सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 609 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूगोल खगोल वर्णनम् ३१९
नक्षत्र कक्षा खचरैः समेतो यस्माद तस्तैर्न समाहतोऽम्
भपञ्जरः खेचर, चक्र युक्तो भ्रमत्यजस्रं प्रवहानिलेन । ५ ।
होकर नक्षत्र कक्षा तथा ग्रह कक्षा आदि रहकर प्रवह के आघात से सभी की
कक्षा पश्चिम दिशा में गतिशील है ।
यान्तो भचक्रे लघुपूर्व गत्या खेटास्तु तस्या पर शीघ्रगत्या
कुलाल चक्रे भ्रमि वामगत्या यान्तो न कीटा इव भान्ति यान्तः। इति । ६ ।
भचक्र की पश्चिम गति के भीतर ग्रह अपनी अल्प गति से (भचक्र) की
तुलना में) पूर्व की तरफ इसी प्रकार चलते हैं । जैसे कुम्हार का चक्र जिस दिशा
में घूमता है, उसकी विपरीत दिशा में कोई कीड़ा धीमी गति से जा रहा हो ।
चाक की तेज गति के कारण कीड़ा भी उसी दिशा में चलता दिखायी देगा, बहुत
ध्यान से देखने पर उसकी अपनी गति दिखायी देगी । (इसी प्रकार ग्रह भी पश्चिम
की तरफ भचक्र के कारण चलते हैं, तारों की तुलना में उनकी क्रमशः पूर्व की
तरफ गति बहुत सावधानी से देखने पर ज्ञात होता है ।) उद्धरण समाप्त ।
प्राग् यापि मध्यम रवे परितो भसूत्रे
मन्दोच्चकृष्ट तनवः खचरा भ्रमन्तः ।
तिष्ठान्त यावति भुवोऽन्तर एव तस्मात्
पश्चाद् यतां बहुविधा भवतिस्वकक्षा । ७ ।
मध्यम रवि पूर्व की तरफ जाता है । उसके चारों तरफ मन्दोच्च से आकृष्ट
होकर बिम्ब शरीर वाले ग्रह घूमते हैं । ये पृथ्वी से पश्चिम दिशा में जाते हैं ।
(नक्षत्र मण्डल के साथ) अतः इन ग्रहों की कक्षा के मध्यम और स्फुट कई प्रकार
के भेद हैं ।
अथावनीवेष्टन कृद्रवीन्द्रोर्न्यूनाधिका कर्षणतो मृदुत्वात् ।
कक्षानिजा स्यादत एव मध्या लेख्याग्रतः कर्म ततः स्फुटानाम् । ८ ।
पृथ्वी के चारों तरफ रवि और चन्द्र भ्रमण करते हैं । मन्दोचल के कम या
अधिक आकर्षण से इनके मार्ग में थोड़ा परिवर्तन होता है । अतः पहले मध्यम
कक्षा लिखकर तब स्फुट साधन के लिए कक्षा लिखी जाती है ।
भूसूर्य बाह्याम्बर सञ्चराणां दवीयसां जीव कुजार्क जानाम्
गत्यल्प भावान्निजमध्य कक्षा मध्यार्कतो मध्य रवेस्तु कक्षा । ९ ।
पृथ्वी और सूर्य के बाहर अति दूर में स्थित होकर वृहस्पति , मंगल, और
शनि की गति अत्यन्त कम होने के कारण और मध्यम सूर्य की गति भी कम होने
से मध्यम सूर्य केन्द्र से ही उनकी अपनी अपनी मध्य कक्षा होगी । मध्यम रवि
कक्षा ही