सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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बांस के गोले में राशि सन्धि को ठीक स्थान पर चिह्नित करेंगे । इसके बाद
आयन संस्कृत मेष आदि को विषुवद् वृत्त से सटाकर रखेंगे ।
तत्कर्क नक्र मुखयोः सदलाग्नि भुजां (२३।३०) श दूरगं विषुवात्
कलनीया कुशलधिया रविगतिमार्गः यदेवाहुः । २१ ।
क्रान्ति और विषुव वृत्त का परमान्तर कर्क और मकर रेखा के स्थान पर २३°
३०' होगा । इस क्रान्ति वृत्त को ही रवि गति मार्ग कहा जाता है ।
ऊर्ध्वाधः प्राक् पश्चिम याम्योत्तर विन्दु षट्क मवैव
प्रत्येकं स्वस्तिकं भिति गदितं स्वस्वस्तिकं चोर्ध्वम् । २२ ।
इस वृत्त के ऊपर, नीचे, पूर्व पश्चिम, तथा दक्षिण उत्तर (याम्योत्तर) इस प्रकार
६ बिन्दु देंगे । प्रत्येक बिन्दु को ख स्वस्तिक कहा जाता है । उर्ध्व के स्वस्तिक
को ऊर्ध्व खस्वस्तिक कहते हैं ।
चन्द्रादीनां पातानपमण्डलंगान् विधाय तद् भार्द्धे
पात स्थाने च लग्नू क्रान्तिजवृत्ते त्रिभान्ते तु । २३ ।
चन्द्र आदि ग्रहों के पात राशि आदि को क्रान्ति वृत्त में चिह्नित करेंगे । उसमें
चन्द्र विमण्डल को एक स्थान लगा कर पुनः ६ राशि दूरी पर विमण्डल और
क्रान्ति वृत्त का मिलन (सम्पात) करायेंगे । सम्पात बिन्दुओं से तीन राशि की दूरी
पर
पातात् पश्चात् पुरतो याम्योत्तरग विमण्डला क्रान्तेः
परमशरान्ते देय तेषा मध्येऽनुपातेन । २४ ।
पात के आगे पीछे दोनों (विमण्डल और क्रान्ति वृत्त) का अन्तर चन्द्र के
परम शर के बराबर उत्तर और दक्षिण दिशा में होगा ।
किन्तु कुजादेः पाताश्च फल भागैः सुसंस्कृता स्थाप्याः
श्रुति संस्कृति विशिखान्ते तद् गति मार्गों विवृत्तारूयः । २५ ।
मंगल आदि ग्रहों का विमण्डल भी इसी विधि से बांधा जायेगा । किन्तु
इनके पातों में इनके शीघ्र फल से संस्कार करना पड़ेगा । कर्ण के अनुपात से
उनका परमशर निकाल कर उतने ही अन्तर पर उन ग्रहों का विमण्डल क्रान्ति
वृत्त से उत्तर तथा दक्षिण रहेगा ।
क्षितिज वलयं निरक्षेऽप्युन्मण्डल नामकं परिज्ञेयम्
तच्चर हेतु स्तस्मात् स्वक्षिति जात् खार्द्धगान्त्यज्या । २६ ।
निरक्ष देश का क्षितिज वृत्त अन्य स्थानों पर (विषुव से उत्तर या दक्षिण)
उन्मण्डल कहलाता है । इस वृत्त के कारण ही चर की उत्पत्ति होती है (वृत्त
क्षितिज से झुका होने के कारण नक्षत्र और राशियों का उदय विषुव से पहले या