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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

३२० सिद्धान्त दर्पण
तेषा चलाख्या भवति क्षितोन मध्याप्र सञ्चारि सितज्ञयोश्च
अनल्पगत्यो रवि मध्यकक्षा मध्याभिधास्या रवितश्चलाख्या । १० ।
उनके शीघ्र केन्द्र की कक्षा होगी । सूर्य और पृथ्वी के बीच में स्थित अधिक
गति शील बुध और शुक्र का मध्य रवि कक्षा ही है । रवि के चारों ओर उनकी
जिस चल कक्षा के बारे में कहा गया उसमे रवि से-
साप्यर्कतस्तन्मृदुकर्णसिद्धौ मध्योच्यते कौरिव चन्द्रभान्वो-
सूर्य्यत्कुजाद्यन्तर एवमन्द कर्ण स्फुटाद्वाङ्घ्रदुजः कुगोलात् । ११ ।
बुध और शुक्र का मन्द कर्ण साधन करने के लिए उसको मध्यकक्षा भी कहा
जा सकता है । जिस प्रकार भूमि से चन्द्र और सूर्य के मन्दकर्ण साधन के लिए
मध्यकक्षा होती है । सूर्य से मगंल आदि की दूरी से मन्द कर्ण या स्फुट मन्द
कर्ण है । पृथ्वी से मंगल आदि की दूरी शीघ्र कर्ण तथा रवि चन्द्र आदि की दूरी
शीघ्र कर्ण है ।
सूर्य्यज्ञा स्फूजितां मध्य कक्षा योजन संख्यया
शताहताष्टशून्याभ्रनागासैन्धवसिन्धवः (४७८००८००) । १२ ।
सूर्य, बुध, शुक्र की मध्य कक्षा का योजन ४,७८,००,८०० है ।
शीघ्रकक्षय मे वोक्ता कुजजीवार्कि जन्मनाम्
बुधस्य नखवेदांग बाणाब्धिधृतयो (१,८४,५६,४२०) निजा । १३ ।
यही (सूर्य मध्यम कक्षा) मंगल, वृहस्पति तथा शनि की चलया शीघ्र कक्षा
है । बुध की चल कक्षा (१,८४,५६,४२०) योजन है ।
शुक्रस्याष्टाष्ट पञ्चेषु पञ्चाङ्गाब्धि गुणाः (३,४६,५५, ५८०) स्वका ।
मध्यांगारस्य ख खषड् गुणाभ्रगुणदृङ्नगः (७,२३०,३,६००) । १४ ।
शुक्र की चल या शीघ्र कक्षा (३,४६,५५,५८०) योजन है ।
मंगल की मध्य या मन्द कक्षा (७,२३,०३, ६००) योजन है ।
गीष्पष्ट नखरामाष्ट शरसिद्धाः शताहताः (२४,५८,३२,०००) ।
शनेः ख ख रसाद्र्यग्नि पक्ष चन्द्राब्धि सिन्धवः (४४,१२३, ७६००) । १५ ।
गुरु की स्पष्ट या मन्द कक्षा (२४,५८,३२,०००) योजन हैं । शनि की मन्द
कक्षा (४४,१२,३७,६००) योजन हैं ।
शीघ्रकक्षा भ चक्रांश (३६०) गुणिता मध्ययोद्धृता
लब्धाः शीघ्र परिध्यंशा श्वक्र चक्रार्द्धजा मताः । १६ ।
ग्रह की शीघ्र (चल) कक्षा को ३६०° से गुणा कर ग्रह की मध्यकला से भाग
देने पर युग्म पादान्तर की शीघ्र परिधि के अंश आदि होंगे ।