू की स्थिति ८२
भारत की स्थिति ८८
द्वीप भेद और सागर ९१
उसका असल रूप ९४
क्षीर सागर आदि ९८
अन्य ग्रन्थों में मेरू का वर्णन १००
देव और असुरों का विभाग १०२
अक्षांश और देशान्तर निर्णय १०५
विषुव स्थान १०६